बुद्धिमान बाप ने अपनी बेटी को जवान होने का इंजेक्शन लगाया, फिर क्या हुआ |
गांव के किनारे एक पुराना कच्चा मकान था, जिसमें बालदेव नाम का एक सत्तर वर्षीय बूढ़ा हकीम रहता था। उसकी जिंदगी उदास थी, क्योंकि चालीस साल की शादी के बाद भी उसकी पत्नी सुधा कभी मां नहीं बन सकी। दोनों ने हर कोशिश की—हकीमों से इलाज, मंदिर में दुआ, हर मुमकिन उपाय किया, लेकिन किस्मत ने उन्हें औलाद की खुशी नहीं दी। बालदेव अक्सर रातों को आसमान की तरफ देखकर आहें भरता और सोचता कि क्या उसकी नस्ल यूं ही खत्म हो जाएगी, क्या वह अपने घर में बच्चों की हंसी कभी ना सुन सकेगा। वक्त गुजरता गया, सुधा की कमर झुक गई, बालदेव की दाढ़ी बर्फ की तरह सफेद हो गई थी। लेकिन फिर एक दिन किस्मत ने अजीब मोड़ लिया—सुधा ने सत्तर साल की उम्र में एक नन्ही सी बच्ची को जन्म दिया। गांव वाले हैरान थे, कोई इसे भगवान का करिश्मा मानता, कोई हकीम के खुफिया नुस्खे का असर। परंतु बच्ची के जन्म के तुरंत बाद ही सुधा की सांसें टूट गईं। बालदेव एक ही पल में बाप भी बन गया और मां भी खो बैठा। उसने बच्ची का नाम मीरा रखा। गांव वाले मजाक करते थे कि बालदेव की बेटी नहीं, पोती है यह। लेकिन बालदेव को इन बातों की परवाह नहीं थी। वह अपनी नन्ही मीरा को गोद में उठाकर ऐसा महसूस करता जैसे सारी दुनिया उसकी हो।
गांव के लोग हैरान थे कि सत्तर बरस का आदमी किस तरह एक नवजात को पालेगा, लेकिन बालदेव ने हौसला नहीं हारा। वह दिन-रात बेटी के लिए जीता, दूध का इंतजाम करता, उसके रोने पर दौड़ता, खुद फर्श पर सो जाता। बालदेव सिर्फ आम हकीम नहीं था, वह जड़ी-बूटियों के साथ-साथ कुछ ऐसे पोशीदा नुस्खे भी जानता था जो आम लोग नहीं जानते थे। बीवी के जाने के बाद वह और भी कठोर हो गया था। मीरा अब सात बरस की हो गई थी। वह गांव की दूसरी बच्चियों से अलग लगती थी—दूधिया रंग, बड़ी-बड़ी आंखें, काले लंबे बाल, मुस्कान में अजीब कशिश। लोग कहते, यह बच्ची आम नहीं, इसके अंदर कोई जादू है। बालदेव दिन-रात सोचता रहता कि कैसे अपनी बेटी को दुनिया के सामने एक अनोखे रूप में पेश करे। उसके दिल में एक खतरनाक ख्याल जन्म लेने लगा था।
बालदेव के पास एक पुराना नुस्खा था, जो उसके दादा के जमाने से छुपा हुआ था। यह एक खास इंजेक्शन जैसा था, नायाब जड़ी-बूटियों से तैयार। कहा जाता था कि यह इंसान की उम्र और जाहिरी हालत बदल देता है। गांव के बुजुर्गों ने हमेशा उसे मना किया था कि यह खेल भगवान के कानून के खिलाफ है। मगर बालदेव को अब खुदा या उसूलों की कोई परवाह नहीं थी। उसने तय कर लिया कि अपनी बेटी मीरा पर यह नुस्खा आजमाएगा। एक रात जब गांव सो रहा था, बालदेव ने मीरा को बुलाया, “बेटी, आओ, मैं तुम्हें एक दवा दूंगा। इससे तुम और भी खास बन जाओगी।” मीरा मासूम थी, बाप की बात पर सवाल ना कर सकी। बालदेव ने खुफिया नुस्खे से तैयार इंजेक्शन निकाला और कांपते हाथों से बेटी को लगा दिया। मीरा के बदन में जैसे आग सी दौड़ गई। वह तड़पने लगी, रोने लगी। बालदेव के दिल में लम्हे भर को खौफ आया, मगर फिर उसने देखा कि चंद मिनटों में वह सात साल की मासूम बच्ची एकदम से एक जवान, हसीन और दिलकश लड़की में बदल गई थी। मीरा अब किसी परियों की दुनिया की शहजादी लग रही थी—चेहरा दूध की तरह सफेद, आंखों में अजब कशिश, लबों पर सुर्खी, बाल कंधों से नीचे बह रहे थे। वह खुद भी आईने में देखकर कांप गई, “बाबा, यह मेरे साथ क्या हुआ?” बालदेव की आंखों में सुर्खी आ गई। उसने बेटी को देखकर दिल ही दिल में कहा, अब मेरी तकदीर बदलने वाली है।
