तुम में हिम्मत नहीं है मुझसे शादी करने की, उस लड़की से जिसने उसे ये कहकर भगा दिया था कि एक दिन यही होगा…

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पहली मुलाकात

दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैंपस में दो अलग-अलग दुनिया एक ही छत के नीचे सांस लेती थी। एक दुनिया थी दिव्या बच्चन की। दिव्या देश के सबसे बड़े रियलस्टेट टकून श्री आर के बच्चन की इकलौती बेटी थी। वह एक ऐसी दुनिया में पली बढ़ी थी जहां हर चीज सोने की चम्मच पर परोसी जाती थी। उसके लिए दुनिया का मतलब था लेटेस्ट डिजाइनर कपड़े, स्विस घड़ियां, तेज रफ्तार स्पोर्ट्स कारें और वीकेंड पर होने वाली हाई प्रोफाइल पार्टियां।

दिव्या बेहद खूबसूरत थी और अपनी इस खूबसूरती और दौलत पर उसे बेपनाह गुरूर था। कॉलेज आना उसके लिए पढ़ाई करने का नहीं बल्कि अपनी हैसियत और अपने फैशन का प्रदर्शन करने का एक जरिया था। उसके दोस्त भी उसी की तरह अमीर घरों के बिगड़े हुए लड़के लड़कियां थे, जिनका काम था दिव्या की हर बात पर वाहवाही करना और अपने से कम हैसियत वाले छात्रों को नीची नजर से देखना।

दूसरी दुनिया थी अभय कामावत की। अभय उत्तराखंड के छोटे से शहर नैनीताल से आया एक साधारण लड़का था। उसके पिता एक सम्मानित स्कूल टीचर थे जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी ईमानदारी और उसूलों के साथ गुजारी थी। अभय यहां दिल्ली में अपनी मेहनत और अपने पिता की जीवन भर की जमा पूंजी के दम पर पढ़ने आया था।

तेरी औकात नहीं है की तू मुझसे शादी करे, ये कहकर भगा देने वाली लड़की एक दिन  उसी के पास नौकरी मांगने

अभय का संघर्ष

अभय साधारण कपड़े पहनता था। उसके पैरों में पुराने लेकिन साफ सुथरे जूते होते थे और उसका ज्यादातर वक्त कॉलेज की लाइब्रेरी या फिर अपनी किताबों की दुनिया में ही गुजरता था। वह खामोश रहता था, अपनी ही दुनिया में मग्न। वह इन लड़कों में से नहीं था जो भीड़ का हिस्सा बनना चाहते थे। वह तो उस भीड़ से अलग अपनी एक पहचान बनाने का सपना देखता था।

यह दोनों दुनिया एक दूसरे के समानांतर चलती थीं, कभी एक दूसरे से टकराए बिना। लेकिन एक दिन वे टकरा गईं और ऐसी टकराई कि उसकी गूंज सालों बाद तक सुनाई देने वाली थी। कॉलेज का एनुअल फेस्ट पूरा कैंपस किसी मेले की तरह सजा हुआ था। हर तरफ म्यूजिक, हंसी-खुशी और युवाओं का जोश था।

प्रतियोगिता का दिन

इसी फेस्ट के दौरान एक बिजनेस आईडिया प्रेजेंटेशन प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था। यह प्रतियोगिता ज्यादातर छात्रों के लिए सिर्फ एक बोरिंग इवेंट थी। लेकिन अभय के लिए यह उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा मौका था। उसका सपना कोई सुरक्षित नौकरी करना नहीं था। उसका सपना था अपना खुद का एक बिजनेस खड़ा करना।

अभय पिछले कई महीनों से दिन-रात एक करके एक आईडिया पर काम कर रहा था। उसका आईडिया था एक ऐसा मोबाइल एप्लीकेशन बनाना जो छोटे स्थानीय कारीगरों और कलाकारों को सीधे ग्राहकों से जोड़ सके ताकि बिचौलियों का मुनाफा खत्म हो और असली हुनर को उसकी सही कीमत मिल सके।

