मेरी बेटी ने लिखा: “नए साल की पूर्व संध्या पर हमसे उम्मीद मत रखना। हम मेरे पति के माता-पिता के पास…
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“नए साल की पूर्व संध्या पर हमसे उम्मीद मत रखना। हम मेरे पति के माता-पिता के पास जा रहे हैं। वे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं…”
मेरे नाम गिरिजा गोस्वामी है। उम्र 76 साल। चंडीगढ़ के सेक्टर 22 के उसी दो बेडरूम के फ्लैट में रहती हूं, जिसमें पिछले 48 साल से हर खुशी, हर ग़म, हर रिश्ते की कहानी लिखी गई। 30 दिसंबर की शाम थी। मैं रसोई में खड़ी अपनी बेटी नीलम के पसंदीदा गाजर के हलवे के लिए गाजर कस रही थी। सोचा था, नए साल की पूर्व संध्या पर वह अपने पति व बेटे के साथ आएगी। तीन साल हो गए थे उसके पिता को गए हुए। यह पहला नया साल होता जब घर में थोड़ी रौनक होती। लेकिन तभी फोन पर उसका संदेश आया—”नए साल की पूर्व संध्या पर हमसे उम्मीद मत रखना। हम मेरे पति के माता-पिता के पास जा रहे हैं। वे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।”
मेरे हाथ से कद्दूकस गिर गया। गाजरें फर्श पर बिखर गईं। मैं वहीं खड़ी रह गई। बार-बार संदेश पढ़ती रही। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मेरी अपनी बेटी ने ऐसा कैसे लिखा। क्या मैं कम महत्वपूर्ण थी? जिसने उसे जन्म दिया, पाला, पढ़ाया, शादी कराई, उसके बच्चे के लिए लाखों रुपए दिए—वह मां कम महत्वपूर्ण थी?
पर उन्हें क्या पता था कि मैं कौन हूं। मैं गिरिजा गोस्वामी हूं। मैंने अपनी पूरी जिंदगी हिसाब-किताब रखते हुए बिताई है। हर पैसे का लेखाजोखा रखा है, हर कागज संभाला है। और जब सही समय आया, तो मैंने वह किया जो मुझे करना चाहिए था।
शुरुआत: एक मां, एक परिवार
नीलम मेरी इकलौती संतान है। उसका जन्म इसी घर में हुआ था। उस समय मैं 30 साल की थी। पति रमाना जी पोस्ट ऑफिस में काम करते थे। मध्यम वर्ग का परिवार था। इस फ्लैट को खरीदने के लिए दोनों ने मिलकर पैसा जमा किया था। नीलम जब पैदा हुई, तो मैंने तय कर लिया था कि उसे अच्छी शिक्षा दूंगी। खुद बीएससी गणित से की थी। घर पर छोटे पैमाने पर ट्यूशन शुरू की। धीरे-धीरे क्लास बढ़ी, पहचान बनी। रमाना जी की तनख्वाह से घर चलता था, मेरी ट्यूशन की कमाई पूरी तरह बचाई जाती थी।
हर महीने 56000 बचाती थी। 90 के दशक में यह बड़ी रकम थी। एक अलग खाता खोला था—नीलम के नाम पर। संयुक्त खाता, पर निकासी का अधिकार मेरे पास। दूसरा खाता उसकी शादी के लिए, तीसरा भविष्य के लिए। तीनों खातों में मैं प्राथमिक खाता धारक थी। नीलम का नाम था, पर पैसा निकालने का अधिकार मेरे पास।

बेटी का बदलना
नीलम बचपन में बहुत प्यारी थी। पढ़ाई में होशियार, मार्केटिंग में डिग्री ली, अच्छी कंपनी में नौकरी लगी। फिर मोहित से शादी हुई—निवेश बैंक में काम करता था। शादी में मैंने विवाह निधि खाते से 12 लाख निकाले, बाकी अपनी जमा पूंजी से 5 लाख लगाए। शादी के बाद नीलम और मोहित गुड़गांव में रहने लगे। शुरू में महीने में एक-दो बार आते थे। मैं उनके लिए खाना बनाती, बातें करती। फिर आरुष का जन्म हुआ। पोते की देखभाल के लिए 3 महीने गुड़गांव में रही। वे दिन बहुत अच्छे थे।
