मेरे बेटे ने मुझे फोन किया: “मैं कल शादी कर रहा हूँ। मैंने तुम्हारे बैंक से सारे पैसे निकाल लिए…”
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आत्मनिर्भरता की यात्रा
मां, कल मेरी शादी है। मैंने तुम्हारे बैंक अकाउंट से सारे पैसे निकाल लिए हैं और घर बेच दिया। बाय। फोन कट गया। मेरे हाथ से मोबाइल नहीं गिरा। मैं हिली भी नहीं। बस एक मुस्कान आ गई चेहरे पर। ऐसी मुस्कान जो तब आती है जब कोई बहुत बड़ी बेवकूफी करके खुद को बहुत चालाक समझ रहा हो। मेरा बेटा, मेरा अथर्व। जिसे मैंने पैदा किया, पाला, पढ़ाया। वही अथर्व आज मुझसे कह रहा था कि उसने मेरी जिंदगी भर की कमाई लूट ली है और मैं हंस रही थी। क्यों? क्योंकि उसे नहीं पता था कि असली खेल अभी शुरू होने वाला था।
मेरा नाम कल्पना गोखले है। उम्र 57 साल। पुणे के कोथरूड इलाके में रहती हूं। अकेली पिछले 4 साल से। लोग समझते हैं मैं एक बेसहारा विधवा हूं। शायद मेरा बेटा भी यही समझता था। पर सच कुछ और था। बहुत कुछ और था।
फोन काटने के बाद मैं अपनी होम ऑफिस की कुर्सी पर बैठी रही। रात के 11:00 बज रहे थे। मेरे सामने कंप्यूटर पर एक डिजाइन प्रोजेक्ट खुला था। किसी क्लाइंट के घर का इंटीरियर डिजाइन। मैं इंटीरियर डिजाइन कंसलटेंट हूं। फ्रीलांस बिल्डर्स और घर वालों के लिए काम करती हूं। पिछले 20 साल से यह काम कर रही हूं। पहले शौक था, फिर पार्ट टाइम बना और पति की मौत के बाद यही मेरा पूरा टाइम बिजनेस बन गया। पर अथर्व को कभी इसकी कोई कदर नहीं रही। उसके लिए मैं बस एक मां थी। एक विधवा जिसकी जिम्मेदारी वो उठा रहा था।
मैंने ठंडी कॉफी का घूंट लिया। मग में कॉफी अब ठंडी हो चुकी थी। मैं सोच रही थी कि अथर्व को कब समझ आएगा कि उसने क्या किया है। शायद तब जब पुलिस का फोन आएगा या फिर जब वह प्रॉपर्टी खरीदने वाला उसके पीछे लगेगा। या फिर जब उसकी होने वाली सास और ससुर उससे सवाल करेंगे। खैर, समय बताएगा।

मुझे याद है वो दिन जब अथर्व पैदा हुआ था। मैं उस वक्त 25 साल की थी। मेरे पति नीलेश गोखले सिविल इंजीनियर थे। अच्छी नौकरी थी उनकी। हम शुरू में किराए के मकान में रहते थे। फिर धीरे-धीरे हमने अपना एक फ्लैट खरीदा। कोथरूड में दो बैडरूम का। उस वक्त 50 लाख का था। होम लोन से खरीदा था। 15 साल में चुकाया। नीलेश बहुत मेहनत करते थे। मैं भी अपना इंटीरियर का काम करती थी। अथर्व को अच्छे स्कूल में पढ़ाया, कॉलेज भेजा, एमबीए करवाया। फिर वह बोर में नौकरी करने चला गया। मार्केटिंग में था। अच्छी सैलरी थी उसकी।
पर 4 साल पहले सब कुछ बदल गया। नीलेश की मौत हो गई। वर्क प्लेस एक्सीडेंट। वह एक कंस्ट्रक्शन साइट पर इंस्पेक्शन के लिए गए थे। अचानक स्कैफोल्डिंग गिर गई। नीलेश उसी में फंस गए। उन्हें बचाया नहीं जा सका। जब मुझे खबर मिली मेरी दुनिया उजड़ गई। 53 साल की उम्र में विधवा हो गई।