प्रतियोगिता का दिन आया। अभय पूरी तैयारी के साथ मंच पर चढ़ा। वह थोड़ा नर्वस था, लेकिन उसकी आंखों में अपने आईडिया को लेकर एक जुनून और एक विश्वास था। उसने अपनी प्रेजेंटेशन शुरू की। उसने इतने आत्मविश्वास और इतनी गहराई से अपनी बात रखी कि हॉल में बैठे प्रोफेसर और जज भी उससे बहुत प्रभावित हुए।

दिव्या का अपमान

उसी हॉल में आखिरी कतार में दिव्या और उसके दोस्त भी बैठे थे। वे बोर हो रहे थे और अपने फोन में लगे हुए थे। तभी दिव्या की नजर मंच पर खड़े अभय पर पड़ी। उसने अपने दोस्तों से कान में फुसफुसाते हुए कहा, “देखो तो, यह बहन जी भी बिजनेस टकून बनने का सपना देख रहा है।”

लेकिन जैसे-जैसे दिव्या ने अभय की बातें सुनी, उसके आत्मविश्वास को देखा, तो उसके अंदर की वह घमंडी लड़की एक पल के लिए कहीं खो गई। उसे मानना पड़ा कि लड़के की बातों में दम था। प्रतियोगिता का नतीजा आया और जैसा कि अपेक्षित था, अभय ने पहला पुरस्कार जीता।

इनाम में उसे एक ट्रॉफी और ₹50,000 का चेक मिला। जब वह मंच से नीचे उतरा तो उसके कुछ दोस्त उसे बधाई देने आए। लेकिन अभय की नजरें उस भीड़ में किसी और को ढूंढ रही थीं। वह दिव्या को ढूंढ रहा था।

अभय उस दिन से दिव्या को पसंद करता था जिस दिन उसने पहली बार उसे कॉलेज में देखा था। दिव्या की खूबसूरती पर तो पूरा कॉलेज मरता था। लेकिन अभय को उसकी खूबसूरती से ज्यादा उसके अंदर छिपी एक चंचलता, एक जिंदादिली अच्छी लगती थी।

दिल की बात

आज अपनी जिंदगी की पहली बड़ी जीत के बाद उसे लगा कि शायद यह सबसे सही मौका है अपने दिल की बात कहने का। उसकी इस जीत ने उसे एक नई हिम्मत दे दी थी। उसने देखा कि दिव्या और उसके दोस्त बाहर लॉन की तरफ जा रहे हैं।

उसने गहरी सांस ली। अपनी ट्रॉफी को अपने दोस्त के हाथ में थमाया और दिव्या की पीछे-पीछे चल पड़ा। लॉन में दिव्या अपने दोस्तों के साथ खड़ी हंस-हंस कर बातें कर रही थी। अभय कांपते कदमों से उनके पास पहुंचा। उसने बहुत ही हिम्मत करके कहा, “दिव्या, क्या मैं तुमसे 2 मिनट अकेले में बात कर सकता हूं?”

दिव्या और उसके दोस्त उसे देखकर चौंक गए। दिव्या ने अपनी एक भौंह चढ़ाते हुए एक व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ कहा, “हो तो देखो कौन आया है हमारा नया नवेला बिजनेस टकून?”

“हां, बोलो क्या कहना है?” उसके दोस्त दबी हुई हंसी-हंसने लगे। अभय ने उनके मजाक को नजरअंदाज किया। उसने कहा, “मैं जो भी कहना चाहता हूं, सबके सामने ही कहना चाहता हूं।”

अभय का इजहार

उसने एक पल के लिए अपनी आंखें बंद की और फिर दिव्या की आंखों में सीधे देखते हुए एक ही सांस में कह दिया, “दिव्या, मैं तुम्हें बहुत पसंद करता हूं। जब से मैंने तुम्हें पहली बार देखा है तब से मैं जानता हूं कि हम दोनों बहुत अलग हैं। हमारी दुनिया बहुत अलग हैं। लेकिन मैं यह भी जानता हूं कि मैं अपनी जिंदगी की हर कामयाबी तुम्हारे साथ बांटना चाहता हूं। आज मैंने जो कुछ भी जीता है, यह सब अधूरा है। अगर तुम मेरे साथ नहीं हो। क्या तुम मेरी जिंदगी का हिस्सा बनोगी?”

