महिला टीचर के साथ ऑटो ड्राइवर की शर्मनाक हरकत को देख पुलिस और लोग दंग रह गए/

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महिला टीचर और ऑटो ड्राइवर — विश्वास के नाम पर हुआ सबसे बड़ा धोखा

उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में खासपुर नाम का एक गांव था—वैसा ही गांव जैसा आप किसी भी नक्शे पर ढूंढें तो शायद उंगली थक जाए, पर गांव का हर आदमी आपको रास्ता बता देगा। यहां की सुबहें खेतों की महक से शुरू होतीं, और शामें मंदिर की घंटी, बच्चों की हंसी और चौपाल की धीमी गपशप से खत्म हो जातीं। इसी गांव में रहती थीं मीनाक्षी देवी—सरकारी स्कूल की अध्यापिका। गांव के लोग उन्हें “मास्टरनी जी” कहते थे, लेकिन यह संबोधन सिर्फ सम्मान नहीं, भरोसे की मुहर भी था।

मीनाक्षी देवी की दिनचर्या सुई की तरह सीधी थी। सुबह करीब आठ बजे स्कूल निकलना, दोपहर में बच्चों को पढ़ाना, फिर घर लौटकर गांव के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना—और खास बात यह कि उन्होंने कभी किसी बच्चे से फीस नहीं ली। “पढ़ाई बेचने की चीज़ नहीं है,” वह बस इतना कहकर मुस्कुरा देतीं। गांव के गरीब घरों में भी जब कोई बच्चा पास हो जाता, तो सबसे पहले मिठाई उनके घर आती। मीनाक्षी देवी एक टीचर नहीं थीं—गांव का भरोसा थीं।

उनके घर में सास सुधा देवी थीं, शांत स्वभाव की बुजुर्ग महिला, और छोटी ननद जिज्ञासा, जो कॉलेज जाती थी। मीनाक्षी के पति रमेश दिल्ली में नौकरी करते थे और महीने में चार-पांच दिन ही गांव आते। बाकी दिनों में घर की जिम्मेदारी मीनाक्षी के कंधों पर ही रहती—घर, स्कूल, ट्यूशन, सास की दवाइयां और जिज्ञासा का भविष्य।

ऐसे घरों में छोटे-छोटे सहारे बहुत मायने रखते हैं। और मीनाक्षी के घर का वही “सहारा” था—पड़ोस में रहने वाला एक ऑटो ड्राइवर, विनोद। पिछले करीब एक साल से विनोद रोज मीनाक्षी को स्कूल छोड़ता और शाम को वापस ले आता। जिज्ञासा को भी कई बार कॉलेज छोड़ देता। गांव में लोग उसे ठीक-ठाक समझते थे—कामकाजी, बोलने में मीठा, और मददगार। सबसे बड़ी बात, वह जिज्ञासा को “बहन” कहता और हर साल राखी भी बंधवाता। मीनाक्षी उसे “भाई जैसा” मानने लगी थीं, और यह मानना ही बाद में सबसे खतरनाक साबित हुआ।

दिसंबर की ठंड शुरू हो चुकी थी। घरों में धूप सेंकने की जगह तय होने लगी थी और गांव की गलियों में ऊनी कपड़ों की गंध फैलने लगी थी। उसी महीने की 10 तारीख को सुबह विनोद अचानक मीनाक्षी के घर पहुंचा, चेहरे पर बेचैनी और आंखों में एक अजीब-सी जल्दबाजी। दरवाजा जिज्ञासा ने खोला तो विनोद बिना भूमिका बनाए बोला, “जिज्ञासा… मुझे पांच हजार की बहुत जरूरत है। अभी के अभी।”

जिज्ञासा चौंक गई। “भैया… अभी तो घर में नहीं हैं। आप भाभी से पूछ लीजिए।”

विनोद की आवाज़ में झल्लाहट थी, “भाभी से ही पूछ रहा हूं… दे दो यार।”

मीनाक्षी बाहर आईं। उन्होंने विनोद की बात सुनी, फिर शांत स्वर में कहा, “विनोद, अभी मेरी सैलरी नहीं आई। अगले महीने मिलते ही तुम्हें पांच नहीं, दस हजार दे दूंगी। अभी सच में नहीं है।”

