पोती दादा जी के साथ चारा काटने खेत में गई थी बीच रास्ते में हुआ हादसा/
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बागपत का सनसनीखेज मामला: परिवार के भीतर छिपा भय, चुप्पी, शोषण और आखिरकार खून तक पहुंची त्रासदी
उत्तर प्रदेश के बागपत जिले से सामने आई एक बेहद विचलित कर देने वाली घटना ने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया। यह मामला केवल एक परिवार के भीतर हुए अपराध का नहीं, बल्कि उस चुप्पी का भी है जो लंबे समय तक डर, शर्म और सामाजिक बदनामी के कारण बनी रही। आरोपों के अनुसार, यह कहानी एक ऐसे घर की है जहां भरोसे की जगह भय ने ले ली, रिश्तों की मर्यादा टूट गई, और अंततः हालात इतने भयावह हो गए कि एक किशोरी ने अपने ही दादा की हत्या कर दी। पुलिस अब पूरे मामले की जांच कर रही है, और अदालत में यह तय होगा कि कानून इस घटना को किस रूप में देखता है। लेकिन इससे पहले, यह समझना जरूरी है कि घटनाओं की यह कड़ी आखिर किस तरह शुरू हुई और किस मोड़ पर जाकर इतनी भयावह बन गई।
बागपत जिले के मवी कला गांव का रहने वाला शीशपाल पेशे से किसान बताया गया है। उसके पास करीब चार एकड़ जमीन थी और वह खेती-किसानी से कमाई करता था। गांव में उसके बारे में अलग-अलग तरह की चर्चाएं थीं। बाहर से वह एक सामान्य ग्रामीण व्यक्ति की तरह दिखाई देता था, लेकिन आरोप यह हैं कि उसका चरित्र संदिग्ध था और गांव की महिलाओं के प्रति उसका रवैया उचित नहीं माना जाता था। परिवार में उसकी बहू पूजा और पोती अंजलि रहती थीं। अंजलि 11वीं कक्षा की छात्रा थी और पढ़ाई में अच्छी मानी जाती थी। गांव के लोग उसकी तारीफ करते थे, खासकर इसलिए क्योंकि पिता की मौत के बाद उसने कठिन परिस्थितियों में भी पढ़ाई जारी रखी थी।
अंजलि के पिता अर्जुन की मृत्यु के बाद पूजा और अंजलि की जिम्मेदारी घर के बुजुर्ग सदस्य होने के नाते शीशपाल पर आ गई थी। परिवार के बाकी लोगों और गांववालों के सामने वह संरक्षण देने वाले व्यक्ति की छवि में था, लेकिन आरोपों के अनुसार, इसी छवि के पीछे वह अपने घर की महिलाओं पर बुरी नजर रखता था। बाद की घटनाओं को देखते हुए यही बात पूरे मामले का सबसे भयावह पहलू बन जाती है।
बताया जा रहा है कि 4 दिसंबर 2025 की सुबह अंजलि स्कूल चली गई थी और घर पर उसकी मां पूजा अकेली थी। आरोप है कि इसी दौरान शीशपाल ने अपनी बहू पूजा के साथ अनुचित व्यवहार करने की कोशिश की। जब पूजा ने विरोध किया, तो उसने उसे पैसों का लालच देने की कोशिश की और फिर अश्लील प्रस्ताव रखा। पूजा ने साफ इंकार कर दिया और उसे पिता समान होने की याद दिलाई। इस पर शीशपाल ने नाराज होकर उसे आर्थिक तंगी में डालने की धमकी दी और खेत पर बने कमरे में रहने की बात कहकर चला गया। पहली नजर में यह घटना यहीं खत्म होती दिखाई देती है, लेकिन वास्तव में यह आगे आने वाली बड़ी साजिश की शुरुआत थी।

कुछ देर बाद, कथित रूप से शीशपाल ने अपनी बहू को फोन किया और माफी मांगने का नाटक किया। उसने कहा कि वह अपनी गलती समझ गया है और भविष्य में ऐसा कुछ नहीं करेगा। इसके बाद उसने पूजा से खेत पर दोपहर का खाना पहुंचाने के लिए कहा। पूजा ने पहले मना किया और कहा कि वह खाना भिजवा देगी, लेकिन शीशपाल ने भावनात्मक दबाव बनाते हुए कहा कि अगर वह खुद खाना लेकर नहीं आई तो वह उसके हाथ का खाना कभी नहीं खाएगा। पूजा ने इसे शायद ससुर का पश्चाताप समझा और खाना लेकर खेत की ओर चली गई।
