पाकिस्तानी SP मैडम जासूस बनकर भारत में घूसी | सिपाही ने पकड़कर 4 दिन तक उसके साथ जो किया
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भूमिका
नमस्कार देशवासियों। आज हम आपको एक ऐसी चौंकाने वाली और रोमांचक कहानी सुनाने जा रहे हैं जो ना केवल आपके रोंगटे खड़े कर देगी बल्कि आपको एक भारतीय होने पर गर्व करने के लिए मजबूर कर देगी। यह कहानी है एक पाकिस्तानी एसपी मैडम राबिया खान की। एक ऐसी अफसर जिसे उसके देश ने भारत में भेजा था एक खतरनाक मिशन पर। उसका मकसद था भेष बदलकर हमारे देश से गुप्त जानकारियां चुराना। वह चालाक थी, प्रशिक्षित थी, खूबसूरत थी और उसने सोचा कि भारत की जमीन पर आकर वह सब कुछ हासिल कर लेगी। लेकिन उसे अंदाजा नहीं था कि उसका सामना एक ऐसे भारतीय सिपाही से होगा, जिसकी देशभक्ति और चतुराई के आगे उसकी सारी योजनाएं ध्वस्त हो जाएंगी।
राबिया का मिशन
राबिया खान, जो पाकिस्तान के लाहौर में जन्मी थी, एक तेजतर्रार महिला अधिकारी थी। उसकी आंखों में आत्मविश्वास और जोश साफ नजर आ रहा था। आईएसआई की बैठक में, जब उसे भारत में गुप्त जानकारी जुटाने का मिशन सौंपा गया, तो उसने दृढ़ता से कहा, “मैं उनके दिल में उतर जाऊंगी और सारा डाटा लेकर लौटूंगी।”
बैठक में फैसला हुआ कि राबिया को एक पंजाबी गांव की घरेलू नौकरानी के रूप में भारत भेजा जाएगा। उसका नया नाम रखा गया सिमरन। उम्र 26 साल। एक विधवा महिला जो पति की मौत के बाद काम की तलाश में दर-दर भटक रही थी। राबिया के लिए तैयार किए गए थे फर्जी आधार कार्ड, पैन कार्ड और वोटर आईडी। गुप्त रास्तों से सरहद पार करके वह भारत में दाखिल हो गई।
उधर धर्मपुरा गांव में एक मौका उसका इंतजार कर रहा था। भारतीय सेना से रिटायर्ड सूबेदार बलदेव सिंह, जो अपनी बूढ़ी मां के साथ रहते थे, उन्हें एक घरेलू नौकरानी की जरूरत थी। उनकी पत्नी का कुछ साल पहले निधन हो चुका था। उनका एक बेटा है अभिनव जो एक सीनियर आर्मी अफसर है और ज्यादातर समय ड्यूटी पर बाहर रहता है। यहीं से राबिया उर्फ सिमरन का मिशन शुरू हुआ।
सिमरन का काम
एक स्थानीय महिला की मदद से सिमरन को बलदेव सिंह के यहां नौकरानी का काम मिल गया। बलदेव सिंह ने रहने के लिए अपने ही घर में एक कमरा दे दिया था। सिमरन ने धीरे-धीरे घर के कामों की जिम्मेदारियां संभाल ली। वह सुबह जल्दी उठती, रसोई का काम, सफाई, पूजा के लिए दीप जलाना सब कुछ सलीके से करती। लेकिन यह सब उसकी असली भूमिका नहीं थी।

