प्रेग्नेंट महिला को बस में खड़े देख अपनी सीट दे दी थी ,कुछ साल बाद जो मिला वो कभी सोचा भी नहीं था
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बस की एक सीट और किस्मत की सबसे बड़ी वापसी

मुंबई—सपनों का शहर।
यह शहर दिन में तेज़ दौड़ता है और रात में भी थकता नहीं। यहां हर गली में किसी की उम्मीदें हैं, हर स्टेशन पर किसी की मजबूरी, और हर बस में किसी का संघर्ष। लोग कहते हैं, “मुंबई सबको मौका देती है।” मगर सच यह है कि मुंबई मौका देती है—और फिर आपकी परीक्षा लेती है।
कभी धैर्य की, कभी मेहनत की… और कभी आपके दिल की अच्छाई की।
यह कहानी उसी अच्छाई की है।
एक साधारण युवक की—मनोहर—जिसने बस में अपनी सीट देकर सोचा भी नहीं था कि वह एक दिन उसी सीट का “कर्ज़” अपनी पूरी जिंदगी में सबसे बड़े तोहफे के रूप में वापस पाएगा।
भाग 1: धारावी का छोटा कमरा और बड़े सपने
मनोहर तीन साल पहले उत्तर प्रदेश के एक छोटे-से गांव से मुंबई आया था। गांव में पिता किसान थे। मां घर संभालती थीं। छोटी बहन स्कूल जाती थी।
पर खेत की उपज कम थी, कर्ज़ बढ़ रहा था, और घर की उम्मीदें मनोहर पर टिक गई थीं।
मुंबई में उसने धारावी के पास एक छोटे-से कमरे में किराया लिया। कमरा इतना छोटा कि अगर हाथ फैलाते तो दीवार छू जाती। एक चारपाई, एक पुरानी अलमारी, और एक कोने में छोटा सा चूल्हा। बरसात में छत से पानी टपकता। दीवारों पर सीलन की गंध बसी रहती।
लेकिन मनोहर शिकायत नहीं करता था। उसे लगता था—“यह सब अस्थायी है। बस नौकरी लग जाए।”
हर सुबह वह जल्दी उठता। चाय बनाता। अखबार खोलता। रोजगार वाले पन्ने पर आंखें गड़ा देता। विज्ञापन काटकर जेब में रख लेता—जैसे कोई सैनिक गोलियां भर रहा हो।
फिर वह निकल पड़ता—कभी अंधेरी, कभी नरीमन पॉइंट, कभी बांद्रा, कभी दादर।
इंटरव्यू देता। लौटता। फिर अगला दिन, फिर वही चक्र।
कभी-कभी उसे लगता कि मुंबई उसे देखते हुए मुस्कुरा रही है—पर मदद नहीं कर रही।
फिर भी, मनोहर हार नहीं मानता।
क्योंकि वह जानता था, हारने का मतलब है—घर लौटना खाली हाथ। और घर लौटने का मतलब सिर्फ उसकी हार नहीं—पूरे परिवार की उम्मीदों का टूटना।
भाग 2: उस दिन का इंटरव्यू और गर्म दोपहर
जुलाई की एक उमस भरी दोपहर थी। बारिश का मौसम शुरू हो चुका था, मगर उस दिन धूप ऐसी कि सड़कें तप रही थीं।
मनोहर बांद्रा में एक कंपनी का इंटरव्यू देकर लौट रहा था।
इंटरव्यू अच्छा नहीं गया था। उसे अपना जवाब भी आधा-अधूरा लग रहा था।
जेब में बस का किराया मुश्किल से था।
मन में चिंता—“अब अगले हफ्ते का किराया कैसे दूंगा?”
