मेरी बहू का सेल फोन बजा… और वह मेरे पति का नंबर था, जो छह साल पहले गुजर चुके थे!
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पहचान की लड़ाई
अध्याय 1: वो मंगलवार की शाम
गायत्री शर्मा, 64 वर्ष की, गाजियाबाद के वैशाली सेक्टर में अपने बेटे वरुण, बहू कृतिका और पोते आर्यन के साथ रहती थी। पति राजेंद्र शर्मा छह साल पहले दिल का दौरा पड़ने से चले गए थे। गायत्री ने अपने जीवन की अधिकांश कमाई, पेंशन और फिक्स्ड डिपॉजिट को संभाल रखा था। उसका 3 बीएचके फ्लैट, 35 लाख की एफडी और 42 हजार की पेंशन थी। परिवार की खुशहाली ही उसका सपना था।
एक मंगलवार की शाम, जब सब डाइनिंग टेबल पर बैठे थे, अचानक कृतिका के फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर नाम चमका: “राजेंद्र शर्मा”। गायत्री के हाथ से रोटी का टुकड़ा गिर गया। आर्यन खाना भूल गया। कृतिका का चेहरा घबराहट से सफेद पड़ गया। गायत्री ने पूछा, “यह कैसे?” कृतिका ने फोन काट दिया, मुस्कुराने की कोशिश की, “मां, बस गलती से नाम सेव हो गया था। बैंक वाले का नंबर है।” लेकिन गायत्री को यकीन नहीं हुआ।
रातभर गायत्री सो नहीं पाई। उसे पिछले तीन महीने की छोटी-छोटी बातें याद आने लगीं – कृतिका का बार-बार फोन लेकर दूसरे कमरे में जाना, देर रात तक फोन पर बातें करना, बैंक जाने के बहाने अकेले बाहर जाना।
अध्याय 2: शक की शुरुआत
अगली सुबह, जब कृतिका नहाने गई, उसका फोन किचन काउंटर पर पड़ा था। गायत्री ने देखा – सात मिस्ड कॉल्स, सभी “राजेंद्र शर्मा” नाम से। कुछ WhatsApp मैसेज थे – HDFC, ICICI, Bajaj Finserv से ईएमआई के नोटिफिकेशन। गायत्री का दिल बैठ गया। कृतिका ने कोई लोन लिया है? किस लिए?
गायत्री ने अपनी पुरानी पड़ोसन श्रीमती कपूर को सब बताया। उन्होंने सलाह दी, “गायत्री, या तो यह गलती से सेव हुआ नाम है, या कोई राजेंद्र जी की पहचान का गलत इस्तेमाल कर रहा है। टेलीकॉम ऑफिस जाओ, आधार से जुड़े नंबर चेक करवाओ।”
गायत्री अगले दिन BSNL ऑफिस गई। वहां कोई एक्टिव नंबर नहीं मिला। Airtel ऑफिस में पता चला कि राजेंद्र शर्मा के आधार से चार साल पहले एक नंबर एक्टिव हुआ था। गायत्री ने लिखित शिकायत दर्ज करवाई। LIC ऑफिस में पता चला कि कृतिका ने पॉलिसी क्लेम करने की कोशिश की थी, लेकिन नॉमिनी गायत्री ही थी।

अध्याय 3: सच की तलाश
गायत्री ने अपने बेटे वरुण से पूछा, “क्या तुम्हारे बिजनेस में कोई लोन चल रहा है?” वरुण ने कहा, “हां मां, 5 लाख का छोटा सा लोन है।” लेकिन बैंक स्टेटमेंट में 12 लाख का लोन दिखा। गायत्री ने अपने पुराने दोस्त एडवोकेट ओम प्रकाश मेहता से सलाह ली। उन्होंने कहा, “यह मामला आईपीसी की कई धाराओं के तहत अपराध है। लेकिन अगर आप पुलिस में केस नहीं करना चाहतीं, तो फैमिली मीटिंग बुलाइए।”
गायत्री ने वरुण से पूछा, “क्या तुम्हें पता है कि कृतिका ने पापा के नाम से लोन लिया है?” वरुण ने सिर झुका लिया, “मुझे लगा बस 5 लाख है।” गायत्री ने तय किया – अब सच सबके सामने आएगा।
अध्याय 4: फैमिली मीटिंग और आमना-सामना
शनिवार को गायत्री ने अपने भाई प्रमोद, ओम प्रकाश जी, कृतिका के माता-पिता, वरुण और कृतिका को घर बुलाया। आर्यन को पड़ोसन के घर भेज दिया। सब एक जगह बैठे। गायत्री ने सबूत दिखाए – रेंटल एग्रीमेंट, लोन एप्लीकेशन, प्रॉपर्टी ट्रांसफर ड्राफ्ट, फर्जी साइन, बैंक स्टेटमेंट।
