मुझे अपनी बेटी उसके बच्चे के साथ बेघर मिली—तभी मुझे विश्वासघात समझ आया…

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माँ की लड़ाई – मृदुला ठाकुर की कहानी

1. रात की शुरुआत – गैस स्टेशन पर एक वैन

रात के ग्यारह बजे, चंडीगढ़ के एक सुनसान गैस स्टेशन पर मृदुला ठाकुर की गाड़ी रुकी। पेट्रोल भरवाते हुए उसकी नजर एक पुरानी सफेद वैन पर पड़ी। वैन के शीशे पर झांकने पर उसने देखा – उसकी बेटी निशा, अपने तीन साल के बेटे ऋषभ को गोद में लिए सो रही थी। दोनों के कपड़े मैले थे, बच्चे के चेहरे पर सूखे आँसुओं के निशान। मृदुला का दिल काँप उठा। उसने दरवाजा खटखटाया। निशा जागी, माँ को देखा, और फूट-फूटकर रोने लगी।

“माँ, गौरव और उसकी माँ ने मुझे और ऋषभ को रात नौ बजे घर से निकाल दिया। मेरा सामान सड़क पर फेंक दिया।” निशा सिसकती रही। मृदुला के भीतर कुछ टूट गया, मगर साथ ही जाग भी गया। 32 साल तक सरकारी आवास बोर्ड में दस्तावेजीकरण अधिकारी रही मृदुला ने हजारों संपत्तियों का पंजीकरण किया था। उसे कानून की हर बारीकी आती थी। मगर आज उसकी बेटी और पोता सड़क पर थे।

2. बीते रिश्ते – शादी, सपने और बदलाव

चार साल पहले पति के देहांत के बाद मृदुला की दुनिया उसकी बेटी निशा और पोता ऋषभ में सिमट गई थी। निशा की शादी गौरव भल्ला से हुई थी – प्राइवेट कंपनी में सेल्स मैनेजर, दिखने में शालीन परिवार। गौरव की माँ राजकुमारी भल्ला, पिता की मृत्यु के बाद अकेली रहती थी। शादी के समय सब ठीक लगा था। लेकिन धीरे-धीरे रिश्तों की असलियत सामने आने लगी।

शादी के दो साल बाद ऋषभ पैदा हुआ। निशा खुश थी, मगर धीरे-धीरे उसकी आँखों की चमक फीकी पड़ने लगी। मृदुला ने कई बार पूछा, “क्या हुआ बेटा?” निशा ने हमेशा टाल दिया – “बस थकान है माँ।”

3. घर की जद्दोजहद – संपत्ति, अधिकार और धोखा

एक दिन निशा ने माँ से कहा, “गौरव कह रहे हैं कि हमें अपना घर चाहिए। बच्चा बड़ा हो रहा है। क्या आप मदद कर सकती हैं?” मृदुला ने अपनी सारी बचत, एफडी तोड़ दी, सेक्टर 22 में तीन बीएचके अपार्टमेंट खरीदा। मगर एक शर्त रखी – अपार्टमेंट निशा के नाम होगा, और रजिस्ट्री में क्लॉज जुड़वाया कि बिना दोनों (मृदुला और निशा) की मौजूदगी के प्रॉपर्टी ट्रांसफर नहीं हो सकती।

शुरुआत में सब ठीक था। मगर धीरे-धीरे गौरव और उसकी माँ ने निशा को मृदुला से दूर करना शुरू कर दिया। फोन कम होने लगे, घर बुलाना बंद कर दिया। जब मृदुला अचानक गई, तो निशा भी अजनबी सी हो गई। गौरव ने कहा, “सासू माँ, अगली बार पहले बता दीजिएगा। हमारा शेड्यूल टाइट रहता है।” राजकुमारी जी ने चाय तक नहीं पूछी। मृदुला को लगा – बेटी पर दबाव है।

4. घरेलू हिंसा – दर्द, डर और अकेलापन

एक दिन मृदुला ने निशा को सड़क किनारे रोते देखा। उसके गाल पर नीले निशान थे, साड़ी फटी थी। “किसने किया यह?” निशा ने कहा, “गौरव ने। बहस हो गई थी, धक्का दे दिया।” मृदुला ने पुलिस रिपोर्ट की बात की, मगर निशा डर गई – “वो मेरे पति हैं, उनकी माँ है। वो कहेंगी कि मैंने ही कुछ गलत किया।”

मृदुला ने उसे अपने घर ले आई, घावों पर मलहम लगाया, खाना खिलाया। मगर निशा फिर गौरव के घर लौट गई – “माँ, ऋषभ वहाँ है। उसकी स्कूल है, दोस्त हैं।”

