मेरे बेटे ने मुझे फोन किया: “मैं कल शादी कर रहा हूँ। मैंने तुम्हारे बैंक से सारे पैसे निकाल लिए…”

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दहेज, लालच और आत्मनिर्भरता की यात्रा

मां, मेरी शादी हो चुकी है। मैंने तुम्हारे बैंक अकाउंट से सारे पैसे निकाल लिए हैं और तुम्हारी सारी जायदाद अपने नाम कर ली है। बाय।
फोन कट गया। मेरे हाथ से मोबाइल नहीं गिरा। मैं हिली भी नहीं। बस एक मुस्कान आ गई चेहरे पर। ऐसी मुस्कान जो तब आती है जब कोई बहुत बड़ी बेवकूफी करके खुद को बहुत चालाक समझ रहा हो। मेरी बेटी, मेरी रितानिया। जिसे मैंने जन्म दिया, पाला, पढ़ाया। वही रितानिया आज मुझे बता रही थी कि उसने मेरी जिंदगी भर की कमाई लूट ली है और मैं हंस रही थी। क्यों? क्योंकि उसे नहीं पता था कि असली खेल अभी शुरू होने वाला था।

मेरा नाम शांति अय्यर है। उम्र 54 साल। तमिलनाडु के त्रिपुर में रहती हूं। लोग समझते हैं मैं एक बेसहारा मां हूं। शायद मेरी बेटी भी यही समझती थी। पर सच कुछ और था। बहुत कुछ और था।

फोन काटने के बाद मैं अपनी होम ऑफिस की कुर्सी पर बैठी रही। रात के 11:00 बज रहे थे। मेरे सामने कंप्यूटर पर एक अकाउंटिंग प्रोजेक्ट खुला था। मैं फ्रीलांस अकाउंटेंट हूं। पिछले 18 साल से यह काम कर रही हूं। पहले शौक था, फिर पार्ट टाइम बना और पति की मौत के बाद यही मेरा पूरा टाइम बिजनेस बन गया। पर रितानिया को कभी इसकी कोई कदर नहीं रही। उसके लिए मैं बस एक मां थी। एक अकेली औरत जिसकी जिम्मेदारी वह उठा रही थी।

मैंने ठंडी कॉफी का घूंट लिया। मग में कॉफी अब ठंडी हो चुकी थी। मैं सोच रही थी कि रितानिया को कब समझ आएगा कि उसने क्या किया है। शायद तब जब पुलिस का फोन आएगा या जब उसका पति उससे सवाल करेगा। खैर, समय बताएगा।

मुझे याद है वो दिन जब रितानिया पैदा हुई थी। मैं उस वक्त 28 साल की थी। मेरे पति सुंदरम टेक्सटाइल कारोबारी थे। अच्छी आमदनी थी। हम शुरू में किराए के मकान में रहते थे। फिर धीरे-धीरे हमने अपना एक घर खरीदा। त्रिपुर में। उस वक्त 60 लाख का था। होम लोन से खरीदा था। 12 साल में चुकाया। सुंदरम बहुत मेहनत करते थे। मैं भी अपना अकाउंटिंग का काम करती थी। रितानिया को अच्छे स्कूल में पढ़ाया, कॉलेज भेजा, एमबीए करवाया। फिर उसकी शादी की बात आई तो सब बदल गया।

शादी में ढाई करोड़ खर्च किए। 70 लाख की वोल्वो कार दी। 4.5 किलो सोना देने का वादा था। उसमें से 2.7 किलो दे भी दिया। बाकी का वादा किया। पर ससुराल वालों को यह सब कम लगा। “दूसरे लोग तो 100 करोड़ दहेज देते हैं। आपने क्या दिया?”
रितानिया को हर दिन ताने मिलते। मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना होती। वह मां-बाप को बताना चाहती थी, लेकिन डरती थी – “कहीं उन्हें दुख न हो, कहीं समाज क्या कहेगा, कहीं शादी टूट न जाए…”
कभी हिम्मत कर बताती, तो जवाब मिलता – “बेटा, एडजस्ट कर लो, सब ठीक हो जाएगा।”

शुरुआत में ही ससुराल वालों की अपेक्षाएँ सामने आ गईं – “फलां ने 100 करोड़ दहेज दिया, फलां ने बेटे को बिज़नेस शुरू करवा दिया, तुमने क्या दिया?”
रितानिया समझती रही कि शायद वक्त के साथ सब ठीक हो जाएगा।

