मेरे दामाद ने मेरी बेटी पर जूते पोंछे और मेहमानों से कहा कि वह एक पागल नौकरानी है…
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1. एक माँ की आंखों के सामने अपमान
जब मैंने अपनी बेटी निशा की पीठ पर उसके पति समीर को जूते पोंछते देखा, मेरे हाथ कांप गए। निशा, फर्श पर दरवाजे के पास फटी सलवार, गंदे कपड़े, बिखरे बालों में लेटी थी। समीर ने अपने महंगे जूते उसकी पीठ पर रगड़े और मेहमानों से हँसते हुए कहा, “यह हमारी पागल नौकरानी है। बीच-बीच में ऐसी हरकतें करती है।”
आठ लोग डाइनिंग टेबल पर बैठे थे। सब हँस रहे थे। किसी ने नहीं पूछा कि यह नौकरानी कौन है, क्यों सो रही है यहाँ? मेरी इकलौती बेटी, जिसे मैंने 28 साल अपने खून-पसीने से पाला था। पर उन्हें क्या पता था कि मैं कौन हूँ? समीर को क्या पता था कि जिस साधारण माँ को उसने नजरअंदाज किया, वह 28 साल से हर महीने 500 से ज्यादा खातों का ऑडिट करती है। मुझे जाली दस्तखत पहचानने में 15 सेकंड लगते हैं। मुझे पता है कि धोखाधड़ी के कागजात कैसे दिखते हैं। और अब वक्त आ गया था सब कुछ खत्म करने का।
2. बीते दिन – शादी, संघर्ष और अकेलापन
मेरा नाम अर्चना भट्ट है। मैं 53 साल की हूँ। लखनऊ के गोमती नगर में रहती हूँ। मेरे पति राजीव का तीन साल पहले निधन हो गया। किडनी फेल हो गई थी। 8 महीने तक डायलिसिस चला, हॉस्पिटल के चक्कर, दवाइयाँ, इलाज – सब खर्च हो गया था। निशा मेरी इकलौती बेटी है। उसकी शादी समीर से हुई थी – रियल एस्टेट का काम बताता था, बड़ी धूमधाम से शादी की थी। मैंने अपनी ज्यादातर जमा पूंजी लगा दी थी उस शादी में। राजीव की बीमारी के बाद बस एक छोटी सी एफडी बची थी।
मैं सीनियर अकाउंटेंट हूँ – गुप्ता मेटल वर्क्स में। 28 साल से काम कर रही हूँ। मेरा काम है 500 से ज्यादा कर्मचारियों के खातों का ऑडिट करना। मुझे कागजात पढ़ना आता है, दस्तखत पहचानना आता है, धोखे को पकड़ना आता है। मगर उस शाम जब मैंने अपनी बेटी को फर्श पर देखा, सब धुंधला पड़ गया। बस एक माँ बची थी मैं – जिसकी बेटी को किसी ने नौकरानी बना दिया था।
3. अपमान और झूठ – समीर की चालें
मैंने समीर से कहा, “मैं निशा को ले जा रही हूँ।” समीर मुस्कुराया, “मम्मी जी, परेशान मत होइए। यह उसकी दवाइयों का असर है। डॉक्टर ने नई दवा दी है। कुछ दिन में सब ठीक हो जाएगा।” मैंने पूछा, “कौन सी दवा?” – “साइकेट्रिस्ट की दवा, निशा को कभी-कभी अजीब हरकतें होती हैं।”
मैंने निशा को हिलाया – वो नहीं उठी। गहरी नींद में थी या बेहोश? मुझे समझ नहीं आ रहा था। मैंने कहा, “मैं इसे अभी डॉक्टर के पास ले जा रही हूँ।” समीर का चेहरा सख्त हुआ, “मम्मी जी, आप सीन मत बनाइए। निशा मेरी पत्नी है, मैं उसका ख्याल रखता हूँ।”
मैं उठी, समीर को सीधे आंखों में देखा, “मैं कल आऊंगी। सुबह 10:00 बजे। अगर निशा ठीक नहीं मिली तो मैं पुलिस के साथ आऊंगी।” समीर हँसने की कोशिश की, मगर उसकी आंखों में एक पल के लिए डर दिखा।