वह बीईएसटी की लाल डबल-डेकर बस में चढ़ा। बस खचाखच भरी थी। हवा में पसीने की गंध, डीज़ल का धुआं, और लोगों की चिड़चिड़ाहट।
कंडक्टर को टिकट काटने में दिक्कत हो रही थी। लोग एक-दूसरे से चिपके खड़े थे। कुछ रॉड पकड़कर लटक रहे थे।
भाग्य से मनोहर को बीच में एक सीट मिल गई।
वह बैठते ही राहत की सांस लेने लगा—पैर दर्द कर रहे थे, कंधा भारी था, और मन भी थका हुआ।
उसने अपना पुराना Samsung फोन निकाला और WhatsApp पर जॉब ग्रुप्स देखने लगा—शायद कोई नया अपडेट मिल जाए।
बस चलती रही।
हर स्टॉप पर लोग उतरते। उससे ज्यादा लोग चढ़ते।
भीड़ बढ़ती रही।
भाग 3: वह गर्भवती महिला और मनोहर का फैसला
करीब 20 मिनट बाद एक स्टॉप पर मनोहर ने फोन से नजर उठाई तो उसने एक महिला को बस में चढ़ते देखा।
महिला करीब 30-35 साल की रही होगी। हल्के नीले रंग की सूती साड़ी, हाथ में ब्रांडेड बैग, और चेहरे पर थकान।
वह पढ़ी-लिखी और संभ्रांत लग रही थी।
पर जो चीज सबसे ज्यादा ध्यान खींच रही थी—वह गर्भवती थी।
कम से कम छह-सात महीने।
महिला ने इधर-उधर देखा—कोई सीट खाली हो जाए, तो बैठ सके।
पर बस में सीटें खाली नहीं हो रही थीं।
आसपास बैठे लोग अपने फोन में मगन थे। कोई गाने सुन रहा था, कोई सोशल मीडिया स्क्रोल कर रहा था, कोई आंखें बंद किए आराम कर रहा था।
किसी ने भी उस महिला की परेशानी पर ध्यान नहीं दिया।
वह धीरे-धीरे आगे बढ़ी और बस के बीच में एक रॉड पकड़कर खड़ी हो गई।
बस के झटकों से उसका संतुलन बिगड़ रहा था।
कभी वह पेट पर हाथ रखती, कभी बैग संभालती, कभी रॉड पर पकड़ मजबूत करती।
मनोहर उसे देखता रहा।
और उसके भीतर एक बेचैनी उठने लगी।
वह खुद भी थका था।
लेकिन उसके मन में अचानक मां की कही बात घूम गई—“जब मैं गर्भवती थी, बस में मुझे बहुत तकलीफ हुई थी। कोई सीट नहीं देता था।”
मनोहर ने उस वक्त मां की आंखों में जो दर्द देखा था, वह आज फिर उसके सामने आ गया।
उसने आसपास देखा।
एक मोटा आदमी सीट पर फैलकर खर्राटे ले रहा था।
एक लड़का ईयरफोन लगाकर आंखें बंद किए बैठा था।
दो लड़कियां हंसकर बातें कर रही थीं।
किसी को फर्क नहीं पड़ रहा था।
मनोहर ने मन ही मन कहा—
“अगर बस ने अचानक ब्रेक मारा और इन्हें कुछ हो गया… तो?”
उसका दिल कस गया।
और वहीं—उसने फैसला कर लिया।
उसने फोन जेब में रखा, बैग उठाया और खड़ा हो गया।
वह महिला की तरफ बढ़ा।
“एक्सक्यूज़ मी…” उसने विनम्रता से कहा।
महिला ने चौंककर देखा। “जी?”
“आप प्लीज़ मेरी सीट पर बैठ जाइए। इस हालत में खड़े रहना ठीक नहीं है। सफर लंबा है।”
महिला कुछ सेकंड तक उसे देखती रही—जैसे भरोसा नहीं हो रहा हो।
फिर बोली, “नहीं-नहीं, आप बैठिए… मुझे कोई दिक्कत नहीं…”
मनोहर ने मुस्कुराकर कहा, “प्लीज़… मैं इंसिस्ट कर रहा हूँ। वैसे भी मुझे बस दो-तीन स्टॉप ही जाना है।”
यह झूठ था। उसे अभी काफी दूर जाना था।
पर उसने यह झूठ इसलिए बोला ताकि महिला को अपराधबोध न हो।
महिला की आंखों में आभार चमक उठा।
“थैंक यू सो मच… आजकल ऐसे लोग कम मिलते हैं।”
वह बैठ गई।
और मनोहर रॉड पकड़कर खड़ा हो गया।
भाग 4: बस में हुई बातचीत और किस्मत की छोटी गांठ
कुछ देर बाद महिला ने फिर बात की।
“आप कहाँ जाना है?”