पूरी महफिल में एक गहरा सन्नाटा छा गया। दिव्या के दोस्त हक्का-बक्का होकर कभी अभय को देखते तो कभी दिव्या को। दिव्या का चेहरा भावहीन था। वो कुछ पल खामोश रही। और फिर वो जोर से हंसी। एक ऐसी हंसी जो कोई हंसी नहीं थी। एक अपमान था। एक जिल्लत थी।

उसकी हंसी के साथ ही उसके सारे दोस्त भी जोर-जोर से ठहाके लगाकर हंसने लगे। दिव्या ने हंसते-हंसते अपनी आंखों से निकले पानी को पछते हुए कहा, “ओह माय गॉड, तुम सीरियस हो? तुम और मैं?”

उसने अभय को ऊपर से नीचे तक एक बहुत ही घिनौनी नजर से देखा। उसने कहा, “सुनो, तुम मिस्टर जो भी तुम्हारा नाम है। तुमने आज एक छोटी सी प्रतियोगिता जीती है। कोई दुनिया नहीं जीत ली है। तुम्हारे जैसे लोग जो स्कॉलरशिप पर पढ़ते हैं और पार्ट टाइम जॉब करते हैं, वे सपने भी अपनी औकात के हिसाब से ही देखते हैं। और फिर उसने वह शब्द कहे जो अभय की आत्मा में किसी जलते हुए लोहे की तरह धंस गए।

उसने कहा, “तुम्हारी औकात नहीं है कि तुम मुझसे शादी करने के बारे में सोच भी सको। तुम और मैं, यह तो ऐसा है जैसे किसी झोपड़ पट्टी के लड़के ने ताजमहल में रहने का सपना देख लिया हो। तो मेरे आसपास भी दोबारा भटकने की हिम्मत मत करना।”

यह कहकर वह जोर से हंसी और अपनी सहेलियों के साथ अपनी स्पोर्ट्स कार की तरफ बढ़ गई। जाते-जाते उसके एक दोस्त ने अभय के कंधे पर धक्का मारते हुए कहा, “हिम्मत तो देख साले की।”

अभय का अपमान

अभय वहीं खड़ा रह गया जैसे वह कोई इंसान नहीं बल्कि एक पत्थर की मूर्ति हो। लोगों की हंसी, उनके ताने सब कुछ उसके कानों में गूंज रहा था। लेकिन उसे कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था। उसका दिल नहीं टूटा था। उसका तो वजूद ही टूटकर बिखर गया था।

उस दिन उस अपमान की आग में एक भोले-भाले सपने देखने वाले लड़के की मौत हो गई और एक ऐसे इंसान का जन्म हुआ जिसके लिए अब उसकी कामयाबी ही उसका प्यार, उसका जुनून और उसका बदला सब कुछ थी।

अभय की सफलता

15 साल गुजर गए। एक लंबा अरसा जिसने दिल्ली के नक्शे के साथ-साथ इन दोनों की तकदीर का नक्शा भी पूरी तरह से बदल दिया था। अभय कामावत। यह नाम आज भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम में एक सुनामी का पर्याय था। उसने कॉलेज खत्म होने के बाद अपने उस प्रतियोगिता में जीते हुए ₹500 और अपने पिता से उधार लिए हुए कुछ और पैसों से दिल्ली के एक छोटे से गराज से अपनी उस एप्लीकेशन “हुनरबाज” की शुरुआत की थी।

शुरुआती कुछ साल किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं थे। उसे बहुत सी ठोकरें खानी पड़ीं। बहुत सी रातें उसने बिना सोए गुजारीं। लेकिन उसके अंदर जल रही वह अपमान की आग उसे कभी थकने नहीं देती थी। आज “हुनरबाज” भारत का सबसे बड़ा ऑनलाइन प्लेटफार्म था जो देश के कोने-कोने में छिपे हुए लाखों कारीगरों को एक वैश्विक बाजार मुहैया करा रहा था।

