माँ, ठेला और हेलीकॉप्टर: 25 साल बाद लौटे तीन बेटे

प्रस्तावना

शहर के बाहरी हिस्से में एक पुराना सरकारी स्कूल था। उसकी इमारत जर्जर थी, दीवारों की पपड़ी उतर रही थी, और बरसात में छत टपकती थी। लेकिन उस स्कूल के बाहर हर सुबह एक ठेला लगता था, जिस पर दाल-रोटी की खुशबू उठती थी। ठेले के पीछे खड़ी रहती थी कमला देवी—एक साधारण, मेहनती औरत, जिसके चेहरे पर झुर्रियाँ थीं, लेकिन आँखों में अपनापन था।

कमला देवी की जिंदगी कभी आसान नहीं थी। उसका पति एक फैक्ट्री हादसे में चल बसा, कोई संतान नहीं थी, रिश्तेदारों ने कुछ दिन संवेदना जताई और फिर उसे अकेला छोड़ दिया। कमला ने रोना छोड़ दिया और जीना सीख लिया। पहले घर-घर जाकर बर्तन मांजे, फिर सिलाई की, और आखिर में सड़क किनारे ठेला लगाकर खाना बनाना शुरू किया। यही ठेला उसकी पहचान बन गया।

तीन अनाथ बच्चे

हर सुबह कमला देवी सूरज निकलने से पहले उठती, चूल्हा जलाती, दाल चढ़ाती और रोटियों का आटा गूंथती। स्कूल खुलने से पहले उसका ठेला गेट के सामने लग जाता। बच्चे आते, शोर मचाते, कोई हँसता, कोई रोता। लेकिन उन्हीं बच्चों के बीच तीन चेहरे ऐसे थे, जो रोज कमला देवी की नजरों में अटक जाते थे।

वे तीनों बच्चे लगभग एक ही उम्र के थे। कपड़े मैले, जूते टूटे, और आँखों में एक ऐसी भूख झलकती थी जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। स्कूल की छुट्टी के बाद वे गेट के पास खड़े होकर बाकी बच्चों के टिफिन झांकते रहते। कभी कोई बचा-खुचा फल मिल जाता, वही उनका खाना बनता।

पहले दिन कमला ने उन्हें देखा, दूसरे दिन भी देखा, तीसरे दिन उसका दिल नहीं माना। उसने ठेले से आवाज लगाई, “अरे बेटा, इधर आओ।” तीनों सहमे-सहमे पास आए। कमला ने नरम आवाज में पूछा, “रोज यहीं क्यों खड़े रहते हो?” सबसे बड़े बच्चे ने सिर झुकाकर कहा, “अम्मा, घर नहीं है। खाने को भी कुछ नहीं।”

यह सुनते ही कमला देवी का हाथ अपने आप दाल के भगोने की ओर बढ़ गया। उसने तीन कटोरियाँ निकाली और गरम दाल-रोटी परोस दी। बच्चे ऐसे खाने लगे जैसे कई दिनों बाद पेट भरने का मौका मिला हो। खाते वक्त न शर्म थी, न डर, बस भूख थी।

खाना खत्म हुआ तो सबसे छोटे बच्चे ने धीरे से पूछा, “अम्मा, कल भी मिलेगा?” कमला देवी ने बिना एक पल सोचे कहा, “हाँ बेटा, कल भी मिलेगा और रोज मिलेगा।”

माँ का नया अर्थ

यही वह दिन था जब कमला देवी की जिंदगी में माँ बनने का एक नया अर्थ जुड़ा। उसने उन बच्चों से कभी उनका असली नाम नहीं पूछा, बाद में खुद ही उन्हें नाम दे दिए—रोहन, मोहन और सोहन। उसके लिए नाम से ज्यादा जरूरी यह था कि वे रोज पेट भरकर स्कूल जाएँ।

कई बार ऐसा होता कि कमला के पास बस उतना ही खाना होता जितना बिक सकता था। उन दिनों वह ग्राहकों को मना कर देती और बच्चों को खिला देती। लोग ताना मारते, “बुढ़िया धंधा करने आई है या धर्मशाला खोल रखी है?” कमला बस मुस्कुरा देती। वह जानती थी कि भूखे पेट के सामने कोई ताना बड़ा नहीं होता।

समय बीतता गया। बच्चे बड़े होने लगे। स्कूल के बाद भी वे कमला के पास आते। कई बार रात हो जाती और वे वहीं ठेले के पास सो जाते। कमला उनके लिए चादर बिछा देती और खुद ठेले के नीचे बैठ जाती। बरसात के दिनों में वह उन्हें अपनी झोपड़ी में ले जाती। झोपड़ी छोटी थी, बारिश में टपकती थी, लेकिन वहाँ अपनापन था।

कमला देवी ने कभी खुद को उनकी माँ कहलाने की जिद नहीं की। लेकिन उन तीनों के लिए वह माँ ही थी। उसने उनकी फीस भरी, किताबें दिलाई और खुद कई बार भूखी रहकर उन्हें पढ़ाया। जब वे पढ़ाई में अच्छा करते, तो कमला का सीना गर्व से भर जाता। वही गर्व जो किसी माँ को अपने बच्चों को आगे बढ़ते देखकर होता है।

बच्चों का सफर

साल दर साल गुजरते गए। कमला की कमर झुकने लगी, हाथ काँपने लगे, ठेला अब रोज नहीं लग पाता था। एक दिन तीनों बच्चों ने उसके पैर छुए और कहा, “अम्मा, हमें बाहर पढ़ने का मौका मिला है।” कमला ने ज्यादा सवाल नहीं किए, बस उनके सिर पर हाथ रखा और कहा, “जहाँ भी रहो, ईमानदार रहना और किसी भूखे को कभी खाली हाथ मत लौटाना।”

उस दिन के बाद स्कूल के बाहर वह ठेला तो दिखता रहा, लेकिन वे तीन चेहरे नहीं दिखे। कमला कई बार गेट की ओर देखती, फिर खुद को समझा लेती, “बच्चे अपने रास्ते पर निकल गए हैं। यही तो हर माँ चाहती है।”

कमला को नहीं पता था कि समय हर एहसान का हिसाब रखता है और वह भी नहीं जानती थी कि 25 साल बाद उसी जिंदगी में एक ऐसा दिन आने वाला है जब उसके छोटे से घर के सामने आसमान से शोर करता हुआ एक हेलीकॉप्टर उतरेगा।

समय की नदी

समय कभी एक जैसा नहीं रहता। वह किसी के लिए धीरे चलता है, किसी के लिए बहुत तेज। कमला देवी के लिए समय एक ऐसी नदी बन चुका था जिसमें वह हर दिन चुपचाप उतरती और बिना शिकायत बहती चली जाती थी। स्कूल के बाहर लगने वाला ठेला अब पहले जैसा नहीं रहा था। कभी-कभी वह लगता, कभी-कभी नहीं। हाथों में अब पहले जैसी ताकत नहीं बची थी। आँखें धुंधली होने लगी थीं और पैरों में अक्सर दर्द रहता था।

लेकिन कमला देवी को इस सबसे ज्यादा तकलीफ इस बात की नहीं थी। उसे बस यही सुकून था कि जिन तीन बच्चों को उसने भूखा नहीं सोने दिया, वे अब अपनी जिंदगी के रास्ते पर निकल चुके थे।