पार्टी में पति से सैंडल साफ़ करवाई फिर..| स्वाभिमानी पति का बदला..

.

.

स्वाभिमानी पति का बदला: ईशा और कबीर की कहानी

यह कहानी है एक घमंडी पत्नी और उसके स्वाभिमानी पति की, जो अपने रिश्ते की जटिलताओं और बदलती परिस्थितियों के बीच खुद को एक नई पहचान दिलाने की लड़ाई लड़ते हैं। यह कहानी है ईशा रॉय और कबीर सिंघानिया की, जिनकी जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आता है, जो सब कुछ बदल देता है।

ईशा रॉय: शहर की सबसे बड़ी बिजनेस वूमेन

ईशा रॉय, शहर की सबसे बड़ी बिजनेस वूमेन, रॉय मेंशन के आलीशान घर में रहती थी। उसकी जिंदगी में सब कुछ था — दौलत, नाम, सम्मान। लेकिन उसके अंदर घमंड और अहंकार भी था, जो उसने अपने पति कबीर के प्रति दिखाया। कबीर, जो ईशा का पति था, पर घर में उसका कोई सम्मान नहीं था। वह ईशा के लिए सिर्फ एक नौकर की तरह था, जिसे वह आदेश देती, अपमानित करती।

एक सुबह ईशा ने कबीर से अपनी ब्लैक कॉफी मांगी। कबीर किचन से कॉफी लेकर आया, लेकिन ईशा ने उसकी बात सुने बिना कॉफी का मग झटक कर जमीन पर गिरा दिया। गर्म कॉफी के छींटे कबीर के जूतों पर पड़े, पर ईशा को कोई फर्क नहीं पड़ा। उसने कहा, “तुम जैसे घर जमाई को और काम ही क्या है? मेरे पिता ने तुम्हें सड़क से उठाकर मेरा पति बनाया, इसका मतलब यह नहीं कि तुम मेरे बराबर हो।”

कबीर ने सिर झुका लिया और कहा, “मैं तुम्हारा पति हूं, कम से कम थोड़ी इज्जत तो दो।” पर ईशा ने उसकी बात काट दी, “तुम मेरे पति सिर्फ कागजों पर हो। हकीकत में तुम मेरे लिए एक गलती हो। एक बोझ हो। जिस दिन मुझे बड़ी डील मिल गई, उस दिन मैं तुम्हें इस घर से निकाल दूंगी। मुझे तलाक चाहिए।”

पार्टी में अपमान और स्वाभिमान की लड़ाई

शाम को रॉय मेंशन में एक ग्रैंड पार्टी थी। शहर के सभी बड़े अमीर लोग वहां मौजूद थे। ईशा बेहद खूबसूरत लग रही थी, उसके साथ विक्रम था, जो कबीर को नीचा दिखाने का मौका ढूंढता रहता था। कबीर ने एक पुराना सूट पहना था और जूस के गिलास सर्व कर रहा था, क्योंकि ईशा ने उसे यही काम दिया था।

विक्रम ने जोर से हंसते हुए कहा, “मिलिए मिस्टर कबीर से, ईशा के भाग्यशाली पति। वैसे काम तो यह बेटर का कर रहे हैं, लेकिन किस्मत राजाओं वाली है।” पूरी पार्टी में लोग हंसने लगे। ईशा को शर्म महसूस हुई, लेकिन उसने अपना गुस्सा कबीर पर निकालने का फैसला किया।

ईशा ने कबीर को बुलाया और कहा, “देखो मेरे सैंडल पर किसी ने ड्रिंक गिरा दी है। इसे साफ करो, वरना आज रात तुम्हें घर में घुसने नहीं दूंगी।” कबीर ने उसकी बात सुनी, लेकिन सैंडल साफ करने की बजाय उसने जमीन पर रुमाल बिछा दिया और खड़ा हो गया।

कबीर ने कहा, “मैंने यह शादी मजबूरी में और तुम्हारे पिता की इज्जत रखने के लिए निभाई थी। मुझे उम्मीद थी कि तुम मुझे पति मानोगी, लेकिन तुमने साबित कर दिया कि तुम्हारे पास पैसा तो बहुत है, लेकिन औरत की गरिमा नहीं।”

ईशा ने चिल्लाकर कहा, “तुम्हें तलाक चाहिए? मुबारक हो, आज से तुम आजाद हो।” कबीर ने कहा, “और रही बात डील की, तो दुआ करना कि उनका सीईओ तुम्हारी तरह घमंडी न हो।”

कबीर का बदला और कंपनी की डील

कबीर ने एंपायर ग्रुप के साथ रॉय इंडस्ट्रीज की डील कैंसिल करवा दी और बाजार में अफवाह फैला दी कि रॉय इंडस्ट्रीज डूबने वाली है। इससे ईशा की कंपनी के शेयर 40% गिर गए। ईशा को लगा जैसे उसकी पूरी दुनिया ध्वस्त हो गई।

विक्रम की फैक्ट्री पर रेड पड़ी, और पता चला कि उसके खिलाफ फ्रॉड और टैक्स चोरी के आरोप हैं। विक्रम ने कबीर से माफी मांगी, लेकिन कबीर ने उसे जेल भेज दिया।

कबीर का नया रूप और ईशा की हार

कबीर अब एक सफल और ताकतवर व्यवसायी बन चुका था। उसने ईशा को दिखा दिया कि असली ताकत दौलत में नहीं, इंसान के स्वाभिमान और मेहनत में होती है। उसने ईशा को एग्रीमेंट पर साइन करने को कहा, जिसमें उसने कंपनी और अपने सभी अधिकार कबीर को सौंप दिए।

ईशा को अब कबीर के घर में नौकरानी की भूमिका निभानी थी। वह झाड़ू पोछा करती, खाना बनाती और कबीर के जूते साफ करती। यह सब देखकर ईशा का घमंड टूट गया।

ईशा की तबाही और कबीर की दया

एक दिन ईशा के पिता की तबीयत बिगड़ गई। उसे ऑपरेशन के लिए भारी रकम की जरूरत थी। ईशा के पास पैसे नहीं थे, क्योंकि सारे अकाउंट कबीर के नाम थे। वह कबीर के पास मदद मांगने गई।

कबीर ने कहा, “तुम्हारे पिता ने मेरी मदद की थी, मैंने उनका कर्ज चुका दिया। अब मैं तुम्हें मदद क्यों करूं? तुमने मुझे घर से निकाला था।”

ईशा ने रोते हुए माफी मांगी। कबीर ने उसे माफ किया और पिता का ऑपरेशन करवा दिया। उसने कहा, “माफी मांगना आसान है, भरोसा जीतना मुश्किल। देखेंगे छह महीने बाद तुम कैसी हो।”

नई शुरुआत और सम्मान

ईशा ने कबीर के साथ काम करना शुरू किया। उसने मेहनत से अपनी जगह बनाई। कबीर ने उसे सम्मान दिया और एक दिन खुद कॉफी बनाई। दोनों के बीच अब सिर्फ एक गहरा सम्मान था।

निष्कर्ष

यह कहानी सिखाती है कि रिश्ते केवल कागजों पर नहीं होते, बल्कि सम्मान और समझदारी से चलते हैं। घमंड और अहंकार रिश्तों को तोड़ देते हैं, लेकिन स्वाभिमान और माफी से नए रिश्ते बनते हैं।