बहू का इंतकाम: जब न्याय की गुहार ज़हर बन गई

भाग १: अजमेर की तपिश और बनवारी का बदलता मन

राजस्थान के अजमेर ज़िले के बागपुरा गाँव में बनवारी सिंह का परिवार रहता था। बनवारी एक ट्रक ड्राइवर था, जो दिन-रात सड़कों पर ट्रक चलाकर अपने परिवार के लिए पैसा कमाता था। उसकी मेहनत की बदौलत घर में ख़ुशहाली थी। उसका इकलौता बेटा, किशन सिंह, भी अपने पिता की तरह ट्रक चलाने लगा था। बाप-बेटे की कमाई से घर में लक्ष्मी का वास था।

तीन साल पहले, किशन की शादी आंचल से हुई थी। आंचल न केवल बेहद ख़ूबसूरत थी, बल्कि संस्कारी और सुशील भी थी। वह घर के सारे काम करती थी और अपने पति और ससुर की सेवा में लगी रहती थी।

लेकिन जैसे-जैसे बनवारी के पास पैसे की गर्मी बढ़ी, उसका मन बदलने लगा। वह अब केवल ट्रक ड्राइवर नहीं रहा; पैसे ने उसे एक नया अहंकार दे दिया था। वह घर पर कम और बाहर ज़्यादा रहने लगा। आंचल और किशन इस बदलाव से अनजान थे। उन्हें नहीं पता था कि बनवारी अब दो बड़ी घटनाओं को अंजाम देने वाला था, जिसकी क़ीमत उन्हें चुकानी पड़ेगी।

भाग २: मीनाक्षी और झूठ का परदा

८ अक्टूबर, २०२५ का दिन। किशन अपने काम पर जा चुका था। बनवारी ने आंचल से खाना पैक करवाया और कहा कि वह देर शाम तक ही लौटेगा।

शाम को, बनवारी सिंह अपना ट्रक लेकर गाँव के बस अड्डे पर पहुँचा। आधी रात का समय था, और वहाँ एक महिला अकेली खड़ी थी। वह मीनाक्षी थी, जो उसी गाँव की एक विधवा थी। बनवारी ने ट्रक रोककर उससे पूछा। मीनाक्षी ने बताया कि वह मायके से लौट रही थी, और उसे कोई ऑटो नहीं मिला।

बनवारी की नीयत ख़राब हो चुकी थी। उसने मीनाक्षी को अपने ट्रक में बैठाया। रास्ते में बातों-बातों में मीनाक्षी ने बताया कि उसके पति की मौत हो चुकी है, और वह दो बच्चों को पालने के लिए मज़दूरी करती है।

बनवारी ने तुरंत मौक़ा ताड़ लिया। उसने मीनाक्षी को पैसे का लालच दिया। “देखो मीनाक्षी, मैं तुम्हें हर महीने कुछ पैसे दूँगा, लेकिन तुम्हें मेरे साथ वक़्त गुज़ारना पड़ेगा।”

मीनाक्षी, जो अपने बच्चों का पेट पालने के लिए मजबूर थी, मान गई। बनवारी ने उसे रात दस बजे घर आने का वादा किया।

रात को बनवारी घर पहुँचा। आंचल ने दरवाज़ा खोला। बनवारी ने अपनी बहू को अपनी पूरी महीने की तनख़्वाह दी, लेकिन चार हज़ार रुपये यह कहकर बचा लिए कि उसे अपने दोस्त को देने हैं।

फिर वह मीनाक्षी के घर गया। दोनों ने अपनी मर्ज़ी से ग़लत रिश्ते क़ायम किए। बनवारी ने मीनाक्षी को तीन हज़ार रुपये दिए और वापस अपनी बैठक में आकर सो गया।

यह सिलसिला चल पड़ा। बनवारी जब भी गाँव आता, सबसे पहले मीनाक्षी के घर जाता।

२० अक्टूबर को, बनवारी जब मीनाक्षी के घर में था, तो उनकी पड़ोसन सीमा देवी ने यह सब देख लिया। सीमा तुरंत आंचल के घर गई और उसे बताया कि उसका ससुर एक विधवा के घर जाता है।

आंचल को बहुत गुस्सा आया। जब बनवारी रात को घर लौटा, तो आंचल ने उसे रोका।

“पिताजी, यह आपको शोभा नहीं देता। अगर किसी को पता चला तो बदनामी होगी।”