बालदेव ने अपनी लालच पूरी करने की ठान ली। मीरा के सौंदर्य को देखकर गांव वाले हैरान थे। बुजुर्ग बोले, “यह कैसे संभव है? कल तक तो यह बच्ची थी।” युवा लड़के विस्मय से मीरा को निहारने लगे। स्त्रियां एक दूसरे के कान में कहने लगीं, “बालदेव ने अवश्य कोई टोनाटोटका किया है।” बालदेव ने अपने कच्चे घर के बाहर खटिया बिछा दी। आने-जाने वालों से कहने लगा, “आओ, मेरी बेटी मीरा से मिलो। ऐसा सौंदर्य आज तक नहीं देखा होगा।” लोग उत्साह से आने लगे। कोई उपहार लाता, कोई मुद्रा रख जाता। युवा लड़के उसके घर के बाहर मंडराने लगे। बालदेव उन्हें भीतर बुलाता, मीरा को दिखाता और बदले में सिक्के-नोट इकट्ठा करने लगा। मीरा दिन-रात एक कमरे में बंद रहती। लोग आते, उसे घूरते, प्रशंसा करते, लालसा भरी दृष्टियों से देखते। वह अपने निष्कलंक हृदय के साथ पीड़ा सहती रहती। हर रात वह चुपचाप आकाश की ओर देखती और धीमे स्वर में प्रार्थना करती, “हे ईश्वर, मुझे इस अपमान से मुक्त कर। मैं स्वतंत्र होना चाहती हूं।”

मीरा की प्रसिद्धि अब गांव की सीमा से निकलकर आसपास के क्षेत्रों तक फैल चुकी थी। दूर-दूर से लोग आने लगे—कोई विवाह का प्रस्ताव, कोई देवी मानकर नमन, कोई धन का अंबार लेकर। बालदेव का हृदय आनंद से भर गया। वह प्रत्येक आगंतुक से कहता, “मीरा केवल उनके लिए है जो सबसे अधिक मूल्य चुका सके।” मीरा भीतर ही भीतर टूटती जा रही थी। उसकी निष्कलंकता कुचली जा रही थी। एक दिन गांव की वृद्ध महिला—चाचू मां—बालदेव के घर आई। उसने मीरा को देखा, आंखों में आंसू भर आए। वह बालदेव के समीप आई और कांपती आवाज में बोली, “बालदेव, यह तुम्हारी पुत्री है। पुत्री ईश्वर का वरदान होती है। उसे संसार के बाजार में मत बेचो। उसकी मर्यादा की रक्षा करो। अन्यथा ईश्वर का कोप तुम्हारे ऊपर पड़ेगा।” बालदेव ने अट्टाहास किया, “चाचू मां, तुम्हारे ये पुराने आदर्श मेरे किसी काम के नहीं हैं। अब समय धन का है।” चाचू मां ने मीरा के ललाट को चूमा, “बेटी, धैर्य रखना। ईश्वर एक दिन तुम्हें इस बंधन से मुक्त करेगा।” मीरा के हृदय में आशा की किरण जागी। बालदेव ने वृद्धा को धक्के मारकर बाहर निकाल दिया।
खबर फैली कि शहर से बड़े जमींदार आ रहे हैं। उनके पास धन की कोई कमी नहीं थी और वे विरल वस्तुएं खरीदने में प्रसिद्ध थे। बालदेव ने अपना घर सजाया, भोजनपान का प्रबंध किया, और पूरी तैयारी के साथ जमींदारों का इंतजार करने लगा। उसे विश्वास था कि इस बार वह इतनी संपत्ति प्राप्त करेगा कि कभी किसी के सामने झुकना न पड़ेगा। शाम ढलते ही जमींदार अपने कारवां के साथ गांव पहुंचे। बालदेव ने उनका स्वागत किया। कुछ समय बाद उन्होंने असली बात कही—उनकी नजरें मीरा पर टिकी थीं। उन्होंने