असल मिशन कुछ और था। काम के बीच-बीच में वह पूरे घर में गुप्त कैमरे और रिकॉर्डिंग डिवाइस लगा रही थी। फोन के पास, कंप्यूटर के पास और दरवाजे के आसपास। दरअसल दोस्तों, सूबेदार बलदेव सिंह के घर अक्सर भारतीय सेना के उच्च अधिकारी आते रहते थे। बलदेव सिंह से सलाह मशवरा करने के लिए। उनकी बातें सिमरन छुपकर सुना करती थी और रात होते ही वह एक छोटा मोबाइल सेटेलाइट राउटर ऑन करती, सारा डाटा इंक्रिप्ट करके सीधे पाकिस्तान के सर्वर पर भेज देती थी। घर में किसी को जरा सी भी भनक नहीं थी। सब कुछ इतनी सफाई से हो रहा था कि सिमरन पर शक करने का कोई सवाल ही नहीं उठता।
बहादुर सिंह की एंट्री
सूबेदार बलदेव सिंह के घर के पास ही एक भारतीय सैनिक रहता था। बहादुर सिंह, 30 वर्षीय बहादुर जवान जो फिलहाल बीएसएफ में तैनात था। वह अक्सर सूबेदार बलदेव सिंह के घर आता जाता रहता था। एक दिन जब उसने पहली बार सिमरन को देखा, तो थोड़ा हैरान हो गया। वह सोचने लगा, “इतनी सुंदर लड़की वह भी इस घर में नौकरानी।” उसके मन में सवाल उठने लगे।
धीरे-धीरे दोनों के बीच बातचीत होने लगी। बहादुर ने पूछा, “सिमरन जी, आप पढ़ी लिखी लगती हैं? क्या आप कभी कॉलेज गई थी?” सिमरन धीरे से बोली, “थोड़ा बहुत पढ़ा है। अब तो जिंदगी ही सबसे बड़ी पढ़ाई है।” धीरे-धीरे दोनों के बीच बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ता है। बहादुर सिंह को सिमरन अब अच्छी लगने लगी थी।
सिमरन की चालाकी
वह उससे मिलने के लिए छोटे-छोटे बहाने ढूंढने लगा। कभी चाय मांगने आ जाता तो कभी हलवे की फरमाइश करता था। सिमरन को यह सब खटकने लगा। लेकिन वह समझदार थी। उसे पता था कि ऐसे मोहरों को संभालना बेहद जरूरी होता है। अगर बहादुर को जरा भी शक हो गया तो पूरा मिशन खतरे में पड़ सकता था। वह मुस्कुरा कर पेश आती लेकिन भीतर ही भीतर हर चाल को सावधानी से बुन रही थी।
धीरे-धीरे सिमरन ने बहादुर सिंह से दूरी बनाना शुरू कर दी थी। उसे अपने मिशन से मतलब था, भावना या प्रेम से नहीं। लेकिन बहादुर सिंह अब अपनी सीमाएं लांघने लगा था। वह अब सिर्फ जान पहचान तक सीमित नहीं रहा।
अचानक बदलाव
एक रात वह चुपचाप सिमरन के कमरे की पिछली खिड़की के पास आ गया। उसके मन में एक अधूरी अधमरी सी लालसा थी। “देखूं तो सही, यह अकेली लड़की रात को क्या पहन के सोती है।” पर जो उसने देखा उसने उसके होश उड़ा दिए। सिमरन छोटे कपड़ों में नहीं बल्कि पूरी सजगता से लैपटॉप पर बैठी थी। वह कुछ डाटा टाइप कर रही थी और फिर एक खास डिवाइस से उसे पाकिस्तान के सर्वर पर भेज रही थी।
बहादुर की आंखें फटी की फटी रह गईं। उस समय वह कुछ नहीं बोला। बस चुपचाप लौट गया। अगली सुबह उसने मौका पाकर सिमरन को अकेले में रोका। धीरे से पूछा, “तुम कौन हो? रात को क्या कर रही थी?” सिमरन का चेहरा सफेद पड़ गया। उसे समझ आ गया कि अब मामला हाथ से निकल सकता है। या तो वह पकड़ी जाएगी या मारी जाएगी। लेकिन वह घबराई नहीं।
