तलाक के 6 महीने बाद बच्चे को लौटाने पहुंची पत्नी घर की हालत देख रोने लगी
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टूटता घर, लौटता प्यार
तलाक को पूरे छह महीने हो चुके थे। एक समय था जब सुनीता और अमित का घर हंसी-खुशी से भरा रहता था, लेकिन अब दोनों अलग-अलग दुनियाओं में जी रहे थे। उस दिन दोपहर का समय था, जब सुनीता अपने छोटे से बेटे अर्जुन को गोद में लिए अमित के घर के दरवाजे पर खड़ी थी।
उसने धीरे से दरवाजा खटखटाया।
कुछ क्षणों बाद दरवाजा खुला। सामने अमित खड़ा था—थका हुआ, कमजोर, और जैसे जिंदगी से हार चुका हो। दोनों की नजरें मिलीं, लेकिन शब्द जैसे गले में अटक गए।
सुनीता ने बिना कुछ कहे अर्जुन को अमित की गोद में थमा दिया और बोली,
“तुम ही संभालो इसे… मुझसे नहीं हो रहा।”
यह कहकर वह मुड़ गई।
अमित हतप्रभ रह गया। उसने तुरंत आवाज लगाई,
“सुनीता… रुको… अंदर आ जाओ… कम से कम बैठ तो जाओ…”
लेकिन सुनीता ने कदम नहीं रोके।
तभी पीछे से एक मासूम आवाज आई—
“मम्मा… इधर आओ…”
यह अर्जुन की आवाज थी।
उस आवाज ने सुनीता के कदम रोक दिए। उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। वह धीरे-धीरे पलटी और अपने बेटे को देखने लगी, जो अपने छोटे-छोटे हाथ उसकी ओर बढ़ा रहा था।
अमित ने धीरे से कहा,
“अंदर आ जाओ… बाहर खड़े होकर रोना ठीक नहीं…”
कुछ पल की खामोशी के बाद, सुनीता अंदर चली गई।
अतीत की शुरुआत
कुछ साल पहले…
अमित आगरा में रहने वाला एक सफल युवक था। अच्छी नौकरी, बड़ा घर, गाड़ी, और माता-पिता का प्यार—उसके पास सब कुछ था। माता-पिता ने उसके लिए एक साधारण, लेकिन सुंदर और संस्कारी लड़की सुनीता को चुना।
शादी धूमधाम से हुई। सुनीता गांव की रहने वाली थी, जहां उसने हमेशा सीमित जीवन जिया था। शहर का खुला माहौल, सुविधाएं, और अमित का प्यार—यह सब उसके लिए एक नई दुनिया जैसा था।
अमित उसे बहुत प्यार करता था। दोनों साथ घूमने जाते, बातें करते, और एक-दूसरे के साथ खुश रहते।
तीन साल बाद, जब डॉक्टर ने बताया कि सुनीता मां बनने वाली है, तो दोनों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
समय बीता और उनके घर एक बेटे ने जन्म लिया—अर्जुन।

धीरे-धीरे बढ़ती दरार
बच्चे के जन्म के बाद सब कुछ बदल गया।
सुनीता का पूरा समय बच्चे की देखभाल में बीतने लगा। रात-रात भर जागना, बच्चे को संभालना—उसकी जिंदगी अब पूरी तरह बदल चुकी थी।
अमित भी शुरू में उसका साथ देता रहा, लेकिन धीरे-धीरे वह अपने काम में व्यस्त हो गया।
समय के साथ सुनीता का वजन बढ़ने लगा। यह स्वाभाविक था, लेकिन अमित मजाक में उसे “मोटी” कहकर बुलाने लगा।
शुरू में सुनीता हंसकर टाल देती थी।
लेकिन जब यही मजाक बार-बार होने लगा—मेहमानों के सामने भी—तो यह उसे अंदर से चुभने लगा।
एक दिन, जब वह पूरी रात जागी हुई थी और बच्चा बीमार था, अमित ने फिर से कहा,
“मोटी, जरा पानी देना…”
इस बार सुनीता फट पड़ी।
“बस करो ये सब! तुम्हें जरा भी एहसास है मैं क्या झेल रही हूं?”
अमित चौंक गया।
“मैं तो मजाक कर रहा था…”
“मजाक?” सुनीता की आंखों में आंसू थे, “तुम्हें पता भी है ये मजाक मुझे कितना दुख देता है?”
