मेरे बेटे ने अपनी पत्नी को कैंसर से बचाया। वह बच गई, फिर बोली: “मैं किसी गरीब आदमी के साथ नहीं रहना…
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मेरा नाम सुलेखा गोस्वामी है। उम्र 67 साल। मैं जयपुर के वैशाली नगर में रहती हूं। मेरे जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा तब आई जब मेरे बेटे निखिल ने अपनी पत्नी रतिका को कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से बचाने के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया, लेकिन बदले में उसे सिर्फ धोखा मिला।
शुरुआत: एक आम परिवार
30 साल पहले मैंने और मेरे पति राम प्रसाद गोस्वामी ने एक छोटा सा फ्लैट खरीदा था। पति सरकारी नौकरी में थे, मैं प्राइवेट नर्सिंग होम में एडमिनिस्ट्रेटर और अकाउंटेंट थी। दो बीएचके फ्लैट, थोड़ी बचत, प्रोविडेंट फंड, एलआईसी की दो पॉलिसी, और एक बेटा निखिल—यही मेरी दुनिया थी।
निखिल, 35 साल का, सॉफ्टवेयर इंजीनियर, अच्छी नौकरी, महीने के 60,000 की सैलरी। चार साल पहले उसकी शादी रतिका सिंघानिया से हुई। रतिका सुंदर, स्मार्ट, एमबीए, प्राइवेट कंपनी में मार्केटिंग मैनेजर, 30,000 महीने की सैलरी। हमें लगा, अच्छा रिश्ता है। शादी के बाद दोनों मेरे साथ रहने लगे। परिवार में प्यार था, अपनापन था।
कैंसर का साया
एक रात सब बदल गया। डेढ़ साल पहले मार्च का महीना था। रतिका ने बताया कि उसकी छाती में गांठ है। डॉक्टर ने बायोप्सी की, रिपोर्ट आई—ब्रेस्ट कैंसर स्टेज थ्री। उस रात रतिका रो रही थी, निखिल सन्न था, मैं रसोई में खड़ी दीवार का सहारा लिए कांप रही थी। अगले दिन हम अस्पताल गए। डॉक्टर अनिल सिंघानिया, रतिका के पिता, खुद भी डॉक्टर थे। उन्होंने बड़े प्राइवेट अस्पताल में इलाज शुरू करवाया—कीमोथेरेपी, रेडिएशन, ऑपरेशन। इलाज की लागत—₹1 करोड़।
मैंने 18 साल अस्पताल में काम किया है। मुझे पता था कि स्टेज 3 ब्रेस्ट कैंसर का इलाज 30-40 लाख में हो जाता है, लेकिन बेटे की पत्नी की जान का सवाल था। पैसे की बात कौन करता है ऐसे वक्त पर?

पैसे का इंतजाम
निखिल की कंपनी में इंश्योरेंस पॉलिसी थी, लेकिन कैंसर के लिए सिर्फ 60% कवरेज थी। यानी 1 करोड़ के इलाज में 60 लाख इंश्योरेंस देती, बाकी 40 लाख खुद देने थे। निखिल के पास 12 लाख की सेविंग थी। रतिका के पिता ने 10 लाख दिए। बाकी पैसों के लिए निखिल ने अपना गुड़गांव वाला फ्लैट बेचा—35 लाख मिले। गाड़ी बेची—8 लाख मिले। मेरी एफडी तुड़वाई—15 लाख। एलआईसी की पॉलिसी सरेंडर की—7 लाख। फ्लैट पर लोन लिया—₹23 लाख। कुल मिलाकर ₹1 करोड़ जुटा लिए गए।
इलाज शुरू हुआ। रतिका बड़े अस्पताल में भर्ती हुई। 14 महीने तक कीमोथेरेपी, ऑपरेशन, रेडिएशन। हर महीने मोटे-मोटे बिल आते। निखिल रात-दिन उसकी सेवा करता। मैं घर संभालती, खाना बनाती, अस्पताल में डिब्बा पहुंचाती। बहू की जान बचाना सबसे जरूरी था।
इलाज के बाद: बदलता व्यवहार
14 महीने बाद रतिका ठीक हो गई। कैंसर खत्म हो गया। डॉक्टर ने कहा, “आप बिल्कुल स्वस्थ हैं।” हम सबने मंदिर में माथा टेका। निखिल की आंखों में आंसू थे। रतिका मुस्कुरा रही थी। मुझे लगा, भगवान का शुक्र है। बहू बच गई।