सच्चाई का सामना
उसने जल्दी से हालात का अंदाजा लगाया और सोचने लगी। “बहादुर तो मुझे पहले से चाहता है। क्यों ना इसी का इस्तेमाल करूं।” वह धीमे स्वर में बोली, “मैं बताऊंगी। पर तुम वादा करो। किसी से कुछ नहीं कहोगे।” बहादुर को तो यही चाहिए था। उसने कहा, “ठीक है, रात को मेरे कमरे में आ जाना।”
रात को सिमरन बहादुर के कमरे में जाती है। उस रात क्या हुआ? किस भाव से हुआ? तन का मेल था या मन का छल? यह कहना मुश्किल था। लेकिन उस रात के बाद कुछ बदल गया। सिमरन ने डाटा भेजना बंद कर दिया। उसके भीतर एक अदृश्य द्वंद शुरू हो गया था।
मिशन का संकट
क्या यह मिशन है या बहादुर का सच्चा प्रेम? उधर बहादुर भी पूरी तरह उलझ गया था। उसने चुपचाप सिमरन द्वारा लगाए गए सारे कैमरे और डिवाइसेस हटाने शुरू कर दिए। उसकी आंखों में प्यार था लेकिन दिल में देशभक्ति कहीं गहराई से धड़क रही थी। अब वह मानसिक संघर्ष में था।
एक ओर सिमरन की मोहक मुस्कान थी जो उसके दिल की परतों में उतर चुकी थी और दूसरी ओर था देश जिसकी रक्षा की शपथ उसने खून से खाई थी। सिमरन भी अब चुप रहने वाली नहीं थी। वह बहादुर से खुलकर बातें करने लगी थी। बचपन की कहानियां, अपने जीवन की झूठी मजबूरियां ताकि वह पूरी तरह उसका विश्वास जीत सके।
खतरनाक मोड़
एक दिन शाम के वक्त वे दोनों छत पर बैठे थे। सिमरन चुपचाप आकाश की ओर देखती है और कहती है, “वह जो तारे हैं ना बहादुर। कई बार सोचा उन्हें छू लूं। लेकिन मेरी किस्मत में तो अंधेरा ही लिखा है।” बहादुर कुछ नहीं कहता। पर उसकी आंखें भर आती।
जब आईएसआई को कई दिनों तक भारत से कोई भी डाटा नहीं मिला तो पाकिस्तान के सैन्य ठिकानों में बेचैनी फैल गई। कई अधिकारी सवाल उठाने लगे, “राबिया आखिर कर क्या रही है? कहीं वह पकड़ी तो नहीं गई।” आईएसआई ने एक विशेष योजना बनाई। ऑपरेशन गुलिस्तान 24।
इस मिशन का मकसद था भारत में पहले से छिपे अफसर की निष्क्रियता को नजरअंदाज करते हुए बल प्रयोग के जरिए अफरातफरी फैलाना। एक अफसर ने ठंडे लहजे में कहा, “राबिया को भूल जाओ। अब वक्त है खून बहाने का।” चार प्रशिक्षित आतंकवादियों को पंजाब सीमा के रास्ते भारत में घुसपैठ करने का आदेश दिया गया।
आतंकवादी हमला
उधर बहादुर सिंह को कुछ पुराने सैन्य संपर्कों ने बताया कि सीमा पर हलचल बढ़ गई है। वह सतर्क हो गया। बहादुर तभी सिमरन के पास पहुंचा और उसने सिमरन को घूरते हुए पूछा, “तुम मुझसे कुछ छुपा रही हो क्या? तुम्हारा पाकिस्तान अब क्या करने जा रहा है?”