आरोपों के मुताबिक, खेत पर पहुंचने पर पूजा ने शीशपाल को नशे की हालत में पाया। वह वहां से तुरंत लौटना चाहती थी, लेकिन उसने उसे पानी लाने के बहाने कमरे के अंदर भेजा। जैसे ही पूजा कमरे में गई, शीशपाल भी अंदर घुस गया, दरवाजा बंद कर लिया और हथियार दिखाकर उसे धमकाया। आरोप है कि भय और जान के खतरे के कारण पूजा खुद को बचा नहीं सकी। घटना के बाद उसे धमकी दी गई कि यदि उसने किसी को बताया तो उसे और उसकी बेटी को मार दिया जाएगा। भय, शर्म और सामाजिक बदनामी के डर से पूजा ने यह बात न तो पड़ोसियों को बताई और न ही अपनी बेटी अंजलि को।
यहीं से इस मामले का दूसरा और अधिक दर्दनाक चरण शुरू होता है। लगभग एक सप्ताह बाद, 11 दिसंबर 2025 को, आरोप है कि शीशपाल ने अपनी पोती अंजलि को भी निशाना बनाया। उस दिन वह स्कूल फीस जमा कराने के बहाने स्कूल पहुंचा, फीस भरी और छुट्टी के बाद अंजलि को अपने साथ ले आया। रास्ते में उसने कहा कि उसका मोबाइल खेत में छूट गया है और पहले खेत से फोन लेकर घर चलेंगे। अंजलि को कोई शक नहीं हुआ। वह अपने दादा के साथ खेत पर चली गई। वहां पहुंचने के बाद, कथित रूप से उसने अंजलि को कमरे में मोबाइल देखने के लिए भेजा और खुद पीछे से अंदर जाकर दरवाजा बंद कर लिया। आरोप है कि हथियार के दम पर उसने अंजलि को भी डराया और उसके साथ गंभीर अपराध किया। बाद में उसने उसे भी धमकी दी कि यदि उसने यह बात किसी को बताई तो वह उसकी मां और उसे जान से मार देगा।
यहां एक बेहद महत्वपूर्ण और मनोवैज्ञानिक पहलू सामने आता है। अंजलि और उसकी मां, दोनों अपने-अपने दर्द में चुप रहीं। पूजा ने अपनी बेटी को कुछ नहीं बताया, और अंजलि ने अपनी मां को कुछ नहीं बताया। मां बेटी दोनों एक-दूसरे की बेचैनी नोटिस तो कर रही थीं, लेकिन किसी ने सच कहने की हिम्मत नहीं जुटाई। यही चुप्पी आगे चलकर त्रासदी की जड़ बनी। अंजलि स्कूल जाने से कतराने लगी, बहाने बनाने लगी, और पूजा भी अपनी बेटी की हालत देखकर चिंतित थी, लेकिन दोनों के बीच संवाद का अभाव बना रहा।
इसी दौरान आरोप है कि शीशपाल ने बार-बार दोनों के साथ उत्पीड़न जारी रखा। जब मौका मिलता, वह पूजा को निशाना बनाता, और जब बहू घर से बाहर होती तो पोती के साथ गलत हरकतें करता। यह सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा। 25 जनवरी 2026 को हालात तब और बिगड़ गए जब पूजा को लगातार उल्टियां होने लगीं। वह मेडिकल स्टोर से जांच किट लाई और परीक्षण में पता चला कि वह गर्भवती है। इस खबर ने उसे अंदर तक तोड़ दिया। वह खुद को खत्म करने तक के बारे में सोचने लगी, लेकिन बेटी अंजलि का चेहरा सामने आने पर रुक गई।
उसी शाम, जब मां-बेटी दोनों अपनी-अपनी पीड़ा में टूट चुकी थीं, तो आखिरकार पूजा ने अपनी चुप्पी तोड़ी। उसने अंजलि को बताया कि उसका ससुर लंबे समय से उसका शोषण कर रहा है और अब वह गर्भवती हो चुकी है। यह सुनते ही अंजलि ने भी अपनी मां को बता दिया कि उसके साथ भी उसके दादा ने घिनौना अपराध किया है। यह वह क्षण था जब मां-बेटी दोनों को पहली बार पता चला कि वे दोनों एक ही राक्षसी व्यवहार की शिकार रही हैं।
पूजा ने गुस्से में पुलिस स्टेशन जाने की बात कही, लेकिन अंजलि ने बदनामी का डर जताया। यहीं यह सवाल पैदा होता है कि समाज में यौन अपराधों की पीड़िताओं के लिए न्याय की राह इतनी कठिन क्यों होती है। कानून उनके साथ हो सकता है, लेकिन सामाजिक दबाव, डर, परिवार की इज्जत और बदनामी का भय अक्सर उन्हें शिकायत दर्ज कराने से रोक देता है। इस मामले में भी यही हुआ। मां-बेटी ने उसी समय पुलिस तक जाने का फैसला नहीं किया।