धीरे-धीरे बदलाव आने लगा। मोहित की नौकरी में तरक्की हुई, आमदनी बढ़ी, बड़े अपार्टमेंट में शिफ्ट हुए, महंगी गाड़ियां, महंगे कपड़े, विदेश यात्राएं। नीलम का आना कम होता गया। पहले महीने में दो बार, फिर महीने में एक बार, फिर दो महीने में एक बार, फिर फोन पर ही बात। “मां बहुत व्यस्त हूं, अगले महीने आऊंगी।”
पति की बीमारी, अकेलापन और बेटी की दूरी
रमाना जी को मधुमेह था। फिर लिवर में समस्या आ गई। अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। नीलम को फोन किया—”बेटा, पापा की तबीयत खराब है, आ सकती हो?” “मां, बहुत जरूरी मीटिंग है, अगले हफ्ते आऊंगी।” अगला हफ्ता आया, फिर बहाना। एक महीना बीत गया। रमाना जी अस्पताल में थे, मैं अकेले ही सब संभाल रही थी। डॉक्टरों से बात, दवाइयां, रात-रात भर जागना। फिर उनकी हालत बहुत बिगड़ गई। “बेटा, जल्दी आ जाओ।” “मां, ट्रैफिक बहुत है।” रमाना जी शाम को चले गए। नीलम रात को 9 बजे पहुंची, जब सब खत्म हो चुका था।
अंतिम संस्कार के बाद तीन दिन में नीलम व मोहित वापस चले गए। “मां, ऑफिस जॉइन करना है। लीव खत्म हो गई है। तुम ठीक हो ना?” मैं अकेली रह गई। उसके बाद के महीने बहुत कठिन थे। अकेलापन भारी था। पर खुद को संभाला। ट्यूशन फिर से शुरू करने की सोची, पर अब उतनी ताकत नहीं थी। शांत जीवन स्वीकार किया।
त्योहार, जन्मदिन और उपेक्षा
दिवाली आई। सोचा नीलम आएगी। पर उसका फोन—”मां, मोहित के माता-पिता के यहां जा रहे हैं। दिल्ली में बुला रहे हैं।” “बेटा, मेरे पास नहीं आ सकती?” “मां, अगली बार आऊंगी। पैसे भेज देती हूं, कुछ अच्छा बना लेना।” ₹5000 ट्रांसफर कर दिए। मुझे पैसों की जरूरत नहीं थी। पर यह उसका तरीका था मुझे खामोश कराने का।
75वां जन्मदिन आया। कोई फोन नहीं आया। शाम को 7 बजे संदेश—”हैप्पी बर्थडे मां। सॉरी, भूल गई थी। बहुत व्यस्त थी।” मैं उस दिन बहुत रोई। पर अगले दिन अपने आंसू पोंछे और सोच लिया, अब मुझे सोचना होगा।
मां की संपत्ति, बेटी की नजर
मैंने अपने सभी कागजात निकाले—बैंक की पासबुक, प्रॉपर्टी के कागजात, फिक्स्ड डिपॉजिट की रसीदें। सेक्टर 22 के फ्लैट के अलावा सेक्टर 35 में एक और छोटा फ्लैट था—20 साल पहले खरीदा, अब किराए पर था। हर महीने ₹15,000 किराया। ₹3 लाख की फिक्स्ड डिपॉजिट, ट्यूशन की कमाई, तीन खाते—शिक्षा के लिए ₹8,43,000, शादी के लिए 4 लाख, भविष्य के लिए ₹18,66,000। कुल मिलाकर नीलम के नाम पर 30 लाख से ज्यादा, पर निकासी का अधिकार मेरे पास।
नीलम को लगता था कि यह उसका है, उसका हक है।
बेटी की मांग—प्रॉपर्टी ट्रांसफर, पैसे दो
उसका फोन आया—”मां, प्रॉपर्टी का क्या प्लान है?”
“क्या मतलब?”
“मतलब यह फ्लैट तुम्हारे नाम पर है, दूसरा भी। क्यों ना तुम इसे मेरे नाम ट्रांसफर कर दो? टैक्स बेनिफिट होगा।”
“नीलम, मैं अभी जिंदा हूं। मुझे इस घर में रहना है।”
“बस नाम बदल जाएगा, भविष्य में आसानी होगी।”
“मुझे सोचना होगा।”
“मां, तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं है?”
