पुलिस ने फर्जी मेडिकल रिपोर्ट पेश कर दी बलाकत-कार हुआ ही नहीं
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न्याय की हत्या: गायत्री की अनसुनी चीख
1. सपनों का सफर: जहानाबाद से पटना तक
बिहार का एक छोटा सा जिला, जहानाबाद। यहाँ के साधारण परिवारों की आँखों में बड़े सपने पलते हैं। इन्हीं सपनों को आँखों में सजाए 17 साल की गायत्री ने अपनी मेहनत के दम पर ‘नीट’ (NEET) की तैयारी शुरू की थी। वह डॉक्टर बनना चाहती थी—शायद इसलिए ताकि वह उन लोगों का इलाज कर सके जिन्हें समाज अनदेखा कर देता है।
5 जनवरी 2026 की दोपहर थी। नए साल की छुट्टियां बिताकर गायत्री अपने घर से पटना के लिए निकली। जहानाबाद से पटना की दूरी महज 48 किलोमीटर है, लेकिन गायत्री के लिए यह उसके भविष्य की ओर बढ़ने वाला एक बड़ा कदम था। दोपहर 1:00 बजे उसने ट्रेन पकड़ी और करीब 3:00 बजे वह पटना जंक्शन पर उतरी। 3:35 बजे वह ‘शंभू गर्ल्स हॉस्टल’ पहुँची। उसने अपने पिता को फोन किया, “बाबूजी, मैं सुरक्षित पहुँच गई हूँ।” पिता ने सुकून की सांस ली, पर उन्हें क्या पता था कि यह उनकी बेटी की आखिरी सुकून भरी आवाज थी।

2. सन्नाटा और साज़िश की शुरुआत
अगले दिन, यानी 6 जनवरी को, वह फोन नहीं आया जिसका परिवार को इंतजार था। इसके बजाय, हॉस्टल के बाहर के एक व्यक्ति का फोन आया। खबर बिजली की तरह कौंधी— “आपकी बेटी बेहोश मिली है, हम उसे डॉक्टर सहजानंद के यहाँ ले जा रहे हैं।”
जब परिवार बदहवास होकर पटना पहुँचा, तो उन्हें अपनी ही बेटी से मिलने के लिए संघर्ष करना पड़ा। 7 जनवरी को जब गायत्री के मामा हॉस्टल पहुँचे, तो वहाँ का नजारा देखकर उनके रोंगटे खड़े हो गए। जिस कमरे में गायत्री रहती थी, वहाँ फर्श पर पोछा लगाकर सब कुछ चमका दिया गया था। साक्ष्यों को मिटाने की यह पहली और सबसे बड़ी कोशिश थी। हॉस्टल की वार्डन और प्रशासन के चेहरों पर कोई शिकन नहीं थी।
3. मौत से संघर्ष और इशारों में बयान
गायत्री को ‘प्रभात मेमोरियल अस्पताल’ में भर्ती कराया गया था। 8 जनवरी को शाम के वक्त चमत्कार हुआ; गायत्री करीब चार घंटे के लिए होश में आई। वह बोल नहीं पा रही थी, उसका शरीर टूट चुका था, लेकिन उसकी आँखों में खौफ और न्याय की तड़प साफ थी। उसने इशारों में अपने परिवार को बताया कि उसके साथ ‘गलत’ हुआ है।
अस्पताल की गुंडागर्दी का आलम यह था कि परिवार को अपनी बेटी का बयान मोबाइल में रिकॉर्ड नहीं करने दिया गया। जब पिता और मामा ने दबाव बनाया, तो उनके साथ बदतमीजी की गई और उन्हें बाहर निकाल दिया गया। लेकिन सच को ज्यादा देर दबाया नहीं जा सकता था। उसी अस्पताल के एक डॉक्टर ने दबी जुबान में परिवार के कान में कह दिया— “आपकी बच्ची के साथ बहुत बुरा हुआ है, इसे यहाँ से ले जाइए।”
4. सिस्टम का असली चेहरा: वर्दी और सफेद कोट का गठजोड़
परिवार एफआईआर (FIR) दर्ज कराने के लिए थाने के चक्कर काटता रहा। घटना 6 जनवरी की थी, लेकिन पुलिस ने 9 जनवरी तक कोई मामला दर्ज नहीं किया। पटना की पुलिस, जो सुरक्षा का दावा करती है, अपराधियों के लिए ढाल बनी खड़ी थी।