लेकिन ठीक होने के एक हफ्ते बाद रतिका का व्यवहार बदल गया। ऑफिस जाना शुरू किया। घर आकर चुप रहती। फोन पर लगी रहती, कमरे में दरवाजा बंद कर लेती। एक दिन देखा, वह अपना सामान अलग-अलग करके रख रही थी—कपड़े, ज्वेलरी। मैंने पूछा, “क्या कर रही हो बेटा?” उसने कहा, “कुछ नहीं मां।”
फिर एक रविवार की शाम, रतिका ने बम गिरा दिया। “मुझे तलाक चाहिए।” निखिल हंस पड़ा, “मजाक कर रही हो?” रतिका बोली, “नहीं, मैं सीरियस हूं। मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकती। मैं किसी गरीब आदमी के साथ नहीं रह सकती।” निखिल की आंखें भर आईं। “मैंने तुम्हारे लिए सब कुछ छोड़ दिया।” रतिका बोली, “हां, पर अब तुम्हारे पास कुछ नहीं है। तुम्हारी नौकरी भी छूट गई। अभी फ्रीलांसिंग कर रहे हो। मैं ऐसी जिंदगी नहीं जी सकती।”
धोखा और आरोप
रतिका ने अपने कपड़े, ज्वेलरी सब पैक करके अपने माता-पिता के घर भेज दिया। “मैं जा रही हूं। तलाक के कागजात भेजूंगी।” निखिल टूट गया। महीनों डिप्रेशन में रहा। ऑफिस नहीं गया। फ्रीलांसिंग छोड़ दी। बस अपने कमरे में बंद रहता।
दो महीने बाद रतिका ने तलाक का नोटिस भेजा। म्यूचुअल कंसेंट से तलाक लेने की मांग की। निखिल ने इंकार कर दिया। “मैं तलाक नहीं दूंगा। मैंने उसे बचाया है।” रतिका ने 498A के तहत दहेज उत्पीड़न का केस कर दिया। पुलिस ने नोटिस भेजा। निखिल को थाने बुलाया। घंटों पूछताछ की गई।
सच्चाई की खोज
मुझे गुस्सा आया। मैंने फैसला किया, सच्चाई निकालूंगी। निखिल के कमरे में पुराने सामान के बॉक्स में रतिका के इलाज के सारे कागजात थे। मैंने हर बिल, हर रसीद, इंश्योरेंस क्लेम फॉर्म पढ़ा। पता चला, इलाज की असली कीमत 40 लाख थी। इंश्योरेंस से 60 लाख मिले थे। यानी हमने 1 करोड़ दिए, लेकिन असल में 60 लाख का फर्जी खेल हुआ था।
मैंने अपने पुराने दोस्त राजीव भट्ट से संपर्क किया, जो इंश्योरेंस कंपनी में इन्वेस्टिगेटर था। उसने जांच शुरू की। अस्पताल के रिकॉर्ड निकाले। पाया कि दवाइयां, टेस्ट, डॉक्टर फीस—सब ओवरचार्जिंग, फर्जी। कुछ दवाइयां दी ही नहीं गई थीं, कुछ टेस्ट हुए ही नहीं थे।
साजिश का खुलासा
राजीव भाई ने बताया, “सुलेखा जी, यह साफ फ्रॉड है। इंश्योरेंस कंपनी को पता चला तो केस होगा।” मैंने महिला वकील मीना अय्यर से संपर्क किया। उसने कहा, “यह इंश्योरेंस फ्रॉड है। क्रिमिनल केस बनता है। शिकायत दर्ज करवाएं तो 7 साल तक की सजा हो सकती है।”
मैंने रतिका की सहेली से बात की। पता चला, रतिका का अफेयर अमन नाम के आदमी से है, जो उसी के ऑफिस में काम करता है। अमन शादीशुदा है, पत्नी को छोड़ चुका है। रतिका उसी के साथ रहने लगी है।
फिर पता चला, रतिका के पिता डॉक्टर अनिल सिंघानिया पहले भी इंश्योरेंस फ्रॉड में फंस चुके हैं। पैसे देकर सेटल कर लिया था। अब समझ आया, यह उनका धंधा है—मरीजों के इलाज में फर्जी बिल बनाना, इंश्योरेंस से पैसे एंठना, और अपनी ही बेटी के इलाज का इस्तेमाल करके मेरे बेटे को लूटना।
अदालत में सच्चाई
