पटना नीट छात्रा मामला: हॉस्टल संचालक, वार्डन और गार्ड का कैमरे पर खुलासा | शंभू गर्ल्स हॉस्टल
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के साए में: शंभवी गर्ल्स हॉस्टल की रात
पटना की वो गली दिन में जितनी आम लगती थी, रात में उतनी ही डरावनी हो जाती थी।
पीली स्ट्रीट लाइट के नीचे जमा कचरा, दीवारों पर थूक के दाग, और सड़क के किनारे पड़ी शराब की खाली बोतलें—सब मिलकर एक ऐसा माहौल बनाते थे, जिसमें किसी मां का दिल अपनी बेटी को छोड़कर चैन से नहीं सो सकता था।
इसी गली में था शंभवी गर्ल्स हॉस्टल।
यहां देश के अलग-अलग हिस्सों से आई लड़कियां रहती थीं—कोई NEET की तैयारी कर रही थी, कोई नर्सिंग की, तो कोई इंजीनियरिंग के सपने देख रही थी। सबकी आंखों में एक ही सपना था—कुछ बनना, अपने मां-बाप का नाम रोशन करना।
लेकिन किसी ने नहीं सोचा था कि यह गली एक दिन दहशत की पहचान बन जाएगी।

वो दिन जब सब कुछ बदल गया
5 तारीख की सुबह सामान्य थी।
लड़कियां जल्दी-जल्दी तैयार होकर कोचिंग के लिए निकल रही थीं। कोई नोट्स देख रही थी, कोई फोन पर मां से बात कर रही थी।
अनुष्का—18 साल की NEET अभ्यर्थी—थोड़ी चुप-चुप थी उस दिन। उसकी सहेली रिया ने पूछा,
“क्या हुआ? रात को सोई नहीं क्या?”
अनुष्का ने हल्की मुस्कान के साथ सिर हिला दिया,
“सब ठीक है… बस सिर थोड़ा भारी है।”
किसी को अंदाजा नहीं था कि यह उसकी आखिरी सुबह होगी।
शाम होते-होते हॉस्टल में अफरा-तफरी मच गई।
अनुष्का अपने कमरे में बेहोश पाई गई।
वार्डन घबरा गई।
गार्ड दौड़ते हुए अंदर आया।
एम्बुलेंस बुलाई गई।
हॉस्पिटल ले जाया गया।
और फिर…
पांच दिन बाद… मौत।
हॉस्टल में पसरा सन्नाटा
अनुष्का की मौत के बाद शंभवी गर्ल्स हॉस्टल में जैसे जान ही नहीं बची थी।
लड़कियां फोन हाथ में लिए बैठी रहतीं।
हर अजनबी आवाज़ पर चौंक जातीं।
रात में कोई वॉशरूम जाने से भी डरने लगी।
रिया अक्सर बिस्तर पर बैठकर रोती थी।
“अगर कल मैं उसके साथ रुक जाती तो…?”
कोई जवाब नहीं था।
सामने वाला हॉस्टल और कैमरे की आंख
शंभवी गर्ल्स हॉस्टल के ठीक सामने एक और गर्ल्स हॉस्टल था—सरस्वती निवास।
यहां के गार्ड हरि बाबू पचपन साल के थे।
चेहरे पर झुर्रियां थीं, लेकिन आंखें चौकस।
जब पत्रकार कैमरा लेकर पहुंचे, तो उन्होंने थकी आवाज़ में कहा,
“बच्चे बहुत दहशत में हैं साहब… छोटी-छोटी बच्चियां हैं। डर लगना स्वाभाविक है।”
कैमरे के सामने हॉस्टल का रजिस्टर दिखाया गया—
कौन कब बाहर गया, कब लौटा—सब दर्ज था।
“हम कोशिश करते हैं कि एक भी बच्ची बिना जानकारी बाहर न जाए,”
वार्डन सुचित्रा देवी ने कहा।
लेकिन सवाल सिर्फ नियमों का नहीं था।
सवाल था—सिस्टम का।
नॉर्म्स सिर्फ कागजों में
पत्रकार ने पूछा,
“आपके हॉस्टल का रजिस्ट्रेशन है?”
संचालक अमरनाथ शरण ने कड़वी हंसी हंसी,
“नॉर्म्स के हिसाब से तो पटना में एक भी हॉस्टल नहीं चलेगा।”
फायर सेफ्टी?
एनओसी?
लाइसेंस?
“फीस जमा हो जाती है साहब,
लेकिन लाइसेंस नहीं मिलता।”
यह सिर्फ एक हॉस्टल की कहानी नहीं थी।
यह पूरे शहर का सच था।
रात की गाड़ियां और खामोश गलियां
पास-पड़ोस के लोगों ने बताया—
“रात में महंगी गाड़ियां आती थीं… कुछ देर रुकती थीं… फिर चली जाती थीं।”
गार्ड ने कंधे उचकाए,
“गाड़ी तो आजकल सबके पास है… इससे क्या साबित होता है?”
लेकिन सवाल वहीं अटका था।
अगर सब कुछ ठीक था…
तो डर क्यों?
मां का फोन
अनुष्का की मां सीमा देवी गांव में थीं।
जब बेटी की मौत की खबर मिली, तो वो वहीं गिर पड़ीं।
“मैंने अपनी बच्ची को पढ़ने भेजा था… मरने नहीं…”
पटना आकर जब उन्होंने हॉस्टल देखा,
तो सिर्फ एक सवाल पूछा—
“क्या मेरी बेटी यहां सुरक्षित थी?”
कोई जवाब नहीं दे पाया।
डर के बीच पढ़ाई
रिया अब भी हॉस्टल में थी।
NEET का एग्ज़ाम पास था।
लेकिन किताबों के अक्षर अब उसे चुभते थे।
हर रात उसे लगता—
कोई दरवाज़ा खटखटा रहा है।
वह फोन पर पिता से बोली,
“पापा, मुझे यहां से ले जाइए…”
लेकिन पिता की आवाज़ मजबूर थी,
“बेटा, बस कुछ महीने और… फिर सब ठीक हो जाएगा।”
सिस्टम की नींद
मीडिया में खबर चली।
नेताओं ने बयान दिए।
जांच के आदेश हुए।
कुछ दिन रेड हुई।
कुछ हॉस्टल बंद हुए।
फिर…
सब शांत।
जैसे कुछ हुआ ही न हो।
एक सवाल जो रह गया
एक शाम रिया हॉस्टल की छत पर खड़ी थी।
सामने वही गली।
वही लाइट।
वही सन्नाटा।
उसने खुद से पूछा—
“अगर अनुष्का की जगह मैं होती तो?”
उसे जवाब पता था।
यह किस्मत का नहीं, व्यवस्था का सवाल था।
अंत नहीं, शुरुआत
यह कहानी किसी एक लड़की की नहीं है।
यह उन हजारों छात्राओं की है—
जो सपने लेकर शहरों में आती हैं,
और सुरक्षा की जगह समझौते पाती हैं।
जब तक
हॉस्टल सिर्फ “बिजनेस” रहेंगे,
जब तक
नियम सिर्फ फाइलों में रहेंगे,
तब तक
हर गली में
एक अनुष्का की कहानी
लिखी जाती रहेगी।
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