थानेदार रोशनी कुमारी ने न तो फॉरेंसिक टीम भेजी और न ही विशेषज्ञों को बुलाया। बल्कि, उन्होंने अपने एक निजी डॉक्टर को हॉस्टल भेजकर डीवीआर मंगा लिया। इसी बीच, हॉस्टल और अस्पताल ने मिलकर एक ‘फर्जी मेडिकल रिपोर्ट’ तैयार कर ली। रिपोर्ट में लिखा गया— “लड़की नशा करती थी और उसकी हालत नशे की ओवरडोज की वजह से खराब हुई है।”
यह केवल गायत्री का बलात्कार नहीं था, यह उसके चरित्र का भी सामूहिक बलात्कार था, जिसे सत्ता और पुलिस ने मिलकर अंजाम दिया था।
5. सच जो पोस्टमार्टम ने उगल दिया
गायत्री की हालत बिगड़ती गई। प्रभात मेमोरियल से उसे मेदांता ले जाया गया, जहाँ 11 जनवरी की दोपहर उसने दम तोड़ दिया। गायत्री तो चली गई, लेकिन पीछे छोड़ गई वो सबूत जिन्हें पुलिस मिटाना चाहती थी।
जब भारी दबाव के बीच पटना मेडिकल कॉलेज (PMCH) में पोस्टमार्टम हुआ, तो डॉक्टरों की कलम ने वो सच उगल दिया जिसने पूरे देश को हिला दिया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुख्य बिंदु कुछ इस प्रकार थे:
यौन हिंसा की पुष्टि: रिपोर्ट में साफ लिखा था कि छात्रा के साथ बलात्कार हुआ है।
भयानक संघर्ष: गायत्री ने उन दरिंदों से दो घंटे तक मुकाबला किया था। उसकी गर्दन, कंधों और हाथों पर नाखूनों के गहरे निशान थे।
निर्ममता: उसके प्राइवेट पार्ट पर गहरी चोटें थीं और बहुत अधिक खून बहा था। उसे किसी सख्त चीज से रगड़ा गया था, उसकी पीठ पर नीले निशान थे।
सामूहिक अपराध: रिपोर्ट ने इस ओर भी इशारा किया कि इस कृत्य में एक से ज्यादा लोग शामिल हो सकते हैं।
6. कारगिल चौक और बुझती हुई मशालें
पोस्टमार्टम के बाद, टूटा हुआ परिवार गायत्री का शव लेकर कारगिल चौक पर बैठ गया। वे अंतिम संस्कार करने से इनकार कर रहे थे। वे केवल इंसाफ चाहते थे। लेकिन ‘डबल इंजन’ की सरकार की पुलिस ने अपराधियों को पकड़ने के बजाय, न्याय मांग रहे लोगों पर लाठियां भांजी। 6 नामजद और 150 अज्ञात लोगों पर मुकदमा दर्ज कर दिया गया।
बिहार के गृह मंत्री और उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पर निशाना साधते हुए जनता सड़कों पर उतर आई। ‘नीतीश-भाजपा की सरकार है, बलात्कारियों की बहार है’ जैसे नारे गूंजने लगे।
7. आईएमए (IMA) की चुप्पी और नैतिकता का पतन
इस पूरे मामले में जो सबसे शर्मनाक रहा, वह था ‘इंडियन मेडिकल एसोसिएशन’ का रवैया। जब जनता उन डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रही थी जिन्होंने फर्जी रिपोर्ट बनाई, तो आईएमए ने डीजीपी को चिट्ठी लिखकर डॉक्टरों की सुरक्षा की मांग की। लेकिन उन्होंने एक बार भी उस ‘स्त्री रोग विशेषज्ञ’ का लाइसेंस रद्द करने की बात नहीं की जिसने पहली जाँच में यौन हिंसा को नकार दिया था।
निष्कर्ष: क्या हम सुरक्षित हैं?
गायत्री की कहानी आज हर उस माता-पिता के लिए एक डरावना सपना है जो अपनी बेटियों को पढ़ने के लिए बाहर भेजते हैं। यह कहानी केवल एक हत्या या बलात्कार की नहीं है, यह ‘सिस्टम’ द्वारा की गई संगठित हत्या है। जहाँ पुलिस साक्ष्य मिटाती है, डॉक्टर फर्जी रिपोर्ट लिखते हैं और नेता चुप्पी साध लेते हैं।
गायत्री का गुनहगार केवल वो दरिंदा नहीं है जिसने उसे नोचा, बल्कि वो हर शख्स है जिसने इस सच को दबाने के लिए अपने पद का इस्तेमाल किया।
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