उसके लिए मैं बस पापा की इंश्योरेंस और एफडी पर जी रही थी। अब असली बात बताती हूं जो रितानिया नहीं जानती थी। सुंदरम की मौत के बाद मुझे कंपनी से 30 लाख का कंपनसेशन मिला। उनकी LIC से 15 लाख मिले। प्रोविडेंट फंड से 10 लाख। कुल मिलाकर 55 लाख और हमारा घर था जो उस वक्त 1 करोड़ का था। यानी कुल मेरे पास करीब 1 करोड़ 55 लाख की संपत्ति थी।

मैंने इन पैसों को एफडी में रखा अलग-अलग बैंकों में और अपना अकाउंटिंग का काम शुरू कर दिया पूरी तरह से। मेरे पास क्लाइंट्स आने लगे। मैं अकाउंट्स बनाती, टैक्स फाइल करती, सलाह देती। मेरी फीस अच्छी थी। एक प्रोजेक्ट से 5000 से लेकर 1 लाख तक कमाती थी। साल में 10-15 प्रोजेक्ट मिल जाते थे। यानी अच्छी आमदनी हो रही थी। पर रितानिया को कभी दिलचस्पी नहीं रही।

अब असली बात – शादी के बाद मैंने अपने बिजनेस की कमाई से कोयंबटूर में एक कमर्शियल शॉप खरीदी। 700 स्क्वायर फीट की 90 लाख में। पूरी कैश। कोई लोन नहीं। उस शॉप को मैंने एक मेडिकल स्टोर को किराए पर दे दिया। 50,000 महीने का किराया और मेरे अलग बैंक अकाउंट में एफडी के रूप में 40 लाख पड़े थे। यह अकाउंट सिर्फ मेरे नाम पर था। रितानिया को इसके बारे में कुछ पता नहीं था। जिस अकाउंट के बारे में उसे पता था, उसमें मैंने सिर्फ 2 लाख रखे थे। बाकी सब अलग जगह थे।

और अब सबसे मजेदार बात, जो घर रितानिया ने अपने पति के नाम ट्रांसफर कराया था, वह असल में हमारा घर नहीं था। वह सुंदरम के भाई का घर था। एक पुराना पैतृक प्रॉपर्टी डिस्प्यूट सुंदरम की फैमिली में सालों से चल रहा था। सुंदरम के नाम पर कागजात थे पर प्रॉपर्टी पर कोर्ट केस चल रहा था। सुंदरम की मौत के बाद मुझे वह सब पेपर्स मिले। मैंने वकील से सलाह ली। वकील ने कहा, “शांति जी, यह प्रॉपर्टी आपकी नहीं है। कोर्ट में केस चल रहा है। अगर कोई इसे बेचने की कोशिश करेगा, तो फ्रॉड का केस हो सकता है।” मैंने वो पेपर्स अलग से रख दिए और अपने असली घर के पेपर्स बैंक लॉकर में सुरक्षित रख दिए। पर जब रितानिया ने पेपर्स मांगे तो मैंने वो डिस्प्यूटेड प्रॉपर्टी के पेपर्स दे दिए।

सोचा अगर उसकी नियत खराब है तो वह खुद फंस जाएगी और वही हुआ।
नीलेश की मौत के शुरुआती महीने बहुत मुश्किल थे। मैं रोती थी। अकेली थी। घर सूना लगता था।

रितानिया शुरू में महीने में एक बार आती थी। फिर 2 महीने में एक बार, फिर 3 महीने में। धीरे-धीरे उसकी आमद कम होती गई। फोन पर बात करती थी। “मां कैसी हो? सब ठीक है ना? पैसों की कोई दिक्कत तो नहीं?” मैंने हमेशा कहा, “नहीं बेटा सब ठीक है। तू अपना ख्याल रख।” मुझे नहीं पता था कि उसके दिमाग में क्या चल रहा था। फिर एक दिन उसने बताया, “मां, मेरे पति कह रहे हैं कि तुम्हारा पैसा हमें ट्रांसफर कर दो।”
मैं समझ गई कि उसकी दिलचस्पी मुझ में नहीं, मेरी प्रॉपर्टी में थी।