अथर्व उस वक्त बोर में था। वो आया। तीन दिन रहा। फिर चला गया। बोला मां तुम्हें कुछ चाहिए तो बताना। मैं हूं ना। मैंने सोचा शायद वह सच में मेरी परवाह करता है। पर धीरे-धीरे मुझे असलियत समझ आने लगी। नीलेश की मौत के बाद मुझे कंपनी से 20 लाख का कंपनसेशन मिला। उनकी LIC से 10 लाख मिले। प्रोविडेंट फंड से 15 लाख। कुल मिलाकर 45 लाख और हमारा फ्लैट था जो उस वक्त 80 लाख का था। यानी कुल मेरे पास करीब 1 करोड़ 25 लाख की संपत्ति थी।
मैंने इन पैसों को एफडी में रखा अलग-अलग बैंकों में और अपना इंटीरियर का काम शुरू कर दिया पूरी तरह से। मेरे पास क्लाइंट्स आने लगे। मैं डिजाइन बनाती, साइट विजिट करती, सुपरविजन करती। मेरी फीस अच्छी थी। एक प्रोजेक्ट से 500 से लेकर 3 लाख तक कमाती थी। साल में 15-20 प्रोजेक्ट मिल जाते थे। यानी अच्छी आमदनी हो रही थी। पर अथर्व को कभी दिलचस्पी नहीं रही।
उसके लिए मैं बस पापा की इंश्योरेंस और एफडी पर जी रही थी। अब असली बात बताती हूं जो अथर्व नहीं जानता था। नीलेश की मौत के 2 साल बाद मैंने अपने इंटीरियर बिजनेस की कमाई से डेक्कन में एक कमर्शियल शॉप खरीदी। 600 स्क्वायर फीट की 85 लाख में। पूरी कैश। कोई लोन नहीं। उस शॉप को मैंने एक फार्मेसी को किराए पर दे दिया। 45,000 महीने का किराया और मेरे अलग बैंक अकाउंट में एफडी के रूप में 32 लाख पड़े थे। यह अकाउंट सिर्फ मेरे नाम पर था कन ऑपरेटिव बैंक में।
अथर्व को इसके बारे में कुछ पता नहीं था। जिस अकाउंट के बारे में उसे पता था, उसमें मैंने सिर्फ 3 लाख रखे थे। डिकॉय बाकी सब अलग जगह थे। और अब सबसे मजेदार बात, जो घर अथर्व ने बेचा था, वह असल में हमारा फ्लैट नहीं था। वह नीलेश के चाचा का फ्लैट था। एक पुराना पैतृक प्रॉपर्टी डिस्प्यूट नीलेश की फैमिली में सालों से चल रहा था। नीलेश के नाम पर कागजात थे पर प्रॉपर्टी पर कोर्ट केस चल रहा था। नीलेश की मौत के बाद मुझे वह सब पेपर्स मिले।
मैंने वकील से सलाह ली। वकील ने कहा, देवी जी, यह प्रॉपर्टी आपकी नहीं है। कोर्ट में केस चल रहा है। अगर कोई इसे बेचने की कोशिश करेगा, तो फ्रॉड का केस हो सकता है। मैंने वो पेपर्स अलग से रख दिए और अपने असली घर के पेपर्स बैंक लॉकर में सुरक्षित रख दिए। पर जब अथर्व ने पेपर्स मांगे तो मैंने वो डिस्प्यूटेड प्रॉपर्टी के पेपर्स दे दिए।
सोचा अगर उसकी नियत खराब है तो वह खुद फंस जाएगा और वही हुआ। पर मैं आपको शुरू से बताती हूं कैसे मेरा बेटा मेरे खिलाफ हो गया। कैसे उसने मुझे ठगने की कोशिश की और कैसे मैंने उसे सबक सिखाया। नीलेश की मौत के शुरुआती महीने बहुत मुश्किल थे। मैं रोती थी। अकेली थी। घर सूना लगता था।
अथर्व शुरू में महीने में एक बार आता था। फिर 2 महीने में एक बार, फिर 3 महीने में। धीरे-धीरे उसकी आमद कम होती गई। फोन पर बात करता था। मां कैसी हो? सब ठीक है ना? पैसों की कोई दिक्कत तो नहीं? मैंने हमेशा कहा, नहीं बेटा सब ठीक है। तू अपना ख्याल रख। मुझे नहीं पता था कि उसके दिमाग में क्या चल रहा था। फिर एक दिन उसने एक लड़की से मिलवाया। फोन पर वीडियो कॉल पर नताशा देसाई। बोर में ही थी। मार्केटिंग मैनेजर खूबसूरत लड़की थी। अंग्रेजी में बात करती थी।