कृतिका के मां-बाप हैरान थे। कृतिका रोने लगी। “मां, मैंने सिर्फ बिजनेस के लिए किया था। मेरा क्रेडिट स्कोर खराब था, तो पापा के डॉक्यूमेंट्स इस्तेमाल किए।” वरुण ने कहा, “मुझे पूरी जानकारी नहीं थी।”
गायत्री ने शर्तें रखी:
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सभी फर्जी अकाउंट, लोन, दस्तावेज 7 दिन में बंद किए जाएंगे।
₹18 लाख, जो वरुण ने तीन साल पहले लिए थे, तीन महीने में लौटाए जाएंगे।
फ्लैट के तीसरे बेडरूम में गायत्री की सहेली पूनम वर्मा किराए पर रहेंगी।
प्रॉपर्टी पूरी तरह गायत्री के नाम रहेगी, वसीयत आर्यन के नाम होगी।
भविष्य में कोई धोखाधड़ी या गलत व्यवहार हुआ तो पुलिस केस होगा।
सबने कांपते हाथों से साइन किए। ओम प्रकाश जी ने कागज नोटरी करवाने के लिए ले लिया।
अध्याय 5: नई शुरुआत
अगले हफ्ते कृतिका ने सारे फर्जी लोन अकाउंट बंद किए, रेंटल एग्रीमेंट रद्द किया, सिम कार्ड सरेंडर किया। वरुण ने दोस्तों से उधार लेकर पहले महीने के 6 लाख दिए। गायत्री ने अपने फ्लैट में पूनम वर्मा को बुला लिया। वह विधवा थीं, अकेली रहती थीं – अब दोनों का साथ अच्छा था।
गायत्री ने अपना जीवन फिर से जीना शुरू किया। टीचर्स एसोसिएशन से जुड़ी, एनजीओ में वालंटियर बनी, बुजुर्गों को कानूनी सलाह देने लगी। उसने अपनी कहानी साझा की – “जब कोई परिवार का सदस्य गुजर जाए तो सारे डॉक्यूमेंट्स सुरक्षित करें, सिम कार्ड सरेंडर करें, बैंक को सूचित करें।”
अध्याय 6: आत्मनिर्भरता और शिक्षा
गायत्री ने टेक्नोलॉजी सीखी – फोटो खींचना, Google ड्राइव पर अपलोड करना, कॉल रिकॉर्डिंग। उसने बुजुर्गों को सिखाया – “अपनी फाइनेंशियल इंडिपेंडेंस बनाए रखें, बच्चों को डॉक्यूमेंटेड लोन के रूप में दें, कानून को जानें।”
तीन महीने बाद वरुण ने ₹18 लाख लौटा दिए। गायत्री ने वसीयत बनवाई, संपत्ति आर्यन के नाम की। आर्यन अब भी गायत्री के पास आता था, उसे बहुत प्यार करता था।
एक दिन कृतिका आई, “मां, मुझे माफ कर दीजिए।” गायत्री ने कहा, “माफ कर दिया है, लेकिन भरोसा नहीं लौट सकता। तुम अपनी जिंदगी जियो, मैं अपनी।”
अध्याय 7: जीत और सबक
गायत्री ने अपने लिए लड़ाई लड़ी, अपनी पहचान और सम्मान बचाया। उसने एनजीओ की मीटिंग में कहा, “अगर आपके बच्चे ही धोखा दें, तो चुप मत बैठिए। अपने अधिकारों के लिए लड़िए। टेक्नोलॉजी सीखिए, कानून को जानिए। उम्र आपकी कमजोरी नहीं, अनुभव है।”
गायत्री अब स्वतंत्र आत्मनिर्भर महिला थी। उसका अपना घर, अपनी पेंशन, अपने दोस्त थे। वरुण और कृतिका अब सम्मान से बात करते थे। गायत्री ने उन्हें सिखा दिया कि वह कमजोर नहीं है।
एक युवा महिला ने पूछा, “आंटी, आपको डर नहीं लगा?” गायत्री ने मुस्कुराकर कहा, “डर तो लगा, लेकिन सच के लिए खड़े होना जरूरी था।”
अध्याय 8: अंतिम संदेश
गायत्री ने कहा, “जब कोई परिवार का सदस्य गुजर जाए, तो उनके सारे डॉक्यूमेंट्स सुरक्षित करें। सिम कार्ड सरेंडर करें, बैंक को सूचित करें। अपनी प्रॉपर्टी के ओरिजिनल पेपर बैंक लॉकर में रखें। फाइनेंशियल इंडिपेंडेंस बनाए रखें। टेक्नोलॉजी सीखें। कानून को जानें। और सबसे जरूरी, चुप मत रहिए।”
उस मंगलवार की शाम ने गायत्री को बदल दिया था। अब वह मजबूत थी, आत्मनिर्भर थी, और दूसरों को भी प्रेरित करती थी।
समाप्त
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