अगले कुछ महीनों में रितानिया ने धीरे-धीरे अपनी चाल चलनी शुरू कर दी। पहले उसने कहा, “मां, प्रॉपर्टी पेपर्स मुझे दे दो। मैं बैंक में सेफ डिपॉजिट में रख दूंगी। तुम्हारे पास रखना सेफ नहीं है।” मैंने कहा, “बेटा, मेरे पास लॉकर है। वहां सुरक्षित है।” वो चुप हो गई। फिर कुछ दिन बाद बोली, “मां, तुम्हारे बैंक अकाउंट में मेरा नाम जॉइंट में ऐड करवा दो।” मैंने मना कर दिया। कहा, “बेटा, अभी कोई जरूरत नहीं है। मैं खुद सब संभाल लेती हूं।”

फिर एक दिन वह अपने पति के साथ आई। बोले, “हम शादी के बाद बिजनेस शुरू करना चाहते हैं। मां, तुम मदद कर दो।” मैंने खुशी से हां कर दी। “बेटा, तुम जो चाहे करो। मैं तुम्हारे साथ हूं।”

उस दिन हम तीनों बाहर खाना खाने गए। एक फैंसी रेस्टोरेंट में। रितानिया ने मुझसे पूछा, “मां, आप क्या करती हैं पूरे दिन घर में अकेली?” मैंने कहा, “बेटा, मेरा अकाउंटिंग का काम है। क्लाइंट्स आते हैं। मैं साइट पर जाती हूं। बिजी रहती हूं।”
उसके पति ने हल्के से हंसते हुए कहा, “ओह दैट्स नाइस हॉबी फॉर सीनियर सिटीजंस।” हॉबी मेरा बिजनेस था वो। पर मैंने चुप रहना बेहतर समझा।

रितानिया ने फिर प्रॉपर्टी पेपर्स मांगे। मैंने वही डिस्प्यूटेड प्रॉपर्टी के पेपर्स दे दिए। वो खुश हो गई। बोली, “थैंक यू मां, मैं इन्हें संभाल कर रखूंगी।” और वह चली गई।

अगले 2 महीने रितानिया का कोई फोन नहीं आया, कोई मैसेज नहीं। मैं समझ गई कि वह कुछ प्लान कर रही है। मैंने अपने वकील से बात की। उन्होंने कहा, “शांति जी, अगर वह उस प्रॉपर्टी को बेचने की कोशिश करेगी तो यह फ्रॉड है क्योंकि वह प्रॉपर्टी डिस्प्यूट में है। खरीदार के साथ धोखा होगा और आपकी बेटी पर केस बन सकता है।” मैंने तय किया कि मैं रितानिया को एक मौका दूंगी। आखिर वो मेरी बेटी थी। पर अगर उसने गलत रास्ता चुना तो मुझे भी कदम उठाने होंगे।

और फिर वो फोन आया। “मां, मेरी शादी हो चुकी है। मैंने तुम्हारे बैंक अकाउंट से सारे पैसे निकाल लिए हैं और तुम्हारी सारी जायदाद अपने नाम कर ली है। बाय।”
मुझे हंसी आ गई। असल में मैं सोच रही थी कि वह कितना बड़ी बेवकूफ है। पहली बात, उसने जो घर ट्रांसफर कराया, वह डिस्प्यूटेड था। दूसरी बात, मेरे बैंक अकाउंट से उसने शायद 2 लाख निकाले होंगे। बाकी सब मेरे दूसरे अकाउंट में सुरक्षित था। तीसरी बात, उसने मेरी सिग्नेचर फर्जरी की होगी जो क्रिमिनल केस था।

अब मैं क्या करूं? मैंने तय किया कि कल सुबह मैं पुलिस के साथ उसके घर जाऊंगी और उसकी असलियत सबके सामने रखूंगी। उसकी शादी के रिसेप्शन में सबके सामने। मैं अपनी छोटी पूजा घर में गई। दिया जलाया। भगवान से प्रार्थना की।

“हे भगवान, मैंने कभी किसी का बुरा नहीं सोचा। पर आज मेरी बेटी ने मेरे साथ धोखा किया। अब मुझे न्याय दिलवाइए।”