“धारावी,” मनोहर ने कहा।
महिला हैरान हुई—“अरे! फिर तो बहुत दूर है। आपने सीट क्यों दे दी? आप भी थके लगते हैं।”
मनोहर ने सहजता से कहा, “कोई बात नहीं। मैं जवान हूं। खड़ा रह सकता हूँ। लेकिन आपको बैठना चाहिए।”
महिला थोड़ी देर चुप रही। फिर पूछा, “आप क्या करते हैं?”
मनोहर ने सच बोल दिया—“मैं नौकरी ढूंढ रहा हूं… आज इंटरव्यू देकर लौट रहा हूं।”
“किस फील्ड में?”
“कॉमर्स ग्रेजुएट हूं। अकाउंटिंग, फाइनेंस, एडमिन—कुछ भी चलेगा।”
उसका स्वर मजबूत था, लेकिन भीतर उसकी चिंता छिपी नहीं थी।
महिला ने उसे ध्यान से देखा।
उसे उस लड़के की आंखों में ईमानदारी दिखी।
कई लोग काम मांगते हैं—पर बहुत कम लोग मेहनत और सच्चाई के साथ मांगते हैं।
“आप कहां से हैं?”
“उत्तर प्रदेश के गांव से… तीन साल हो गए यहां।”
“परिवार?”
“मां-पापा और छोटी बहन… पिता किसान हैं… घर की हालत ठीक नहीं… इसलिए आया।”
महिला ने धीरे से कहा, “घबराइए मत। मेहनत और ईमानदारी कभी बेकार नहीं जाती। सही वक्त पर रास्ता खुलता है।”
उसकी आवाज में एक अजीब-सी उम्मीद थी।
मनोहर को अच्छा लगा।
बस जैसे थोड़ी हल्की हो गई हो—या शायद उसका मन।
कुछ स्टॉप बाद महिला का स्टॉप आ गया। उतरते वक्त उसने कहा,
“आज आपने जो किया… मैं भूलूंगी नहीं। भगवान आपको सफल करे।”
मनोहर ने हाथ जोड़कर कहा, “बच्चे को मेरी तरफ से दुआएं।”
महिला उतर गई।
मनोहर कुछ देर खड़ा रहा, फिर खाली सीट पर बैठ गया।
उसने मन में सोचा—
“अच्छा लगा आज किसी की मदद करके।”
उसे क्या पता था—यह मदद उसके भाग्य के पन्ने पर एक छोटी-सी “गांठ” की तरह बंध गई है, जो सही वक्त पर खुलने वाली थी।
भाग 5: चार साल का संघर्ष और टूटता धैर्य
समय किसी को नहीं रोकता।
चार साल बीत गए।
मनोहर ने कई छोटी-मोटी नौकरियां कीं।
कभी तीन महीने कहीं, कभी छह महीने कहीं।
कभी कंपनी बंद हो गई, कभी छंटनी हो गई।
कभी सैलरी इतनी कम थी कि कमरे का किराया भरना भारी पड़ता।
और फिर… वह फिर बेरोजगार हो गया।
अब उसकी उम्र 28 हो चुकी थी।
घर से दबाव बढ़ गया। पिता बीमार रहने लगे। मां की दवाइयों का खर्च बढ़ा।
बहन की शादी की चिंता अलग।
कई रातें ऐसी थीं जब मनोहर छत की सीलन देखते हुए सोचता—
“क्या मैं गलत शहर आ गया?”
