बहु ने ससुर संग कर दिया कारनामा/ससुर ने उठाया था गलत कदम/

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अध्याय 1: खुशहाली की नींव और फौजी का परिवार

कानपुर के श्रवणखेड़ा गाँव में जिले सिंह का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता था। उसके पास 16 एकड़ उपजाऊ जमीन थी और बरसों की मेहनत से उसने एक अच्छा बैंक बैलेंस भी बना लिया था। जिले सिंह के दो बेटे थे—बड़ा बेटा अजय और छोटा बेटा आनंद

अजय चार साल पहले भारतीय सेना में भर्ती हुआ था। वह सरहद पर देश की रक्षा करता था और गाँव में उसकी बहादुरी के चर्चे होते थे। छोटा बेटा आनंद घर पर रहकर अपने पिता के साथ खेती-किसानी का काम संभालता था। करीब तीन साल पहले, जिले सिंह ने अजय की शादी कल्पना नाम की एक अत्यंत सुशील और मेहनती लड़की से करवाई थी। कल्पना ने आते ही घर को स्वर्ग बना दिया। वह अपने ससुर और देवर की सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ती थी। अजय साल में कुछ ही बार छुट्टी पर आता था, लेकिन कल्पना ने कभी कोई शिकायत नहीं की। उसे गर्व था कि उसका पति देश की सेवा कर रहा है।


अध्याय 2: खुशियों का आगमन और वो मनहूस बारिश

2 दिसंबर 2025 का दिन श्रवणखेड़ा के उस घर के लिए खुशियों की सौगात लेकर आया। अजय सात दिनों की छुट्टी लेकर घर आने वाला था। घर में पकवान बन रहे थे, हंसी-ठिठोली हो रही थी। जब अजय घर पहुँचा, तो माहौल उत्सव जैसा हो गया। शाम को अजय अपनी पत्नी कल्पना को शहर घुमाने ले गया, होटल में खाना खिलाया और अपने पिता व भाई के लिए नए कपड़े खरीदे। उन सात दिनों में किसी को आभास नहीं था कि यह इस परिवार की आखिरी खुशियाँ हैं।

12 दिसंबर 2025 को अजय वापस अपनी ड्यूटी पर चला गया। घर फिर से शांत हो गया।

15 दिसंबर 2025 की सुबह करीब 9 बजे मौसम ने करवट ली। आसमान में काले बादल छा गए और रिमझिम बारिश शुरू हो गई। जिले सिंह ने आनंद से कहा, “बेटा, बारिश का मौसम है, चलो छाता लेकर खेत का चक्कर लगा आते हैं।” पिता-पुत्र खेत चले गए। पीछे से कल्पना ने घर का काम निपटाया और ससुर व देवर के कपड़े धोकर छत पर सूखने डाल दिए।

अचानक बारिश तेज हो गई। कल्पना कपड़े बचाने के लिए छत पर भागी। वह पूरी तरह भीग चुकी थी। जब वह कपड़े लेकर नीचे आई, तो उसे ठंड लगने लगी। वह अपने कमरे में गई और किवाड़ भिड़ाकर कपड़े बदलने लगी। उसे अंदाजा नहीं था कि नियति ने उसके लिए क्या जाल बुना है।


अध्याय 3: मर्यादा की पहली ईंट का खिसकना

उसी वक्त आनंद खेत से वापस आ गया। उसने न तो आवाज दी, न दरवाजा खटखटाया। वह सीधे कमरे में दाखिल हो गया। कल्पना को उस अवस्था में देखकर आनंद की नियत डोल गई। पवित्र रिश्तों की मर्यादा एक पल में धुंधली हो गई। कल्पना ने उसे झिड़का, “आनंद! ये क्या तरीका है? कम से कम आवाज तो देते!”

कल्पना ने इसे एक दुर्घटना समझकर टाल दिया, लेकिन आनंद के मन में हैवानियत ने जन्म ले लिया था। उसी दोपहर, कल्पना की माँ संतोष देवी का फोन आया। उनकी तबीयत खराब थी। कल्पना ने आनंद से कहा कि उसे मायके छोड़ आए। शाम 4 बजे आनंद मोटरसाइकिल लेकर निकला।

गाँव से करीब 10 किलोमीटर दूर, एक सुनसान रास्ता आया। सड़क के दोनों ओर गन्ने के ऊंचे खेत थे। आनंद ने अचानक बाइक रोक दी। “क्या हुआ आनंद? बाइक क्यों रोक दी?” कल्पना ने घबराकर पूछा। “शायद पेट्रोल खत्म हो गया,” आनंद ने झूठ बोला।

सुनसान इलाका देखकर आनंद ने कल्पना का मुँह दबा लिया और उसे खींचकर गन्ने के खेत में ले गया। उसने अपने जेब से रुमाल निकाला और कल्पना के मुँह पर पट्टी बाँध दी। उस दिन एक देवर ने अपनी भाभी के भरोसे का कत्ल कर दिया। आनंद ने कल्पना को धमकी दी, “अगर गाँव में किसी को बताया, तो मैं तो फंसूँगा ही, तुझे भी मार डालूँगा।”

डरी-सहमी कल्पना अपने मायके पहुँची, लेकिन लोक-लाज के डर से अपनी माँ को कुछ नहीं बता सकी।


अध्याय 4: ससुर का दोहरा चेहरा

कल्पना तीन दिन मायके में रही। 19 दिसंबर 2025 को आनंद ने उसे फोन किया कि वह लेने आ रहा है, लेकिन कल्पना ने साफ मना कर दिया। जब जिले सिंह को यह पता चला, तो उसने आनंद को डांटा। जिले सिंह को अपने बेटे की फितरत का थोड़ा अंदाजा था, पर उसने खुद जो किया, वह और भी भयानक था।

