मेरी बेटी ने कहा—‘आपका ना होना ही सबसे बड़ा गिफ्ट है।’मैं चली गई। और जाते वक़्त उसकी मेज़ पर जो चिट
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मेरी बेटी ने कहा—‘आपका ना होना ही सबसे बड़ा गिफ्ट है।’ मैं चली गई। और जाते वक्त उसकी मेज़ पर जो चिट्ठी छोड़ गई, वह सबको दंग कर दिया।
यह कहानी एक मां और बेटी के रिश्ते में एक बड़े बदलाव की है। एक ऐसी मां, जो अपने परिवार के लिए अपना सब कुछ देती है, लेकिन जब उसकी बेटी उसे छोड़ देती है, तब वह खुद को फिर से पहचानने की कोशिश करती है। यह कहानी हमें यह सिखाती है कि किसी के लिए जीने के बजाय, कभी-कभी खुद के लिए जीना जरूरी होता है।
कभी न खत्म होने वाला संघर्ष
मेरा नाम फाल्गुनी मेहरा है। मेरी उम्र 72 साल है और मैंने अपनी पूरी जिंदगी दूसरों के लिए जी। 30 साल तक दिल्ली के एक सरकारी अस्पताल में नर्स रही हूं। ईद हो, होली हो, दिवाली हो या नया साल, मेरा ज्यादातर समय अस्पताल की ड्यूटी पर ही बीतता था। डबल शिफ्ट, ओवरटाइम, रात भर जागना, बस यही मेरा जीवन था। मेरे जीवन का मकसद सिर्फ एक था— मेरी बेटी प्रिया की पढ़ाई पूरी हो, उसकी शादी अच्छे से हो और वह अपने पैरों पर खड़ी हो।
मेरे पति रमेश दत्ता सिविल कॉन्ट्रक्टर थे और उनकी भी जिंदगी बहुत मेहनत भरी थी। 30 साल की मेहनत से उन्होंने एक अच्छी खासी प्रॉपर्टी बनाई थी। उनका सपना था कि उनकी बेटी को हर सुख-सुविधा मिले। मैंने अपनी जिंदगी का अधिकांश समय यही सोचते हुए बिताया कि जब मेरी बेटी बड़ी होगी, तो मैं उसे वह सब दे पाऊंगी जो मैंने खुद कभी नहीं किया था।
लेकिन कभी कभी कुछ चीजें हमारे हाथ से फिसल जाती हैं, और हमें यह एहसास तब होता है जब बहुत देर हो चुकी होती है। मेरे पति की मौत एक हादसे में हो गई थी, और वह सब कुछ खत्म हो गया था, जिसे उन्होंने इतनी मेहनत से तैयार किया था। फिर मेरी जिंदगी सिर्फ एक मकसद पर केंद्रित हो गई— मेरी बेटी, प्रिया।
बेटी का बदलता व्यवहार
जब मेरी बेटी प्रिया छोटी थी, तब वह मुझसे बहुत प्यार करती थी। हर छोटी बात में मेरी मदद लेती थी। लेकिन शादी के बाद, उसकी शादी के बाद कुछ अजीब बदलाव आ गए थे। पहले वह मेरे पास आती थी, मुझसे बातें करती थी, लेकिन धीरे-धीरे उसने मुझसे दूरी बनानी शुरू कर दी। पहले वह मुझे अपनी परेशानियों के बारे में बताती थी, लेकिन अब वह सब कुछ अकेले करने लगी। उसकी बहू सिमरन भी कभी मुझे स्वीकार नहीं करती थी। वह हमेशा मुझसे दूरी बनाए रखती थी। कभी मेरे बनाए खाने की तारीफ नहीं करती थी, बस चुपचाप खा लेती थी।

शादी के बाद वह अपनी जिंदगी में बहुत बदल गई थी। अब वह बहुत व्यस्त रहती थी, और मुझे लगता था कि शायद यह सब नया होने के कारण था। लेकिन समय के साथ, मुझे यह समझ में आ गया कि अब वह मुझे उतना प्यार नहीं करती जितना पहले करती थी। मेरी बेटी ने मुझे बहुत ही बेदर्दी से यह कह दिया कि “आपका ना होना ही मुझे सबसे बड़ा तोहफा होगा।”
दिवाली की रात और दर्द
यह वाक्य मेरे दिल में एक गहरा घाव छोड़ गया। यह शब्द मुझे चुप कर गए, जैसे मेरे अंदर कुछ टूट गया हो। उस दिन दिवाली की रात थी। घर में रंग-बिरंगी मोमबत्तियां जल रही थीं, कोने में रंगोली बिखरी हुई थी, और सभी लोग हंसते-खिलते हुए थे। दामाद करण किस्से सुना रहा था और सब खा-पी रहे थे। मैं रसोई में खड़ी थी और हरी मटर की पुलाव की डिश हाथों में लिए बाहर जाने ही वाली थी, तभी मैंने प्रिया की आवाज सुनी, “करन, समझो ना, हर वीकेंड और हर त्यौहार मम्मी यहीं होती हैं, मुझे लगता है यह घर मेरा है ही नहीं। सांस नहीं ले पाती मैं।”
वह अपनी बात पूरी कर पाती कि करन ने उसकी बात को और भी तेज कर दिया। “लेकिन प्रिया, यह घर भी तो मम्मी ने ही लिया है, लोन क्लियर करवाया, डाउन पेमेंट दी तो क्या हुआ?”