पर फिर सुबह उठकर अखबार पलटता—क्योंकि उम्मीद मरना नहीं चाहती थी।
एक दिन अखबार में उसकी नजर एक विज्ञापन पर पड़ी:
Urgently Required: Accounts Manager
लोकेशन: अंधेरी
क्वालिफिकेशन: B.Com/M.Com
Experience: 2-5 Years
Walk-in Interview: 15th July, 10 AM to 4 PM
मनोहर का दिल तेज़ धड़कने लगा।
यह नौकरी उसके लिए थी।
उसने विज्ञापन की कटिंग निकाली, फाइल तैयार की, अपनी सबसे अच्छी शर्ट निकाली—पुरानी थी, पर साफ थी।
और चल पड़ा अंधेरी की तरफ।
भाग 6: तीसरी मंज़िल पर किस्मत की मुस्कान
कंपनी की बिल्डिंग बड़ी थी। गेट पर सिक्योरिटी। रिसेप्शन चमकदार।
वेटिंग एरिया में बहुत लोग बैठे थे।
एक-एक करके नाम बुलाए जा रहे थे।
मनोहर की हथेलियाँ पसीने से भर गईं।
उसने मन ही मन प्रार्थना की—“भगवान… इस बार…”
फिर नाम पुकारा गया—“मनोहर शर्मा।”
रिसेप्शनिस्ट ने कहा, “आप तीसरी मंज़िल पर CEO ऑफिस जाइए।”
CEO?
मनोहर घबरा गया।
लेकिन उसने खुद को संभाला और लिफ्ट से ऊपर चला गया।
कॉरिडोर में कालीन बिछा था। दीवारों पर कंपनी की उपलब्धियों की तस्वीरें।
और फिर वह दरवाजा—CEO के केबिन का।
मनोहर अंदर गया।
और उसकी सांस जैसे वहीं रुक गई।
टेबल के पीछे बैठी महिला… वही थी।
वही चेहरा, वही आंखें—अब और ज्यादा आत्मविश्वास से भरी।
उसने साड़ी की जगह प्रोफेशनल आउटफिट पहना था।
टेबल पर नेम प्लेट: प्रिया मल्होत्रा (CEO)
मनोहर उसे पहचान नहीं पाया। चार साल में हजारों चेहरे गुजर जाते हैं।
लेकिन प्रिया ने उसे देखते ही पहचान लिया।
उसकी आंखों में चमक आ गई, और होंठों पर मुस्कान।
“बैठिए, मनोहर।”
मनोहर हैरान—“इन्होंने मेरा नाम कैसे…?”
फिर उसने सोचा रिसेप्शन ने बताया होगा।
वह बैठ गया। फाइल आगे बढ़ाई।
प्रिया ने फाइल हाथ में ली… और बिना खोले साइड में रख दी।
मनोहर के दिल में धक-धक:
“क्या मेरी फाइल खराब है? क्या मैं रिजेक्ट हो गया?”
प्रिया ने बहुत शांत आवाज में कहा—
“आप कल से जॉइन कर सकते हैं। यह पोज़ीशन आपकी है।”
मनोहर को लगा उसने गलत सुन लिया।
“मैडम… आपने… इंटरव्यू नहीं लिया… डॉक्यूमेंट्स भी नहीं देखे… आप इतना जल्दी फैसला कैसे…?”