मुझसे भी अंग्रेजी में बोली, हेलो आंटी, हाउ आर यू? मैंने हिंदी में जवाब दिया। मुझे अंग्रेजी आती है, पर मुझे हिंदी ज्यादा पसंद है। अथर्व ने कहा, मां, यह नताशा है। हम साथ में काम करते हैं। सोच रहे हैं शादी कर लें? मैं चौंक गई। इतनी जल्दी पर मैंने कुछ नहीं कहा। बस मुस्कुरा दी। बोली, बहुत अच्छी बात है बेटा। तुम खुश हो तो मुझे भी खुशी है। पर अगले ही पल नताशा ने एक सवाल किया। आंटी, अथर्व टोल्ड मी अबाउट दी प्रॉपर्टी। सो व्हेन आर यू ट्रांसफरिंग इट टू हिज नेम? मेरा दिल बैठ गया। यह सवाल शादी से पहले।
मैंने धीरे से कहा, बेटा, अभी यह सब बातें बाद में करेंगे। पहले शादी तो हो जाए। नताशा की स्माइल गायब हो गई। अथर्व ने टॉपिक बदल दिया। उस रात मुझे नींद नहीं आई। मैं अपने होम ऑफिस में बैठी रही। पुराने डॉक्यूमेंट्स निकाले, प्रॉपर्टी पेपर्स देखे और मुझे समझ आ गया कि अथर्व की दिलचस्पी मुझ में नहीं मेरी प्रॉपर्टी में थी।
अगले कुछ महीनों में अथर्व ने धीरे-धीरे अपनी चाल चलनी शुरू कर दी। पहले उसने कहा, “मां प्रॉपर्टी पेपर्स मुझे दे दो। मैं बैंक में सेफ डिपॉजिट में रख दूंगा। तुम्हारे पास रखना सेफ नहीं है।” मैंने कहा बेटा मेरे पास लॉकर है। वहां सुरक्षित है। वो चुप हो गया। फिर कुछ दिन बाद बोला, मां तुम्हारे बैंक अकाउंट में मेरा नाम जॉइंट में ऐड करवा दो। इमरजेंसी में काम आएगा। मैंने मना कर दिया। कहा बेटा अभी कोई जरूरत नहीं है। मैं खुद सब संभाल लेती हूं।
फिर एक दिन वह पुणे आया। साथ में नताशा भी थी। उन्होंने मुझसे कहा कि वह शादी की तैयारी करना चाहते हैं। मैंने खुशी से हां कर दी। बेटा तुम जो चाहे करो। मैं तुम्हारे साथ हूं। उस दिन हम तीनों बाहर खाना खाने गए। एक फैंसी रेस्टोरेंट में। नताशा ने मुझसे पूछा। आंटी आप क्या करती हैं पूरे दिन घर में अकेले? मैंने कहा, बेटा मेरा इंटीरियर डिजाइन का काम है। क्लाइंट्स आते हैं। मैं साइट पर जाती हूं। बिजी रहती हूं।
नताशा ने हल्के से हंसते हुए कहा, ओह दैट्स नाइस हॉबी फॉर सीनियर सिटीजंस। हॉबी मेरा बिजनेस था वो। पर मैंने चुप रहना बेहतर समझा। अथर्व ने कुछ नहीं कहा। उसने नताशा को सपोर्ट किया। उसी शाम अथर्व ने कहा, मां मुझे प्रॉपर्टी पेपर्स चाहिए। बैंक में कुछ काम है? मैंने पूछा। कौन सा काम? वो झल्लाया। मां तुम हर बात में सवाल क्यों करती हो? मैं तुम्हारा बेटा हूं। मुझ पर भरोसा नहीं है क्या? मैंने धीरे से कहा, भरोसा है बेटा। पर यह पेपर्स बहुत इंपॉर्टेंट हैं।
नताशा बीच में बोली, देखो आंटी, अथर्व तुम्हारा बेटा है। वो तुम्हारा भला चाहता है। तुम इतना शक क्यों कर रही हो? मैंने चुप हो गई। पर मैंने पेपर्स नहीं दिए। उस रात जब वह सो रहे थे, मैंने अपने वकील को फोन किया। वकील रामास्वामी सर पुराने परिचित थे। उन्होंने कहा, “कल्पना जी अगर आपको लग रहा है कि आपका बेटा कुछ गलत करने की सोच रहा है तो आप सावधान रहिए। अपनी प्रॉपर्टी के असली पेपर्स किसी को मत दीजिए और अगर देना ही है तो वह डिस्प्यूटेड प्रॉपर्टी के पेपर्स दे दीजिए। अगर उसकी नियत साफ नहीं है तो वह खुद फंस जाएगा।” मैंने उनकी बात मान ली।
