भाई ने बहन का उठाया फायदा और अंजाम बहुत बुरा हुआ/जब बहन पहुंच गई पुलिस थाने/
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बहन का न्याय: मंजू की कहानी
राजस्थान के कोटा शहर के मंदुगढ़ मोहल्ले में सुबह के दस बजे थे। सूरज की किरणें खेतों पर पड़ रही थीं, और मंजू देवी अपनी माँ कांता के साथ घर के कामों में लगी थी। मंजू सत्रह साल की सुंदर, समझदार और मेहनती लड़की थी। उसके पिता की एक साल पहले दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी, जिससे घर की सारी जिम्मेदारी मंजू और उसकी माँ के कंधों पर आ गई थी। घर में दो भैंसें थीं, जिनका दूध बेचकर उनका गुजारा चलता था।
कुछ दिनों से कांता देवी बीमार रहने लगी थी। माँ की बीमारी के कारण मंजू को खेतों में अकेले जाना पड़ता था। कांता देवी को अपनी जवान बेटी की सुरक्षा की चिंता सताने लगी थी। उन्होंने अपने भतीजे रवि को, जो बीस साल का था, मदद के लिए बुलाया। रवि उनके घर आ गया और मंजू के साथ खेतों में जाने लगा।

शुरुआत में सब ठीक था। मंजू और रवि रोज़ खेत में चारा काटने जाते, घर लौटते और भैंसों को चारा खिलाते। लेकिन चौथे दिन एक घटना ने मंजू की ज़िंदगी बदल दी।
खेत में चारा काटते समय मंजू के ब्लाउज में अचानक एक कीड़ा घुस गया। डर के मारे मंजू ने अपने ऊपर का कपड़ा जल्दी-जल्दी उतार दिया। रवि की नजर मंजू पर पड़ी। वह बेकाबू हो गया। चारों ओर कोई नहीं था, उसने मंजू को ईख के खेत में ले जाकर जबरदस्ती की। मंजू ने विरोध किया, लेकिन रवि ने उसकी एक न सुनी। उसने अपनी बहन का फायदा उठाया और उसे धमकी दी कि अगर उसने किसी को कुछ बताया तो वह उसकी और उसकी माँ की जान ले लेगा।
मंजू डरी हुई थी, घबराई हुई थी। वह चुपचाप घर लौट आई। अगले कुछ दिनों तक रवि ने बार-बार उसके साथ गलत काम किया। मंजू की आत्मा टूट गई थी। वह जानती थी कि अगर रवि घर में रहा तो उसकी जिंदगी नरक बन जाएगी।
एक शाम रवि किसी काम से बाहर गया। मंजू ने माँ कांता को सब कुछ बता दिया। माँ के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उन्होंने बेटी को गले लगाकर रोने दिया। कांता देवी ने फैसला किया कि अब चुप रहना ठीक नहीं। उन्होंने बेटी के साथ मिलकर पुलिस में जाने का निर्णय लिया।
रात के ग्यारह बजे कांता देवी और मंजू ने रवि के कमरे में जाकर उसका सामना किया। मंजू के भीतर जमा हुआ गुस्सा फूट पड़ा। माँ-बेटी ने खुद की रक्षा के लिए रवि पर हमला किया। रवि की मौत हो गई। दोनों ने तुरंत पुलिस स्टेशन जाकर आत्मसमर्पण कर दिया।
पुलिस ने दोनों की बात सुनी, घर जाकर रवि की लाश बरामद की और मामला दर्ज किया। कोर्ट में मुकदमा चला। मंजू ने अदालत में अपनी पीड़ा और रवि की करतूतों का सच बयान किया। कांता देवी ने भी बेटी के पक्ष में गवाही दी। समाज में इस घटना की चर्चा फैल गई।
समाज की प्रतिक्रिया
मोहल्ले के लोग इस घटना से स्तब्ध थे। कुछ लोग माँ-बेटी के फैसले को सही मानते थे, तो कुछ इसे कानून हाथ में लेने की गलती बताते थे। लेकिन अधिकांश लोग इस बात पर सहमत थे कि मंजू के साथ जो हुआ, वह किसी भी लड़की के साथ नहीं होना चाहिए। गाँव की महिलाओं ने मंजू के साहस की सराहना की। उन्होंने कहा—
“अगर मंजू ने आवाज़ न उठाई होती, तो न जाने और कितनी लड़कियाँ ऐसी पीड़ा सहतीं।”
अदालत का फैसला
अदालत ने पूरे मामले की गंभीरता को समझा। जाँच में स्पष्ट हुआ कि मंजू के साथ बार-बार जबरदस्ती हुई थी। रवि ने उसकी मजबूरी का फायदा उठाया था। माँ-बेटी ने डर के मारे यह कदम उठाया। अदालत ने दोनों को आत्मरक्षा और मानसिक प्रताड़ना के आधार पर न्यूनतम सजा दी। साथ ही पुलिस को आदेश दिया कि गाँव की लड़कियों की सुरक्षा के लिए विशेष कदम उठाए जाएँ।
मंजू की नई शुरुआत
सजा पूरी करने के बाद मंजू और उसकी माँ गाँव लौट आईं। मंजू ने अपनी पढ़ाई जारी रखी और गाँव की लड़कियों को आत्मरक्षा की शिक्षा देने लगी। उसने अपने अनुभव से सीखा कि चुप रहना कभी समाधान नहीं होता। उसने गाँव की महिलाओं को जागरूक किया—
“अगर आपके साथ कुछ गलत होता है, तो डरिए मत। आवाज़ उठाइए, कानून आपका साथ देगा।”
मंजू की कहानी पूरे जिले में मिसाल बन गई। लोग उसकी हिम्मत और न्याय के लिए लड़ने के जज़्बे की तारीफ करने लगे। माँ-बेटी ने अपने दुख को ताकत बना लिया। गाँव की लड़कियाँ मंजू को अपना आदर्श मानने लगीं।
सामाजिक संदेश
यह घटना हमें यह सिखाती है कि
चुप रहना अपराध को बढ़ावा देता है।
हर लड़की को अपनी सुरक्षा के लिए जागरूक रहना चाहिए।
परिवार को बेटियों का साथ देना चाहिए।
कानून सबका है, डरना नहीं चाहिए।
मंजू की कहानी हर उस लड़की के लिए प्रेरणा है जो डर के साए में जी रही है। समाज को चाहिए कि वह बेटियों की सुरक्षा को प्राथमिकता दे और अपराधियों को सख्त सजा दिलवाए।
समाप्ति
मंजू ने अपने साहस और माँ के साथ मिलकर न्याय की लड़ाई लड़ी। उसने साबित कर दिया कि अगर इरादा मजबूत हो, तो कोई भी मुश्किल पार की जा सकती है। उसकी कहानी आज भी गाँव की लड़कियों को हिम्मत देती है कि वे अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाएँ और अन्याय के खिलाफ लड़ें।
जय हिंद!
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