दूधवाले ने बीमार बूढ़ी मां को एक महीने तक मुफ्त में दूध दिया, फिर जो वसीयत वह पीछे छोड़ गए, उसने सबको चौंका दिया।.
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कहानी: “रामू और जानकी मां – इंसानियत का सच्चा मोल”
उत्तर प्रदेश के छोटे से कस्बे रामपुर के बाहरी इलाके में एक पुरानी, जर्जर हवेली खड़ी थी। उखड़े हुए प्लास्टर, टूटे झरोखे, और चारों ओर ऊँची घासों से घिरी इस हवेली को गांव वाले “भूतिया हवेली” कहते थे। वहां अकेली रहती थी एक वृद्ध महिला – जानकी देवी। उम्र 80 के पार, सफेद झुर्रियों से भरा चेहरा, कांपते हाथ, और मोटा चश्मा। लोग उन्हें “जानकी मां” कहते थे, पर यह नाम सम्मान से ज़्यादा एक औपचारिकता जैसा लगता था।
उनकी दुनिया उस हवेली की चारदीवारी में सिमटी हुई थी। गांव में उनके बारे में कई कहानियां चलती थीं – किसी ने कहा उनके पति उन्हें छोड़ गए थे, किसी ने कहा उनकी कोई औलाद नहीं थी, और कुछ कहते कि हवेली में कोई पुराना खजाना दबा हुआ है।
इन कहानियों से बेखबर, सिर्फ एक इंसान था जो हर सुबह उनके दरवाज़े पर दस्तक देता था – रामू, गांव का दूधवाला। लगभग 35 साल का सीधा-सादा मेहनती युवक। उसके पिता भी यही काम करते थे, और उनके गुजर जाने के बाद रामू ने यह जिम्मेदारी संभाली थी। गांव में अब पैकेट वाले दूध का चलन बढ़ गया था, जिससे जैसे-तैसे उसका गुजारा होता था।
रामू की पत्नी सीता और आठ साल की बेटी प्रिया ही उसका संसार थे। उसका जीवन दिन-रात की मेहनत और छोटी-छोटी जरूरतों को पूरा करने के संघर्ष में बीतता था। जानकी मां उसकी सबसे पुरानी ग्राहकों में से थीं। वह हर सुबह आधा लीटर दूध देने आता, और महीने के अंत में जानकी मां उसे टिन के डिब्बे से पैसे देतीं।
लेकिन पिछले कुछ महीनों से रामू देख रहा था कि जानकी मां की सेहत तेजी से गिर रही है। वह और ज्यादा झुककर चलने लगी थीं, आवाज धीमी हो गई थी, और कभी-कभी दरवाज़ा खोलने में भी उन्हें वक्त लग जाता था।
एक दिन जब रामू पैसे लेने गया, तो जानकी मां के डिब्बे में एक भी सिक्का नहीं था। उन्होंने कांपती आवाज में कहा, “बेटा, इस बार पैसे नहीं हैं… अगले महीने ले लेना।” रामू ने उनके चेहरे की बेबसी देख ली। वह चुपचाप लौट आया और रात को सीता को यह बात बताई।
सीता ने चिंता जताई, “हमारा गुज़ारा कैसे चलेगा रामू? प्रिया की किताबें, गाय का चारा…”
रामू ने शांत भाव से कहा, “वो अम्मा अकेली हैं, बीमार हैं। अगर हमने मदद नहीं की तो कौन करेगा? ये मेरा धर्म है।”
अगली सुबह रामू ने तय किया कि जानकी मां को एक महीने तक दूध मुफ्त देगा। जब उसने जानकी मां से यह बात कही, तो उनकी आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने कहा, “नहीं बेटा, तुम्हारा भी तो परिवार है…”
रामू मुस्कुराया, “आप मुझे बेटा कहती हैं ना? क्या एक बेटा अपनी मां को एक महीने दूध नहीं पिला सकता?”
