नौकर ने करोड़पति की बेटी की जान बचाई… बदले में जो मिला, इंसानियत रो पड़ी… फिर जो हुआ

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शीर्षक: नौकर ने करोड़पति की बेटी की जान बचाई… बदले में जो मिला, इंसानियत रो पड़ी… फिर जो हुआ

भाग 1: वफ़ादारी की धूप

दिल्ली के सबसे पॉश इलाक़ों में से एक, लुटियंस ज़ोन की हरियाली के बीच विक्रम सिंह राठौड़ का आलीशान बंगला किसी महल से कम नहीं था। सफ़ेद संगमरमर से बना यह बंगला सिर्फ़ ईंट और गारे का ढाँचा नहीं, बल्कि विक्रम सिंह की दौलत, ताक़त और गुरूर का जीता-जागता प्रतीक था। देश की सबसे बड़ी कंस्ट्रक्शन कंपनियों में से एक के मालिक, विक्रम सिंह के लिए इंसान की क़ीमत उसकी हैसियत से तय होती थी।

इसी बंगले के एक छोटे से सर्वेंट क्वार्टर में शंकर रहता था। बिहार के एक छोटे से गाँव का 25 साल का नौजवान, जिसकी आँखों में सपने तो थे, लेकिन कंधों पर ज़िम्मेदारियों का बोझ उससे कहीं ज़्यादा था। गाँव में उसकी बूढ़ी माँ, एक जवान बहन और छोटा भाई थे, जिनका पेट भरने की ज़िम्मेदारी उसी की थी। शंकर पिछले पाँच सालों से राठौड़ साहब के यहाँ काम कर रहा था। उसका काम बंगले की साफ़-sफ़ाई और बाग़वानी देखना था, लेकिन उसका असली काम था विक्रम सिंह की सात साल की इकलौती बेटी, अंजलि का ध्यान रखना।

अंजलि, उस बंगले का सबसे मासूम और प्यारा फूल थी। वह अपने माता-पिता से ज़्यादा शंकर के क़रीब थी। शंकर सिर्फ़ उसका नौकर नहीं, उसका ‘शंकर भैया’ था। वही उसे कहानियाँ सुनाता, उसके साथ बाग़ में तितलियाँ पकड़ता, उसके गिरने पर उसे उठाता और उसके हर सवाल का जवाब देता। विक्रम सिंह और उनकी पत्नी सुनीता, अपनी पार्टियों और बिज़नेस में इतने व्यस्त रहते थे कि अंजलि के लिए उनके पास वक़्त ही नहीं था। शंकर ने उस खालीपन को अपने स्नेह और वफ़ादारी से भर दिया था। अंजलि की एक मुस्कान के लिए वह कुछ भी कर सकता था।

एक दिन, विक्रम सिंह ने अपने बिज़नेस की एक बड़ी डील पक्की होने की ख़ुशी में बंगले पर एक शानदार पार्टी रखी। पूरा बंगला मेहमानों, संगीत और क़ीमती शराब की महक से भरा हुआ था। विक्रम सिंह अपने दोस्तों के बीच अपनी कामयाबी के क़िस्से सुना रहे थे और सुनीता अपनी सहेलियों को अपनी नई डायमंड नेकलेस दिखा रही थीं।

शंकर, हमेशा की तरह, अपनी ड्यूटी पर तैनात था। उसने अंजलि को खाना खिलाकर, उसे परियों की कहानी सुनाकर सुला दिया था और अब वह पार्टी में बचे-खुचे काम निपटा रहा था।

भाग 2: आग का दरिया

रात के क़रीब बारह बजे होंगे। पार्टी अपने पूरे शबाब पर थी। तभी अचानक बंगले के पिछले हिस्से से धुआँ उठता दिखाई दिया। किसी ने ध्यान नहीं दिया, सबको लगा कि शायद किचन की चिमनी का धुआँ होगा। लेकिन कुछ ही पलों में धुएँ के साथ आग की लपटें भी उठने लगीं। शॉर्ट सर्किट की वजह से लगी एक छोटी सी चिंगारी ने अब विकराल रूप ले लिया था।

