मैंने अपनी बेटी बाथरूम साफ करते पकड़ा, उसके ससुर हँसकर बोले, इसे बस यही आता है… फिर मैंने फोन किया…

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एक फ़ोन कॉल – माँ की लड़ाई

अध्याय 1: सुबह की सच्चाई

सुबह साढ़े छह बजे, वसुंधरा राठौर ने अपनी बेटी आंचल को उसके ससुर के बाथरूम में घुटनों के बल झुका देखा। हाथों में रबर के दस्ताने, चेहरा थका हुआ, आंचल टाइलें रगड़ रही थी। बाहर दरवाज़े पर खड़े हसमुख लाल अग्रवाल, ससुर, पान चबाते हुए अपने बेटे शैलेश से हँसते हुए बोले—”देख लिया ना, इसे बस यही काम आता है। एमबीए करवा दिया तो क्या हुआ, बाथरूम ही साफ़ करती है।”

वसुंधरा के हाथ काँप गए। उनकी बेटी, जिसे उन्होंने अकेले पाला, पढ़ाया, आत्मनिर्भर बनाया, आज नौकरानी से भी बदतर ज़िंदगी जी रही थी। उस पल वसुंधरा ने तय कर लिया—अब चुप नहीं रहेंगी।

अध्याय 2: माँ का शक

आंचल की शादी को दो साल हो चुके थे। शुरू के छह महीने सब ठीक था, लेकिन धीरे-धीरे उसकी आवाज़ बदलने लगी। फोन कम हुए, बातचीत छोटी हो गई। हर बार पूछने पर “सब ठीक है, बस व्यस्त हूँ” कहती। वसुंधरा, नागपुर की रिटायर्ड अपर जिला न्यायाधीश, अनुभव से जानती थी कि आंचल कुछ छुपा रही थी।

एक दिन बिना बताए इंदौर पहुँची। विजय नगर सोसाइटी में आंचल का तीन बेडरूम फ्लैट। दरवाज़ा खोला तो आंचल खुश दिखी, लेकिन घबराई भी। घर में अजीब ख़ामोशी थी। आंचल पतली, थकी, आँखों के नीचे काले निशान। साड़ी पहने, माथे पर बड़ी बिंदी—वो आंचल नहीं थी जिसे वसुंधरा जानती थी।

अध्याय 3: ससुराल का सच

आंचल ने नौकरी छोड़ दी थी। वजह पूछने पर टाल गई। सास कुसुम का व्यवहार ठंडा, ससुर हसमुख लाल ने कहा—”बहुत काम करती है लड़की, पूरे घर का काम संभालती है।” शाम को शैलेश आया, नमस्ते किया, लेकिन कोई ख़ुशी नहीं। खाना बनाना, परोसना, बर्तन धोना—सब आंचल करती। खुद सबसे बाद में खाती।

रात को वसुंधरा ने पूछा—”नौकरी क्यों छोड़ी?” आंचल बोली—”यहाँ का माहौल अलग है। ससुराल में काम ज़रूरी है, नौकरी से घर के काम नहीं हो पाते थे।” वसुंधरा समझ गई, दबाव था। शैलेश भी माता-पिता की बात मानता था।

अध्याय 4: रोज़मर्रा का शोषण

अगली सुबह वसुंधरा जल्दी उठी। देखा, आंचल चाय बना रही थी, नाश्ता तैयार कर रही थी। सात बजे सबको नाश्ता परोसा, खुद खड़ी रही। बर्तन धोना, झाड़ू-पोछा, कपड़े धोना, रसोई साफ़ करना—एक मशीन की तरह काम करती रही। दोपहर का खाना, फिर वही प्रक्रिया। कोई मदद नहीं, कोई सराहना नहीं।

वसुंधरा ने देखा, आंचल के पास अपना पैसा नहीं था। तनख्वाह का बड़ा हिस्सा ससुर को देती थी। शादी के गहने भी गिरवी रख दिए गए थे। हसमुख लाल के व्यवसाय में निवेश के लिए भी पैसे ले लिए गए। शैलेश सब जानता था, लेकिन कुछ नहीं करता था।

अध्याय 5: सबूतों की तलाश

वसुंधरा ने सबूत जुटाने शुरू किए—आंचल की डायरी, बैंक स्टेटमेंट, ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग, पड़ोसी की गवाही। पड़ोसन भारती जोशी ने बताया, “आंचल बहुत मेहनती है, लेकिन ससुराल वाले उससे बहुत काम करवाते हैं। कई बार उसे बालकनी में रोते देखा है।”