बालदेव से कहा, “जो चाहे मांग लें, सब देंगे, बस वह लड़की हमें चाहिए।” बालदेव की आंखों में लालच की चमक आ गई। वह हंसकर बोला, “यह सौदा स्वीकार है।” मीरा ने यह सुना तो जैसे जमीन सर से खिसक गई। वह चीख मारकर पिता के चरणों में गिर पड़ी, “पिताजी, ईश्वर के लिए मुझे मत भेजो। मैं आपकी पुत्री हूं, आपकी इज्जत हूं। मुझे किसी अजनबी के हवाले न करो।” मीरा की आवाज में इतनी बेचैनी और दर्द था कि गांव के कई लोग कांप उठे। पर बालदेव पर कोई असर न हुआ। उसने मीरा को झटका और जमींदारों की ओर देखकर बोला, “उसकी बातों की परवाह मत करो। यह सब नाटक है। रकम तैयार करो और इसे ले जाओ।” मीरा की चीखें और आंसू सुनकर पूरे गांव के लोग इकट्ठा हो गए। अब सब पर सच खुल चुका था कि बालदेव किस हद तक गिर गया है।
लोग एक दूसरे को देखने लगे। कुछ ने क्रोध से मुट्ठियां बांधी। अचानक आकाश पर काले बादल छा गए। तेज आंधी उठी, बिजली कड़की। गांव वालों को भय हो गया। जमींदार पीछे हटे, लेकिन बालदेव डटा रहा। वह कह रहा था, “कुछ नहीं होगा। यह सब भ्रम है। धन मेरे हाथ में है और धन ही सब कुछ है।” इतने में बालदेव के घर की छत जोर से हिलने लगी। लकड़ी के बीम चरमराने लगे। सब भय से चीखने लगे। अचानक एक बड़ा बीम टूट कर सीधे बालदेव पर गिरा। वह उसी स्थान पर कुचला गया। उसकी चीख इतनी दहला देने वाली थी कि गांव के सारे लोग सन्न रह गए। जमींदार भी डर कर वहां से भाग निकले। बालदेव के मरने के बाद शांति छा गई। मीरा जमीन पर गिरी हुई थी। उसके आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। गांव के लोगों ने आगे बढ़कर उसे सहारा दिया। उन्होंने कहा, “यह ईश्वर की अदालत है। जो अपनी पुत्री की इज्जत बेचता है, उसकी जिंदगी भी अपमान सहित समाप्त होती है।”
उस दिन के बाद गांव वालों ने मीरा को अपनी पुत्री मान लिया। उन्होंने उसकी रक्षा का वचन दिया। कोई उस पर उंगली न उठा सका। मीरा ने राहत की सांस ली और ईश्वर का धन्यवाद किया कि उसने उसे इस जेल से मुक्त कर दिया। बालदेव की मृत्यु एक सबक बन गई। लोग जब भी उसके बारे में बात करते हैं तो सिर हिलाते हुए कहते, “लालच का अंत हमेशा बुरा होता है।” मीरा ने गांव के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। उसने अपनी सुंदरता को सेवा में बदल दिया। गांव की औरतें उसे अपनी बेटी मानतीं, पुरुष उसकी इज्जत करते। मीरा अब गांव की शान बन गई थी।
यह कहानी हमें सिखाती है कि लालच मनुष्य को अंधा कर देता है। बालदेव अपनी ही पुत्री की इज्जत को धन के लिए बेचना चाहता था, लेकिन उसका अंत एक दहशत भरी मौत में हुआ। यह संसार इज्जत के बिना कुछ नहीं है। धन, सोना, चांदी सब शेष रह जाते हैं, लेकिन चरित्र और इज्जत सदा बनी रहती है। एक पिता जो अपनी पुत्री का रक्षक होना चाहिए, यदि वही उसकी इज्जत खोए तो ईश्वर का न्याय अवश्य प्रकट होता है। हमें यह शिक्षा लेनी चाहिए कि धन कभी भी मनुष्य की आंखों पर पर्दा न डाले। जो अपनी संतान को इज्जत देगा, संसार उसे इज्जत देगा। जो दूसरों की इज्जत लूटेगा, वह स्वयं नीचा होगा।
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