विनोद ने सिर हिलाया, पर उसकी आंखों में कुछ टूटता नहीं—कुछ कड़वा जमा होता दिखा। उसने कोई बहस नहीं की, लेकिन जाते-जाते उसके चेहरे पर ऐसी चुप्पी थी, जैसे उसने किसी बात की गांठ बांध ली हो। उस दिन वह मीनाक्षी को स्कूल छोड़ने भी आया, वापस लाने भी—पर उसके व्यवहार में वह पुरानी विनम्रता नहीं थी। जैसे मीठे पानी में नमक घुल गया हो।

कुछ दिन बीत गए। फिर 15 दिसंबर आया। उस दिन मीनाक्षी ने छुट्टी ले रखी थी—उन्हें शहर जाकर कुछ कपड़े और घर का सामान लेना था। सुबह उन्होंने विनोद को कॉल किया, लेकिन फोन नहीं उठा। विनोद का मोबाइल चार्जिंग पर था और वह बाहर चला गया था। मीनाक्षी ने सोचा, “आज नहीं आएगा।” उन्होंने सास से कहा, “मां जी, हम दूसरे ऑटो से शहर चलेंगे।” जाते-जाते उन्होंने जिज्ञासा से कहा, “तुम डेढ़ घंटे बाद कॉलेज चली जाना। हम शाम तक लौट आएंगे।”

जिज्ञासा घर में अकेली रह गई।

कुछ देर बाद विनोद घर लौटा, मिस्ड कॉल देखी और बिना देर किए ऑटो लेकर मीनाक्षी के घर पहुंच गया। उसने दरवाजा खटखटाया। जिज्ञासा ने खोला। विनोद की निगाहें उस पर पड़ीं और उस पल उसकी आंखों में जो बदला, वह जिज्ञासा ने नहीं देखा—लेकिन हवा ने देख लिया था। विनोद ने बहाना किया, “भाभी को स्कूल छोड़ना था।”

जिज्ञासा ने सहजता से कहा, “आज भाभी और मां जी शहर गई हैं। आप नौ बजे के आसपास आ जाइए, मैं आपके ऑटो से कॉलेज चली जाऊंगी।”

विनोद “ठीक है” कहकर चला गया, लेकिन उसके भीतर कुछ गंदा जाग चुका था—लालच, बदला, और एक ऐसी घिनौनी सोच जो राखी और रिश्तों को भी रौंद देती है। वह घर पहुंचकर अपने दोस्त कर्मवीर को फोन करने लगा। कुछ ही मिनटों में कर्मवीर आया। विनोद ने फुसफुसाकर कहा, “आज जिज्ञासा घर में अकेली है… मौका है।”

कर्मवीर ने तुरंत विरोध किया, “तू पागल है? वो तेरी बहन है, तुझे राखी बांधती है।”

विनोद ने गुस्से में कहा, “सगी बहन नहीं है। और वो लोग पैसे भी नहीं दे रहे। आज देखता हूं…”

कर्मवीर हिचकिचाया, फिर विनोद के दबाव में, उसकी संगत और डर के आगे कमजोर पड़ गया। ठीक नौ बजे के आसपास दोनों ऑटो लेकर जिज्ञासा के घर पहुंचे। जिज्ञासा ने ताला लगाया और बैठ गई। कर्मवीर को देखकर उसने पूछा, “आज ये साथ क्यों?”

विनोद ने झूठ बोला, “इसे शहर में कुछ सामान लेना है, इसलिए साथ आ गया।”

ऑटो चला। गांव का रास्ता पीछे छूटता गया। कुछ किलोमीटर बाद सुनसान इलाका आया—जहां खेतों की मेड़ें थीं, झाड़ियां थीं, और सड़क पर इंसान नहीं, सिर्फ सन्नाटा था। उसी सन्नाटे में जिज्ञासा की जिंदगी टूट गई। विनोद ने ऑटो रोक दिया। “ऑटो में गड़बड़ है,” उसने कहा। और फिर जो हुआ, वह जिज्ञासा के लिए सिर्फ डर नहीं था—विश्वास का कत्ल था। उसे धमकाया गया, उसकी आवाज़ दबाई गई, और उसके साथ ऐसी हिंसा हुई जिसे शब्दों में लिखना भी जख्म को दोबारा खोल देता है।

कुछ देर बाद वही लोग उसे वापस घर छोड़ गए—जैसे कुछ हुआ ही नहीं। जाते-जाते धमकी भी दी कि किसी को बताया तो अंजाम बुरा होगा। जिज्ञासा दरवाजा बंद करके कमरे में गिर पड़ी। उसके शरीर पर चोटें थीं, पर उससे ज्यादा चोट उसके मन पर थी—वह लगातार यही सोचती रही कि “जिसने मुझे बहन कहा… उसने ऐसा कैसे किया?” वह रोती रही, पर आवाज़ नहीं निकली। क्योंकि कई बार डर गले में पत्थर बनकर बैठ जाता है।

शाम को मीनाक्षी और सुधा देवी लौट आईं। मीनाक्षी ने देखा कि जिज्ञासा चुप है, बुझी-बुझी है। उन्होंने प्यार से पूछा, “क्या हुआ? तबीयत ठीक नहीं?”

