बेटे से मिलने Canada जा रही पंजाबी मां अमृतसर एयरपोर्ट पर गिरफ्तार!
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ममता का सफर और धोखे की दहलीज: एक अनकही त्रासदी
पंजाब के मालवा क्षेत्र के एक शांत और खुशहाल गाँव में रहने वाली 65 वर्षीय माताजी (सुरक्षा कारणों से नाम गुप्त) के लिए वह दिन किसी उत्सव से कम नहीं था, जब उनके बेटे कुलदीप ने कनाडा से फोन कर बताया कि उनका ‘सुपर वीजा’ लग गया है। पिछले छह वर्षों से बेटा वैंकूवर में मेहनत कर रहा था और माँ की आँखें अपने पोते-पोतियों को देखने के लिए तरस गई थीं। गाँव की गलियों में यह खबर आग की तरह फैल गई। हर कोई माताजी को बधाई देने आ रहा था और वे बड़े चाव से सबको बता रही थीं कि अब वे सात समंदर पार अपने बेटे के पास जा रही हैं।
जाने की तैयारियों में ममता का हर रंग शामिल था। माताजी ने रातों को जागकर पोते-पोतियों के लिए स्वेटर बुने, शुद्ध देसी घी की पिन्नियाँ बनाईं और घर का बना सरसों का साग और मक्की की रोटियाँ पैक कीं। उन्हें लग रहा था कि वे अपने साथ सिर्फ खाने-पीने का सामान नहीं, बल्कि पंजाब की मिट्टी की खुशबू लेकर जा रही हैं। लेकिन नियति ने उनके इस सुनहरे सफर के पीछे एक काला अध्याय लिख रखा था, जिससे वे पूरी तरह अनजान थीं।
रवानगी से ठीक एक दिन पहले, उनके घर एक दूर का रिश्तेदार आया। वह व्यक्ति परिवार का पुराना परिचित था और अक्सर घर आता-जाता रहता था। उसने बातों-बातों में अपनी चालाकी का जाल बुना और माताजी से कहा, “बेबे, आप कनाडा जा रही हैं, तो मेरा एक छोटा सा काम कर दीजिए। मेरा भाई वहां बहुत उदास रहता है और उसे घर के अचार की बहुत याद आती है। मैंने एक डिब्बे में थोड़ा अचार और कुछ देसी दवाइयां पैक की हैं, बस इसे उसके पास पहुँचा दीजिएगा।” हमारी पंजाबी संस्कृति में ‘ना’ कहना अपमान समझा जाता है, और माताजी ने उसी भरोसे के नाते बिना पैकेट खोले उसे अपने बैग में रख लिया। उन्हें क्या पता था कि जिस डिब्बे को वे दुआओं का डिब्बा समझ रही थीं, उसमें उनकी बर्बादी का सामान छिपा था।

अमृतसर के श्री गुरु रामदास जी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे (राजा सांसी) पर जब माताजी पहुँचीं, तो उनके चेहरे पर उत्साह था। परिवार ने उन्हें नम आँखों से विदा किया। चेक-इन की प्रक्रिया सामान्य रही, लेकिन जैसे ही उनका मुख्य बैग एक्स-रे मशीन से गुजरा, सुरक्षा अधिकारियों के चेहरे की रंगत बदल गई। मशीन ने उस डिब्बे के भीतर कुछ संदिग्ध पदार्थ की ओर इशारा किया था। जब माताजी को एक अलग कमरे में ले जाया गया, तो उनकी घबराहट चीख में बदल गई। सुरक्षाकर्मियों ने जब अचार की परतों को चाकू से हटाया, तो नीचे प्लास्टिक में बहुत सफाई से लपेटी गई उच्च कोटि की अफीम बरामद हुई, जिसकी अंतरराष्ट्रीय कीमत लाखों में थी।
उस पल माताजी के पैरों तले से जमीन खिसक गई। वह बुजुर्ग महिला, जिसने कभी थाने की दहलीज नहीं देखी थी, अब अंतरराष्ट्रीय ड्रग तस्करी के आरोप में हथकड़ियों में जकड़ी हुई थी। जिस फोन नंबर पर उन्होंने उस रिश्तेदार को कॉल करने की कोशिश की, वह बंद आ रहा था। तस्कर ने एक भोली माँ की ममता को मोहरा बनाकर अपनी जान बचा ली थी और माताजी को एक ऐसे अंधेरे कुएँ में धकेल दिया था जहाँ से निकलना नामुमकिन सा लग रहा था।