अगले दिन जब अथर्व फिर पेपर्स मांगने लगा तो मैंने वो डिस्प्यूटेड प्रॉपर्टी के पेपर्स निकाल दिए। वो खुश हो गया। बोला, थैंक यू मां मैं इन्हें संभाल कर रखूंगा और वह चला गया। नताशा भी उसके जाने के बाद मैं अपने होम ऑफिस में बैठी और मुझे पता था कि अब कुछ गलत होने वाला है पर मैं तैयार थी।
अगले 2 महीने अथर्व का कोई फोन नहीं आया, कोई मैसेज नहीं। मैं समझ गई कि वह कुछ प्लान कर रहा है। मैंने अपने वकील से बात की। उन्होंने कहा, “कल्पना जी अगर वह उस प्रॉपर्टी को बेचने की कोशिश करेगा तो यह फ्रॉड है क्योंकि वह प्रॉपर्टी डिस्प्यूट में है। खरीदार के साथ धोखा होगा और आपके बेटे पर केस बन सकता है।” मैंने तय किया कि मैं अथर्व को एक मौका दूंगी। आखिर वो मेरा बेटा था। पर अगर उसने गलत रास्ता चुना तो मुझे भी कदम उठाने होंगे।
और फिर वो फोन आया। “आज रात मां, कल मेरी शादी है। मैंने तुम्हारे बैंक अकाउंट से सारे पैसे निकाल लिए हैं और घर बेच दिया। बाय।” जब उसने यह कहा तो मुझे हंसी आ गई। असल में मैं सोच रही थी कि वह कितना बड़ा बेवकूफ है। पहली बात, उसने जो घर बेचा वह डिस्प्यूटेड था। दूसरी बात, मेरे बैंक अकाउंट से उसने शायद 3 लाख निकाले होंगे। बाकी सब मेरे दूसरे अकाउंट में सुरक्षित था। तीसरी बात, उसने मेरी सिग्नेचर फर्जरी की होगी जो क्रिमिनल केस था।
अब मैं क्या करूं? मैंने तय किया कि कल सुबह मैं बोर जाऊंगी अपने वकील के साथ और पुलिस के साथ और अथर्व को उसकी असलियत दिखाऊंगी। उसकी शादी से पहले की सगाई रिंग सेरेमनी में सबके सामने। मैं अपनी छोटी पूजा घर में गई। दिया जलाया। भगवान से प्रार्थना की।
हे भगवान, मैंने कभी किसी का बुरा नहीं सोचा। पर आज मेरे बेटे ने मेरे साथ धोखा किया। अब मुझे न्याय दिलवाइए। मैंने अपने वकील रामास्वामी सर को फोन किया। उन्होंने कहा, “कल्पना जी, आप बिल्कुल सही कर रही हैं। यह मुश्किल था पर जरूरी था।” मैंने उनका शुक्रिया अदा किया। फिर मैंने अपने बैंक मैनेजर को फोन किया। उसी रात उन्होंने बताया, “हां कल्पना जी, आज दोपहर को आपके बेटे ने 3 लाख निकाले। आपकी सिग्नेचर की कॉपी लेकर आया था। हमने वेरीफाई नहीं की क्योंकि वह आपका बेटा है।”
मैंने उनसे कहा, “सर, वो सिग्नेचर फेक थी। मैंने कोई अथॉरिजेशन नहीं दिया। आप पुलिस को इनफॉर्म कर दीजिए।” बैंक मैनेजर घबरा गए। बोले, “हम तुरंत एक्शन लेंगे।”
अब बारी थी उस प्रॉपर्टी खरीदार की। मैंने रामास्वामी सर से कहा कि वह पता लगाएं कि अथर्व ने वह प्रॉपर्टी किसे बेची। दो दिन बाद सर ने बताया, “कल्पना जी, एक बिल्डर ने खरीदी है 45 लाख में। पर जब उसे पता चलेगा कि यह प्रॉपर्टी डिस्प्यूटेड है तो वह आपके बेटे पर केस करेगा।”