जिज्ञासा ने झूठ बोल दिया, “मैं अकेली थी, डर लग रहा था… थोड़ा सिर दर्द है।” वह सच बोलना चाहती थी, पर धमकी उसके कान में सांप की तरह फुफकार रही थी। मीनाक्षी ने उसे दवा दी, माथा सहलाया और समझीं कि शायद अकेलेपन से घबराई है।

लेकिन विनोद और कर्मवीर का अपराध यहीं नहीं रुका। अपराध जब बच निकलता है, तो उसका साहस बढ़ता है। कुछ दिन बाद 24 दिसंबर की सुबह विनोद फिर मीनाक्षी के घर आया। इस बार उसने तीन हजार मांगे। मीनाक्षी ने फिर वही जवाब दिया, “सैलरी आते ही दे दूंगी।” विनोद का चेहरा कड़वा हो गया, लेकिन उसने कहा, “ठीक है भाभी, बैठिए… स्कूल छोड़ देता हूं।”

मीनाक्षी रोज की तरह बैठ गईं। यह उनका सबसे बड़ा भरोसा था—और सबसे बड़ी भूल भी। कुछ दूर जाकर विनोद ने ऑटो रोका। “मेरा दोस्त कर्मवीर भी आ रहा है,” उसने कहा और उतरकर फोन करने लगा। मीनाक्षी को अजीब लगा, पर वह सोच भी नहीं सकती थीं कि गांव का वही ऑटो ड्राइवर—जिसे उन्होंने घर का आदमी माना—आज उनके लिए मौत बन चुका है।

कर्मवीर आया, बैठा। मीनाक्षी ने पूछा, “ये कहां जाएगा?” विनोद ने फिर झूठ बोला, “ऑटो चलाना सीख रहा है, साथ रहता है।”

ऑटो आगे बढ़ा। एक सुनसान रास्ते पर फिर रुक गया। इस बार धमकियां, डर, और वही दरिंदगी—मीनाक्षी के साथ भी वही हुआ जो जिज्ञासा के साथ हुआ था। उन्होंने बचने की कोशिश की, गिड़गिड़ाईं, मगर दो अपराधियों के सामने एक अकेली महिला की आवाज़ हवा में दब गई। वे उसे एक खेत की तरफ ले गए, जहां ट्यूबवेल के पास एक छोटा कमरा बना था। वहां वह उनके चंगुल से छूट नहीं पाईं।

यह कहानी यहां तक भी भयानक है, लेकिन इसके बाद जो हुआ वह और भी रोंगटे खड़े कर देता है—क्योंकि मीनाक्षी देवी किसी तरह वहां से निकल नहीं पाईं। वह दर्द, अपमान और डर के बीच फंस गईं। कुछ देर बाद, नशे में धुत दोनों आरोपी वापस लौटे तो उन्हें मीनाक्षी बेसुध मिलीं। उस कमरे में बिजली के तार, टूटी व्यवस्था और आतंक—सब मिलकर मौत का कारण बन गए। क्या वह दुर्घटना थी या आत्मरक्षा में उठाया गया अंतिम कदम—यह बाद में जांच का हिस्सा बना। पर सच यह था कि मीनाक्षी अब जीवित नहीं थीं।

और अपराधियों की घिनौनी सोच यहीं भी नहीं रुकी। वे भागने की जगह अपराध को और विकृत बनाने लगे—यह वही हिस्सा है जिसे याद करना भी मानवता को शर्मिंदा करता है।

लेकिन किस्मत ने उस दिन इंसाफ के लिए एक दरवाजा खुला छोड़ा था।

उसी खेत का मालिक रामकरन अपने मजदूरों के साथ वहां आया था। उसे खेत में कुछ काम करवाना था, इसलिए वह अचानक ट्यूबवेल की तरफ पहुंच गया। जैसे ही उसने कमरे का दरवाजा खोला, वह सन्न रह गया। सामने जो दृश्य था, उसे देखकर वह चीख पड़ा। उसने मजदूरों को आवाज़ दी, शोर मचाया। पांचों मजदूर दौड़कर आए और दोनों आरोपियों को दबोच लिया। वे भाग नहीं पाए। रामकरन ने तुरंत पुलिस को फोन किया।

