दरोगा पत्नी ने बेरोज़गार पति को अपमानित किया 5 मिनट बाद SP आए और सैल्यूट किया पूरा थाना सन्न रह गया

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किरदार का कद

मधुपुर एक ऐसा गाँव था जहाँ समय आज भी पुरानी रफ़्तार से चलता था। सुबह की ताजी हवा में मोहन साहब की दुकान की चाशनी वाली जलेबियों की खुशबू घुलती थी, और शाम को लालटेन की पीली रोशनी में बुजुर्गों की चौपाल सजती थी। इसी गाँव की तंग गलियों से निकलकर एक सपना दिल्ली की ऊंची इमारतों तक पहुँचा था—वह सपना था राघव का।

राघव, मोहन साहब का इकलौता बेटा। मोहन साहब की मिठाई की दुकान छोटी थी, पर उनके हौसले बड़े थे। उन्होंने पाई-पाई जोड़कर राघव को पढ़ाया। राघव भी ऐसा कि कॉलेज से आते ही अपनी किताबें किनारे रखता और पिता के साथ भट्टी के पास खड़ा हो जाता। कभी जलेबियाँ छानता, तो कभी ग्राहकों का हिसाब करता। गाँव वाले कहते, “मोहन, तेरा बेटा हीरा है।” पर राघव की आँखों में एक अजीब सी बेचैनी थी। वह संतुष्ट नहीं था।

एक रात, जब पूरा गाँव सो चुका था, राघव ने अपने पिता के पैर दबाते हुए कहा, “बाबूजी, मुझे दिल्ली जाना है। यूपीएससी की तैयारी के लिए।” मोहन साहब कुछ देर चुप रहे। माँ राधिका देवी ने चूल्हे की आग बुझाते हुए राघव की ओर देखा। दिल्ली बहुत दूर थी, और उनकी हैसियत बहुत कम। पर पिता ने बस इतना कहा, “बेटा, अगर सपना इतना बड़ा है कि तुझे सोने नहीं दे रहा, तो जा। मेरी दुकान की भट्टी जलती रहेगी, तू बस अपनी पढ़ाई की लौ मत बुझने देना।”

संघर्ष की गलियाँ और त्याग

दिल्ली की तंग गलियों में एक छोटा सा कमरा राघव की दुनिया बन गया। वहाँ न माँ के हाथ की रोटी थी, न पिता का साया। था तो बस किताबों का ढेर और अकेलापन। वहीं उसकी मुलाकात अभिषेक से हुई। दोनों की आर्थिक स्थिति एक जैसी थी। कई बार ऐसा होता कि अभिषेक के पास मकान मालिक को देने के लिए पैसे नहीं होते। तब राघव अपने खाने के पैसे बचाकर अभिषेक की फीस भर देता और कहता, “दोस्त, आज तू पढ़ ले, कल जब हम अफसर बनेंगे, तब हिसाब करेंगे।”

साल बीतते गए। पहली कोशिश में राघव असफल रहा। दूसरी बार इंटरव्यू तक पहुँचा, पर किस्मत ने साथ नहीं दिया। सात साल बीत गए। गाँव से आने वाले फोन अब उम्मीद से ज्यादा डर पैदा करने लगे थे। माँ कहती, “बेटा, हमारे बाल सफेद हो गए हैं, कब आएगा?” उधर, राघव के साथ के लड़के कोई एसडीएम बन गया था, तो कोई डीएसपी। राघव अब भी उसी पुराने कमरे में पुरानी किताबों के पन्ने पलट रहा था।

अंततः, उसने तय किया—एक आखिरी प्रयास। उसने अपनी पूरी आत्मा उस परीक्षा में झोंक दी और परिणाम का इंतज़ार किए बिना मधुपुर लौट आया।

नियति का मोड़ और निधि का प्रवेश

गाँव लौटने के कुछ समय बाद, राघव की शादी निधि से तय हुई। निधि पढ़ी-लिखी थी और खुद पुलिस भर्ती की तैयारी कर रही थी। शादी के ही दिन खबर आई कि निधि का चयन पुलिस इंस्पेक्टर (दरोगा) के रूप में हो गया है। पूरा गाँव झूम उठा। सबने कहा, “राघव की तो किस्मत चमक गई। खुद बेरोजगार है तो क्या, पत्नी दरोगा है।”