मैंने सब कुछ तैयार किया। अपने डॉक्यूमेंट्स, असली प्रॉपर्टी पेपर्स, बैंक स्टेटमेंट्स और एक रिपोर्ट जो दिखाती थी कि अथर्व ने कैसे फर्जरी की और फ्रॉड किया। मैं तैयार थी अपने बेटे से आखिरी बार मिलने के लिए। पर इस बार मैं अकेली नहीं थी। मेरे साथ कानून था और सच्चाई थी।
अगले दिन मैं रामास्वामी सर और दो पुलिस ऑफिसर्स बोर के लिए निकले। अथर्व की शादी से पहले की सगाई रिंग सेरेमनी एक फाइव स्टार होटल में थी। हमने होटल के बाहर से अथर्व को फोन किया। उसने नहीं उठाया। फिर हम सीधे सगाई हॉल में गए। वहां करीब 100 लोग थे। नताशा की फैमिली, उसके रिश्तेदार, दोस्त, सब बहुत खुश थे।
अथर्व स्टेज पर खड़ा था। सूट पहने हुए मुस्कुरा रहा था। नताशा उसके बगल में थी। सुंदर साड़ी में। हम अंदर गए। सबकी नजर हम पर पड़ी। अथर्व ने मुझे देखा। उसका चेहरा सफेद हो गया। उसे उम्मीद नहीं थी कि मैं आऊंगी। वो भी पुलिस के साथ। मैं धीरे-धीरे स्टेज की तरफ बढ़ी। लोग फुसफुसाने लगे। कौन है यह? क्या हो रहा है? पुलिस क्यों है?
मैं स्टेज पर पहुंची। अथर्व के सामने खड़ी हो गई। उसने घबरा कर पूछा, “मां, तुम यहां क्यों आई हो?” मैंने शांति से कहा, “बेटा, मैं तुम्हें बधाई देने आई हूं। और एक छोटी सी बात बताने भी आई हूं।”
नताशा बोली, “आंटी, यह क्या तमाशा है? और यह पुलिस क्यों है?” मैंने उसकी तरफ देखा। फिर अथर्व की तरफ मुड़ी। बोली, “बेटा, तुमने कल मुझे फोन किया था ना? कहा था कि तुमने मेरे पैसे निकाल लिए और घर बेच दिया। मैं तुम्हें बताना चाहती हूं कि तुमने जो घर बेचा वो असल में तुम्हारा नहीं था।”
सब लोग चुप हो गए। अथर्व ने कहा, “मां, तुम क्या बोल रही हो? वो हमारा फ्लैट था।” मैंने सिर हिलाया। “नहीं बेटा, वो तुम्हारे दादाजी के चाचा की प्रॉपर्टी थी। जिस पर कोर्ट में केस चल रहा है। तुम्हारे पापा को वह पेपर्स मिले थे। पर वह प्रॉपर्टी कभी हमारी नहीं थी और तुमने उसे बेच दिया।”
मैंने अपने बैग से डॉक्यूमेंट्स निकाले। “यह देखो। यह कोर्ट केस के कागजात हैं। यह प्रॉपर्टी डिस्प्यूटेड है। तुमने जो भी बिल्डर को बेचा वो फ्रॉड है। अब वह बिल्डर तुम पर केस करेगा।”
अथर्व का चेहरा पीला पड़ गया। नताशा ने पूछा, “व्हाट? फ्रॉड। अथर्व, यह क्या है?” अथर्व ने यह क्या किया? “मां, तुमने मुझे वह पेपर्स दिए थे। तुमने बताया नहीं कि वह डिस्प्यूटेड है।”
मैंने शांत आवाज में कहा, “मैंने तुम्हें वह पेपर्स इसलिए दिए क्योंकि मुझे शक था कि तुम कुछ गलत करोगे और तुमने वही किया।” रामास्वामी सर ने कहा, “अथर्व जी, आपने एक डिस्प्यूटेड प्रॉपर्टी को बेचकर फ्रॉड किया है। यह आईपीसी की धारा 420 के तहत अपराध है। आप पर केस बन सकता है।”
पुलिस ऑफिसर ने कहा, “और आपने अपनी मां के बैंक अकाउंट से सिग्नेचर फोर् करके पैसे निकाले। यह भी अपराध है।” नताशा की मां उठ खड़ी हुई। बोली, “यह क्या हो रहा है? अथर्व, तुमने हमसे झूठ बोला? तुम फ्रॉड हो?”
