मेरठ के कपसाड़ में मां का कत्ल और दलित बेटी के अप#हर#ण की कहानी का पूरा सच!
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मेरठ के कपसाड़ में दलित बेटी के अपहरण और मां की हत्या की पूरी सच्ची कहानी
उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले का कपसाड़ गांव। जनवरी 2026 की ठंडी सुबह थी। गांव में रोज की तरह हलचल थी, खेतों में मजदूर काम पर जा रहे थे, और गांव के रजवाहे के किनारे सुनीता देवी अपनी बेटी रूबी के साथ ईख की छिलाई करने जा रही थीं। सुनीता देवी दलित समाज से थीं, उम्र करीब 45 साल, गरीबी से जूझती, लेकिन अपने परिवार के लिए मेहनत करती थीं। उनकी बेटी रूबी, उम्र 20 साल, पढ़ाई के साथ-साथ मां का हाथ बंटाती थी।
सुनीता और रूबी का रोज का रास्ता था। लेकिन 8 जनवरी 2026 की सुबह, सबकुछ बदल गया। जैसे ही मां-बेटी खेत की ओर बढ़ रही थीं, अचानक एक कार आई। कार तेजी से उनके पास आकर रुकी। उसमें से दो युवक उतरे—पारस सोम और सुनील राजपूत, दोनों ठाकुर समाज के दबंग लड़के। दोनों ने रूबी को पकड़ लिया, उसे जबरन कार की ओर खींचने लगे।
मां सुनीता देवी ने विरोध किया। वो चीखने लगीं, मदद की गुहार लगाने लगीं। आसपास के खेतों में काम कर रहे लोग उनकी आवाज सुन रहे थे, लेकिन ठाकुरों का डर सबके मन में था। पारस ने एक हाथ में फरसा उठाया और सुनीता देवी पर वार कर दिया। सुनीता देवी जमीन पर गिर गईं, खून बहने लगा। रूबी को जबरन कार में बैठाकर दोनों युवक भाग गए।
कुछ दूरी पर सुनीता देवी का बेटा नरसी कुमार भी खेत की ओर आ रहा था। उसने मां को खून से लथपथ देखा, मदद के लिए चिल्लाया। आसपास के लोग इकट्ठा हुए, सुनीता देवी को अस्पताल ले जाया गया। लेकिन हालत गंभीर थी। अस्पताल में भर्ती होने के बाद सुनीता देवी ने बेटे को बताया—”रूबी को पारस सोम और सुनील राजपूत ले गए हैं, मुझे उन्होंने ही मारा है।”

गांव में मातम और गुस्सा
शाम होते-होते सुनीता देवी की मौत हो गई। गांव में मातम छा गया। दलित परिवार के रिश्तेदार, पड़ोसी, समाज के लोग इकट्ठा हो गए। गुस्सा इतना बढ़ गया कि अस्पताल के बाहर एंबुलेंस में तोड़फोड़ शुरू हो गई। पुलिस को बुलाया गया। एसपी देहात अभिजीत सिंह अपनी टीम के साथ पहुंचे, भीड़ को शांत करने की कोशिश की।
परिवार ने 24 घंटे का अल्टीमेटम दिया—”हत्यारों को गिरफ्तार करो, बेटी को बरामद करो।” पुलिस ने वक्त मांगा, लेकिन समय बीतता गया। 36 घंटे, 72 घंटे, और फिर 85 घंटे तक लड़की का कोई सुराग नहीं मिला। गांव में भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया। बाहरी लोगों का प्रवेश बंद कर दिया गया। कपसाड़ गांव छावनी बन गया।
राजनीतिक दबाव और प्रशासन की चुनौती
मामला सोशल मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, प्रिंट मीडिया पर वायरल हो गया। पूर्व मुख्यमंत्री मायावती, अखिलेश यादव, सांसद चंद्रशेखर आजाद ने ट्वीट कर निष्पक्ष कार्रवाई की मांग की। क्षेत्रीय विधायक अतुल प्रधान अपनी टीम के साथ पहुंचे, धरना दिया, परिवार को तसल्ली दी।
