“दिनदहाड़े हाईवे पर खेला गया खेल… लेकिन निकली IPS!”
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दिनदहाड़े हाईवे पर खेला गया खेल… लेकिन निकली IPS!
शहर शिवगढ़ पिछले कुछ महीनों से दहशत में था। जैसे ही शाम ढलती, सड़कों पर सन्नाटा पसर जाता। खासकर हाईवे के उस सुनसान हिस्से पर, जहां से कपड़ा फैक्ट्री की कई महिलाएं रात की शिफ्ट खत्म कर घर लौटती थीं। एक के बाद एक कई महिलाएं रहस्यमय तरीके से लापता हो चुकी थीं। पुलिस जांच चल रही थी, पर हर बार केस अधूरा रह जाता। कोई गवाह नहीं, कोई पुख्ता सबूत नहीं।
लोगों के मन में डर के साथ-साथ गुस्सा भी था—क्या पुलिस नाकाम है? या कोई अंदर का आदमी इस खेल में शामिल है?
इसी शहर में नई-नई पोस्टिंग हुई थी आईपीएस सृष्टि गुप्ता की। तेज दिमाग, शांत स्वभाव और अन्याय के खिलाफ जीरो टॉलरेंस—यही उनकी पहचान थी। सृष्टि ने शहर संभालते ही सबसे पहले पुराने केस फाइल मंगवाए। उन्होंने देखा कि जितनी भी महिलाएं गायब हुईं, वे लगभग एक ही इलाके से थीं और समय भी लगभग एक जैसा था—रात 9 से 11 बजे के बीच।
“इसमें पैटर्न है,” सृष्टि ने अपने विश्वसनीय कांस्टेबल अरुण से कहा।
“मैडम, लेकिन कोई सीसीटीवी फुटेज साफ नहीं है। हर बार कैमरे या तो बंद मिलते हैं या फुटेज गायब,” अरुण बोला।
सृष्टि की आंखों में संदेह की चमक उभरी। “कैमरे हर बार कैसे खराब हो सकते हैं? मुझे लगता है कि इस खेल में सिस्टम के अंदर का कोई आदमी शामिल है।”
उधर शहर के दूसरे कोने में दरोगा धर्मवीर सिंह अपनी जीप में बैठा शराब का गिलास थामे मुस्कुरा रहा था। उसकी वर्दी पर लगे सितारे उसे ताकत का अहसास दिलाते थे। उसके साथ था उसका खास कांस्टेबल अरविंद। दोनों अक्सर रात को हाईवे पर गश्त के बहाने निकलते और फिर कोई न कोई महिला उनकी गाड़ी में बैठी नजर आती—लेकिन वह अपनी मर्जी से नहीं।
धर्मवीर की नजर में कानून उसकी जेब में था। उसे लगता था कि उसका राज हमेशा कायम रहेगा।
एक दिन फैक्ट्री से तीन महिलाएं एक साथ लापता हो गईं। शहर में हड़कंप मच गया। मीडिया ने सवाल उठाए। सृष्टि पर भी दबाव बढ़ने लगा। उसी रात उन्हें एक फोन आया—ऊपर से निर्देश था कि केस को तुरंत सुलझाया जाए।
सृष्टि ने ठान लिया—अब जाल बिछाने का वक्त आ गया है।
“अरुण,” उन्होंने कहा, “आज रात मैं खुद निकलूंगी। एक आम महिला बनकर।”
अरुण चौंक गया। “मैडम, यह बहुत खतरनाक हो सकता है!”
“खतरा तभी खत्म होगा जब हम उसका सामना करेंगे,” सृष्टि ने दृढ़ स्वर में कहा।
उन्होंने साधारण कपड़े पहने—फीकी साड़ी, चप्पल और पुरानी साइकिल। बालों को ढीला बांधा, चेहरे पर हल्की धूल लगाई ताकि पहचान छिप सके। अपने शरीर पर छोटा-सा ट्रैकर लगा लिया और अरुण को निर्देश दिए—“अगर मेरी लोकेशन एक जगह ज्यादा देर रुके, तो समझ जाना वही अड्डा है।”
रात के साढ़े नौ बजे सृष्टि हाईवे की ओर निकल पड़ीं। हल्की ठंडी हवा चल रही थी। दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज आ रही थी। सड़क लगभग खाली थी।
करीब आधे घंटे बाद उन्होंने देखा—एक जीप खड़ी है, हेडलाइट जल रही है। दो साए खड़े हैं।
“अरे तुम इतनी रात को कहां जा रही हो?” एक कड़क आवाज गूंजी।
सृष्टि ने सिर झुकाकर जवाब दिया, “साहब, फैक्ट्री में काम करती हूं। देर हो गई।”
धर्मवीर ने अरविंद की ओर देखा और मुस्कुराया। “लगता है आज किस्मत मेहरबान है।”
“मैडम,” अरविंद ने धीरे से कहा, “इसे भी ले चलते हैं।”
सृष्टि ने भीतर ही भीतर सब रिकॉर्ड होने दिया। वे शांत रहीं, जैसे डरी हुई हों। धर्मवीर ने उन्हें जबरन जीप में बैठा लिया।
जीप कच्चे रास्ते से होती हुई शिवगढ़ किले के पीछे पुराने गोदाम तक पहुंची—वही जगह जहां पहले से कई महिलाएं कैद थीं।
गोदाम के अंदर अंधेरा था। कुछ महिलाएं कोने में सहमी बैठी थीं। सृष्टि ने धीरे से फुसफुसाया, “घबराइए मत, मैं पुलिस से हूं।”
एक महिला की आंखों में उम्मीद चमकी—“सच?”