मैंने अपने वकील को फोन किया। उन्होंने कहा, “शांति जी, आप बिल्कुल सही कर रही हैं। यह मुश्किल था पर जरूरी था।” मैंने उनका शुक्रिया अदा किया। फिर मैंने अपने बैंक मैनेजर को फोन किया। उसी रात उन्होंने बताया, “हां शांति जी, आज दोपहर को आपकी बेटी ने 2 लाख निकाले। आपकी सिग्नेचर की कॉपी लेकर आई थी। हमने वेरीफाई नहीं की क्योंकि वह आपकी बेटी है।”
मैंने उनसे कहा, “सर, वो सिग्नेचर फेक थी। मैंने कोई अथॉरिजेशन नहीं दिया। आप पुलिस को इनफॉर्म कर दीजिए।” बैंक मैनेजर घबरा गए। बोले, “हम तुरंत एक्शन लेंगे।”

अब बारी थी उस प्रॉपर्टी खरीदार की। मैंने वकील से कहा कि वह पता लगाएं कि रितानिया ने वह प्रॉपर्टी किसे बेची। दो दिन बाद सर ने बताया, “शांति जी, एक बिल्डर ने खरीदी है 40 लाख में। पर जब उसे पता चलेगा कि यह प्रॉपर्टी डिस्प्यूटेड है तो वह आपकी बेटी पर केस करेगा।”

मैंने सब कुछ तैयार किया। अपने डॉक्यूमेंट्स, असली प्रॉपर्टी पेपर्स, बैंक स्टेटमेंट्स और एक रिपोर्ट जो दिखाती थी कि रितानिया ने कैसे फर्जरी की और फ्रॉड किया। मैं तैयार थी अपनी बेटी से आखिरी बार मिलने के लिए। पर इस बार मैं अकेली नहीं थी। मेरे साथ कानून था और सच्चाई थी।

अगले दिन मैं वकील और दो पुलिस ऑफिसर्स के साथ उसके घर गई। रिसेप्शन में सैकड़ों मेहमान थे। रितानिया स्टेज पर खड़ी थी। सुंदर साड़ी में। उसके पति उसके बगल में।
हम अंदर गए। सबकी नजर हम पर पड़ी। रितानिया ने मुझे देखा। उसका चेहरा सफेद हो गया। उसे उम्मीद नहीं थी कि मैं आऊंगी। वो भी पुलिस के साथ।
मैं धीरे-धीरे स्टेज की तरफ बढ़ी। लोग फुसफुसाने लगे। कौन है यह? क्या हो रहा है? पुलिस क्यों है?

मैं स्टेज पर पहुंची। रितानिया के सामने खड़ी हो गई। उसने घबरा कर पूछा, “मां, आप यहां क्यों आई हो?” मैंने शांति से कहा, “बेटा, मैं तुम्हें बधाई देने आई हूं। और एक छोटी सी बात बताने भी आई हूं।”

उसके पति बोला, “आंटी, यह क्या तमाशा है? और यह पुलिस क्यों है?” मैंने उसकी तरफ देखा। फिर रितानिया की तरफ मुड़ी। बोली, “बेटा, तुमने कल मुझे फोन किया था ना? कहा था कि तुमने मेरे पैसे निकाल लिए और घर अपने नाम कर लिया। मैं तुम्हें बताना चाहती हूं कि तुमने जो घर ट्रांसफर कराया वो असल में तुम्हारा नहीं था।”

सब लोग चुप हो गए। रितानिया ने कहा, “मां, आप क्या बोल रही हो? वो हमारा घर था।” मैंने सिर हिलाया। “नहीं बेटा, वो तुम्हारे पापा के भाई की प्रॉपर्टी थी। जिस पर कोर्ट में केस चल रहा है। तुम्हारे पापा को वह पेपर्स मिले थे। पर वह प्रॉपर्टी कभी हमारी नहीं थी और तुमने उसे ट्रांसफर कराया।”

मैंने अपने बैग से डॉक्यूमेंट्स निकाले। “यह देखो। यह कोर्ट केस के कागजात हैं। यह प्रॉपर्टी डिस्प्यूटेड है। तुमने जो भी बिल्डर को बेचा वो फ्रॉड है। अब वह बिल्डर तुम पर केस करेगा।”

रितानिया का चेहरा पीला पड़ गया। उसके पति ने पूछा, “व्हाट? फ्रॉड। रितानिया, यह क्या है?” रितानिया ने हकलाते हुए कहा, “मां, आपने मुझे वह पेपर्स दिए थे। आपने बताया नहीं कि वह डिस्प्यूटेड है।”