परिवार ने फैसला किया—”जब तक रूबी वापस नहीं आएगी, मां का अंतिम संस्कार नहीं करेंगे।” पुलिस प्रशासन के बड़े अधिकारी, आईजी, डीआईजी, एडीजी, मुख्यमंत्री, डीजीपी, सब पल-पल की रिपोर्ट ले रहे थे। परिवार को ₹1 लाख का चेक प्रशासन ने दिया, अखिलेश यादव ने ₹3 लाख की घोषणा की, विधायक ने भी आर्थिक मदद दी।
लड़की की तलाश और आरोपी की भागदौड़
पारस सोम रूबी को लेकर पहले मुजफ्फरनगर के खतौली पहुंचा, फिर दिल्ली गया, एक होटल में रुका, फिर गुरुग्राम, वहां दोस्त के पास रहा। गुरुग्राम से सहारनपुर के टपरी गांव गया, जहां अपनी बहन के पास रुका। लेकिन सोशल मीडिया पर मामला बढ़ता गया, पुलिस का दबाव बढ़ता गया।
10 जनवरी की शाम, हरिद्वार जा रही ट्रेन में पारस सोम बैठा था। ट्रेन में एक अजनबी से फोन मांगा, मेरठ के डॉक्टर राजेंद्र कुमार को कॉल किया—”मैं निकल गया हूं, हरिद्वार जा रहा हूं।” पुलिस ने उस नंबर को सर्विलांस पर लगा दिया। रुड़की स्टेशन पर पुलिस ने ट्रेन की बोगी घेर ली। पारस सोम और रूबी को गिरफ्तार कर लिया गया।
पूछताछ, बयान और कोर्ट की प्रक्रिया
रूबी को आशा ज्योति केंद्र में रखा गया, पारस सोम से छह घंटे तक पूछताछ हुई। मीडिया में खबर आई कि 11 जनवरी को कोर्ट में बयान होंगे। लड़की के बयान गोपनीय तरीके से बंद लिफाफे में लिए गए। कयास थे कि रूबी ने लड़के के पक्ष में बयान दिए हैं, लेकिन असली बयान सिर्फ मजिस्ट्रेट को पता थे।
कोर्ट में पेशी के दौरान पारस सोम रोते हुए बोला—”हमारा रिश्ता सच्चा है, हमने कोई अपराध नहीं किया। लड़की अपनी मर्जी से मेरे साथ आई थी।” लेकिन पुलिस की जांच में अपहरण और हत्या का मुकदमा चला। सुनील राजपूत और अन्य आरोपियों की भी गिरफ्तारी हुई।
प्यार, जाति और समाज की जटिलता
जांच में सामने आया कि रूबी और पारस सोम इंटर कॉलेज में साथ पढ़ते थे, तीन साल से प्रेम संबंध था। लड़की की मां को ऐतराज था, परिवार विरोध कर रहा था। पारस सोम जिद्दी स्वभाव का था, पहले भी अपने पिता पर हमला कर चुका था। उसने मां पर हमला किया, लड़की को लेकर भाग गया।
सांसद चंद्रशेखर आजाद बार-बार परिवार से मिलने की कोशिश कर रहे थे, ताकि लड़की पर कोई दबाव न बने, बयान बदलवाए न जाएं। पुलिस ने गांव को छावनी बना दिया, विपक्षी नेताओं को परिवार से मिलने नहीं दिया गया, आरोप लगे कि बीजेपी नेताओं को आसानी से गांव में प्रवेश मिला।
मीडिया, पुलिस और समाज की भूमिका
मामला हाईलाइट होने के बाद पुलिस पर दबाव बढ़ा, आखिरकार लड़की बरामद हो गई, आरोपी पकड़े गए। लेकिन सवाल बाकी रहे—क्या दलित परिवार को न्याय मिलेगा? क्या लड़की के बयान पर कोई दबाव नहीं होगा? क्या समाज में जाति का डर खत्म होगा?
इस घटना ने पूरे प्रदेश, बल्कि देश को झकझोर दिया। दलित परिवार की बेबसी, ठाकुर समाज का दबदबा, पुलिस की चुनौतियां, राजनीतिक दबाव, मीडिया की भूमिका—सबकुछ एक साथ सामने आया।
समाप्ति और संदेश
यह कहानी किसी को दुखी करने या भड़काने के लिए नहीं, बल्कि समाज को सचेत करने के लिए है। जाति, दबंगई, और सत्ता के खेल में आम इंसान की जिंदगी कितनी कठिन हो सकती है, यह घटना उसका उदाहरण है। हमें जागरूक रहना चाहिए, न्याय के लिए आवाज उठानी चाहिए, और समाज में बराबरी की लड़ाई लड़नी चाहिए।
जय हिंद। जय भारत।
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