अब यह रोज का नियम बन गया। रामू दूध लाता, कभी गुड़ या सब्ज़ी भी ले आता। ज्यादा बातें नहीं होतीं, पर एक खामोश अपनापन दोनों के बीच पनपने लगा था। जानकी मां हर सुबह उसका इंतज़ार करतीं।
पूरा महीना बीत गया।
एक सुबह जब रामू दूध लेकर आया, तो हवेली का दरवाज़ा खुला था। आवाज लगाने पर कोई उत्तर नहीं मिला। डरते-डरते वह अंदर गया। जानकी मां अपनी आराम कुर्सी पर शांति से बैठी थीं, हाथ में एक पुरानी किताब, सिर एक तरफ झुका हुआ। रामू ने जब उनके कंधे को छुआ, तो वह समझ गया – जानकी मां हमेशा के लिए जा चुकी थीं।
रामू की आंखें नम हो गईं। उसने गांव के सरपंच को खबर दी। पर गांव वाले अंदर आने से डरते रहे। रामू ने कहा, “ये मेरी मां जैसी थीं। इनका अंतिम संस्कार मैं करूंगा।”
उसने अपनी बचत से कफन, लकड़ियों और अन्य ज़रूरतों का इंतजाम किया और बेटे की तरह सारे संस्कार पूरे किए। गांव वाले चुपचाप उसकी इंसानियत को देख रहे थे।
कुछ दिन बाद, गांव में एक चमचमाती कार आई। उसमें से उतरे एक वकील – विनय प्रकाश। उन्होंने कहा, “मैं जानकी देवी जी का वकील हूं। उनके मरने से पहले उन्होंने एक वसीयत मेरे पास जमा करवाई थी।” सब चौंक गए।
वकील ने कहा, “वसीयत के अनुसार, जानकी देवी जी ने अपनी सारी संपत्ति उस व्यक्ति को देने का निर्णय किया है जिसने उनकी मृत्यु के बाद निस्वार्थ भाव से अंतिम संस्कार किया। और वह व्यक्ति है – रामू।”
रामू अवाक था। वह बोला, “पर अम्मा के पास तो कुछ था ही नहीं…”
वकील मुस्कुराया, “यह आपका बड़प्पन है। असल में उनके पास करोड़ों की संपत्ति थी। हवेली के साथ-साथ एक कंपनी के शेयर जिनकी आज की कीमत लगभग ₹25 करोड़ है।”
गांव में सनसनी फैल गई।
वकील ने फिर एक पुराना खत निकाला – जानकी मां की लिखी अंतिम चिट्ठी। उसमें लिखा था:
“रामू बेटा, तुमने मुझे सिर्फ दूध नहीं पिलाया। तुमने मेरे टूटे हुए विश्वास को फिर से जिंदा किया। मैं यह संपत्ति तुम्हें सौंपती हूं – हवेली, ज़मीन और कंपनी के शेयर।
लेकिन एक शर्त है – इस दौलत से सिर्फ अपना घर मत बसाना। गांव के लिए एक अच्छा स्कूल बनवाना – जहां गरीब बच्चे मुफ्त में पढ़ सकें। एक अस्पताल बनवाना, ताकि कोई और दवा के बिना ना मरे।
और इस हवेली को एक अनाथाश्रम में बदल देना – ‘मां का आंगन’ नाम देना।
स्कूल का नाम रखना – सीता राम स्कूल, ताकि तुम्हारी पत्नी और तुम्हारा नाम हमेशा लोगों को याद रहे।”
खत खत्म होते ही रामू की आंखों से आंसुओं की धार बहने लगी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि यह सपना है या हकीकत। मगर वह समझ गया – यह दौलत नहीं, एक मां का आशीर्वाद है।
रामू ने वकील की मदद से सारी कानूनी प्रक्रियाएं पूरी कीं। सबसे पहले गांव में जानकी मां मेमोरियल अस्पताल की नींव रखी, फिर सीता राम स्कूल का निर्माण शुरू हुआ। हवेली की मरम्मत कराकर उसे एक सुंदर सा अनाथाश्रम बना दिया – “मां का आंगन”।
उसने अपनी बेटी को शहर के अच्छे स्कूल में दाखिला दिलवाया, और अपने लिए एक छोटा घर बनवाया। लेकिन रामू ने दूध का काम नहीं छोड़ा।
जब लोगों ने पूछा, “अब क्यों करते हो यह काम?”
तो वह मुस्कुराकर कहता, “यही मेरी पहचान है। इसी काम ने मुझे मेरी जानकी मां से मिलाया।”
कुछ ही सालों में रामपुर बदल गया। वहां अच्छी सड़कें, मुफ्त इलाज का अस्पताल और गरीब बच्चों के लिए एक शानदार स्कूल था।
अब रामू सिर्फ दूधवाला नहीं था – वह रामपुर का रक्षक, गांव का भाई, और इंसानियत की मिसाल बन गया था।
उसकी छोटी सी निस्वार्थ नेकी ने न सिर्फ उसकी जिंदगी बदली, बल्कि सैकड़ों लोगों की तकदीर भी।
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