“हां, मेरी टीम रास्ते में है।”
उधर अरुण स्क्रीन पर ट्रैकर की लोकेशन देख रहा था। “मैडम शिवगढ़ किले के पास रुकी हैं!” उसने तुरंत टीम तैयार की।
गोदाम में धर्मवीर हंस रहा था। “कोई नहीं बचा सकता तुम्हें,” उसने घमंड से कहा।
तभी बाहर से सायरन की आवाज गूंजी। जीपों की हेडलाइट्स ने गोदाम को घेर लिया।
दरवाजा धड़ाम से खुला।
“दरोगा धर्मवीर सिंह, आप गिरफ्तार हैं!” सृष्टि ने अपनी असली पहचान जाहिर करते हुए कहा।
धर्मवीर का चेहरा पीला पड़ गया। “तुम… तुम IPS हो?”
“हां,” सृष्टि ने दृढ़ता से कहा, “और तुम्हारा खेल खत्म।”
अरविंद भागने की कोशिश में पकड़ा गया। बाकी टीम ने सभी महिलाओं को सुरक्षित बाहर निकाला।
अगले दिन शहर के मुख्य चौक पर प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई। मीडिया, आम जनता और पुलिस अधिकारी मौजूद थे।
सृष्टि ने कहा, “कानून से बड़ा कोई नहीं। वर्दी का मतलब सुरक्षा है, डर नहीं। जिसने इस वर्दी को बदनाम किया है, उसे सजा मिलेगी।”
धर्मवीर को सस्पेंड कर जेल भेज दिया गया। अदालत ने सख्त सजा सुनाई।
भीड़ में खड़ी महिलाएं ताली बजा रही थीं। “आईपीएस मैडम जिंदाबाद!” के नारे गूंज उठे।
कुछ दिनों बाद शहर में शांति लौट आई। फैक्ट्री की महिलाएं फिर से निडर होकर काम पर जाने लगीं। हाईवे अब उतना डरावना नहीं लगता था।
एक शाम अरुण ने पूछा, “मैडम, आपको डर नहीं लगा था?”
सृष्टि मुस्कुराईं। “डर तो था, लेकिन उससे बड़ा था मेरा कर्तव्य।”
उन्होंने आसमान की ओर देखा। डूबते सूरज की रोशनी शहर पर फैल रही थी। जैसे अंधेरे के बाद उजाला लौट आया हो।
सृष्टि जानती थीं—अपराध कभी पूरी तरह खत्म नहीं होता, लेकिन हर बार कोई न कोई खड़ा होता है उसे रोकने के लिए।
और उस दिन शिवगढ़ ने सीखा—अगर इरादा मजबूत हो, तो सच की जीत तय है।
यह कहानी हमें याद दिलाती है कि साहस केवल ताकत का नाम नहीं, बल्कि सही समय पर सही कदम उठाने का नाम है। जब व्यवस्था में ही कोई गलत हो जाए, तब बदलाव लाने के लिए भीतर से ही आवाज उठानी पड़ती है।
आईपीएस सृष्टि गुप्ता की बहादुरी ने साबित कर दिया कि न्याय देर से सही, लेकिन मिलता जरूर है। और जब कानून जागता है, तो सबसे ताकतवर अपराधी भी टिक नहीं पाता।
शहर की सड़कों पर अब एक नई कहावत चल पड़ी थी—
“हाईवे पर अगर अंधेरा भी हो, तो डरना मत… क्योंकि कहीं न कहीं, एक सृष्टि गुप्ता जाग रही है।”
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