प्रिया मुस्कुराई।
“आराम से बैठिए। मैं आपको एक कहानी सुनाती हूं।”
भाग 7: कर्मों का चक्र और सीट का कर्ज़
“चार साल पहले,” प्रिया ने कहना शुरू किया,
“जुलाई की एक गर्म दोपहर थी। मैं सात महीने की गर्भवती थी। कार खराब थी, ड्राइवर छुट्टी पर। मुझे बस से जाना पड़ा।”
मनोहर धीरे-धीरे याद करने लगा।
“बस बहुत भरी थी,” प्रिया बोली,
“मुझे बहुत तकलीफ हो रही थी। कोई सीट नहीं दे रहा था। सब अपने फोन में लगे थे।
और तभी एक लड़का—थका हुआ, परेशान… लेकिन दिल का साफ—अपनी सीट देकर खड़ा हो गया। उसने कहा, उसे बस दो-तीन स्टॉप जाना है… बाद में मुझे पता चला वह बहुत दूर जा रहा था। उसने बस मुझे सहज रखने के लिए झूठ बोला था।”
मनोहर की आंखें फैल गईं।
उसकी स्मृति जैसे बिजली की तरह चमकी—वह महिला, वह बस, वह सीट… सब याद आ गया।
प्रिया ने कहा,
“हमने थोड़ी बातचीत की थी। आपने बताया था कि आप नौकरी ढूंढ रहे हैं, परिवार गांव में है, आप संघर्ष कर रहे हैं।
पर सबसे ज्यादा मुझे आपकी इंसानियत ने प्रभावित किया—खुद मुश्किल में होकर भी आपने मदद की।”
प्रिया ने सीधे उसकी आंखों में देखा।
“वह लड़का… आप थे, मनोहर।”
मनोहर के गले में गांठ पड़ गई।
वह कुछ बोल नहीं पाया।
प्रिया ने आगे कहा,
“उस दिन मैंने मन में ठान लिया था—अगर कभी मुझे मौका मिला, तो मैं आपकी मदद जरूर करूंगी। मैंने आपका चेहरा और नाम याद रखा।
आज जब आप इस कमरे में आए, मैंने आपको पहचान लिया।”
मनोहर की आंखों में आंसू भर आए।
चार साल का संघर्ष, हजार बार की निराशा, और असंख्य दरवाजों पर “नॉट सिलेक्टेड”—सब एक पल में जैसे मिट गया।
“मुझे आपके डॉक्यूमेंट्स देखने की जरूरत नहीं,” प्रिया बोली,
“क्योंकि मुझे पता है आप मेहनती हैं… और सबसे जरूरी, आप अच्छे इंसान हैं। मेरी कंपनी में मुझे ऐसे ही लोग चाहिए।”
फिर उसने फॉर्मेलिटी वाले अंदाज में कहा,
“आपकी सैलरी 25,000 से शुरू होगी। परफॉर्मेंस के आधार पर बढ़ेगी। HR के पास जाकर जॉइनिंग की प्रक्रिया पूरी कर लीजिए।”
मनोहर खड़ा हुआ।
“थैंक यू, मैडम… मैं आपको निराश नहीं करूंगा।”
प्रिया ने हल्का सा सिर हिलाया।
“मुझे पता है। और हाँ… मेरा बेटा अब चार साल का है। उस दिन अगर मैं गिर जाती… तो शायद… कुछ भी हो सकता था। आपने सिर्फ मेरी नहीं—मेरे बच्चे की भी मदद की थी।”
भाग 8: नई शुरुआत और नेकी की असली कीमत
मनोहर बाहर निकला तो उसे लगा वह जमीन पर नहीं चल रहा, हवा में उड़ रहा है।
उसने सबसे पहले मां को फोन किया।
“मां… नौकरी मिल गई…”
मां की आवाज कांप गई—“भगवान का शुक्र है, बेटा…”
मनोहर ने कहा,
“मां… यह मेरी उस छोटी-सी नेकी का फल है, जो मैंने चार साल पहले की थी।”
अगले दिन वह जॉइन कर गया।
कड़ी मेहनत की।
समय पर काम, ईमानदारी से रिपोर्ट, और जिम्मेदारी।
कुछ ही महीनों में सबने देख लिया—यह लड़का “किस्मत से नहीं”, “काबिलियत से” आया है।
छह महीने बाद सैलरी बढ़ी।
फिर प्रमोशन।
फिर बेहतर घर।
मां-बाप को पैसे भेजना शुरू हुआ। बहन की शादी में मदद मिली।
और मनोहर ने एक बात कभी नहीं बदली—
