बेटी के साथ गलत होने पर पिता फौजी ने रच दिया इतिहास/S.P साहब के रोंगटे खड़े हो गए/

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लेखक: विशेष संवाददाता

उदयपुर, राजस्थान: इतिहास गवाह है कि जब-जब कानून की मर्यादाएँ टूटी हैं, तब-तब किसी न किसी ‘न्यायकर्ता’ का जन्म हुआ है। राजस्थान के उदयपुर जिले के अमरपुरा गाँव में हाल ही में घटी एक घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है। यह कहानी केवल एक पिता और बेटी की नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था पर एक करारा तमाचा है, जहाँ रक्षक ही भक्षक बन गए और जहाँ एक सेवानिवृत्त फौजी को अपनी ‘पगड़ी की लाज’ बचाने के लिए हाथ में कुल्हाड़ी उठानी पड़ी।

पृष्ठभूमि: एक फौजी और उसकी ‘शेरनी’ बेटी

अमरपुरा गाँव के निवासी रामपाल फौजी भारतीय सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद शांतिपूर्ण जीवन जी रहे थे। पत्नी के निधन के बाद, उनकी दुनिया उनकी इकलौती बेटी माधुरी थी। माधुरी, जो स्थानीय पुलिस स्टेशन में कांस्टेबल के पद पर तैनात थी, न केवल एक मेहनती पुलिसकर्मी थी बल्कि अपने पिता के गौरव का प्रतीक भी थी। रामपाल अक्सर अपनी बेटी से कहते थे, “बेटी, मेरी पगड़ी की लाज बचाए रखना।” और माधुरी का दृढ़ संकल्प था कि वह कभी ऐसी स्थिति नहीं आने देगी जिससे उसके पिता का सिर झुके।

अंधेरे की दस्तक: ट्रक ड्राइवर चेतन का घिनौना चेहरा

रामपाल के घर के ठीक सामने चेतन नाम का एक ट्रक ड्राइवर रहता था। चेतन, जो अपनी वासनाओं और शराब की लत के लिए कुख्यात था, माधुरी की सादगी और कर्तव्यनिष्ठा को पसंद नहीं करता था, बल्कि उसकी आँखों में हवस थी। चेतन का चरित्र इतना गिरा हुआ था कि वह अक्सर घर पर गलत संगति में रहता था और अपनी पत्नी आरती देवी के साथ क्रूर मारपीट करता था।

10 दिसंबर 2025: वह काली रात

10 दिसंबर 2025 की रात, चेतन ने एक विधवा महिला प्रकाशी के साथ अपने ट्रक में घिनौनी हरकत को अंजाम दिया। यह महज शुरुआत थी। उस रात, जब उसकी पत्नी आरती ने उसके गलत कामों का विरोध किया, तो उसने उसे बर्बरता से पीटकर घर से निकाल दिया। आरती, जो अपनी जान बचाकर भागी, रामपाल फौजी के घर पहुँची। माधुरी ने जब आरती की यह स्थिति देखी, तो एक पुलिसकर्मी और एक संवेदनशील महिला होने के नाते, वह तुरंत चेतन के घर पहुँची।

वहाँ जो दृश्य माधुरी ने देखा, उसने उसकी रूह काँप गई। उसने चेतन को रंगे हाथों पकड़ा और उसकी और प्रकाशी की जमकर खबर ली। माधुरी ने उन्हें कड़ी चेतावनी दी और कहा कि अगर भविष्य में ऐसी हरकत हुई, तो वह उन्हें जेल की सलाखों के पीछे डाल देगी। लेकिन माधुरी यह नहीं जानती थी कि यह चेतावनी उसके और उसके पिता के लिए काल बन जाएगी।

प्रतिशोध की आग: 20 दिसंबर 2025

चेतन ने उस अपमान का बदला लेने की ठानी। उसने अपने दोस्त अनिकेत और विकास के साथ मिलकर एक खौफनाक साजिश रची। 20 दिसंबर की रात, जब माधुरी अपनी सहेली करुणा के बेटे का जन्मदिन मनाकर घर लौट रही थी, तब इन तीनों हैवानों ने सड़क पर एक नकली एक्सीडेंट का नाटक किया।