बनवारी दिमाग़ से तेज़ था। उसने तुरंत झूठ का परदा डाल दिया। “ज़रूर किसी ने तुम्हारे कान भरे हैं, बहू। मैं उस विधवा मीनाक्षी के घर ज़रूर जाता हूँ, लेकिन मैं उसकी मदद करता हूँ। उसके पति की मौत हो गई है, और मैं उसे कुछ पैसे देता हूँ ताकि उसके बच्चों का गुज़ारा चल सके।”

आंचल, जो अपने ससुर पर बहुत भरोसा करती थी, उसकी बातों पर विश्वास कर लिया। बनवारी ने वादा किया कि वह अब मीनाक्षी के घर नहीं जाएगा। आंचल शांत हो गई, लेकिन वह नहीं जानती थी कि बनवारी का अगला शिकार कोई और नहीं, बल्कि उसका अपना परिवार होगा।

भाग ३: मीनू का आगमन और ससुर का पाप

५ नवंबर, २०२५ को आंचल की तबियत ख़राब रहने लगी। उसने अपनी छोटी बहन मीनू को फ़ोन किया और उसे कुछ महीने के लिए अपने घर रहने के लिए बुला लिया।

मीनू, जो अपनी बहन से मिलने आई थी, बेहद ख़ूबसूरत और चंचल थी। जैसे ही मीनू ने घर में प्रवेश किया, बनवारी की नज़रें उस पर टिक गईं। उसके मन में ख़राब विचार आने लगे।

बनवारी अब मीनाक्षी को भूल चुका था। उसकी नई हवस मीनू थी।

१० नवंबर को, आंचल ने किशन से कहा कि उसकी तबियत ज़्यादा ख़राब है, और उसे डॉक्टर के पास जाना चाहिए। बनवारी ने यह सुना तो उसने अपने काम पर जाने का इरादा बदल दिया।

आधे घंटे बाद, आंचल और किशन हॉस्पिटल के लिए निकल गए। बनवारी घर में मीनू के साथ अकेला रह गया।

बनवारी ने मीनू से अपने लिए खाना बनाने को कहा और बहाना बनाया कि वह दोस्त के पास जा रहा है। वह घर से बाहर निकला, पास के शराब के ठेके पर गया, ख़ूब शराब पी और नशे में धुत होकर वापस घर आ गया।

मीनू ने दरवाज़ा खोला। बनवारी के मुँह से शराब की बदबू आ रही थी। मीनू ने सोचा कि शराब पीना उसकी आदत है।

बनवारी ने खाना खाया। खाना खाने के बाद, उसने चुपके से घर का मुख्य दरवाज़ा बंद कर दिया।

मीनू ने पूछा, “आपने दरवाज़ा क्यों बंद किया?”

मौक़ा पाते ही बनवारी ने मीनू के मुँह पर हाथ रखा, उसे घसीटकर कमरे में ले गया। उसने मीनू के हाथ-पैर रस्सी से बाँध दिए और उसके मुँह पर कपड़ा बाँध दिया।

शराब के नशे में धुत बनवारी ने अपनी ही बहू की बहन के साथ ग़लत काम किया। यह पाप तब तक चलता रहा जब तक बनवारी का मन नहीं भर गया।

जाने से पहले, बनवारी ने मीनू को धमकी दी, “अगर तुमने अपनी बहन या जीजा को कुछ बताया, तो मैं तुम्हें जान से मार दूँगा।”

मीनू डर गई। वह घंटों कमरे में रोती रही। जब शाम को आंचल और किशन वापस आए, तो आंचल ने मीनू की उदासी देखी। मीनू ने झूठ बोल दिया कि उसकी तबियत ख़राब थी, इसलिए वह परेशान थी।

मीनू की चुप्पी ने बनवारी का हौसला और बढ़ा दिया। जब भी उसे मौक़ा मिलता, वह मीनू का फ़ायदा उठाता। मीनू डर और शर्म के मारे किसी को कुछ नहीं बता पाई।

भाग ४: एसपी साहब के होश उड़ गए

१२ दिसंबर, २०२५ की सुबह। मीनू घर का काम कर रही थी कि अचानक उसे चक्कर आया और वह ज़मीन पर गिरकर बेहोश हो गई।

आंचल घबरा गई। उसने मीनू को उठाया और तुरंत नज़दीकी हॉस्पिटल ले गई। वहाँ महिला डॉक्टर ने मीनू का मेडिकल चेकअप किया।

डॉक्टर ने आंचल को बुलाया और एक ऐसी बात बताई जिसने आंचल के पैरों तले ज़मीन खिसका दी। डॉक्टर ने कहा, “तुम्हारी बहन एक महीने की गर्भवती है।”

आंचल के होश उड़ गए। उसका पहला रिएक्शन ग़ुस्से का था। उसने मीनू को डाँटना शुरू कर दिया, “तूने हमें धोखा दिया! तूने हमारे मुँह पर कालिख पोत दी!”