वह आज भी बस में किसी जरूरतमंद को सीट दे देता।
क्योंकि उसे अब समझ आ चुका था—
सीट देने से सीट कम नहीं होती, इंसान बड़ा हो जाता है।
एक दिन ऑफिस की एनिवर्सरी पर प्रिया ने सबके सामने कहा,
“हम इस कंपनी में स्किल के साथ-साथ इंसानियत को भी महत्व देते हैं। मनोहर हमारी टीम का हिस्सा है क्योंकि यह मेहनती है… और क्योंकि यह अच्छा इंसान है।”
तालियाँ गूंजीं।
और मनोहर ने मन में बस इतना कहा—
“धन्यवाद उस दिन की मेरी अंतरात्मा… जिसने मुझे खड़ा कर दिया था।”
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“बरघट की काली रात: अंधविश्वास, लालच और पाप की सजा”
भाग 1: बरघट गांव का अनवर
आज मैं आपको एक ऐसी कहानी सुनाने जा रहा हूं, जो मध्यप्रदेश के जबलपुर जिले के बरघट गांव से शुरू होती है। वहां रहता था अनवर, एक मिस्त्री। अनवर अपने हुनर से गांव के लोगों के मकान बनाता, अच्छा पैसा भी कमाता था। लेकिन उसका दिल गैर औरतों, शराब और शबाब में ही डूबा रहता था।
अनवर की कमाई अक्सर उसके शौक में ही उड़ जाती थी। घर में हमेशा गरीबी का माहौल रहता। उसकी पत्नी सलमा, जो बेहद खूबसूरत थी, घर के सारे काम करती, लेकिन हमेशा परेशान रहती थी। सलमा बार-बार अनवर से कहती, “कुछ पैसे भविष्य के लिए जोड़ लो, हमारी औलाद नहीं है, कम से कम बचत तो हो।” लेकिन अनवर उसकी बातों को एक कान से सुनता, दूसरे से निकाल देता। पति-पत्नी में अक्सर इसी बात को लेकर झगड़े होते थे। दोनों की कोई औलाद नहीं थी, यही सबसे बड़ा दुख था।
सलमा अपने पति को दोष देती, तो अनवर अपनी पत्नी को। दोनों डॉक्टरों के पास भी गए, दवाइयां भी खाईं, लेकिन कोई समाधान नहीं निकला। वक्त गुजरता गया, दोनों थक चुके थे। लेकिन दोनों के मन में अंधविश्वास भी गहरा था। कोई तांत्रिक या पुजारी दिख जाए, तो अपना हाथ दिखाने बैठ जाते।
भाग 2: तांत्रिक अब्दुल की सलाह
12 दिसंबर 2025 की सुबह थी। करीब 8 बजे अनवर और सलमा घर में बैठे थे, खाना खा रहे थे। तभी घर में तांत्रिक अब्दुल आता है। दोनों खाना छोड़कर उसके पास बैठ जाते हैं। दान-दक्षिणा भी दी जाती है। अनवर अपना हाथ दिखाता है, सलमा अपनी समस्या बताती है—”हमारे घर में औलाद नहीं है, रोज झगड़ा होता है।”
अब्दुल तांत्रिक बोला, “इसका समाधान मेरे पास है, लेकिन मोटी दान-दक्षिणा चाहिए।” अनवर ने कहा, “पैसों की चिंता मत करो, बस उपाय बता दो।” अब्दुल बोला, “10 महीने बाद तुम्हें बेटा होगा, लेकिन अनवर, तुम्हें कब्रिस्तान में जाकर वहां दफन महिलाओं की लाशों के साथ रातें गुजारनी होंगी।”
सलमा यह सुनकर खुश हो गई। बोली, “मेरा पति सब कर सकता है, बस हमारी समस्या का समाधान हो जाए।” अब्दुल ने कहा, “तीन महिलाओं के साथ कब्रिस्तान में रातें बितानी होंगी।” तांत्रिक दान-दक्षिणा लेकर चला गया। सलमा ने अनवर से कहा, “तुम्हें यह काम करना ही पड़ेगा, नहीं तो तलाक दे दूंगी।”
भाग 3: कब्रिस्तान का ठेका
