भाभी ने देवर से परेशान होकर उसके साथ कर दिया बड़ा हादसा।
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एक बंद दरवाज़ा, एक पुड़िया… और एक सच
राजस्थान के छोटे से गांव सातलखेड़ी (ज़िला राजस्थान) में रहने वाला प्रभात अपने पांच भाई-बहनों में सबसे बड़ा था। पिता खेती करते थे, मां घर संभालती थीं। परिवार बड़ा था, जिम्मेदारियाँ उससे भी बड़ी। प्रभात बचपन से ही समझदार था। उसने पढ़ाई पूरी की और फिर नौकरी की तलाश में जयपुर चला गया।
कुछ वर्षों की मेहनत के बाद उसे जयपुर (जयपुर) में एक निजी कंपनी में अच्छी नौकरी मिल गई। अब घर वालों को उसकी शादी की चिंता सताने लगी। उम्र 28 पार कर चुकी थी। रिश्ते आने लगे। आखिरकार संजना नाम की लड़की से बात पक्की हुई।
संजना सुंदर थी, आत्मविश्वासी थी और बोलने में मधुर। पहली मुलाकात में ही दोनों ने एक-दूसरे को पसंद कर लिया। शादी सादगी से हुई और संजना ससुराल आ गई। शुरू में सब कुछ सामान्य था। देवर-देवरानी, ननदें, सास-ससुर—सभी के साथ वह हँस-बोलकर रहती।
शादी के तीन साल बीत गए, मगर संतान नहीं हुई। गांव में फुसफुसाहटें शुरू हो गईं—
“अभी तक कोई खुशखबरी नहीं?”
“कहीं कोई दिक्कत तो नहीं?”
ये ताने धीरे-धीरे संजना के मन में चुभने लगे। जब भी प्रभात छुट्टी में घर आता, वह उससे कहती—
“सब मुझे ही दोष देते हैं। लोग कहते हैं कि मेरी गोद सूनी है।”
प्रभात समझाता—
“अभी मैं पूरी तरह स्थिर नहीं हुआ हूं। थोड़ा समय दो, फिर प्लान करेंगे।”
लेकिन संजना के लिए गांव में रहना मुश्किल होता जा रहा था। उसने साफ कहा—
“या तो मुझे अपने साथ जयपुर ले चलो, या फिर बच्चा कर लो।”
आखिरकार प्रभात ने उसे जयपुर बुला लिया। उसने एक छोटा-सा फ्लैट किराए पर लिया और दोनों साथ रहने लगे। शहर की चमक-दमक ने संजना को उत्साहित कर दिया। अब वह अकेली नहीं थी। मगर दिन भर प्रभात दफ्तर में रहता और वह घर में अकेली पड़ जाती।
कुछ समय बाद प्रभात का छोटा भाई मुकेश, जो 20 साल का था, पढ़ाई के लिए जयपुर आने वाला था। प्रभात ने सोचा—“मुकेश हमारे साथ ही रह लेगा। घर में रौनक भी रहेगी और उसका खर्च भी बचेगा।”
मुकेश घर आ गया। शुरुआत में सब सामान्य था। प्रभात सुबह ऑफिस चला जाता, मुकेश कॉलेज। दोपहर में वह लौट आता और संजना के साथ खाना खाता। शाम को प्रभात वापस आता और तीनों साथ बैठकर बातें करते।
धीरे-धीरे, घर की दीवारों के भीतर एक अनकहा तनाव जन्म लेने लगा।
एक दिन संजना ने महसूस किया कि जब वह बाथरूम में जाती है, तो वेंटिलेशन के पास हल्की-सी आहट होती है। पहले उसने ध्यान नहीं दिया। लेकिन एक दिन उसने स्पष्ट देखा—मुकेश खिड़की के पास खड़ा था।
संजना सन्न रह गई।
उसने उस समय कुछ नहीं कहा। मन में उथल-पुथल मची थी—
क्या प्रभात को बताए?
क्या मुकेश को डांटे?
या चुप रहे?