5. जालसाजी का खुलासा – दस्तखत, कागजात और कानून

कुछ हफ्ते बाद बैंक का फोन आया – “आपकी प्रॉपर्टी पर लोन के लिए गौरव ने अप्लाई किया है।” मृदुला चौंक गई। उसने रजिस्ट्रार ऑफिस जाकर रिकॉर्ड देखा – एक नई एंट्री थी, जिसमें लिखा था कि निशा ने प्रॉपर्टी गौरव के नाम ट्रांसफर कर दी है, और दोनों के दस्तखत थे। लेकिन मृदुला ने तुरंत पहचान लिया – ये दस्तखत नकली थे।

उसने एफआईआर दर्ज करवाई, वकील रमेश नामदेव से सलाह ली। कोर्ट में स्टे ऑर्डर लिया – अब गौरव प्रॉपर्टी बेच नहीं सकता था। मगर निशा और ऋषभ अभी भी उसी घर में थे।

6. बेघर बेटी – संघर्ष की रात

एक रात निशा ने फोन किया – “माँ, गौरव और उनकी माँ ने मुझे घर से निकाल दिया। मैं ऋषभ को लेकर बाहर हूँ।” मृदुला ने उसे ढूंढना शुरू किया – दोस्तों को फोन किया, पुलिस स्टेशन गई, मगर कोई मदद नहीं मिली। शाम को गैस स्टेशन पर वैन में निशा और ऋषभ मिले – भूखे, डरे, टूटे हुए।

मृदुला उन्हें घर ले आई। खाना खिलाया, साफ कपड़े पहनाए। निशा ने पूरी कहानी बताई – कैसे गौरव और राजकुमारी ने उसे प्रताड़ित किया, डराया, और आखिरकार घर से निकाल दिया।

7. न्याय की लड़ाई – कोर्ट, गवाही और जीत

रमेश जी ने कोर्ट में केस दायर किया। सुनवाई के दिन मृदुला, निशा, रमेश जी और श्याम जी कोर्ट पहुँचे। गौरव और राजकुमारी भी थे। गौरव के वकील ने कहा – “प्रॉपर्टी का ट्रांसफर कानूनी है।” रमेश जी ने सबूत पेश किए – असली और नकली दस्तखत, जॉइंट ओनरशिप क्लॉज।

निशा ने गवाही दी – “मैंने कभी ऐसे कागज पर दस्तखत नहीं किए। पति और उसकी माँ ने मुझे प्रताड़ित किया, घर से निकाल दिया।” श्याम जी ने बताया – “मृदुला जी ने खुद रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया देखी थी। क्लॉज अभी भी वैध है।”

जज ने फैसला सुनाया – “यहाँ धोखाधड़ी हुई है। प्रॉपर्टी तुरंत निशा के नाम वापस की जाए। गौरव के खिलाफ जालसाजी और घरेलू हिंसा का केस दर्ज हो।”

8. सजा और नई शुरुआत

गौरव को तीन साल की सजा मिली। राजकुमारी को समाज में बदनामी झेलनी पड़ी। निशा ने वह अपार्टमेंट बेच दिया – 35 लाख मिले। अब निशा और ऋषभ मृदुला के साथ रहते हैं। निशा स्कूल में पढ़ाती है, ऋषभ स्कूल जाता है। घर में फिर से रौनक है।

मृदुला ने महसूस किया – अगर उसने संपत्ति कानून नहीं समझे होते, अगर उसने क्लॉज नहीं जुड़वाया होता, तो आज उसकी बेटी और पोता सड़क पर होते। उसकी उम्र, अनुभव, शिक्षा उसकी ताकत बनी।

9. समाज के लिए संदेश

मृदुला कहती है – “औरतों को अपने अधिकार पता होने चाहिए। संपत्ति के कागजात खुद संभालिए, कभी बिना समझे दस्तखत मत कीजिए। पढ़ाई, नौकरी, आत्मनिर्भरता सबसे जरूरी है।”

हर रविवार तीनों साथ में खाना बनाते हैं, हँसते हैं, बातें करते हैं। यही असली खुशी है। मृदुला छत पर जाती है, ठंडी हवा में सोचती है – “जिंदगी ऊपर-नीचे होती है, मगर हार मत मानो। लड़ो, तो जीत सकते हो।”

गौरव ने उसकी उम्र को कमजोरी समझा, मगर मृदुला ने साबित किया – उम्र ताकत है। अनुभव और ज्ञान ही असली हथियार हैं।

10. अंत – गर्व और जीत

आज मृदुला अपने पति की तस्वीर के सामने बैठती है – “काश आप होते, देखते कि मैंने अपनी बेटी को बचाया। मैंने अन्याय के खिलाफ लड़ाई लड़ी और जीती, सिर्फ अपने लिए नहीं, अपनी बेटी और पोते के लिए।”

अब वह गर्व से कहती है – “मैं मृदुला ठाकुर हूं। 64 साल की, लेकिन कमजोर नहीं। माँ, दादी, और एक लड़ाकू।”

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