इसी बीच गांव का मुखिया राशिद आता है। सलमा दरवाजा खोलती है। राशिद अनवर से कहता है, “गांव के कब्रिस्तान में कुत्तों ने गंदगी फैला दी है, सफाई तो हो गई, लेकिन अब चारदीवारी बनवानी है।” अनवर खुश हो जाता है, क्योंकि उसे कब्रिस्तान में काम मिलने वाला था। वह कहता है, “कल सुबह से काम शुरू कर दूंगा।”
अब अनवर मजदूर की तलाश में निकलता है। उसे याद आता है, गांव में अच्छा मजदूर रहमान है। वह रहमान के घर जाता है। दरवाजा आयशा खोलती है, जो रहमान की पत्नी है और बेहद खूबसूरत है। अनवर की नजरें आयशा पर टिक जाती हैं, उसकी नियत खराब हो जाती है।
आयशा से अनवर पूछता है, “रहमान कहां है?” आयशा बताती है, “शराब के नशे में घर में पड़ा है।” अनवर अंदर जाता है, रहमान को देखता है। आयशा कहती है, “मुझे 1000 रुपये की सख्त जरूरत है, मेरा पति पैसे नहीं देता।” अनवर सोचता है, मौका अच्छा है, बोला, “पैसे दूंगा, लेकिन कीमत चुकानी होगी।” आयशा मजबूरी में मान जाती है, दरवाजा बंद कर लेती है, दोनों गलत रिश्ते कायम करते हैं। अनवर 1000 रुपये देकर चला जाता है।
भाग 4: रहमान और कब्रिस्तान का काम
शाम को रहमान की आंख खुलती है, आयशा बताती है, “अनवर ने बुलाया है, जरूरी काम है।” रहमान अनवर के पास जाता है, अनवर बताता है, “कब्रिस्तान में चारदीवारी का ठेका मिला है, कल सुबह 8 बजे पहुंच जाना।” रहमान खुश होता है, काम की जरूरत थी।
अगली सुबह अनवर फिर रहमान के घर जाता है, आयशा दरवाजा खोलती है। अनवर आयशा से कहता है, “आज रात फिर आऊंगा।” आयशा कहती है, “पति घर पर रहेगा।” अनवर बोला, “उसका इंतजाम मैं कर लूंगा।” रहमान कब्रिस्तान चला गया था।
कब्रिस्तान में अनवर, रहमान और राशिद मिलते हैं, काम शुरू करते हैं। दिनभर काम चलता है। शाम 4 बजे गांव की एक महिला फातिमा की मौत हो जाती है। गांव वाले उसकी लाश दफनाने कब्रिस्तान आते हैं। अनवर खुश हो जाता है, तांत्रिक की बात याद आती है।
गांव वाले फातिमा की लाश दफनाकर चले जाते हैं। अनवर रहमान से कहता है, “आज रात मेरे साथ कब्रिस्तान में रुकना, तुझे पैसे दूंगा।” रहमान लालच में आ जाता है, मान जाता है।
भाग 5: पहली काली रात
रात 8 बजे अनवर रहमान को पैसे देता है, बोतलें खरीदने भेजता है। रहमान शराब लेकर आता है, दोनों शराब पीते हैं। गहरा नशा हो जाता है। अनवर रहमान को बताता है, “तीन महिलाओं की लाशों के साथ रातें बितानी हैं, आज पहली रात है।” रहमान डरता है, लेकिन पैसे लेकर बैठ जाता है।
अनवर फातिमा की कब्र खोदता है, लाश निकालता है, उसके साथ गलत काम करता है। इच्छा पूरी होने पर लाश को वापस दफना देता है। दोनों शराब पीते हैं, अनवर रहमान को ज्यादा पिला देता है। रहमान घर पहुंचता है, आयशा दरवाजा खोलती है। रहमान को और शराब पिलाई जाती है, गहरी नींद में चला जाता है। आयशा और अनवर फिर गलत काम करते हैं। अनवर रहमान की जेब से 2000 रुपये निकालता है, 1000 रुपये और मिलाकर आयशा को दे देता है। रात 12:30 बजे अनवर घर चला जाता है। आयशा की पड़ोसन रुबीना देख लेती है।
भाग 6: शक, झूठ और दूसरा पाप