नताशा रोने लगी। उसने अंगूठी उतारकर अथर्व पर फेंक दी। “आई कैन बिलीव यू डिड दिस। यू लाइक टू मी।” वो भागकर चली गई। उसकी फैमिली भी। बाकी लोग भी एक-एक करके जाने लगे। कोई कुछ समझ नहीं पा रहा था। पर सब देख रहे थे कि अथर्व फंस गया था।
वो घुटनों पर बैठ गया। बोला, “मां, मुझे माफ कर दो। मैंने गलती की। मैं नहीं जानता था कि वह प्रॉपर्टी डिस्प्यूटेड है।” मैंने उसकी तरफ देखा। मेरा दिल टूट रहा था। पर मैं जानती थी कि यह जरूरी था।
“बेटा, तुमने मुझे मां नहीं एक एटीएम समझा। अब तुम्हें समझ आएगा कि रिश्तों की कीमत क्या होती है।” पुलिस ने अथर्व को ले गई। मैं वहीं खड़ी रही। होटल खाली हो गया था। सिर्फ रामास्वामी सर मेरे साथ थे। उन्होंने कहा, “कल्पना जी, आपने सही किया। यह मुश्किल था पर जरूरी था।”
मैंने सिर हिलाया। आंखों में आंसू थे। पर मैं जानती थी कि मैंने जो किया वो सही था। अगले कुछ दिनों में बहुत कुछ हुआ। बिल्डर ने अथर्व पर 45 लाख का फ्रॉड केस किया। उसने कहा कि या तो अथर्व पैसे वापस करें या फिर जेल जाए। पर अथर्व के पास पैसे नहीं थे।
उसने 3 लाख तो मुझसे चुराए थे और बाकी 45 लाख बिल्डर को लौटाने थे। उसकी नौकरी चली गई। कंपनी ने उसे निकाल दिया। आखिर कोई क्रिमिनल केस वाले को कैसे रखता? कोर्ट ने अथर्व के सारे बैंक अकाउंट्स फ्रीज कर दिए। उसे 18 महीने की जेल हुई। बेल पर छूटा। पर शर्त थी कि वह बिल्डर को पैसे वापस करेगा।
अथर्व ने मुझे फोन किया। रोते हुए बोला, “मां, प्लीज मेरी मदद करो। मैं खत्म हो गया हूं। मेरी नौकरी चली गई। मेरी शादी टूट गई। मैं कहां जाऊं?” मैंने धीरे से कहा, “बेटा, तुमने अपनी किस्मत खुद लिखी है। अब तुम्हें खुद ही उसे भरना होगा। मेहनत करो। ईमानदारी से कमाओ। हर रुपया बिल्डर को वापस करो। तभी तुम्हारा सिर ऊंचा होगा।”
मैं पुणे वापस आ गई। मेरा इंटीरियर डिजाइन का काम चल रहा था। मेरे पास एक नया क्लाइंट आया था। एक विधवा औरत। उसने मुझसे पूछा, “कल्पना जी, आप अकेली कैसे रहती हैं? आपका कोई बेटा बेटी है?” मैंने कहा, “हां, बेटा है। पर वो अपनी जिंदगी जी रहा है और मैं अपनी।” उस औरत ने कहा, “मुझे भी सिखाइए कैसे आत्मनिर्भर बने।”
मेरा भी बेटा मुझे बोझ समझता है। मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा। “बहन, सबसे पहले अपने डॉक्यूमेंट्स सुरक्षित रखो। अपनी प्रॉपर्टी अपने नाम रखो। अपना पैसा अपने कंट्रोल में रखो और सबसे जरूरी अपने ऊपर भरोसा रखो। बाकी सब ठीक हो जाएगा।”
मैं अब विधवाओं को काउंसलिंग देती हूं। उन्हें फाइनेंशियल इंडिपेंडेंस के बारे में बताती हूं। कैसे अपनी प्रॉपर्टी सुरक्षित रखें? कैसे बच्चों पर निर्भर ना रहें। मैं खुद एक उदाहरण बन गई हूं। लोग मुझसे पूछते हैं, “कल्पना जी, आपने अपने बेटे के खिलाफ केस कर दिया। यह तो बहुत कठोर कदम था।”
