मेरे बेटे ने कहा: “मैंने तुम्हारा घर बेच दिया ताकि मैं और मेरी पत्नी छुट्टियों पर जा सकें। तुम्हारे…
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1. एक बेरुखा संवाद – चाय की प्याली और टूटती उम्मीदें
“मां, मैंने तुम्हारा घर बेच दिया है। मुझे और तान्या को यूरोप जाना है। कल तक अपना सामान निकाल लो।”
यह शब्द मेरे बेटे अभिमन्यु ने ऐसे कहे जैसे मैं उसकी नौकर हूँ, जैसे मेरी कोई अहमियत नहीं। उस पल मेरे हाथ से चाय का कप गिरते-गिरते बचा। लेकिन मैंने चेहरे पर कोई भाव नहीं आने दिया। बस हल्की मुस्कान दी। क्योंकि अभिमन्यु नहीं जानता था कि जिस घर को वह बेचने की बात कर रहा है, असल में वह किसके नाम पर है। उसे यह भी नहीं पता था कि उसकी मां हेमंती खंडेलवाल सिर्फ एक बेसहारा विधवा नहीं, बल्कि एक जुझारू महिला है जिसने अपनी पूरी जिंदगी मेहनत से बनाई है।
2. बीते दिन – पति, संघर्ष और सपनों का घर
तीन साल पहले मेरे पति प्रदीप जी का अचानक निधन हो गया था। ब्रेन स्ट्रोक इतना तेज था कि डॉक्टर ने कहा – वह तुरंत ही चले गए। 35 साल की शादीशुदा जिंदगी, जिसमें हम दोनों ने मिलकर सब कुछ बनाया। प्रदीप जी चार्टर्ड अकाउंटेंट थे और मैं अपना ट्यूशन सेंटर चलाती थी। जयपुर के वैशाली नगर में मेरा नाम था – “हेमंती मैडम के पास पढ़ो तो नंबर पक्के आते हैं।”
उनके जाने के बाद मैंने सब बंद कर दिया। शोक में डूब गई। घर से बाहर नहीं निकली। अभिमन्यु गुड़गांव में रहता था, सॉफ्टवेयर इंजीनियर, उसकी पत्नी तान्या फैशन ब्लॉगर। दोनों की शादी को 5 साल हो चुके थे। प्रदीप जी के जाने के छह महीने बाद अभिमन्यु ने कहा, “मां, तुम अकेले मत रहो जयपुर में, हमारे साथ गुड़गांव आ जाओ।”
मैंने सोचा शायद बेटा मेरी चिंता कर रहा है। पर अब समझ में आता है – वह सिर्फ मेरे घर और संपत्ति पर नजर रख रहा था।
3. बेटे-बहू का बदलता व्यवहार और घर का माहौल
शुरुआत में सब ठीक था। मैं घर संभालती, खाना बनाती, सफाई करती। लेकिन धीरे-धीरे तान्या का रवैया बदलने लगा। छोटी-छोटी शिकायतें – दाल में नमक कम, सब्जी में तेल ज्यादा, घर में धूल। मैं चुप रहती, सोचती बहू है, समय लगेगा।
एक दिन बाजार से लौटी तो देखा – घर के दरवाजे पर ताला था। चाबी तान्या के पास थी – “मां, आप भूल जाती हैं, बेहतर है मैं रखूं।” मैं बाहर खड़ी रही, गर्मी में पसीने से तरबतर। एक घंटे बाद तान्या आई, बिना कुछ कहे अंदर चली गई।
दवाई की जरूरत पड़ी – अभिमन्यु बोला, “मां, अभी पैसे नहीं हैं।” मैंने खुद पैसे मंगवाकर दवाई ली। दिवाली आई – अभिमन्यु ने दोस्तों को बुलाया, मैंने पूरे दिन खाना बनाया। तान्या ने कहा, “मां, आप किचन में ही रहिए।” मुझे शर्म आ रही थी। रात को तान्या बोली, “मां जी, फ्री में काम कर रही हो, बर्तन धोओ, खाना बनाओ, सफाई करो – कितना अच्छा सेटअप है हमारे लिए।” अभिमन्यु चुप रहा।
4. आत्मबल और कानूनी तैयारी
उस रात मैंने प्रदीप जी की बात याद की – “हेमंती, तुम बहुत मजबूत हो।” मैंने फैसला किया – अब चुप नहीं रहूंगी। अगले दिन अपने पुराने वकील आचार्य जी को फोन किया। उन्होंने बताया – “देवी जी, सब कुछ आपके नाम पर है। घर, दुकानें, जमीन, एफडी, म्यूचुअल फंड – कुल मिलाकर आप ₹4.5 करोड़ की मालकिन हैं।”
मैंने पूछा – “क्या अभिमन्यु इन प्रॉपर्टी को बेच सकता है?” उन्होंने कहा – “जब तक आप खुद साइन नहीं करतीं, कोई कुछ नहीं कर सकता।” मैंने राहत की सांस ली।
5. बेटे की चाल और फर्जीवाड़ा