4. माँ की चिंता और बेटी का डर
रात भर मैं सो नहीं पाई। खिड़की के पास खड़ी रही, राजीव के लगाए बगीचे को देखती रही। अगले दिन समीर के घर गई। निशा ठीक लग रही थी – नहाई-धोई, साड़ी पहने, मुस्कुरा रही थी। “मां आ गई तुम। आओ ना अंदर।” समीर ऑफिस के लिए तैयार हो रहा था। “मम्मी जी देखिए, निशा बिल्कुल ठीक है। कल ज्यादा थक गई थी, मेहमानों के लिए खाना बना रही थी पूरा दिन।”
मैंने निशा से पूछा, “तुम ठीक हो?” – “हां मां, बिल्कुल। तुम परेशान क्यों हो? कल सिर दर्द था, दवा खा ली, नींद आ गई।” उसकी आंखों में डर था। समीर ऑफिस चला गया। मैं निशा के साथ रसोई में चाय पीने बैठी। “निशा, सच बता, सब ठीक है ना?” – “हां मां, समीर बहुत अच्छा ख्याल रखता है।”
किचन काउंटर पर दवाई की शीशी दिखी – साइकेट्रिक दवा थी, मगर एक्सपायर हो चुकी थी। समीर ने कहा था – “नई दवा कल रात को।” मुझे समझ आ गया – समीर झूठ बोल रहा था, मेहमानों के सामने एक नाटक था।
5. घरेलू हिंसा के संकेत – नीला निशान और टूटे सपने
शादी के बाद के पहले 6 महीने सब सामान्य लगे। निशा खुश थी। मगर धीरे-धीरे सब बदलने लगा। निशा कम फोन करने लगी। एक दिन उसके हाथ पर नीला निशान देखा – “गिर गई थी मां, किचन में।” समीर बोला, “इन्हें ध्यान नहीं रहता।”
एक महीने बाद निशा मेरे घर आई – उसकी आंखों में सूजन थी। “समीर का मूड खराब था। ऑफिस में प्रॉब्लम है, पैसों की तंगी है।” मुझे शक हुआ – समीर तो कहता था बिजनेस अच्छा चल रहा है। मैंने डायरी निकाली, हर छोटी बात, तारीख, घटना लिखनी शुरू की। 28 साल का अनुभव था – जब कुछ गलत होता है, संकेत मिलते हैं।
6. समीर का असली चेहरा – कर्ज, जुआ और धोखाधड़ी
दो महीने बाद समीर का फोन आया – “मम्मी जी, एक बहुत बड़ा प्रॉपर्टी डील कर रहा हूँ, इन्वेस्टमेंट चाहिए, बस 15 लाख।” मैंने कहा, “समीर, मेरे पास पैसे नहीं हैं।” – “आपकी तो एफडी है, घर है, गिरवी रख सकती हैं।”
मैंने ऑफिस के वकील राघव त्रिवेदी से बात की। राघव जी ने समीर का बैकग्राउंड चेक किया – कोई रजिस्ट्रेशन नहीं, लाइसेंस नहीं, 47 लाख का कर्ज, सारी प्रॉपर्टी मोर्टगेज, कुछ उसके नाम पर भी नहीं। समीर एक धोखेबाज था।
7. सबूत इकट्ठा करना – जासूसी और रिकॉर्डिंग
समीर ने लीगल नोटिस भेजा – “निशा ने मानसिक रूप से अस्वस्थ होने की वजह से पावर ऑफ अटॉर्नी दे दी है।” कागजात में निशा के दस्तखत थे – मगर असली नहीं। मैंने वॉइस रिकॉर्डर निशा के घर छुपा दिया। रिकॉर्डिंग में समीर की आवाज – “तुम्हारी मां के पास जो है, वह तुम्हारा है, मतलब मेरा।”
मैंने समीर को फॉलो किया, सट्टेबाज के ठिकाने की तस्वीरें लीं, बैंक से अकाउंट डिटेल निकलवाई – पिछले 6 महीने में लाखों रुपये जुए में हार दिए। निशा को सबूत दिखाए – वह टूट गई, “मां, मैंने गलती की।”
8. निर्णायक रात – डिनर पार्टी और पुलिस की कार्रवाई
एक दिन निशा ने फोन किया – “समीर ने निवेशकों को डिनर पर बुलाया है, मुझे किचन में रहना है।” मैं तैयार हो गई, राघव जी से बात की – “अब समय आ गया है।”