शुरुआत में सब कुछ ठीक था। राघव घर के काम संभालता, निधि के लिए नाश्ता बनाता, उसकी वर्दी प्रेस करता और दोपहर का खाना लेकर थाने पहुँचता। वह चाहता था कि निधि को कोई कमी न खले ताकि वह अपनी ड्यूटी अच्छे से कर सके। लेकिन जैसे-जैसे निधि के कंधों पर सितारे चमकने लगे, उसकी आँखों में राघव के लिए सम्मान धुंधला होने लगा।

निधि को अब राघव का सादापन ‘गंवारपन’ लगने लगा। उसे शर्म आने लगी कि एक दरोगा का पति घर पर रोटियाँ बेलता है। एक दिन जब राघव थाने में टिफिन लेकर पहुँचा, तो निधि ने सबके सामने उसे डांट दिया, “तुम यहाँ मत आया करो! और अगर कोई पूछे, तो कहना तुम यहाँ के नौकर हो, मेरे पति नहीं।”

राघव के लिए वह शब्द किसी ज़हर के घूंट जैसे थे। वह चुपचाप वापस आ गया। पर अपमान का सिलसिला यहीं नहीं रुका। घर पर भी निधि उसे कोसती, “मेरे पैसों पर पलते हो, मेरी इज्जत मिट्टी में मिला रखी है।” राघव बस छत की ओर देखता और खामोश रहता।

वह दिन जिसने सब बदल दिया

एक सुबह पूरे जिले में हलचल थी। नए एसपी (Superintendent of Police) साहब का दौरा होने वाला था। निधि का थाना भी सज-धज कर तैयार था। राघव हमेशा की तरह टिफिन लेकर पहुँचा। उसे नहीं पता था कि आज नियति ने कुछ और ही तय कर रखा है।

निधि ने राघव को देखते ही अपना आपा खो दिया। उसने चिल्लाकर कहा, “तुम अपनी औकात क्यों नहीं समझते? एक बेरोजगार आदमी, एक दरोगा की बराबरी कैसे कर सकता है? तुम मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा कलंक हो!”

तभी सायरन की आवाज सुनाई दी। जिले के नए एसपी साहब की गाड़ी रुकी। निधि और पूरा थाना ‘सावधान’ की मुद्रा में खड़ा हो गया। एसपी साहब गाड़ी से उतरे। उनकी नजर भीड़ में खड़े एक साधारण से आदमी पर पड़ी—राघव पर।

सबके होश तब उड़ गए जब एसपी साहब ने सीधे राघव की ओर कदम बढ़ाए और उसे एक ज़ोरदार सैल्यूट किया। पूरा थाना सन्न था। वह एसपी कोई और नहीं, राघव का पुराना दोस्त अभिषेक था।

अभिषेक ने राघव को गले लगा लिया और भरी आँखों से सबके सामने कहा, “आज मैं जिस कुर्सी पर बैठा हूँ, उसकी कीमत इस इंसान ने चुकाई है। जब मेरे पास खाने को पैसे नहीं थे, तब इसने अपनी पढ़ाई छोड़कर ट्यूशन पढ़ाकर मेरी फीस भरी थी। यह बेरोजगार नहीं है, यह तो वो पारस है जिसने मुझ जैसे लोहे को सोना बना दिया।”

अहंकार का अंत और नई शुरुआत

निधि की वर्दी जैसे उसे चुभने लगी। उसकी नजरें झुक गईं। उसे अहसास हुआ कि उसने जिसे ‘बोझ’ समझा, वह तो महापुरुष निकला। एसपी साहब ने निधि की ओर देखकर सिर्फ इतना कहा, “इंस्पेक्टर निधि, सितारे कंधों पर होने से कोई बड़ा नहीं होता, बड़ा वो है जिसका किरदार ऊंचा हो।”

कुछ ही दिनों बाद, यूपीएससी का परिणाम आया। राघव का नाम टॉपर्स की लिस्ट में था। उसने बदला लेने के लिए नहीं, बल्कि व्यवस्था बदलने के लिए यह पद हासिल किया था।

जब राघव अफसर बनकर घर लौटा, तो निधि उसके पैरों में गिरकर रोने लगी। राघव ने उसे उठाकर सिर्फ इतना कहा, “नौकरी हमें समाज की सेवा के लिए मिलती है, अपनों को नीचा दिखाने के लिए नहीं। संस्कार ही इंसान की असली पहचान हैं।”