जिले सिंह खुद बहू को लेने पहुँचा। वापसी में शाम के 6:30 बज चुके थे। गाँव की सीमा के पास पहुँचते ही जिले सिंह ने पैंतरा बदला। उसने कहा, “बहू, घर में सब्जी नहीं है, चलो खेत से कुछ तोड़ लेते हैं।”

खेत में एक छोटा सा कमरा बना हुआ था। जिले सिंह ने बहाने से कल्पना को कमरे के अंदर बुलाया और अचानक दरवाजा बंद कर दिया। उसने वहाँ रखी एक दराती (हंसिया) उठाई और कल्पना की गर्दन पर रख दी। “चीखी तो गला काट दूँगा,” ससुर के इन शब्दों ने कल्पना के पैरों तले जमीन खिसका दी।

जिस ससुर को वह पिता समान मानती थी, उसने अपनी ही बहू की अस्मत को तार-तार कर दिया। जिले सिंह ने भी वही धमकी दोहराई—”किसी को बताया तो जान से मार दूँगा।”


अध्याय 5: शोषण का अंतहीन चक्र

अब उस घर में कल्पना के लिए हर दिन एक नर्क बन गया था। जब अजय सीमा पर दुश्मनों से लड़ रहा था, घर के भीतर उसके अपने ही रक्षक भक्षक बन चुके थे। जब आनंद को मौका मिलता, वह शोषण करता; जब जिले सिंह को मौका मिलता, वह अपनी हैवानियत दिखाता।

24 दिसंबर 2025 को हद पार हो गई। सुबह आनंद ने घर में अकेले पाकर कल्पना के साथ गलत काम किया और धमकी देकर बैंक चला गया। एक घंटे बाद जिले सिंह आया। उसने बहू से खाना मांगा और फिर वही गंदा खेल दोबारा शुरू कर दिया।

कल्पना टूट चुकी थी। वह कमरे में अकेले रोती, गिड़गिड़ाती, पर उसे बचाने वाला कोई नहीं था। उसे लगा कि अगर वह चुप रही, तो यह सिलसिला कभी खत्म नहीं होगा।


अध्याय 6: फौजी का प्रतिशोध

22 जनवरी 2026। कल्पना ने हिम्मत जुटाई और अजय को फोन किया। अजय ने जब फोन उठाया, तो कल्पना की रुलाई फूट पड़ी। उसने एक-एक करके आनंद और जिले सिंह की सारी करतूतें बयां कर दीं।

सीमा पर तैनात अजय का खून खौल उठा। जिस परिवार के लिए वह मेहनत कर रहा था, उसी ने उसकी दुनिया उजाड़ दी थी। उसने शांत स्वर में कहा, “कल्पना, हिम्मत मत हारना। मैं दो दिन में आ रहा हूँ।”

24 जनवरी 2026 की सुबह अजय गाँव पहुँचा। उसने कल्पना से अकेले में बात की। कल्पना ने फिर से वही खौफनाक दास्तां सुनाई। अजय ने तय कर लिया था कि कानून के रास्ते में उसकी पत्नी की बदनामी होगी और इन दरिंदों को शायद वैसी सजा न मिले जिसके ये हकदार हैं।

अजय एक मेडिकल स्टोर पर गया और नींद की कुछ गोलियाँ खरीद लाया। उसने कल्पना को निर्देश दिया कि शाम के खाने में ये गोलियाँ उसके पिता और भाई को खिला दे।

रात के 9 बजे जिले सिंह और आनंद ने खाना खाया और गहरी नींद में सो गए। रात के 11 बजे, सन्नाटा पसरा हुआ था। अजय अपने कमरे से बाहर निकला। उसके हाथ में बरसों पुरानी एक कुल्हाड़ी थी।

वह पहले आनंद के कमरे में गया। गहरी नींद में सो रहे उस भाई की गर्दन पर अजय ने कुल्हाड़ी से वार किया जिसने रिश्तों का कत्ल किया था। एक ही झटके में आनंद का काम तमाम हो गया। फिर वह जिले सिंह के कमरे में गया। उसने उस पिता को भी नहीं बख्शा जिसने अपनी बहू की मर्यादा की रक्षा करने के बजाय उसे लूटा था।


अध्याय 7: अंतिम न्याय और आत्मसमर्पण

अजय का गुस्सा शांत नहीं हुआ था। उसने कल्पना की मदद ली और दोनों लाशों को घसीटकर आँगन में ले आया। वहाँ लगे एक बड़े पेड़ से उसने अपने पिता और भाई के शवों को लटका दिया। यह उसके लिए केवल हत्या नहीं, बल्कि समाज के उन भेड़ियों के लिए एक संदेश था जो घर के भीतर रिश्तों का शिकार करते हैं।

रात के करीब 1:30 बजे, अजय अपनी पत्नी कल्पना का हाथ पकड़कर सीधे नजदीकी पुलिस स्टेशन पहुँचा। दरोगा के सामने उसने कुल्हाड़ी रख दी और अपनी पूरी कहानी सुनाई।

पुलिस कर्मी भी सन्न रह गए। अजय ने कहा, “मैंने देश के गद्दारों को मारना सीखा है, और आज मैंने अपने घर के गद्दारों को मार दिया। मुझे कोई पछतावा नहीं है।”

पुलिस ने अजय और कल्पना को हिरासत में ले लिया और चार्जशीट दाखिल की। आज भी श्रवणखेड़ा गाँव में उस पेड़ को देखकर लोगों की रूह कांप जाती है। अजय फौजी आज जेल की सलाखों के पीछे है, लेकिन गाँव के कई लोग उसे अपराधी नहीं, बल्कि एक ‘न्याय करने वाला पति’ मानते हैं।