“आग! आग!” किसी के चिल्लाने की आवाज़ आई और संगीत बंद हो गया। मेहमानों में भगदड़ मच गई। हर कोई अपनी जान बचाने के लिए मुख्य दरवाज़े की तरफ़ भाग रहा था। विक्रम सिंह और सुनीता भी बदहवास होकर बाहर भागे।

बाहर आकर, जब साँसें कुछ दुरुस्त हुईं, तो सुनीता को भयानक सच याद आया। उसकी आँखों में दुनिया का सबसे बड़ा ख़ौफ़ उतर आया। वह चीखी, “अंजलि! मेरी बेटी अंदर है!”

विक्रम सिंह के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उनकी सारी दौलत, सारी ताक़त उस आग की लपटों के सामने राख लग रही थी। अंजलि ऊपर वाले कमरे में सो रही थी, और उस कमरे तक जाने वाली सीढ़ियों को आग ने अपनी चपेट में ले लिया था।

विक्रम सिंह चिल्लाए, “कोई मेरी बेटी को बचाओ! मैं उसे मुँह माँगा इनाम दूँगा! एक करोड़ दूँगा! कोई तो जाओ!”

लेकिन कोई आगे नहीं बढ़ा। आग इतनी भयानक थी कि अंदर जाने का मतलब था मौत को गले लगाना। गार्ड, दूसरे नौकर, यहाँ तक कि विक्रम के तथाकथित ‘वफ़ादार’ दोस्त, सब दूर खड़े तमाशा देख रहे थे।

तभी भीड़ को चीरता हुआ शंकर आगे आया। उसकी आँखों में न डर था, न लालच। उसकी आँखों में सिर्फ़ अंजलि का मासूम चेहरा घूम रहा था। उसने विक्रम सिंह की तरफ़ देखा तक नहीं, बस इतना कहा, “मालिक, आप चिंता न करें। मैं बिटिया को कुछ नहीं होने दूँगा।”

इससे पहले कि कोई उसे रोक पाता, शंकर ने पास पड़े एक गीले कंबल को अपने ऊपर लपेटा और आग की लपटों से घिरे बंगले के अंदर घुस गया। अंदर का दृश्य नरक जैसा था। धुआँ इतना था कि साँस लेना मुश्किल था, और हर तरफ़ से चटकने और टूटने की आवाज़ें आ रही थीं। वह किसी तरह दीवारों के सहारे, जलते हुए फ़र्नीचर से बचता हुआ सीढ़ियों तक पहुँचा। सीढ़ियाँ आधी जल चुकी थीं। उसने अपनी जान की परवाह न करते हुए, जलती हुई सीढ़ियों पर क़दम रखे। उसके पैर झुलस गए, लेकिन वह रुका नहीं।

ऊपर अंजलि का कमरा धुएँ से भरा था। वह बिस्तर पर बेहोश पड़ी थी। शंकर ने उसे अपनी गोद में उठाया, कंबल से लपेटा और वापसी के लिए मुड़ा। अब तक आग और फैल चुकी थी। वापसी का रास्ता लगभग बंद हो चुका था। तभी छत का एक जलता हुआ हिस्सा उसके दाहिने हाथ और कंधे पर आ गिरा। असहनीय दर्द से उसकी चीख़ निकल गई, लेकिन उसने अंजलि पर अपनी पकड़ ढीली नहीं होने दी।

लड़खड़ाते हुए, जलते हुए, वह किसी तरह बंगले के बाहर पहुँचा और अंजलि को उसकी माँ की गोद में सौंपकर वहीं बेहोश होकर गिर पड़ा।

नौकर ने करोड़पति की बेटी की जान बचाई… बदले में जो मिला, इंसानियत रो पड़ी…  फिर जो हुआ