सिमरन खामोश रही। उसकी आंखों में डर था मगर जुबान पर ताला। तभी बहादुर ने उसके कमरे की तलाशी ली और एक छुपा हुआ गुप्त कैमरा डिवाइस पकड़ लिया जो अब भी एक्टिव था। उसने तुरंत सारी रिकॉर्डिंग इकट्ठा की और अपने सीनियर ऑफिसर को सौंप दी।
सच्चाई का खुलासा
उस रात बहादुर और सिमरन में तीखी बहस हुई। बहादुर चिल्लाया, “सच बताओ, क्या तुम अब भी पाकिस्तान से जुड़ी हो? क्यों नहीं बताया कि हमला होने वाला है?” सिमरन फूट-फूट कर रोने लगी। “माफ कर दो बहादुर। मुझे नहीं पता था। मैं अब सिर्फ अपने बच्चों के लिए जी रही हूं।”
बहादुर का दिल तो पिघला लेकिन उसका चेहरा अब एक सिपाही का था। सख्त और निर्मोही। फिर वह दिन आया। आतंकवादी हमला करते हैं। लक्ष्य था सूबेदार बलदेव सिंह का घर जहां सेना की गुप्त बैठक चल रही थी। गोलियों की बौछार, धमाकों की आवाज और हर ओर अफरातफरी।
भारतीय सेना की बहादुरी
लेकिन भारतीय सेना और पंजाब पुलिस पहले से तैयार थी। बहादुर और उसकी यूनिट ने मोर्चा संभाल लिया। एक-एक कर सभी आतंकवादी ढेर कर दिए गए। एक आतंकी के पास से मिले दस्तावेजों में सिमरन के हस्ताक्षर और कोडवर्ड्स भी पाए गए। अब सारा सच सामने था।
हमले के दो दिन बाद बहादुर ने सिमरन को घर के बाहर बुलाया। बहादुर ने धीरे से कहा, “अब तुम पाकिस्तान जा सकती हो। तुम्हारी सारी जानकारी हमारे पास है। कुछ दिनों की वफादारी के चलते तुम पर मुकदमा नहीं चलाया जाएगा। लेकिन याद रखना हमारे पास सबूत हमेशा रहेंगे।”
राबिया का प्रायश्चित
सिमरन हाथ जोड़ती है। “बहादुर, मैंने जो किया वह गलत था लेकिन मैंने दिल से तुमसे मोहब्बत की थी।” बहादुर हल्के से मुस्कुराया पर आंखें नम थीं। “यह मोहब्बत नहीं थी। सिमरन, यह एक भ्रम था और मैं भ्रम में नहीं जीता।”
कुछ दिन बाद एक गुप्त डिप्लोमेटिक चैनल के जरिए सिमरन को पाकिस्तान भेज दिया गया। पाकिस्तान में उसका असली नाम राबिया दोबारा एक्टिव कर दिया गया। वह फिर से आईएसआई से जुड़ गई।
राबिया की धमकी
एक दिन उसने बहादुर को फोन किया। धमकी भरे लहजे में बोली, “मैं वापस आ रही हूं।” बहादुर ने शांत स्वर में जवाब दिया, “हम वह लोग हैं जो मोहब्बत में भी वतन नहीं भूलते। और जब दुश्मन मोहब्बत में भी छल करे तो हमें उसे जवाब देना आता है।”
6 महीने बीत चुके थे। बहादुर अब एक गुप्त मिशन पर था। ऑपरेशन नेत्र। मकसद पाकिस्तान की सीमा के अंदर जाकर एक खतरनाक आतंकी नेटवर्क को खत्म करना। लेकिन वह नहीं जानता था कि इस मिशन के भीतर एक और परछाई छिपी है। राबिया उर्फ सिमरन।
आईएसआई का नया आदेश
आईएसआई ने अब उसे एक ही टारगेट दिया था। “बहादुर सिंह को खत्म करना है।” पाकिस्तान के कराची में एक गुप्त मीटिंग के दौरान आईएसआई जनरल महमूद ने कहा, “वह जो तुम्हारे दिल में बचा रह गया है। उसे खत्म करो और फिर इस खेल से आजाद हो जाओ।”