उसने चुप्पी चुनी।
लेकिन चुप्पी हमेशा समाधान नहीं होती।
मुकेश की नजरें अब और निर्भीक हो गई थीं। एक दिन संजना ने देखा कि उसके सुखाने के लिए डाले गए कपड़े गायब हैं, फिर शाम को वापस वहीं मिलते हैं। शक पुख्ता हो गया।
एक तरफ आक्रोश था, दूसरी तरफ अजीब-सा अहंकार भी—कि कोई उसे इस तरह देखता है।
धीरे-धीरे दोनों के बीच अजीब-सी खामोशी ने जगह बना ली। एक रात जब प्रभात गांव गया हुआ था, घर में सिर्फ संजना और मुकेश थे। उस रात एक ऐसी सीमा पार हुई, जो कभी पार नहीं होनी चाहिए थी।
रिश्ता गलत था। लेकिन अब वह बन चुका था।
दिन बीतते गए। दोनों के बीच छुप-छुपकर मुलाकातें होने लगीं। संजना गर्भवती हो गई।
उसे डर लगने लगा—
अगर बच्चा मुकेश का हुआ तो?
अगर सच सामने आ गया तो?
वह मायके चली गई। मुकेश बेचैन रहता, बार-बार मिलने की जिद करता। उसकी जिद अब सनक बनती जा रही थी।
एक दिन प्रभात, संजना और मुकेश मायके से वापस लौटे। उस रात संजना ने एक फैसला किया।
घर में खेती के काम के लिए रखा कीटनाशक पाउडर था। उसने अपनी पुरानी कॉपी से एक पन्ना फाड़ा, उसमें थोड़ा पाउडर बांधकर पुड़िया बना ली।
जब मुकेश उससे मिलने आया, उसने उसे पुड़िया थमाते हुए कहा—
“जब मेरी याद ज्यादा आए, इसे गुनगुने पानी में घोलकर पी लेना। सुकून मिलेगा।”
मुकेश ने बिना सोचे-समझे पुड़िया रख ली।
अगले दिन सुबह प्रभात ऑफिस चला गया। मुकेश अकेला था। यादें, वासना, बेचैनी—सब मिलकर उसे कचोट रहे थे।
उसे संजना की बात याद आई।
उसने पानी गर्म किया, पुड़िया घोली और एक ही घूंट में पी गया।
कुछ ही मिनटों में उसका गला जलने लगा। सांस रुकने लगी। वह फर्श पर गिर पड़ा। मुंह से झाग निकलने लगे।
शाम को जब प्रभात लौटा, घर अंधेरा था। अंदर जाकर उसने देखा—मुकेश जमीन पर पड़ा है।
हॉस्पिटल ले जाया गया। डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया।
मामला संदिग्ध था, इसलिए पुलिस जांच शुरू हुई।
फॉरेंसिक रिपोर्ट में पाया गया कि मौत की वजह कीटनाशक था। पानी के गिलास पर सिर्फ मुकेश के फिंगरप्रिंट थे।
लेकिन असली सुराग उस पुड़िया का कागज था। उस पर लिखावट थी—जो संजना की निकली।
पुलिस ने उसके मायके जाकर उसकी पुरानी कॉपियां मंगवाईं। एक कॉपी में से आधा फटा पन्ना मिला, जो पुड़िया वाले कागज से पूरी तरह मेल खाता था।
संजना से पूछताछ हुई। पहले वह मुकरती रही। लेकिन सबूतों के आगे सच छुप नहीं पाया।
उसने स्वीकार किया—
“मैं डर गई थी। वह मुझे ब्लैकमेल कर सकता था। मेरी जिंदगी बर्बाद हो जाती।”
अदालत में मुकदमा चला। संजना को दोषी पाया गया। उसे सजा सुनाई गई।
प्रभात के लिए यह दोहरा आघात था—
एक भाई की मौत,
और पत्नी का अपराध।
गांव में लोग तरह-तरह की बातें करने लगे।
प्रभात अक्सर सोचता—
अगर उसने मुकेश को साथ न रखा होता…
अगर उसने संजना की परेशानी समझी होती…
लेकिन ‘अगर’ कभी जीवन नहीं बदलते।
इस कहानी में अपराधी कौन था?
मुकेश—जिसने मर्यादा तोड़ी?
संजना—जिसने हत्या की?
या परिस्थितियां—जिन्होंने सबको अंधा बना दिया?
सच यह है कि एक गलत कदम, एक छुपा हुआ रिश्ता और एक पल का डर—तीनों ने मिलकर एक घर उजाड़ दिया।
कभी-कभी अपराध गुस्से से नहीं, डर से जन्म लेते हैं।
और डर, जब विवेक पर हावी हो जाए—तो परिणाम हमेशा विनाश ही होता है।
यह कहानी सिर्फ एक हत्या की नहीं, बल्कि उस चुप्पी की है जो समय रहते टूटती तो शायद एक जान बच जाती, एक परिवार बिखरने से बच जाता।
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