तीन महीने बाद मेरे पास सबूत थे। तलाक और दहेज उत्पीड़न का केस फैमिली कोर्ट में चल रहा था। सुनवाई के दिन मैंने निखिल से कहा, “बेटा, आज कोर्ट में तुम चुप रहना। मैं संभाल लूंगी।” कोर्ट में रतिका, उसके माता-पिता, नया बॉयफ्रेंड अमन, वकील सब थे।
रतिका के वकील ने कहा, “मेरी क्लाइंट को शादी के बाद से प्रताड़ित किया गया, दहेज मांगा गया, कैंसर के इलाज के नाम पर 1 करोड़ लिए गए।” मैं खड़ी हुई। “जज साहब, क्या मैं कुछ कह सकती हूं?” जज ने पूछा, “आप कौन हैं?” “मैं सुलेखा गोस्वामी हूं, निखिल की मां।”
मैंने फाइल निकाली। “रतिका ने इलाज के नाम पर इंश्योरेंस फ्रॉड किया है, मेरे बेटे से ₹60 लाख की ठगी की है।” मैंने इंश्योरेंस क्लेम फॉर्म दिखाया—कुल क्लेम अमाउंट ₹99.8 लाख, अप्रूव्ड अमाउंट ₹60 लाख। अस्पताल का असली बिल दिखाया—कुल खर्चा ₹38 लाख। दवाइयों की लिस्ट—बिल में 45 लाख, असल में 12 लाख। टेस्ट की फर्जी रसीदें—अस्पताल के रिकॉर्ड में टेस्ट हुए ही नहीं।
ऑडियो रिकॉर्डिंग का ट्रांसक्रिप्ट पेश किया। रतिका और उसकी मां की बातचीत—”निखिल तो बर्बाद हो गया। उसके पास अब कुछ नहीं बचा। हमने तो 60 लाख बचा लिए। इंश्योरेंस के पैसे अलग आ गए। अब मैं अमन के साथ रहूंगी।”
कोर्ट में सन्नाटा छा गया। जज ने कहा, “यह बहुत गंभीर मामला है। मैं इसे क्रिमिनल कोर्ट में ट्रांसफर करने का आदेश देता हूं। इंश्योरेंस फ्रॉड और धोखाधड़ी का केस बनता है। पुलिस को जांच का आदेश।”
अंजाम: सच्चाई की जीत
इंश्योरेंस कंपनी ने रतिका के परिवार के खिलाफ 95 लाख का सिविल केस दायर किया। पुलिस ने क्रिमिनल केस दर्ज किया। रतिका और उसके पिता डॉक्टर सिंघानिया को गिरफ्तार किया गया। डॉक्टर सिंघानिया का मेडिकल लाइसेंस सस्पेंड हो गया। रतिका की नौकरी चली गई। उसका बॉयफ्रेंड अमन भी भाग गया। माता-पिता ने उसे घर से निकाल दिया। कोर्ट ने तय किया कि रतिका को 7 साल की सजा हो सकती है। इंश्योरेंस कंपनी ने डॉक्टर सिंघानिया की सारी प्रॉपर्टी अटैच कर दी। सबसे बड़ी बात—इंश्योरेंस कंपनी ने ₹60 लाख निखिल को वापस करने का आदेश दिया।
छह महीने बाद निखिल के अकाउंट में ₹60 लाख आए। उसने फ्लैट वापस खरीदा, नई गाड़ी ली, अपना आईटी कंसल्टिंग बिजनेस शुरू किया। दो साल बाद निखिल की जिंदगी पटरी पर आ गई। उसने एक समझदार लड़की से दोबारा शादी की। मैं वैशाली नगर में मेडिकल फ्रॉड के शिकार लोगों की मुफ्त में मदद करती हूं। अब तक 50 से ज्यादा लोगों की मदद की है।
रतिका आज भी जेल में है। कोई उसके साथ नहीं है। कभी-कभी मुझे उस पर दया आती है, पर फिर याद आता है कि उसने मेरे बेटे के साथ क्या किया था।
सीख और संदेश
इस कहानी से मैंने सीखा—कभी हार मत मानो। सच्चाई हमेशा जीतती है। अगर आप भी कभी किसी धोखे का शिकार हों, तो चुप मत बैठिए। अपने अधिकारों के लिए लड़िए। सबूत जुटाइए। समझदारी से काम लीजिए। पैसा आता-जाता रहता है, पर इज्जत एक बार गई तो वापस नहीं आती।
आज जब मैं अपनी छत पर खड़ी वैशाली नगर की सड़कें देखती हूं, मुझे शांति मिलती है। मेरा बेटा खुश है, बहू अच्छी है, और मैं समाज की मदद कर रही हूं। यही काफी है।
जय हिंद।
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