कनाडा में बैठा बेटा बेबस होकर दीवारों से सिर टकरा रहा था, जबकि यहाँ पंजाब में परिवार अदालतों और वकीलों के चक्कर काट रहा था। एनडीपीएस (NDPS) एक्ट की धाराएं इतनी सख्त थीं कि बुढ़ापे की जमा-पूंजी और मान-सम्मान सब कुछ कानूनी लड़ाई की भेंट चढ़ गया। जो समाज कल तक बधाइयां दे रहा था, वह अब कानाफूसी और तानों में व्यस्त था। जेल की सलाखों के पीछे बैठी माँ अब कनाडा के सपने नहीं देखती, बल्कि केवल अपनी बेगुनाही साबित होने का इंतजार करती है।
इस घटना के बाद जो विनाशकारी परिणाम सामने आए, उन्होंने न केवल उस बुजुर्ग माँ के जीवन को तहस-नहस कर दिया, बल्कि पूरे परिवार की जड़ों को हिलाकर रख दिया। गिरफ्तारी के पहले ही हफ्ते में वह घर, जो कभी खुशियों और कनाडा जाने की चर्चाओं से चहकता था, मातम के सन्नाटे में डूब गया। माताजी की गिरफ्तारी महज एक कानूनी प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि एक जीते-जाते परिवार की सामाजिक मृत्यु की शुरुआत थी। जिस समाज में वे सम्मान के साथ सिर उठाकर जीती थीं, उसी समाज ने रातों-रात उनसे मुंह मोड़ लिया। कल तक जो पड़ोसी उनके बेटे की कामयाबी की मिसालें देते थे, वे अब उनके घर के सामने से गुजरते समय अपनी नजरें फेर लेते थे और दबी जुबान में नशीले पदार्थों के काले कारोबार की चर्चा करने लगे।
कनाडा में बैठे उनके बेटे कुलदीप की स्थिति और भी हृदयविदारक थी। अपनी माँ को वैंकूवर के एयरपोर्ट पर गले लगाने का उसका सपना एक ऐसी डरावनी हकीकत में बदल गया, जहाँ वह हजारों मील दूर बैठा सिर्फ फोन पर अपनी माँ की सिसकियाँ सुन सकता था। कानूनी जटिलताओं और नशीले पदार्थों के गंभीर मामले (NDPS Act) के कारण उसे भारत आने में भी डर लग रहा था कि कहीं जांच के घेरे में उसे भी न ले लिया जाए। अपनी बेगुनाह माँ को सलाखों के पीछे देख वह अपराधबोध से भर गया, क्योंकि उसी के बुलावे पर माँ ने यह सफर शुरू किया था। वह मानसिक रूप से इतना टूट गया कि उसकी नौकरी छूट गई और उसकी रातों की नींद हमेशा के लिए उड़ गई।
सबसे भयानक प्रभाव माताजी के स्वास्थ्य और उनकी मानसिक स्थिति पर पड़ा। 65 वर्ष की आयु में, जहाँ उन्हें अपनों की सेवा और आराम की जरूरत थी, वहाँ उन्हें जेल की ठंडी जमीन और अपराधियों के बीच रहना पड़ा। उच्च रक्तचाप और मधुमेह (Diabetes) की मरीज होने के कारण जेल के वातावरण ने उनकी देह को जर्जर कर दिया। उनकी आँखों की चमक गायब हो गई और वे अक्सर शून्य में ताकती रहती थीं। उन्हें अब अपने बेटे से मिलने की उतनी तड़प नहीं थी, जितनी कि इस बात का दुख था कि उनके अपने ही एक परिचित ने उनकी ममता का सौदा कर दिया।
आर्थिक रूप से भी परिवार पूरी तरह सड़क पर आ गया। अंतरराष्ट्रीय ड्रग तस्करी का मामला होने के कारण अच्छे वकीलों की फीस चुकाने के लिए परिवार को अपनी पुश्तैनी जमीन का एक बड़ा हिस्सा और घर के गहने बेचने पड़े। लाखों रुपये पानी की तरह बह गए, लेकिन कानून की कठोरता के सामने बेगुनाही साबित करना एक लंबी और थका देने वाली जंग बन गई। उस एक ‘अचार के डिब्बे’ ने न केवल एक माँ का बुढ़ापा काल कोठरी में धकेल दिया, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के नाम पर भी एक ऐसा दाग लगा दिया जिसे मिटाना नामुमकिन था। यह त्रासदी इस बात का जीता-जागता प्रमाण है कि एक पल का अंधा विश्वास कैसे पूरी जिंदगी की कमाई और मान-मर्यादा को खाक में मिला सकता है।
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