उसकी कंपनी की वैल्यूएशन अरबों में थी और उसका ऑफिस गुड़गांव के सबसे महंगे कॉर्पोरेट टावर की सबसे ऊपरी मंजिलों पर था। अभय कामावत आज एक लेजेंड था। लेकिन वह आज भी मीडिया से चमक-दमक से दूर ही रहता था। वह आज भी वही शांत, सरल और जमीन से जुड़ा हुआ इंसान था।

दिव्या का पतन

उसने शादी नहीं की थी। शायद उसके दिल का वह जख्म अभी तक पूरी तरह से भरा नहीं था। और दिव्या बच्चन की जिंदगी किसी हिंदी फिल्म की कहानी की तरह अर्श से फर्श पर आ चुकी थी। कॉलेज के बाद वह लंदन चली गई थी। जहां उसने अपने पिता के पैसों पर खूब ऐश की।

उसने अपने ही वर्ग के एक बड़े उद्योगपति के बेटे करन से शादी की जो उससे भी ज्यादा बिगड़ा हुआ और अय्याश था। शुरुआत में तो सब ठीक रहा लेकिन फिर दिव्या के पिता मिस्टर बच्चन ने शेयर बाजार में कुछ गलत फैसले लिए और कुछ ही सालों में उनका विशाल रियलस्टेट का साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह ढह गया। वे दिवालिया हो गए।

जिस दिन यह खबर आई, उसी दिन दिव्या के पति करन ने उसे तलाक के कागजात थमा दिए। उसके सारे अमीर दोस्त जो कल तक उसकी पार्टियों की शान हुआ करते थे, अब उसका फोन तक नहीं उठाते थे। एक ही झटके में वह शहजादी सड़क पर आ गई थी।

उसे अपनी जिंदगी में पहली बार मजबूरी और संघर्ष जैसे शब्दों का मतलब समझ में आ रहा था। उसके पास अपने पिता की दी हुई एक एमबीए की डिग्री तो थी, लेकिन उसे असल दुनिया में काम करने का कोई अनुभव नहीं था। कई महीनों तक वह छोटी-मोटी नौकरियों के लिए भटकती रही।

दिव्या का पछतावा

उसका गुरूर अब टूट चुका था और उसकी जगह एक गहरी निराशा और पछतावे ने ले ली थी। उसे अक्सर कॉलेज का वह दिन याद आता और उस लड़के अभय का वह भोला सच्चा चेहरा याद आता जिसका उसने बेरहमी से अपमान किया था। वह सोचती कि आज वह कहां होगा? क्या कर रहा होगा?

कहानी में वक्त का पहिया एक बार फिर घूमा और इस बार वह ऐसी जगह आकर रुका जहां इन दोनों की भूली बसरी दुनिया एक बार फिर टकराने वाली थी।

दिव्या लगभग 6 महीने की बेरोजगारी के बाद एक बड़ी और बहुत ही प्रतिष्ठित ई-कॉमर्स कंपनी “हुनरबाज” में मार्केटिंग हेड के पद के लिए अर्जी दी। कंपनी का नाम और उसका काम उसे बहुत आकर्षक लगा। उसकी किस्मत अच्छी थी कि उसका पुराना कॉलेज और उसकी डिग्री काम आ गई और उसे इंटरव्यू के आखिरी दौर के लिए बुला लिया गया।

हुनरबाज का इंटरव्यू

वह अपनी जिंदगी के सबसे महत्वपूर्ण इंटरव्यू के लिए हुनरबाज के उस शानदार शीशे के ऑफिस में दाखिल हुई। ऑफिस का माहौल, वहां की सकारात्मक ऊर्जा और कर्मचारियों का काम के प्रति जुनून देखकर वह बहुत प्रभावित हुई। उसका इंटरव्यू एचआर हेड और बाकी सीनियर मैनेजर्स के साथ बहुत अच्छा रहा।

अब आखिरी दौर था कंपनी के संस्थापक और सीईओ के साथ। जब एचआर मैनेजर ने उसे बताया कि सीईओ साहब अब आपसे मिलेंगे, तो दिव्या का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। वह एक नर्वस लेकिन उम्मीद भरी मुस्कान के साथ सीईओ के विशाल कोने वाले कैबिन की तरफ बढ़ी।