जब माधुरी मदद के लिए रुकी, तो चेतन ने चाकू की नोक पर उसे बंधक बना लिया। उन तीनों दरिंदों ने न केवल उसे सुनसान जगह पर ले जाकर उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया, बल्कि वीडियो बनाने और उसे बदनाम करने की धमकी दी। उन्होंने कहा, “अगर किसी को बताया तो तुम्हारे पिता को मार देंगे।” माधुरी, जो एक पुलिस कांस्टेबल थी, उस रात अंदर से मर चुकी थी। वह घर पहुँची और अपने फटे कपड़ों को एक दुर्घटना का नाम देकर पिता से झूठ बोल दिया।

सन्नाटे के पीछे का तूफान

अगले दस दिनों तक माधुरी और रामपाल के बीच का वह घर एक श्मशान जैसा था। माधुरी अंदर ही अंदर घुट रही थी। वह अपनी ड्यूटी पर वापस नहीं जा पा रही थी। इसी बीच, गाँव में एक और लड़की सविता के साथ हुई वैसी ही घटना ने माधुरी को झकझोर दिया। उसने जान लिया कि अब चुप रहना और भी लड़कियों की जान ले सकता है।

फैसला: वर्दी या ‘न्याय’?

जब माधुरी ने अपने पिता रामपाल फौजी को पूरी सच्चाई बताई, तो रामपाल का वह फौजी मन, जो देश की सरहदों की रक्षा के लिए बना था, अपने घर की दहलीज पर हुए अपमान के आगे फटने को तैयार हो गया। रामपाल की आँखों में आँसू नहीं थे, केवल प्रतिशोध की आग थी।

उसी रात, रामपाल ने अपनी कुल्हाड़ी उठाई और माधुरी ने गंडासा। वे चेतन की बैठक में पहुँचे जहाँ तीनों दरिंदे शराब के नशे में चूर थे। रामपाल ने किसी को संभलने का मौका नहीं दिया। पहली कुल्हाड़ी अनिकेत के सिर पर गिरी, दूसरी विकास की पीठ पर। अंत में, उन्होंने चेतन का वह सिर काट दिया जिसने उनकी बेटी की मर्यादा को तार-तार करने की कोशिश की थी।

पुलिस की दस्तक और समाज का प्रश्न

घटना की सूचना मिलते ही पुलिस पहुँची। रामपाल और माधुरी ने अपना गुनाह स्वीकार कर लिया। जब थाने में रामपाल ने पूरी दास्तान सुनाई, तो पुलिस के आला अधिकारियों के भी रोंगटे खड़े हो गए। जिस कानून की शपथ लेकर माधुरी कांस्टेबल बनी थी, उसी कानून के विफल होने पर उसे अपने पिता के साथ ‘स्वयं-न्याय’ करना पड़ा।

निष्कर्ष: क्या यह न्याय है या कानून का पतन?

आज यह पूरा गाँव और पूरा देश दो खेमों में बंटा है। एक वर्ग का मानना है कि रामपाल ने जो किया वह ‘पाप’ है क्योंकि कानून हाथ में लेना अपराध है। वहीं दूसरा वर्ग इसे ‘युगधर्म’ मान रहा है। वे पूछ रहे हैं कि यदि पुलिस विभाग की एक कांस्टेबल को न्याय के लिए पिता को हथियार उठाना पड़ा, तो आम महिला का क्या होगा?

रामपाल और माधुरी सलाखों के पीछे हैं। उनकी कानूनी लड़ाई जारी है। लेकिन अमरपुरा की इस घटना ने समाज के माथे पर एक गहरा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। यह कहानी हमें याद दिलाती है कि जब न्याय में देरी होती है या जब दरिंदगी हद पार कर जाती है, तब समाज का ‘रामपाल’ बाहर निकल आता है। यह न्याय की जीत है या व्यवस्था की हार—इसका फैसला आने वाला समय और अदालत करेगी। लेकिन एक बात साफ है, राजस्थान की इस धरती ने एक ऐसा इतिहास रच दिया है जिसे सदियों तक भुलाया नहीं जा सकेगा।