भाग 3: इंसानियत की राख

अंजलि को तुरंत अस्पताल ले जाया गया। धुएँ के कारण उसे साँस लेने में तकलीफ़ थी, लेकिन उसकी जान ख़तरे से बाहर थी। राठौड़ परिवार ने राहत की साँस ली। विक्रम सिंह ने मीडिया के सामने बड़ी-बड़ी बातें कीं, “मेरे बहादुर नौकर ने अपनी जान पर खेलकर मेरी बेटी को बचाया। मैं उसका जीवन भर आभारी रहूँगा।”

शंकर को भी पास के एक सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया। वह बुरी तरह जल चुका था। उसके पैर, पीठ और ख़ास तौर पर उसका दाहिना हाथ, जिससे वह सारे काम करता था, 80 प्रतिशत तक जल गया था। डॉक्टरों ने कहा कि हाथ को बचाना मुश्किल है और अगर बच भी गया, तो वह शायद कभी पहले की तरह काम नहीं कर पाएगा।

पहले दो-तीन दिन विक्रम सिंह का मैनेजर अस्पताल आता रहा, दवाइयों का ख़र्च देता रहा। लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते गए, उसका आना कम हो गया। एक हफ़्ते बाद, जब शंकर दर्द से कराह रहा था और उसे बेहतर इलाज की सख़्त ज़रूरत थी, मैनेजर आख़िरी बार आया।

उसने शंकर के हाथ में 50,000 रुपये का एक लिफ़ाफ़ा थमाया और कहा, “शंकर, मालिक ने तुम्हारे लिए यह भेजा है। तुम्हारी बहादुरी के लिए। अब तुम गाँव वापस चले जाओ। यहाँ तुम्हारा कोई काम नहीं है। तुम्हारी नौकरी ख़त्म।”

शंकर के कानों को यक़ीन नहीं हुआ। उसने काँपती आवाज़ में कहा, “लेकिन साहब… मेरा इलाज? मेरा हाथ…?”

मैनेजर ने بےरुखी से कहा, “देखो, मालिक ने तुम्हारी जान बचाने का इनाम दे दिया है। अब इलाज का ख़र्च हम क्यों उठाएँ? और वैसे भी, अब तुम इस जले हुए हाथ से क्या काम करोगे? तुम हमारे किसी काम के नहीं रहे। मालिक को अपने बंगले में एक अपाहिज नौकर नहीं चाहिए।”

यह सुनकर शंकर के सीने में आग की लपटों से भी ज़्यादा तेज़ जलन हुई। यह सिर्फ़ नौकरी से निकाला जाना नहीं था, यह उसकी वफ़ादारी, उसकी इंसानियत का गला घोंटना था। जिस मालिक की बेटी के लिए वह मौत के मुँह में चला गया, उसी मालिक ने उसे एक टूटे हुए औज़ार की तरह फेंक दिया था।

उसने गिड़गिड़ाते हुए कहा, “साहब, मालिक से कहिए, मुझे पैसे नहीं चाहिए, बस मेरा इलाज करा दें। मैं ठीक होकर सब चुका दूँगा।”

“चुपचाप पैसे रखो और यहाँ से दफ़ा हो जाओ,” मैनेजर ने धमकाते हुए कहा और चला गया।

शंकर के आँसू उसके जले हुए गालों पर गिरकर और भी ज़्यादा जलन पैदा कर रहे थे। उसे अपना दर्द कम और उस धोखे का दर्द ज़्यादा महसूस हो रहा था। उस दिन, उस अस्पताल के बिस्तर पर सिर्फ़ शंकर नहीं, बल्कि इंसानियत रो रही थी।

कुछ हफ़्तों बाद, आधे-अधूरे इलाज के साथ, एक बेकार हो चुके हाथ और टूटे हुए दिल को लेकर शंकर को अस्पताल से छुट्टी मिल गई। वह लंगड़ाता हुआ, अपनी पहचान बन चुके उस बंगले के सामने आख़िरी बार खड़ा हुआ। अंदर से हँसी और संगीत की हल्की आवाज़ आ रही थी। ज़िंदगी वापस पटरी पर लौट आई थी, बस उसकी पटरी उखड़ चुकी थी। भारी मन से वह अपने गाँव की ट्रेन पकड़ने के लिए स्टेशन की ओर चल पड़ा।