दरवाजे पर एक बहुत ही साधारण सी नेमप्लेट लगी थी। “अभय कामावत”। दिव्या ने उस नाम पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। उसे लगा कि यह उसी नाम का कोई और शख्स होगा। उसने दरवाजा खटखटाया।

अभय का सामना

अंदर से एक जानी पहचानी, लेकिन अब बहुत ही ज्यादा गहरी और आत्मविश्वास से भरी हुई आवाज आई, “प्लीज कम इन।” दिव्या अंदर दाखिल हुई। अंदर एक विशाल मेज के पीछे शहर का नजारा देखती हुई एक बड़ी सी लेदर की कुर्सी रखी थी जो उसकी तरफ पीठ किए हुए थी।

दिव्या ने कहा, “गुड आफ्टरनून सर।” वो कुर्सी धीरे से घूमी और कुर्सी पर जो शख्स बैठा था, उसे देखकर दिव्या बच्चन को लगा जैसे किसी ने एक ही पल में उसके फेफड़ों से सारी हवा खींच ली हो। वही चेहरा, थोड़ा ज्यादा परिपक्व, आंखों पर एक स्टाइलिश रिमलेस चश्मा लेकिन वही शांत गहरी आंखें जिनमें आज एक विजेता का ठहराव था।

यह अभय था। एक पल के लिए उस कमरे में एक बर्फीली खामोशी छा गई। दिव्या के हाथ से उसका महंगा हैंडबैग छूटकर जमीन पर गिर गया। उसके दिमाग ने काम करना बंद कर दिया था। उसके कानों में 15 साल पुरानी अपनी ही आवाज, अपने ही कहे हुए शब्द किसी पिघले हुए शीशे की तरह गूंज रहे थे।

“तुम्हारी औकात नहीं है।” आज वो उसी लड़के के सामने नौकरी मांगने खड़ी थी। जिसकी उसने कभी औकात पूछी थी। अभय के चेहरे पर कोई भाव नहीं था। ना हैरानी, ना गुस्सा, ना ही कोई जीत का गुरूर। उसने बहुत ही शांति से इंटरकॉम पर अपनी सहायिका को बुलाया और कहा, “दिव्या, प्लीज मैडम के लिए पानी ले आओ।”

उसने दिव्या की तरफ इशारा करते हुए कहा, “प्लीज बैठिए मिस बच्चन।” उसकी आवाज में वही पुरानी शांति थी। लेकिन अब उस शांति में एक ऐसी ताकत और एक ऐसा अधिकार था जो किसी भी गुरूर से कहीं ज्यादा प्रभावशाली था।

दिव्या की शर्मिंदगी

दिव्या किसी रॉबर्ट की तरह कांपते कदमों से चलकर कुर्सी पर बैठ गई। उसकी नजरें जमीन पर गड़ी हुई थीं। अभय ने उसकी सीवी उठाई जिसे वह पहले ही देख चुका था। उसने बहुत ही पेशेवर अंदाज में इंटरव्यू शुरू किया। उसने उससे उसकी योग्यता, उसके अनुभव और उसके भविष्य के लक्ष्यों के बारे में पूछा।

दिव्या की जुबान लड़खड़ा रही थी। वह मुश्किल से ही कुछ शब्द बोल पा रही थी। जब यह फॉर्मल इंटरव्यू खत्म हुआ तो अभय अपनी कुर्सी पर पीछे झुक गया। उसने एक गहरी सांस ली और कहा, “आपका रिज्यूमे बहुत प्रभावशाली है, मिस बच्चन। आप इस पद के लिए पूरी तरह से योग्य हैं।”

उसने एक पल का विराम लिया और फिर कहा, “लेकिन इस कंपनी में काम करने के लिए सिर्फ योग्यता ही काफी नहीं है। यहां हम एक टीम की तरह काम करते हैं। एक परिवार की तरह और हमारे परिवार का सबसे पहला नियम है हर इंसान का सम्मान करना। चाहे उसकी हैसियत कुछ भी हो।”