“यह भरोसे की बात नहीं है। यह मेरी प्रॉपर्टी है।”
फिर आरुष की विदेश में पढ़ाई के लिए 15 लाख मांगे। “मां, तुम्हारे पास फिक्स्ड डिपॉजिट है, तोड़ सकती हो। मेरे खुद के खर्चे हैं।”
“मां, तुम्हारे कितने खर्चे हैं? तुम अकेली हो। और यह पैसा तो आखिर में मुझे ही मिलेगा। अभी दे दो।”
“नीलम, यह तरीका बात करने का सही नहीं है।”
“मैं तुम्हारी इकलौती बेटी हूं, यह मेरा हक है।”
मां का फैसला—खाते बंद, वसीयत बदली
मैंने वकील श्रीवास्तव जी से सलाह ली। उन्होंने कहा—”जब तक आप जिंदा हैं, यह सब आपका है।”
मैंने तीनों खाते बंद कर दिए। पैसे अपने मुख्य खाते में ट्रांसफर कर दिए।
फिर अपनी वसीयत बनवाई—सारी संपत्ति, घर, फ्लैट, फिक्स्ड डिपॉजिट, सब एक शैक्षिक ट्रस्ट को जाएगी। ट्रस्ट गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा देगा। नीलम को सिर्फ 5 लाख मिलेंगे।
बेटी का पछतावा, मां का आत्मसम्मान
नीलम ने फोन किया, मैसेज किए, घर आई। “मां, तुमने खाते बंद कर दिए, यह तुम्हें कैसे हक है?”
“मैं प्राथमिक धारक थी। मेरी मेहनत के पैसे थे।”
“पर वे पैसे मेरे थे।”
“नहीं, नीलम, वे पैसे मेरे थे। मैंने तुम्हारे भविष्य के लिए बचाए थे। अब मुझे लगता है कि यह गलत था।”
मोहित बोला, “मम्मी जी, हमें उन पैसों की जरूरत थी।”
“मोहित बेटे, तुम दोनों की सालाना आय कितनी है?”
“करीब 50 लाख।”
“और तुम्हें 30 लाख की इतनी सख्त जरूरत है कि बिना पूछे खातों से पैसे निकालने शुरू कर दिए?”
नीलम रोने लगी। “मां, हमने सोचा था कि वे पैसे वैसे भी मेरे हैं।”
“नहीं नीलम, तुमने सोचा कि मैं कमजोर हूं।”
मैंने वसीयत दिखाई। “मेरी सारी संपत्ति शैक्षिक ट्रस्ट को जाएगी। तुम्हें सिर्फ 5 लाख मिलेंगे।”
ससुराल वालों का सामना
मोहित के माता-पिता आ गए। उन्हें सब बताया। मोहित के पिता बोले, “आपने बिल्कुल सही किया। जब तक आप जिंदा हैं, सब कुछ आपका है। बच्चों का कोई हक नहीं है।”
नीलम रोने लगी। “मां, मुझे माफ कर दो। मैं बदल जाऊंगी।”
“नीलम, मैं तुम्हें माफ करती हूं, पर अपना फैसला नहीं बदलूंगी।”
रिश्तों की नई शुरुआत
नीलम अब महीने में दो बार आती है। आरुष को लेकर आती है। हम साथ में खाना खाते हैं, बातें करते हैं। मैं उसे गणित के ट्रिक्स सिखाती हूं। धीरे-धीरे चीजें सुधरने लगीं। पर मैंने अपनी वसीयत नहीं बदली। मेरी संपत्ति शैक्षिक ट्रस्ट को जाएगी। नीलम को सिर्फ 5 लाख मिलेंगे। यही मेरा फैसला है।
सीख और संदेश
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अपनी मेहनत की कमाई को संभाल कर रखो।
बच्चों को सब कुछ आसानी से मत दो, वे उसकी कदर नहीं करेंगे।
अगर कोई अपमान करे तो चुप मत रहो, चाहे वह अपना बच्चा ही क्यों ना हो।
अपनी इज्जत और स्वाभिमान कभी मत खो।
उम्र बढ़ने का मतलब कमजोर होना नहीं है।
आज जब मैं अपने अध्ययन कक्ष में बैठती हूं, मुझे शांति मिलती है। दीवारों पर छात्रों की तस्वीरें हैं। पड़ोस के गरीब बच्चों को मुफ्त पढ़ाती हूं। मेरा जीवन अर्थपूर्ण है। नीलम अब महीने में तीन-चार बार आती है। हमारा रिश्ता स्वस्थ है, सीमाएं हैं, सम्मान है। अब मुझे किसी से कोई उम्मीद नहीं है। मैं खुद से खुश हूं, अपने आप में पूर्ण हूं।
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जय हिंद।
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