रात करीब साढ़े नौ बजे, आरोप है कि शीशपाल शराब के नशे में घर लौटा और फिर पूजा को अपने कमरे में आने के लिए कहने लगा। अंजलि ने यह सब सुना और शायद उसी क्षण उसके भीतर जमा भय, गुस्सा और प्रतिशोध एक साथ फूट पड़ा। वह रसोई में गई, वहां से एक धारदार चाकू उठाया और सीधे अपने दादा के कमरे में पहुंच गई। आरोप है कि बिना कुछ और सोचे उसने शीशपाल पर हमला कर दिया, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई। इस घटना के बाद पूजा की चीख सुनकर पड़ोसी रामवीर वहां पहुंचे और पुलिस को सूचना दी।
पुलिस मौके पर पहुंची, शव को कब्जे में लिया और पूजा तथा अंजलि दोनों को हिरासत में ले लिया। पूछताछ के दौरान मां-बेटी ने अपने साथ बीते पूरे घटनाक्रम की जानकारी पुलिस को दी। इसके बाद पुलिस ने अंजलि के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की। आगे अदालत इस मामले को किन धाराओं में देखेगी, यह न्यायिक प्रक्रिया तय करेगी। यह भी देखा जाएगा कि हत्या किन परिस्थितियों में हुई, क्या यह आत्मरक्षा, अचानक उपजे आघात या लंबे समय से चले आ रहे उत्पीड़न की परिणति थी।
यह मामला कई गंभीर सवाल उठाता है। पहला, परिवार के भीतर होने वाले यौन शोषण की घटनाएं अक्सर सामने क्यों नहीं आ पातीं? दूसरा, पीड़िताएं बदनामी के डर से चुप क्यों रह जाती हैं? तीसरा, क्या समाज ने ऐसा वातावरण बना दिया है जहां अपराधी से ज्यादा पीड़िता को शर्म महसूस करनी पड़ती है? और चौथा, जब कानून तक पहुंचने में इतना डर हो, तो क्या न्याय केवल कागजों में रह जाता है?
इस घटना से यह भी स्पष्ट होता है कि यौन अपराध केवल कानून का मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का भी प्रश्न है। यदि पूजा और अंजलि को समय रहते सुरक्षित माहौल, विश्वास और कानूनी सहायता मिलती, तो शायद मामला हत्या तक नहीं पहुंचता। यह त्रासदी केवल एक अपराधी की नहीं, बल्कि उस सामाजिक चुप्पी की भी कहानी है जिसने पीड़िताओं को बोलने से रोका।
फिलहाल, कानून अपना काम कर रहा है। पुलिस जांच पूरी कर चुकी है और मामला अदालत की ओर बढ़ रहा है। यह अदालत ही तय करेगी कि अंजलि के कृत्य को किस कानूनी दायरे में देखा जाएगा। लेकिन नैतिक और सामाजिक स्तर पर यह घटना पहले ही एक गहरी बहस छेड़ चुकी है। क्या एक लंबे उत्पीड़न के बाद की गई हिंसक प्रतिक्रिया को केवल अपराध मानना पर्याप्त है? या उसके पीछे छिपे भय, अपमान और असहायता को भी समझना होगा?
इस पूरे मामले से समाज के लिए सबसे बड़ी सीख यही है कि चुप्पी अक्सर अपराधी की ताकत बन जाती है। परिवार, स्कूल, पड़ोस और प्रशासन—सभी को मिलकर ऐसा माहौल बनाना होगा जहां महिलाएं और लड़कियां बिना डर के अपनी बात कह सकें। साथ ही, यह भी जरूरी है कि किसी भी पीड़िता को बदनामी का बोझ न उठाना पड़े। न्याय तभी संभव है जब सच सामने आने की हिम्मत को समाज का सहारा मिले, न कि ताने और डर।
बागपत का यह मामला केवल एक आपराधिक घटना नहीं है; यह उस दर्दनाक सच्चाई का आईना है जिसमें घर की चारदीवारी के भीतर होने वाला अत्याचार अक्सर सबसे देर से सामने आता है। और जब सामने आता है, तब तक बहुत कुछ टूट चुका होता है—रिश्ते, भरोसा, मानसिक संतुलन और कई बार पूरा परिवार।
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