मैं कहती हूं, “नहीं, यह सही कदम था। अगर मैं चुप रहती तो वह और लोगों को ठगता। कम से कम अब उसे सबक मिला और शायद वह एक बेहतर इंसान बने।” आज मैं अपने घर में बैठी हूं। रात के 11:00 बज रहे हैं। मेरे सामने कंप्यूटर पर एक नया प्रोजेक्ट है। कल मुझे एक क्लाइंट से मिलना है। एक बड़ा प्रोजेक्ट है। एक पूरे घर का इंटीरियर करना है।
मैं अपने काम में बिजी हूं। खुश हूं, संतुष्ट हूं। मेरी डेक्कन की शॉप से किराया आ रहा है। मेरे एफडी से ब्याज मिल रहा है। मेरा बिजनेस अच्छा चल रहा है। मैं किसी पर निर्भर नहीं हूं। मैं पुणे में रहती हूं। आप कहां से हैं? कमेंट में जरूर बताइएगा। शायद आपके शहर की भी कोई कहानी सुना दूं किसी दिन।
अथर्व की खबर मुझे कभी-कभी मिलती है। उसके दोस्तों से। सुना है कि वह अब एक डिलीवरी बॉय की नौकरी कर रहा है। दिन भर बाइक पर घूमता है। पैकेज डिलीवर करता है। थक जाता है पर काम कर रहा है। ईमानदारी से धीरे-धीरे बिल्डर को पैसे चुका रहा है। अभी तक सिर्फ 5 लाख चुका पाया है। बाकी 40 लाख अभी बचे हैं।
उसे पता है कि यह काम सालों लगेगा। पर वह कर रहा है। मुझे उम्मीद है कि एक दिन वह सच में समझ जाएगा कि रिश्तों की कीमत क्या होती है। मैंने अथर्व से बात करना बंद नहीं किया। पर मैंने उसे साफ कह दिया है कि जब तक वह हर रुपया चुका नहीं देता वह मेरे पास नहीं आ सकता। यह उसकी सजा नहीं, उसका प्रायश्चित है।
जब वह ईमानदारी से कमाकर वह पैसे लौट आएगा तभी उसका सिर ऊंचा होगा। तभी वह कह सकेगा कि वह एक अच्छा इंसान बन गया। इस कहानी से मैंने बहुत कुछ सीखा। सबसे पहला सबक यह कि अपनी संपत्ति हमेशा अपने कंट्रोल में रखो। चाहे बेटा हो या बेटी, कोई भी भरोसेमंद लगे, अपने डॉक्यूमेंट्स अपने पास रखो।
दूसरा सबक यह कि फाइनेंशियल इंडिपेंडेंस बहुत जरूरी है। चाहे कुछ भी हो, अपनी कमाई का जरिया बनाए रखो। तीसरा सबक यह कि बुजुर्गों को कमजोर मत समझो। हम में ताकत है, अनुभव है, समझ है। चौथा सबक यह कि कानून हमारे साथ है। अगर कोई गलत करे तो चुप मत बैठो। लड़ो, न्याय मांगो।
और आखिरी सबक यह कि रिश्ते प्यार और सम्मान से बनते हैं। पैसे से नहीं। मैं आज भी अपने होम ऑफिस में देर रात तक काम करती हूं। कभी-कभी अपने पति की तस्वीर को देखती हूं। सोचती हूं कि काश वो होते तो क्या कहते। शायद वह कहते, “तुमने सही किया कल्पना, तुमने हमारे बेटे को जिंदगी का सबसे बड़ा सबक सिखाया।”
मैं मुस्कुरा देती हूं और अपने काम में लग जाती हूं। जिंदगी चलती रहती है। पर अब मैं जानती हूं कि मैं अकेली नहीं हूं। मेरे पास मेरा हुनर है, मेरा काम है, मेरी इज्जत है और सबसे जरूरी मेरा आत्मविश्वास है। यही काफी है।
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