प्रिया की आवाज तेज हो गई और वह कहने लगी, “कब तक मैं बेटी बनी रहूंगी? मुझे अपनी जिंदगी चाहिए। सबसे अच्छा तोहफा जो मम्मी मुझे दे सकती हैं, वह है कि वह बस चली जाए, गायब हो जाए, बस ना रहे मेरी जिंदगी में।”
यह सुनकर मेरे हाथ कांपने लगे। कांच का बर्तन हाथ से फिसलकर गिरने वाला था, लेकिन मैंने किसी तरह उसे संभाल लिया। मेरी सांसें भी रुकी हुई थीं। मैंने एक गहरी सांस ली और मुस्कान चेहरे पर चिपका दी।
मेरे लिए यह तोहफा था
आखिरकार मैंने तय किया कि मैं इस बात का जवाब नहीं दूंगी। अगले कुछ मिनटों में मैंने रोहित और सिमरन से कहा कि मुझे कुछ जरूरी काम है, और मैं घर चली जाऊंगी। मैंने घर का दरवाजा खोला और बाहर आ गई। गली के मोड़ से मुड़ी, लेकिन मुझे यह महसूस हुआ जैसे मैं खुद को खो चुकी थी। मेरा शरीर हल्का हो गया था, जैसे मैं कोई खोल हो जिसमें कुछ नहीं बचा।
घर पहुंचने पर मुझे एहसास हुआ कि यह वही घर था जिसमें मैंने अपने सपने संजोए थे। वह चार बेडरूम वाला घर, जिसमें एक समय मुझे यह विश्वास था कि मेरी बेटी हमेशा मेरे पास रहेगी। लेकिन अब यह घर मुझे अकेला महसूस हो रहा था।
मां का निर्णय और बदलाव
मैंने घर में सबसे पहले अपने पुराने वसीयत के कागजात निकाले और उस पर बदलाव किया। मैंने अपनी सारी संपत्ति को ट्रस्ट में ट्रांसफर कर दिया। और साथ ही एक पत्र लिखा, जिसमें मैंने प्रिया को बताया कि वह ना होना ही अब मेरे लिए सबसे बड़ा तोहफा है। मैंने उसे बताया कि मैंने उसका लोन पूरा चुका दिया है और वसीयत बदल दी है, ताकि उसकी उम्मीदें टूट जाएं।
मैंने उसे यह भी लिखा कि मैं अब उसके जीवन से पूरी तरह गायब हो रही हूं, क्योंकि अब मेरी जिंदगी सिर्फ अपने लिए है।
प्रिया का पछतावा
इसके बाद प्रिया को मेरी चिट्ठी मिली, और उसने महसूस किया कि उसने मुझसे जो कहा था वह कितनी बड़ी गलती थी। उसने मुझसे माफी मांगी, लेकिन मैं जान चुकी थी कि माफी का मतलब अब कुछ नहीं था। मैंने यह फैसला लिया कि मुझे खुद को फिर से पहचानने की जरूरत है।
निष्कर्ष
यह कहानी हमें यह सिखाती है कि जीवन में कभी किसी के लिए अपना सम्मान और पहचान नहीं खोनी चाहिए। रिश्ते में अगर सम्मान न हो, तो वह रिश्ता कभी भी सही नहीं हो सकता। कभी-कभी हमें खुद को बचाने के लिए फैसले लेने पड़ते हैं, भले ही वह हमारे लिए कठिन हों।
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