भाग 4: वक़्त का पहिया

गाँव पहुँचकर शंकर की हालत और बिगड़ गई। शहर की बेरुखी ने उसे तोड़ दिया था, और गाँव की ग़रीबी उसे खाने लगी थी। उसका दाहिना हाथ पूरी तरह से बेकार हो चुका था। वह कोई काम नहीं कर सकता था। घर की जमा-पूँजी उसके आधे-अधूरे इलाज में ख़त्म हो गई। माँ की दवाइयाँ बंद हो गईं, बहन के ब्याह के सपने टूट गए और छोटे भाई को पढ़ाई छोड़कर मज़दूरी करनी पड़ी।

जो शंकर कभी पूरे घर का सहारा था, अब वह ख़ुद एक बोझ बन गया था। गाँव वाले उसे ताने मारते, “शहर गया था कमाने, और भिखारी बनकर लौट आया।” वह दिन-रात उस आग वाले दिन को और विक्रम सिंह के धोखे को याद करके घुटता रहता। उसकी आँखों की चमक चली गई थी, और वह एक ज़िंदा लाश बनकर रह गया था।

उधर दिल्ली में, राठौड़ बंगले में सब कुछ सामान्य था, सिवाय अंजलि के। उस हादसे के बाद वह बहुत चुप रहने लगी थी। वह अक्सर रात में डरकर उठ जाती और ‘शंकर भैया’ कहकर रोने लगती। सुनीता और विक्रम ने उसे बहलाने की बहुत कोशिश की, उसे दुनिया के सबसे महँगे खिलौने लाकर दिए, लेकिन अंजलि की आँखों में ख़ुशी नहीं लौटती। वह बार-बार पूछती, “मेरा शंकर भैया कहाँ है? वो मुझसे मिलने क्यों नहीं आता?”

विक्रम और सुनीता उसे झूठ बोल देते, “बेटा, वो अपने गाँव गया है। उसकी माँ बीमार है।”

वक़्त बीतता गया। पाँच साल गुज़र गए।

अंजलि अब बारह साल की एक समझदार लड़की बन चुकी थी। लेकिन शंकर भैया की याद उसके दिल में आज भी ताज़ा थी। एक दिन, घर की सफ़ाई के दौरान उसे स्टोर रूम में एक पुराना संदूक मिला। उसमें उसकी बचपन की तस्वीरें थीं। एक तस्वीर में वह शंकर के कंधे पर बैठी खिलखिला रही थी। तस्वीर देखते ही उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

उसने वह तस्वीर ले जाकर अपनी माँ से पूछा, “माँ, सच बताओ, शंकर भैया कहाँ हैं? आपने पाँच साल से मुझसे झूठ बोला है। मैं अब बच्ची नहीं हूँ।”

सुनीता, जो पिछले पाँच सालों से अपराध-बोध की आग में जल रही थी, आज अपनी बेटी के सवालों के सामने टूट गई। उसने रोते हुए अंजलि को सारी सच्चाई बता दी – कैसे शंकर ने उसे बचाया, कैसे वह बुरी तरह जल गया, और कैसे उसके पिता ने उसे पैसे देकर भगा दिया।

सब कुछ सुनकर अंजलि सन्न रह गई। उसके लिए उसका पिता एक हीरो था, लेकिन आज वह उसकी नज़रों में एक राक्षस बन गया था। उसके अंदर ग़ुस्से, नफ़रत और अपने शंकर भैया के लिए प्यार का एक तूफ़ान उठ खड़ा हुआ।