उसने अपनी दराज खोली और उसमें से एक पुरानी मुड़ी-तुड़ी सी चीज निकाली। यह वही सूखा हुआ मसला हुआ गुलाब का फूल था जिसे उसने आज तक संभाल कर रखा था। उसने उस फूल को मेज पर दिव्या के सामने रख दिया।

एक जीवन का सबक

उसने कहा, “यह फूल मुझे हमेशा याद दिलाता है कि मैं कहां से आया हूं और मुझे कहां जाना है। यह मुझे याद दिलाता है कि सपने किसी की औकात के मोहताज नहीं होते। और यह मुझे यह भी याद दिलाता है कि शब्द किसी भी हथियार से ज्यादा गहरे जख्म दे सकते हैं।”

उस दिन पहली बार दिव्या बच्चन के आंखों से आंसू बहे। यह किसी बिजनेस डील के खोने के आंसू नहीं थे। यह अपने गुरूर के टूटने के, अपने आत्मा पर लगे जख्म के आंसू थे।

वह अपनी कुर्सी से उठी और हाथ जोड़कर रोते हुए बोली, “मुझे माफ कर दो अभय, मुझे माफ कर दो। मैं उस दिन घमंड में अंधी हो गई थी।”

अभय अपनी जगह पर खड़ा रहा। उसने अपनी वही पुरानी शांत मुस्कान दी। उसने कहा, “मैंने आपको उसी दिन माफ कर दिया था दिव्या। क्योंकि आपकी उस बेइज्जती ने ही मुझे वह आग दी जिसकी वजह से मैं आज यहां तक पहुंचा हूं। तो एक तरह से मैं आपका शुक्रगुजार हूं।”

यह कहकर उसने एक अपॉइंटमेंट लेटर निकाला और उसकी तरफ बढ़ा दिया। उसने कहा, “यह नौकरी आपकी है अगर आप करना चाहें तो लेकिन एक शर्त पर, आपको अपनी पहली तनख्वाह से हमारे हुनरबाज फाउंडेशन में जो गरीब कलाकारों के बच्चों को पढ़ाता है, एक छोटा सा दान देना होगा।”

दिव्या ने कांपते हाथों से वो लेटर लिया। वो कुछ बोल नहीं पाई। बस रोते हुए हां में सिर हिलाकर सहमति दे दी।

अंत में

उस दिन वह उस ऑफिस से बाहर तो निकली। उसके हाथ में नौकरी तो थी लेकिन वो अपने साथ एक जिंदगी भर का सबक लेकर जा रही थी। उसने सीखा था कि किसी भी इंसान की असली कीमत उसके ग्रेड से नहीं बल्कि उसके हौसलों से होती है और एक सच्चा इंसान वो होता है जो आपकी गलतियों को भुलाकर आपके सबसे बुरे वक्त में भी आपका हाथ थाम ले।

दोस्तों, यह कहानी हमें सिखाती है कि जिंदगी एक चक्र की तरह है। आप जो आज किसी के साथ करते हैं, वह कल किसी ना किसी रूप में लौटकर आपके पास जरूर आता है। किसी भी इंसान को कभी भी उसके वर्तमान या उसके कपड़ों से कम नहीं आंकना चाहिए। क्योंकि हर साधारण दिखने वाले इंसान के अंदर एक असाधारण कहानी छिपी हो सकती है और गुरूर इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन होता है जो एक ना एक दिन टूट ही जाता है।

सच्ची कामयाबी पैसों में नहीं बल्कि अपने किरदार को ऊंचा उठाने में है।

कहानी का संदेश

इस कहानी में अभय और दिव्या के बीच का संघर्ष और उनकी यात्रा हमें यह सिखाती है कि जीवन में कभी भी किसी को कमतर नहीं आंकना चाहिए। अभय ने अपने संघर्षों से यह साबित किया कि मेहनत और लगन से किसी भी चीज को हासिल किया जा सकता है।

दिव्या ने अपने अपमान के बाद जो सबक सीखा, वह हमें यह बताता है कि कभी-कभी हमें अपने अतीत के अनुभवों से सीख लेकर आगे बढ़ना होता है।

इसलिए, हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि वक्त का पहिया हमेशा घूमता रहता है और हमें अपने कर्मों का फल एक दिन अवश्य मिलता है।