राबिया चुप रही। उसके चेहरे पर अब कोई भाव नहीं था। जो कभी मोहब्बत थी अब एक स्मृति बन चुकी थी। उधर बहादुर सिंह अब पाकिस्तान में घुस चुका था। नया भेष, नई पहचान और सिर्फ दो साथियों के साथ।
मिशन का अंत
मिशन था कराची के बाहरी इलाके में एक फैक्ट्री को उड़ाना जहां बम बनाए जा रहे थे और वहीं से हथियार भारत भेजे जाते थे। जैसे ही वह फैक्ट्री पर हमले के लिए पहुंचा, एक जाना पहचाना चेहरा सामने आया। एक काले बुर्के में राबिया थी।
एक क्षण को उसका दिल डोल गया। लेकिन अगले ही पल वह फिर से सैनिक की भूमिका में आ गया। अब यह मिशन नहीं रहा। यह पर्सनल भी बन गया है। उसने अपने साथी से कहा, “फैक्ट्री पर हमला हुआ।” धमाकों की आवाज से पूरा इलाका थर्रा उठा। आतंकी इधर-उधर भागने लगे।
राबिया की मदद
पर तभी बहादुर को चारों ओर से घेर लिया गया। गोलियां चलने लगी और फिर एक छाया सामने आई। दो गोलियां चली। दो आतंकी गिर गए। वो राबिया खान थी। बहादुर हैरान रह गया। “तुमने मेरी जान क्यों बचाई?”
राबिया की आंखें भीग गईं। “क्योंकि मेरी आत्मा अब खामोश नहीं रह सकती। मैं तुम्हें मारने नहीं आई थी। मैं खुद को मुक्त करने आई थी।”
सच्चाई का सामना
बहादुर की आंखों में शक झलका। “यह भी कोई जाल तो नहीं?” राबिया ने धीरे से पिस्तौल जमीन पर रख दी और बोली, “मैं तुम्हारे देश से माफी मांगती हूं। मुझे एक मौका दो। मैं सारी सच्चाई उजागर कर दूंगी।”
बहादुर ने कहा, “ठीक है, मेरे साथ भारत चलो।” उसके बाद राबिया भारत आ जाती है और फिर भारतीय एजेंसियों ने राबिया को हिरासत में ले लिया। लेकिन उसके बयान इतने विस्फोटक थे कि भारत सरकार को संयुक्त राष्ट्र तक फाइल भेजनी पड़ी।
भारत का जवाब
उसने गुलिस्तान 24, आतंकी फंडिंग, ब्लैकमेलिंग, सब कुछ उजागर कर दिया। भारत ने पूरी दुनिया के सामने पाकिस्तान को बेनकाब किया। बहादुर सिंह ने एक वाक्य कहा, “एक गद्दार ने अंततः इंसानियत चुनी। हम नफरत से नहीं सच्चाई से जीतते हैं।”
राबिया अब भारत की जेल में थी। वह रोज भगवत गीता पढ़ती, मौन रहती और प्रायश्चित करती। एक दिन बहादुर उससे मिलने आया। राबिया ने उसकी आंखों में देखा और कहा, “मैंने तुम्हें खोकर खुद को पाया। अब चाहती हूं कि मेरी आखिरी सांस इसी मिट्टी में हो।”
गुलामी से मुक्ति
बहादुर बोला, “देश से गद्दारी की माफी नहीं मिलती पर आत्मा को शांति मिल सकती है।” 5 साल बीत चुके थे। ऑपरेशन नेत्र की गूंज अब अंतरराष्ट्रीय मंचों से होते हुए इतिहास में दर्ज हो चुकी थी।
राबिया खान जिसने कभी भारत के खिलाफ जासूसी की थी, अब अच्छे व्यवहार और मानवीय आधार पर रिहा की जा रही थी। भारत सरकार के लिए यह निर्णय आसान नहीं था। पर संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार संगठनों के दबाव ने इसे संभव किया।
रिहाई का दिन