बात बढ़ गई। आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गए।
गुस्से में अमित ने सुनीता पर हाथ उठा दिया।
यह वही पल था, जिसने उनके रिश्ते की नींव हिला दी।
अलगाव और अहंकार
सुनीता तुरंत अपना सामान लेकर मायके चली गई।
अमित ने उसे रोकने की कोशिश नहीं की।
दोनों के बीच अहंकार दीवार बन चुका था।
महीनों तक कोई बातचीत नहीं हुई।
अमित के माता-पिता दुख में डूब गए। बेटे का टूटा घर उन्हें अंदर से तोड़ गया। कुछ ही समय में दोनों इस दुनिया से चले गए।
अमित अब पूरी तरह अकेला था।
गुस्से और अकेलेपन में उसने तलाक का नोटिस भेज दिया।
सुनीता ने भी गुस्से में उसे स्वीकार कर लिया।
तलाक हो गया।
नई जिंदगी की सच्चाई
तलाक के बाद कोर्ट ने बच्चे की कस्टडी सुनीता को दे दी।
लेकिन अर्जुन अपने पिता से बहुत जुड़ा हुआ था। वह मां के पास जाने से मना करता था।
फिर भी, मजबूरी में उसे सुनीता के साथ जाना पड़ा।
शुरू में सुनीता ने सोचा कि वह अपने दम पर जिंदगी जी लेगी।
लेकिन धीरे-धीरे सच्चाई सामने आने लगी।
उसने जो पैसे अपने भाई को दिए थे, वे खत्म हो गए। अब वही भाई उसे बोझ समझने लगा।
“मैं कब तक खर्च उठाऊं?” उसने साफ कह दिया।
मां भी उम्रदराज थी, वह बच्चे की जिम्मेदारी नहीं उठा सकती थी।
सुनीता नौकरी करना चाहती थी, लेकिन बच्चे के कारण संभव नहीं था।
धीरे-धीरे उसे अपनी गलती का एहसास होने लगा।
वापसी का फैसला
एक दिन उसने ठान लिया—
“अब बस… मैं बच्चे को उसके पिता के पास छोड़ दूंगी…”
और वह अर्जुन को लेकर अमित के घर पहुंच गई।
वर्तमान में लौटना
घर के अंदर आकर सुनीता ने चारों तरफ देखा।
वह घर, जो कभी खुशियों से भरा था, अब वीरान लग रहा था। धूल जमी थी, सामान बिखरा हुआ था।
“यह क्या हाल बना रखा है?” उसने पूछा।
अमित ने ठंडी आवाज में कहा,
“तुम्हें क्या फर्क पड़ता है?”
सुनीता चुप हो गई।
कुछ देर बाद उसने कहा,
“मैं अर्जुन को यहीं छोड़ने आई हूं… अब मैं नहीं संभाल सकती…”
अमित ने पूछा,
“ऐसा क्या हो गया?”
तब सुनीता ने सब कुछ बता दिया—भाई का व्यवहार, पैसों की कमी, संघर्ष…
अमित भी टूट गया।
“जब से तुम और अर्जुन गए हो… जिंदगी खाली हो गई है…”
दोनों की आंखें भर आईं।
कुछ पल की खामोशी के बाद अमित बोला,
“क्या… हम फिर से साथ नहीं रह सकते?”
सुनीता जैसे इसी पल का इंतजार कर रही थी।
वह रोते हुए बोली,
“मुझसे गलती हो गई… मेरे अहंकार ने सब कुछ बर्बाद कर दिया…”
अमित ने उसका हाथ थाम लिया,
“गलती मेरी भी थी… मुझे तुम्हें मनाने आना चाहिए था…”
नई शुरुआत
उस दिन दोनों ने अपने अहंकार को छोड़ दिया।
उन्होंने फिर से साथ रहने का फैसला किया।
धीरे-धीरे घर फिर से संवरने लगा।
सुनीता ने घर को संभाला, अमित ने रिश्ते को।
अर्जुन फिर से दोनों के बीच हंसने लगा।
हालांकि माता-पिता की कमी हमेशा रही, लेकिन उन्होंने अपनी जिंदगी को दोबारा जीना सीख लिया।
सीख
यह कहानी सिर्फ एक पति-पत्नी की नहीं है, बल्कि हर उस रिश्ते की है जहां अहंकार, संवाद की कमी, और छोटी-छोटी गलतफहमियां बड़े तूफान बन जाती हैं।
प्यार कभी खत्म नहीं होता—
बस उसे समझ, धैर्य और सम्मान की जरूरत होती है।
समाप्त
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