डिनर वाले दिन मैं शाम 7:00 बजे पहुंची। दरवाजा मेहमान ने खोला। हॉल में आठ लोग बैठे थे। समीर मेज के सिर पर था। “मम्मी जी, आप यहां?” – “निशा से मिलने आई हूँ।” दरवाजे के पास निशा फटे कपड़ों में फर्श पर सोई थी। समीर ने उसके जूते उसकी पीठ पर पोंछे – “यह पागल नौकरानी है।”
मैंने फोन निकाला, पुलिस को बुलाया। 10 मिनट बाद राघव जी और दो पुलिस वाले पहुंचे। समीर का चेहरा पीला पड़ गया। राघव जी ने फाइल खोली – “पावर ऑफ अटॉर्नी के कागजात, फॉरेंसिक रिपोर्ट, बैंक स्टेटमेंट, जुए के सबूत, वॉइस रिकॉर्डिंग।”
पुलिस इंस्पेक्टर ने समीर को गिरफ्तार किया – “घरेलू हिंसा, जाली दस्तखत, धोखाधड़ी।” समीर चिल्लाया – “मम्मी जी, आप यह नहीं कर सकतीं।” मैंने कहा – “निशा मेरी बेटी है, मैं उसे बचाने के लिए कुछ भी कर सकती हूँ।”
9. न्याय और नई शुरुआत
निशा मेरे घर आई। मैंने उसे नहलाया, खाना खिलाया। वह बहुत रोई। कोर्ट के चक्कर शुरू हुए। समीर को 3 दिन की पुलिस कस्टडी मिली। उसके घर से और भी सबूत मिले। निवेशकों ने केस किए। कोर्ट ने निशा को प्रोटेक्शन ऑर्डर दिया, समीर उसके पास नहीं आ सकता था। तलाक के कागजात दाखिल किए। समीर के मां-बाप ने माफी मांगी – “शादी के बाद सुधर जाएगा” सोचते रहे, मगर निशा को सजा मिली।
समीर को बेल नहीं मिली, कर्जदार पीछे पड़े, बिजनेस पार्टनर्स ने केस कर दिए। समाज में उसकी असलियत सबको पता चल गई। सोसाइटी ने एंट्री बैन कर दी। अखबारों में खबर छपी – “रियल एस्टेट ब्रोकर की धोखाधड़ी का भंडाफोड़।”
10. माँ-बेटी की जीत – आत्मबल और संदेश
निशा धीरे-धीरे ठीक हुई। काउंसलिंग ली, मेरी कंपनी में असिस्टेंट अकाउंटेंट की पोस्ट पर काम शुरू किया। 6 महीने बाद कोर्ट ने तलाक मंजूर किया। समीर को 3 साल की सजा हुई। निशा अब मेरे साथ रहती है। हम दोनों साथ ऑफिस जाते हैं, साथ घर आते हैं। निशा हँसती है, बातें करती है, सपने देखती है। उसे प्रमोशन मिला – अब वह जूनियर अकाउंटेंट बन गई है।
एक दिन निशा ने कहा, “मां, थैंक यू। मुझे बचाने के लिए।” मैंने उसका हाथ पकड़ा, “बेटा, एक मां अपनी बेटी के लिए कुछ भी कर सकती है। यह सिर्फ फर्ज नहीं था, यह लड़ाई थी, जो हमें लड़नी थी – और हम जीते।”
11. सीख – सबूत, कानून और माँ की ताकत
मैंने सीखा –
कभी किसी को कमजोर मत समझिए, खासकर उन औरतों को जो चुपचाप अपना काम करती हैं।
हर चीज का सबूत रखना जरूरी है – कागजात, रिकॉर्डिंग, सब कुछ।
हार मत मानिए, अगर आप सच के साथ हैं, तो जीत सकते हैं।
माँ की ताकत को कभी कम मत आंकिए।
आज मैं अपने घर में बैठी हूँ, निशा मेरे पास है, मेरी एफडी सुरक्षित है, मेरा फ्लैट मेरे नाम पर है। राजीव की तस्वीर को देखती हूँ – “देखो, हमारी बेटी ठीक है। जिसने उसे तकलीफ दी थी, उसे सजा मिल गई।” मुझे पता है, राजीव गर्व से मुस्कुरा रहे होंगे।
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