करीब एक घंटे में पुलिस आ गई। गांव के लोग भी जुटने लगे। पुलिस ने कमरे से शव बरामद किया, पोस्टमार्टम के लिए भेजा, और विनोद-कर्मवीर को हिरासत में ले लिया। गांव की भीड़ में गुस्सा उफान पर था—पर इस बार लोग सिर्फ मारपीट नहीं चाहते थे, वे चाहते थे कि अदालत ऐसा फैसला करे कि कोई भी विनोद फिर किसी घर के भरोसे पर हाथ न डाल सके।

थाने में पूछताछ हुई। पहले दोनों मुकरते रहे, फिर सबूत, गवाह और दबाव के आगे टूटने लगे। उसी बीच जिज्ञासा को पता चला कि उसकी भाभी के साथ क्या हुआ। उसके अंदर महीनों से जमा डर अचानक टूट गया। वह थाने पहुंची, कांपती आवाज़ में बोली, “मेरे साथ भी… यही हुआ था।” उसका बयान सुनकर पुलिस वालों की आंखों में भी झटका था। गांव के लोग दंग रह गए। जिन हाथों ने राखी बांधी थी, वही हाथ अब गवाही के लिए कांप रहे थे।

जिज्ञासा के बयान के बाद केस की धाराएं और गंभीर हो गईं। यह सिर्फ हत्या का मामला नहीं रहा; यह विश्वासघात, यौन हिंसा, धमकी, अपहरण—सबका मिला-जुला नरक बन गया। गांव में शोक और गुस्सा साथ-साथ था। स्कूल के बच्चे रो रहे थे—उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि उनकी “मास्टरनी जी” अब क्यों नहीं आएंगी। सास सुधा देवी की आंखें सूख गईं। पति रमेश दिल्ली से भागकर आया, और जब उसे सच पता चला तो वह टूट गया—क्योंकि जो घर वह “सुरक्षित” समझकर छोड़ता था, वही घर उसके लौटने से पहले उजड़ चुका था।

मीडिया आया। कैमरे चमके। लोग नारे लगाने लगे। और हर जगह एक ही सवाल था—“ऐसी सजा क्या होनी चाहिए?”
लेकिन इस कहानी का सबसे बड़ा संदेश अदालत की सजा से पहले गांव की सीख है—कि भरोसा जरूरी है, पर अंधा भरोसा खतरनाक हो सकता है; कि “राखी” बांध लेना किसी के चरित्र की गारंटी नहीं; कि अकेलेपन में सुरक्षा और सतर्कता उतनी ही जरूरी है जितनी पढ़ाई; और सबसे जरूरी—कि किसी भी पीड़िता को डर के कारण चुप नहीं रहना चाहिए, क्योंकि अपराधी चुप्पी को अपनी जीत समझते हैं।

जब मामला कोर्ट पहुंचा, जज ने पहली सुनवाई में ही कहा, “यह सिर्फ एक महिला की मौत नहीं, समाज की जिम्मेदारी का सवाल है।” जांच आगे बढ़ी, सबूत मजबूत हुए—रामकरन और मजदूरों की गवाही, जिज्ञासा का बयान, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, कॉल रिकॉर्ड, और घटनास्थल से मिले तथ्य। गांव इंतजार करता रहा—इस उम्मीद में कि मीनाक्षी देवी की आवाज़, जो अब शब्दों में नहीं बची, न्याय के फैसले में जरूर गूंजेगी।

और जिज्ञासा… वह धीरे-धीरे खुद को समेटने लगी। उसने एक दिन अपनी भाभी की कॉपी खोली—जिसमें बच्चों के नामों के आगे उनकी प्रगति लिखी रहती थी। उसने पन्ने पर उंगली रखकर खुद से कहा, “भाभी, मैं चुप नहीं रहूंगी। आपने बच्चों को पढ़ाया… अब मैं अपने डर को पढ़कर खत्म करूंगी।”

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कहानी यहीं रुकती नहीं—क्योंकि गांव में अब हर मां अपने बच्चे को सावधानी की कहानी सुनाने लगी थी। हर स्कूल में सुरक्षा की बात होने लगी। और हर लड़की के लिए एक बात और साफ हो गई—गलती कपड़ों की नहीं, नजरों की होती है; और अपराध की जिम्मेदारी पीड़िता की नहीं, अपराधी की होती है।

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