मैंने शांत आवाज में कहा, “मैंने तुम्हें वह पेपर्स इसलिए दिए क्योंकि मुझे शक था कि तुम कुछ गलत करोगी और तुमने वही किया।” वकील ने कहा, “रितानिया जी, आपने एक डिस्प्यूटेड प्रॉपर्टी को बेचकर फ्रॉड किया है। यह आईपीसी की धारा 420 के तहत अपराध है। आप पर केस बन सकता है।”

पुलिस ऑफिसर ने कहा, “और आपने अपनी मां के बैंक अकाउंट से सिग्नेचर फोर् करके पैसे निकाले। यह भी अपराध है।” उसके सास-ससुर उठ खड़े हुए। बोले, “यह क्या हो रहा है? रितानिया, तुमने हमसे झूठ बोला? तुम फ्रॉड हो?”

उसके पति ने अंगूठी उतारकर रितानिया पर फेंक दी। “आई कैन बिलीव यू डिड दिस। यू लाइक टू मी।” वो भागकर चला गया। उसकी फैमिली भी। बाकी लोग भी एक-एक करके जाने लगे। कोई कुछ समझ नहीं पा रहा था। पर सब देख रहे थे कि रितानिया फंस गई थी।

वो घुटनों पर बैठ गई। बोली, “मां, मुझे माफ कर दो। मैंने गलती की। मैं नहीं जानती थी कि वह प्रॉपर्टी डिस्प्यूटेड है।” मैंने उसकी तरफ देखा। मेरा दिल टूट रहा था। पर मैं जानती थी कि यह जरूरी था।

“बेटा, तुमने मुझे मां नहीं, एक एटीएम समझा। अब तुम्हें समझ आएगा कि रिश्तों की कीमत क्या होती है।” पुलिस ने रितानिया को ले गई। मैं वहीं खड़ी रही। घर खाली हो गया था। सिर्फ वकील मेरे साथ थे। उन्होंने कहा, “शांति जी, आपने सही किया। यह मुश्किल था पर जरूरी था।”

मैंने सिर हिलाया। आंखों में आंसू थे। पर मैं जानती थी कि मैंने जो किया वो सही था। अगले कुछ दिनों में बहुत कुछ हुआ। बिल्डर ने रितानिया पर 40 लाख का फ्रॉड केस किया। उसने कहा कि या तो रितानिया पैसे वापस करे या फिर जेल जाए। पर रितानिया के पास पैसे नहीं थे।

उसने 2 लाख तो मुझसे चुराए थे और बाकी 40 लाख बिल्डर को लौटाने थे। उसकी नौकरी चली गई। कंपनी ने उसे निकाल दिया। आखिर कोई क्रिमिनल केस वाले को कैसे रखता? कोर्ट ने रितानिया के सारे बैंक अकाउंट्स फ्रीज कर दिए। उसे 15 महीने की जेल हुई। बेल पर छूटी। पर शर्त थी कि वह बिल्डर को पैसे वापस करेगी।

रितानिया ने मुझे फोन किया। रोते हुए बोली, “मां, प्लीज मेरी मदद करो। मैं खत्म हो गई हूं। मेरी नौकरी चली गई। मेरी शादी टूट गई। मैं कहां जाऊं?” मैंने धीरे से कहा, “बेटा, तुमने अपनी किस्मत खुद लिखी है। अब तुम्हें खुद ही उसे भरना होगा। मेहनत करो। ईमानदारी से कमाओ। हर रुपया बिल्डर को वापस करो। तभी तुम्हारा सिर ऊंचा होगा।”

मैं त्रिपुर वापस आ गई। मेरा अकाउंटिंग का काम चल रहा था। मेरे पास एक नया क्लाइंट आया था। एक विधवा औरत। उसने मुझसे पूछा, “शांति जी, आप अकेली कैसे रहती हैं? आपका कोई बेटा-बेटी है?” मैंने कहा, “हां, बेटी है। पर वो अपनी जिंदगी जी रही है और मैं अपनी।” उस औरत ने कहा, “मुझे भी सिखाइए कैसे आत्मनिर्भर बने।”

मेरा भी बेटा मुझे बोझ समझता है। मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा। “बहन, सबसे पहले अपने डॉक्यूमेंट्स सुरक्षित रखो। अपनी प्रॉपर्टी अपने नाम रखो। अपना पैसा अपने कंट्रोल में रखो और सबसे जरूरी अपने ऊपर भरोसा रखो। बाकी सब ठीक हो जाएगा।”