सुबह रुबीना रहमान को बताती है, “तुम्हारी पत्नी अनवर के साथ रात बिताती है, मैंने खुद देखा है।” रहमान गुस्सा होता है, आयशा से पूछता है। आयशा झूठ बोलती है, “रुबीना ने पैसे मांगे थे, नहीं दिए तो झूठ बोल रही है।” रहमान यकीन कर लेता है।
रहमान कब्रिस्तान चला जाता है, दूसरी तरफ अनवर दूसरी घटना को अंजाम देने वाला होता है। गांव में फिर एक महिला की मौत हो जाती है। गांव वाले लाश दफनाने आते हैं। अनवर खुश हो जाता है, दूसरी इच्छा पूरी होने वाली थी।
गांव वाले लाश दफनाकर चले जाते हैं। अनवर रहमान से कहता है, “आज फिर रात को कब्रिस्तान में रुकना है, तुझे पैसे और शराब दूंगा।” रहमान मान जाता है। शाम को दोनों शराब पीते हैं, नशा चढ़ जाता है। अनवर दूसरी महिला की कब्र खोदता है, लाश निकालता है, उसके साथ भी गलत काम करता है। इच्छा पूरी होने पर लाश वापस दफना देता है। दोनों शराब पीते हैं, घर लौट जाते हैं।
भाग 7: तीसरी रात, तीसरा पाप और सजा का आरंभ
22 दिसंबर 2025 की सुबह। रहमान कब्रिस्तान जा रहा है, रास्ते में लोग बताते हैं, “तुम्हारी पत्नी अनवर से मिलती है।” रहमान को यकीन हो जाता है, सोचता है, “अनवर को सबक सिखाना है।”
कब्रिस्तान में अनवर पहले से मौजूद था। दोनों कामकाज में व्यस्त हो जाते हैं। शाम को रहमान अनवर को कहता है, “आज रात शराब पीते हैं।” अनवर मान जाता है। रहमान शराब खरीदकर लाता है, दोनों पीते हैं। नशा चढ़ जाता है। अनवर कहता है, “आज पूरी रात कब्रिस्तान में रहूंगा, दो महिलाओं की लाशें निकालकर गलत काम करूंगा।”
रहमान कहता है, “तुम्हारी मर्जी है, मैं घर जा रहा हूं।” रहमान गांव के मुखिया राशिद के पास जाता है, पूरी कहानी सुनाता है। राशिद पुलिस को फोन करता है। दोनों कब्रिस्तान जाते हैं, अनवर कब्र खोद रहा होता है। पुलिस मौके पर पहुंचती है, अनवर को रंगे हाथ पकड़ लेती है।
भाग 8: अंधविश्वास, लालच और कानून
पुलिस अनवर की पिटाई करती है, थाने ले जाती है। पूछताछ में अनवर बताता है, “तांत्रिक ने कहा था, तीन महिलाओं की लाशों के साथ गलत काम करो, बेटा पैदा होगा।” पुलिस चार्जशीट दायर करती है। भविष्य में तय होगा, अनवर को क्या सजा मिलेगी।
भाग 9: सीख और जागरूकता
दोस्तों, इस पूरी घटना को सुनाने का मकसद किसी का दिल दुखाना नहीं, बल्कि आपको जागरूक करना है। अंधविश्वास, लालच और पाप का नतीजा हमेशा बुरा ही होता है। समाज में ऐसे लोग हैं, जो अपनी कमजोरी, लालच या अंधविश्वास में फंसकर अपनी जिंदगी और दूसरों की जिंदगी बर्बाद कर देते हैं।
अगर आपके आसपास कोई ऐसी घटना हो, तो चुप मत रहिए। जागरूक बनिए, सही कदम उठाइए। कानून सबके लिए बराबर है, और पाप की सजा जरूर मिलती है।
अंतिम शब्द और फेसबुक अपील
अगर आपको यह कहानी पढ़कर कुछ सोचने को मिला हो, तो कमेंट में जरूर बताएं। अपने दोस्तों के साथ शेयर करें, ताकि लोग अंधविश्वास और लालच से बच सकें। अपने गांव या शहर का नाम कमेंट में लिखें। ऐसी और कहानियों के लिए पेज को फॉलो करें।
जय हिंद, वंदे मातरम।
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