रिहाई के दिन जेल के बाहर कोई नहीं था। सिवाय एक के। बहादुर सिंह। राबिया उसके सामने चुपचाप खड़ी रही। जैसे कुछ कहना चाहती हो। पर शब्द गले में अटक रहे थे। बहादुर ने उसकी ओर देखा और कहा, “चलो तुम्हें तुम्हारे सरहद पर छोड़ देता हूं।”
गाड़ी सरहद की ओर बढ़ती रही। उन दोनों के बीच सिर्फ चुप्पी थी। वह चुप्पी जो हर शब्द से भारी थी। पठानकोट से अटारी बॉर्डर तक का सफर लंबा था। हर किलोमीटर हर मोड़ जैसे उनके बीच की कहानियों को चुपचाप दोहराता जा रहा था।
अंतिम लम्हा
राबिया ने धीरे से कहा, “मुझे लगा था तुम मुझे देखने भी नहीं आओगे।” अब फिर से बहादुर सिंह ने कुछ देर चुप रहकर बस इतना कहा, “मैंने तुम्हें सजा दी। अब शायद मोक्ष देना मेरा कर्तव्य है।”
राबिया की आंखें भर आई। मगर उन्होंने उन आंसुओं को गिरने नहीं दिया। जैसे किसी अपराध की अंतिम सजा भी अब खुद को कमजोर नहीं करना चाहती थी। अटारी वाघा सीमा पर वो आखिरी लम्हा।
एक ओर पाकिस्तानी रेंजर्स, दूसरी ओर भारतीय जवान, बीच में कंटीली बाड़ जैसे दो दिलों के बीच की अदृश्य दीवार। राबिया ने जाते-जाते पूछा, “क्या तुम मुझे माफ कर पाए?”
मोहब्बत और देशभक्ति
बहादुर ने उसकी ओर देखा। “मेरी वर्दी ने तुम्हें सजा दी। मगर मेरा दिल शायद तुम्हें कभी छोड़ नहीं पाया। लेकिन अब मैं तुम्हें आजाद करता हूं। हर बंधन से।”
राबिया ने सिर झुकाया। आंखों से एक अकेली बूंद गिरी और वह सीमा पार चली गई। अब उसे कोई नाम नहीं चाहिए था। कोई पहचान नहीं, बस आजादी।
एक नया सफर
6 महीने बाद बहादुर सिंह को एक चिट्ठी मिली। पाकिस्तान से राबिया की। “प्रिय बहादुर, तुम्हारे देश ने मुझे सजा दी। पर तुमने मुझे आत्मा दी। अब मैं पेशावर में एक स्कूल चला रही हूं। जहां लड़कियां पढ़ती हैं और नफरत से दूर रहती हैं। शायद यही मेरा प्रायश्चित है। तुम्हारी नहीं रही लेकिन अब किसी और की गुलाम भी नहीं।”
समापन
बहादुर ने वह चिट्ठी संभालकर अपनी किताब के अंतिम पन्ने में रख दी। इस कहानी को सुनाने का उद्देश्य किसी को परेशान करना, किसी का दिल दुखाना बिल्कुल भी नहीं है। इस कहानी का उद्देश्य आपको जागरूक करना, आपको सचेत करना है।
दोस्तों, आप यह वीडियो कहां से देख रहे हैं? दिल्ली, मुंबई, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, कोलकाता, चेन्नई, बिहार, पटना, नेपाल या फिर दुनिया के किसी और कोने से। प्लीज अपना नाम और शहर कमेंट बॉक्स में जरूर लिखिए। आपका नाम और आपकी लोकेशन सिर्फ एक जानकारी नहीं, मेरे लिए एक रिश्ता है। एक आत्मीय जुड़ाव।
जब आप अपना नाम लिखते हैं, तो मुझे लगता है जैसे यह कहानी आप तक सच में पहुंची है। मन से, दिल से। आपका छोटा सा कमेंट हमारी इस सेवा को सार्थक और जीवंत बनाता है। आप ही हमारे सफर के सबसे कीमती साथी हैं।
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