मीनू रोने लगी और कहा, “चलो घर, मैं तुम्हें सब बताती हूँ।”

घर पहुँचकर, मीनू ने रोते-रोते आंचल को उसके ससुर बनवारी की पूरी करतूत बताई—कैसे उसने मौक़ा पाकर उसे डराया, धमकाया और उसके साथ ग़लत काम किया।

आंचल को याद आया कि बनवारी ने मीनाक्षी के बारे में भी झूठ बोला था। उसे एहसास हुआ कि उसका ससुर एक वहशी दरिंदा है, और उसकी चुप्पी ने ही मीनू को इस हाल तक पहुँचाया है।

आंचल का दिल टूट गया। उसने अपनी बहन को गले लगाया और दोनों ने मिलकर एक भयानक फ़ैसला लिया।

“आज इस बुड्ढे का काम तमाम करना है,” आंचल ने कहा।

भाग ५: हथौड़ा और चाकू

किशन सिंह काम पर बाहर था। बनवारी आज भी मीनाक्षी के घर नहीं गया, क्योंकि घर में ही उसकी हवस पूरी हो रही थी। वह शाम को घर आया, और आंचल के हाथ का बना खाना खाकर अपने कमरे में जाकर लेट गया।

रात के साढ़े दस बजे, आंचल और मीनू ने अपनी योजना को अंजाम दिया। आंचल ने घर से एक भारी हथौड़ा उठाया और मीनू को एक तेज़ चाकू दिया।

दोनों बहनें दबे पाँव बनवारी के कमरे में गईं। बनवारी नशे में गहरी नींद में था।

आंचल ने बिना आवाज़ किए, हथौड़े से बनवारी के सिर पर एक के बाद एक कई वार किए। बनवारी की चीख़ तक नहीं निकल पाई। जैसे ही बनवारी का शरीर शिथिल हुआ, मीनू ने चाकू से उसके पेट में पाँच-छह वार किए।

बनवारी की मौत हो चुकी थी।

लेकिन दोनों बहनें यहीं नहीं रुकीं। उन्होंने बनवारी की लाश को घसीटकर आँगन में ले गईं। फिर उन्होंने एक रस्सी ली और उसकी लाश को एक पेड़ से लटका दिया, ताकि यह आत्महत्या का मामला लगे, या शायद वे बस अपनी नफ़रत को अंतिम रूप देना चाहती थीं।

यह सब करने के बाद, आंचल ने मीनू से कहा, “हम पकड़े तो जाएँगे ही, लेकिन हम ख़ुद जाकर सच बताएँगे।”

दोनों बहनें रात के अँधेरे में पुलिस स्टेशन की ओर चल पड़ीं।

थाने में दरोगा संजीव श्रीवास्तव बैठे थे। दोनों बहनों ने उन्हें पूरी कहानी विस्तार से बताई—बनवारी का लालच, मीनाक्षी का मामला, मीनू का शोषण, और अंत में उनका भयानक क़दम।

दरोगा संजीव श्रीवास्तव ने जब दोनों बहनों की कहानी सुनी और उनके हाथ में लगे ख़ून के धब्बे देखे, तो उनके होश उड़ गए। उन्होंने तुरंत एसपी साहब को फ़ोन किया।

एसपी साहब घटनास्थल पर पहुँचे। बनवारी की लाश पेड़ से लटकी थी, और पूरा घर ख़ून से सना था।

पुलिस ने बनवारी की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेजा और आंचल तथा मीनू के ख़िलाफ़ हत्या का मुक़दमा दर्ज कर लिया।

जेल में बंद दोनों बहनें जानती थीं कि उन्होंने क़ानून तोड़ा है, लेकिन उन्हें इस बात का सुकून था कि उन्होंने उस दरिंदे को सज़ा दी, जिसने उनकी इज़्ज़त और भरोसे को रौंद डाला था।

अब यह भविष्य के गर्भ में छिपा था कि जज साहब आंचल और मीनू को क्या सज़ा सुनाएँगे। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल ज़रूर खड़ा कर दिया कि जब एक बहू को न्याय कहीं नहीं मिलता, तो उसका उठाया गया यह भयानक क़दम, क्या केवल अपराध था, या मजबूरन लिया गया इंसाफ़?

जय हिन्द।