उस रात, जब विक्रम सिंह घर आए, तो अंजलि ने डिनर टेबल पर वह तस्वीर फेंक दी। उसकी आँखों में आँसू नहीं, अंगारे थे।

“यह कौन है, पापा? क्या आपको याद है?” उसने काँपती लेकिन दृढ़ आवाज़ में पूछा।

विक्रम ने तस्वीर देखकर नज़रें चुरा लीं। “यह… यह शंकर है। पुराना नौकर था।”

“नौकर?” अंजलि चीखी। “वह इंसान जिसने अपनी जान पर खेलकर आपकी बेटी की जान बचाई, और आपने उसे क्या दिया? उसे अपाहिज बनाकर, 50,000 रुपये की भीख देकर घर से निकाल दिया! आपको शर्म नहीं आई?”

विक्रम चिल्लाया, “तमीज़ से बात करो, अंजलि! तुम नहीं जानती कि बिज़नेस कैसे चलता है।”

“मुझे नहीं जानना आपका बिज़नेस!” अंजलि ने जवाब दिया। “मुझे बस मेरा शंकर भैया वापस चाहिए। आप उसे ढूँढकर लाएँगे, उससे माफ़ी माँगेंगे, और उसका पूरा इलाज कराएँगे। और अगर आपने ऐसा नहीं किया, तो मैं यह घर छोड़कर चली जाऊँगी और पूरी दुनिया को बताऊँगी कि विक्रम सिंह राठौड़ कितने बड़े और ‘महान’ इंसान हैं!”

यह विक्रम सिंह के मुँह पर सबसे बड़ा तमाचा था। जिस बेटी के लिए उसने यह सब किया, आज वही बेटी उसकी दौलत और इज़्ज़त पर थूक रही थी। उसने पहली बार अपनी बेटी की आँखों में अपने लिए नफ़रत देखी, और उसका दिल काँप गया।

भाग 5: प्रायश्चित के आँसू

अंजलि की धमकी और सुनीता के दबाव के आगे विक्रम सिंह को झुकना पड़ा। उसने अपने सबसे क़ाबिल जासूसों और मैनेजरों को शंकर के गाँव का पता लगाने के काम पर लगा दिया। कई हफ़्तों की मशक़्क़त के बाद, बिहार के उस छोटे से, पिछड़े गाँव का पता चल ही गया।

अगले ही दिन, विक्रम सिंह अपनी पत्नी और बेटी के साथ अपनी सबसे महँगी गाड़ी में उस गाँव के लिए रवाना हुआ। शहर की चिकनी सड़कों से उतरकर जब गाड़ी गाँव की ऊबड़-खाबड़, धूल भरी सड़कों पर चली, तो विक्रम को पहली बार अपनी दुनिया और शंकर की दुनिया का फ़र्क़ महसूस हुआ।

गाँव में जब उन्होंने शंकर का घर पूछा, तो लोग उन्हें घूरने लगे। एक टूटी-फूटी झोपड़ी के सामने गाड़ी रुकी। झोपड़ी के बाहर एक चारपाई पर एक कंकाल जैसा आदमी लेटा हुआ था, जिसकी आँखें धँसी हुई थीं और चेहरा निराशा से काला पड़ गया था। उसका दाहिना हाथ अजीब तरह से मुड़ा हुआ और काला पड़ चुका था।

अंजलि उसे देखते ही पहचान गई। वह “शंकर भैया!” कहकर रोती हुई दौड़ी और उस चारपाई के पास घुटनों के बल बैठ गई।

शंकर ने आवाज़ सुनी तो धीरे से आँखें खोलीं। पहले तो उसे यक़ीन नहीं हुआ। उसे लगा कि वह कोई सपना देख रहा है। लेकिन जब अंजलि ने उसका सूखा, ठंडा हाथ अपने हाथों में लिया, तो उसे एहसास हुआ कि यह सच है। पाँच साल बाद, उसकी ‘बिटिया’ उसके सामने थी। उसकी सूखी आँखों से भी आँसू बह निकले।