मैं अब विधवाओं को काउंसलिंग देती हूं। उन्हें फाइनेंशियल इंडिपेंडेंस के बारे में बताती हूं। कैसे अपनी प्रॉपर्टी सुरक्षित रखें? कैसे बच्चों पर निर्भर ना रहें। मैं खुद एक उदाहरण बन गई हूं। लोग मुझसे पूछते हैं, “शांति जी, आपने अपनी बेटी के खिलाफ केस कर दिया। यह तो बहुत कठोर कदम था।”

मैं कहती हूं, “नहीं, यह सही कदम था। अगर मैं चुप रहती तो वह और लोगों को ठगती। कम से कम अब उसे सबक मिला और शायद वह एक बेहतर इंसान बने।” आज मैं अपने घर में बैठी हूं। रात के 11:00 बज रहे हैं। मेरे सामने कंप्यूटर पर एक नया प्रोजेक्ट है। कल मुझे एक क्लाइंट से मिलना है। एक बड़ा प्रोजेक्ट है। एक पूरे घर का अकाउंटिंग सिस्टम बनाना है।

मैं अपने काम में बिजी हूं। खुश हूं, संतुष्ट हूं। मेरी कोयंबटूर की शॉप से किराया आ रहा है। मेरे एफडी से ब्याज मिल रहा है। मेरा बिजनेस अच्छा चल रहा है। मैं किसी पर निर्भर नहीं हूं। मैं त्रिपुर में रहती हूं। आप कहां से हैं? कमेंट में जरूर बताइएगा। शायद आपके शहर की भी कोई कहानी सुना दूं किसी दिन।

रितानिया की खबर मुझे कभी-कभी मिलती है। उसके दोस्तों से। सुना है कि वह अब एक छोटी सी फर्म में काम कर रही है। दिन भर फाइलें संभालती है। थक जाती है पर काम कर रही है। धीरे-धीरे बिल्डर को पैसे चुका रही है। अभी तक सिर्फ 5 लाख चुका पाई है। बाकी 35 लाख अभी बचे हैं।

उसे पता है कि यह काम सालों लगेगा। पर वह कर रही है। मुझे उम्मीद है कि एक दिन वह सच में समझ जाएगी कि रिश्तों की कीमत क्या होती है। मैंने रितानिया से बात करना बंद नहीं किया। पर मैंने उसे साफ कह दिया है कि जब तक वह हर रुपया चुका नहीं देती वह मेरे पास नहीं आ सकती। यह उसकी सजा नहीं, उसका प्रायश्चित है।

जब वह ईमानदारी से कमाकर वह पैसे लौट आएगी तभी उसका सिर ऊंचा होगा। तभी वह कह सकेगी कि वह एक अच्छी इंसान बन गई। इस कहानी से मैंने बहुत कुछ सीखा। सबसे पहला सबक यह कि अपनी संपत्ति हमेशा अपने कंट्रोल में रखो। चाहे बेटा हो या बेटी, कोई भी भरोसेमंद लगे, अपने डॉक्यूमेंट्स अपने पास रखो।

दूसरा सबक यह कि फाइनेंशियल इंडिपेंडेंस बहुत जरूरी है। चाहे कुछ भी हो, अपनी कमाई का जरिया बनाए रखो। तीसरा सबक यह कि बुजुर्गों को कमजोर मत समझो। हम में ताकत है, अनुभव है, समझ है। चौथा सबक यह कि कानून हमारे साथ है। अगर कोई गलत करे तो चुप मत बैठो। लड़ो, न्याय मांगो।

और आखिरी सबक यह कि रिश्ते प्यार और सम्मान से बनते हैं। पैसे से नहीं। मैं आज भी अपने होम ऑफिस में देर रात तक काम करती हूं। कभी-कभी अपने पति की तस्वीर को देखती हूं। सोचती हूं कि काश वो होते तो क्या कहते। शायद वह कहते, “तुमने सही किया शांति, तुमने अपनी बेटी को जिंदगी का सबसे बड़ा सबक सिखाया।”

मैं मुस्कुरा देती हूं और अपने काम में लग जाती हूं। जिंदगी चलती रहती है। पर अब मैं जानती हूं कि मैं अकेली नहीं हूं। मेरे पास मेरा हुनर है, मेरा काम है, मेरी इज्जत है और सबसे जरूरी मेरा आत्मविश्वास है। यही काफी है।