कुछ दिन बाद बैंक मैनेजर दिलीप जी ने बुलाया – “आपके बेटे ने फर्जी कागजात दिखाए, जिसमें लिखा है कि वैशाली नगर वाला घर उसके नाम है और वह लोन लेना चाहता है।” मैंने देखा – मेरे साइन की नकल थी, फर्जी रजिस्ट्री। आचार्य जी ने कहा – “यह आईपीसी की धारा 420, 467, 468, 471 के तहत अपराध है।”
मैंने सबूत इकट्ठा करने शुरू किए। अभिमन्यु और तान्या की बातचीत रिकॉर्ड की। तान्या कह रही थी – “अभिमन्यु, तुम्हारी मां को ओल्ड एज होम भेज दो।” अभिमन्यु – “थोड़ा रुक जाओ बेबी, पहले घर हाथ आ जाए।”

6. असली टर्निंग पॉइंट – परदे के पीछे की साजिश
एक दिन अभिमन्यु ने कहा, “मां, अब रसोई में काम मत करो। हमने कुक रख लिया है।” मैं समझ गई – मुझे बेकार साबित करना चाहते हैं। फिर दिवाली के तीन दिन पहले अभिमन्यु और तान्या ने कहा, “मां, हमने घर बेच दिया है। 95 लाख में। बस तुम्हें साइन कर देने हैं। बाकी पैसों से हम यूरोप घूमने जाएंगे।”
मैंने पूछा – “और मेरा क्या होगा?” तान्या – “नए फ्लैट में एक छोटा सा रूम होगा आपके लिए।” अभिमन्यु – “कल तक फैसला कर लेना।”
7. असली मालिक का खुलासा – सबूत और सामना
अगले दिन निशांत (भतीजा, वकील) और आचार्य जी, बैंक मैनेजर के साथ घर आए। अभिमन्यु ने सबको बुलाया था – दोस्तों, रिश्तेदारों, पड़ोसियों को। मैंने असली रजिस्ट्री, दुकानें, बैंक स्टेटमेंट, एफडी, म्यूचुअल फंड सबके सामने रखे। “यह सब मेरे नाम है।”
आचार्य जी ने कहा – “कानूनी रूप से अभिमन्यु का इसमें कोई हक नहीं। वसीयत भी नहीं बनी है। सब कुछ हेमंती देवी का है।” कुलश्रेष्ठ जी ने फर्जी कागजात दिखाए – “अभिमन्यु ने बैंक में फर्जीवाड़ा किया।”
8. बेटे-बहू की हार और न्याय की प्रक्रिया
मैंने रिकॉर्डिंग चलाई – अभिमन्यु और तान्या की साजिश सबके सामने। तान्या की माँ ने बेटी को थप्पड़ मारा। निशांत ने कहा – “बुआ जी ने आपको पाला, बड़ा किया, और आप उनके साथ यह कर रहे हैं?”
आचार्य जी बोले – “अब आईपीसी की धारा 420, 467, 468, 471 के तहत केस दर्ज होगा। साथ ही मानसिक उत्पीड़न के लिए ₹50 लाख का मुआवजा।”
अभिमन्यु रोने लगा – “मां, माफ कर दो।” मैंने ठंडी नजरों से कहा – “माफी अब नहीं। जब तुम मुझे बेदखल करने की सोच रहे थे, तब माफी कहाँ थी?”
9. परिणाम – सजा, नया जीवन और असली उद्देश्य
पुलिस ने अभिमन्यु को पूछताछ के लिए बुलाया। उसकी नौकरी चली गई। बैंक ने अकाउंट फ्रीज कर दिया। तान्या के मां-बाप ने तलाक का नोटिस भेजा। सारे रिश्तेदारों ने रिश्ता तोड़ लिया। अभिमन्यु एक छोटे फ्लैट में किराए पर रहने लगा। कोर्ट केस चला, कोई वकील उसका केस लेने को तैयार नहीं था।
मैं वापस जयपुर आ गई। अपने वैशाली नगर के घर में, जहाँ मेरी यादें थीं। मैंने फिर से ट्यूशन सेंटर खोला – अब गरीब लड़कियों को फ्री में पढ़ाती हूँ। निशांत अब मेरा सहारा है। मैंने अपनी वसीयत उसके नाम कर दी है।
10. सीख – हक़, आत्मबल और उम्र की ताकत
मैं पूजा घर में प्रदीप जी की तस्वीर के सामने बैठती हूँ। उन्हें बताती हूँ – “मैंने अपना हक़ लड़ा, अपनी इज्जत बचाई।” मैंने सीखा –
अपने हक़ के लिए लड़ना जरूरी है।
अपने कागजातों की जानकारी रखें।
अच्छाई का फायदा मत उठाने दीजिए।
उम्र सिर्फ एक नंबर है, कमजोर मत समझिए।
प्यार को कमजोरी मत बनाइए।
अब मैं शांति से जी रही हूँ। मेरे ट्यूशन सेंटर के बच्चे मुझे माँ कहते हैं। अभिमन्यु कभी-कभी फोन करता है, माफी मांगता है, पर मैंने उसे माफ नहीं किया। क्योंकि उसने सिर्फ मेरे साथ नहीं, अपने पिता की याद का अपमान किया।
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