विक्रम सिंह और सुनीता शर्मिंदगी से सिर झुकाए खड़े थे। विक्रम की सारी हेकड़ी, सारा गुरूर उस झोपड़ी की दहलीज़ पर दम तोड़ चुका था। वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा और शंकर के पैरों के पास ज़मीन पर बैठ गया।

उसने हाथ जोड़कर, भर्राई आवाज़ में कहा, “शंकर… मुझे माफ़ कर दो। मैं अंधा हो गया था। पैसे और घमंड ने मेरी इंसानियत मार दी थी। मैंने तुम्हारे साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है।”

शंकर कुछ नहीं बोला, बस रोती हुई अंजलि के सिर पर अपने काँपते हुए बाएँ हाथ से हाथ फेरता रहा।

अंजलि ने सिसकते हुए कहा, “भैया, पापा को माफ़ कर दो। मैं आपको वापस लेने आई हूँ। आप हमारे साथ दिल्ली चलेंगे। दुनिया के सबसे अच्छे डॉक्टर आपका इलाज करेंगे।”

उस दिन उस गाँव ने एक ऐसा दृश्य देखा जो किसी फ़िल्म से कम नहीं था। एक करोड़पति एक ग़रीब, अपाहिज नौकर के पैरों में बैठकर माफ़ी माँग रहा था।

शंकर दिल्ली नहीं गया। उसने कहा, “बिटिया, मेरी दुनिया अब यही है। लेकिन तुमने आकर मेरे जीने की वजह लौटा दी।”

विक्रम सिंह ने प्रायश्चित करने का फ़ैसला किया। उसने शंकर के इलाज के लिए देश के सबसे बड़े डॉक्टरों की टीम उसी गाँव में भेज दी। कई ऑपरेशनों के बाद, शंकर का हाथ पूरी तरह तो ठीक नहीं हुआ, लेकिन वह काफ़ी हद तक काम करने लायक हो गया। विक्रम ने शंकर के नाम पर एक बड़ी रक़म का ट्रस्ट बनाया, जिससे उसके परिवार का भविष्य सुरक्षित हो गया। उसने शंकर की बहन की शादी बड़ी धूमधाम से की और उसके भाई की पढ़ाई का सारा ज़िम्मा उठाया।

इतना ही नहीं, उसने ‘शंकर के नाम पर’ उस गाँव में एक आधुनिक अस्पताल और एक स्कूल भी बनवाया, ताकि उस गाँव के किसी और शंकर को इलाज या शिक्षा के लिए भटकना न पड़े।

विकom सिंह को अपनी ग़लती का एहसास हो चुका था। वह जान गया था कि इंसानियत का रिश्ता ख़ून या हैसियत से नहीं, बल्कि कर्म और भावना से बनता है।

अंजलि अब हर छुट्टी में उस गाँव जाती। वह शंकर भैया के साथ घंटों बातें करती, और उस अस्पताल और स्कूल के बच्चों के साथ खेलती। शंकर अब गाँव में एक सम्मानित व्यक्ति था। लोग उसे ‘शंकर जी’ कहकर बुलाते थे। उसने अपनी जान देकर सिर्फ़ एक लड़की को नहीं बचाया था, बल्कि एक घमंडी इंसान के अंदर के इंसान को भी जगा दिया था।

कहानी का अंत शायद वैसा नहीं हुआ जैसा फ़िल्मों में होता है, जहाँ नौकर वापस महल में चला जाता है। लेकिन यह ज़्यादा सच्चा था। शंकर को उसकी खोई हुई इज़्ज़त और आत्म-सम्मान वापस मिल गया था, और विक्रम सिंह राठौड़ को एक ऐसा सबक़ मिला था, जो दुनिया की कोई भी बिज़नेस स्कूल उसे नहीं सिखा सकती थी। और इस तरह, इंसानियत जो एक दिन राख हो गई थी, उसी राख से एक नए और ज़्यादा मज़बूत रूप में फिर से जी उठी।