दुकान की हालत भी खराब थी, कर्ज़ में डूबा परिवार। वसुंधरा ने सबूत इकट्ठे किए, योजना बनाई।

अध्याय 6: आख़िरी सबूत और फ़ोन कॉल

छठे दिन सुबह, वसुंधरा ने आंचल को बाथरूम साफ करते देखा, ससुर की हँसी और तिरस्कार सुना। उसी पल वीडियो रिकॉर्ड किया। अब सबूत पूरे थे।

नागपुर लौटते ही वसुंधरा ने अपनी पुरानी सहकर्मी दीपाली खरे (वरिष्ठ पुलिस अधिकारी) को फोन किया। सबूत दिखाए, पूरी कहानी सुनाई। दीपाली ने कहा, “ये मामला घरेलू हिंसा, दहेज प्रताड़ना और आर्थिक शोषण का है। हम कार्रवाई करेंगे।”

अध्याय 7: न्याय की लड़ाई

पुलिस, महिला सुरक्षा अधिकारी, पत्रकार मनीषा देशमुख और वसुंधरा इंदौर पहुँचे। पुलिस ने घर पर छापा मारा, सबूत दिखाए। आंचल ने रोते हुए सब सच बताया—नौकरी छुड़वाई गई, पैसे और गहने लिए गए, दिनभर काम करवाया गया।

हसमुख लाल, कुसुम और शैलेश के खिलाफ़ मामला दर्ज हुआ। मीडिया में खबर फैली—”न्यायाधीश की बेटी को नौकरानी बनाया गया, माँ ने लड़ी क़ानूनी लड़ाई।”

अध्याय 8: अदालत का फ़ैसला

आयकर विभाग ने दुकान की जाँच की—कर चोरी का मामला। अदालत में वसुंधरा ने खुद आंचल की वकालत की। सारे सबूत पेश किए—डायरी, बैंक स्टेटमेंट, रिकॉर्डिंग, पड़ोसी की गवाही।

तीन महीने बाद फैसला आया—हसमुख लाल और कुसुम दोषी, एक लाख रुपये जुर्माना, साढ़े तीन लाख रुपये और गहने लौटाने का आदेश। शैलेश को भी दोषी ठहराया गया। आंचल को तलाक़ का अधिकार मिला, गुज़ारा भत्ता तय हुआ। छह महीने बाद तलाक़ मंजूर, आंचल को पंद्रह लाख रुपये और हर महीने तीस हज़ार रुपये तीन साल तक।

अध्याय 9: नई शुरुआत

आंचल ने बैंक में नौकरी शुरू की, सहायक प्रबंधक बनी, तनख्वाह नौ लाख सालाना। धीरे-धीरे फिर से आत्मविश्वासी, खुशहाल हो गई। वसुंधरा राष्ट्रीय महिला आयोग की सलाहकार बनीं, महिलाओं को उनके अधिकार सिखाने लगीं।

आंचल ने सपोर्ट ग्रुप शुरू किया, शोषित बहुओं के लिए। कई महिलाओं की मदद की, उन्हें न्याय दिलाया।

हसमुख लाल की दुकान बंद हो गई, कर्ज़ और जुर्माने से परिवार टूट गया। शैलेश की नौकरी पर असर पड़ा, समाज में बदनामी हुई। वसुंधरा को उन पर कोई तरस नहीं आया।

अध्याय 10: सच्चा सम्मान

एक साल बाद आंचल को बैंक में अनिरुद्ध नामक सहकर्मी से प्यार हुआ। अनिरुद्ध समझदार, सम्मान देने वाला था। दोनों ने शादी की, साधारण समारोह में। आंचल अब खुश है, अपने सपनों के साथ जी रही है।

वसुंधरा ने अपनी कहानी से महिलाओं को सिखाया—कानून जानना ही नहीं, उसका इस्तेमाल करना भी जरूरी है। घरेलू हिंसा सिर्फ़ शारीरिक नहीं, मानसिक, आर्थिक शोषण भी अपराध है। सबूत इकट्ठा करें, अकेले मत रहें, मदद लें। शिक्षा और नौकरी कभी न छोड़ें, अपने पैसे और गहने सुरक्षित रखें, परिवार से संपर्क बनाए रखें।

अध्याय 11: संदेश

वसुंधरा कहती हैं—”आप अकेली नहीं हैं। मदद उपलब्ध है। कानून आपके साथ है। बस एक कदम उठाइए, एक फ़ोन कॉल करिए, और आपकी ज़िंदगी बदल सकती है।”

उनकी कहानी ख़त्म नहीं, नई शुरुआत है। आंचल की तरह हर बेटी, हर माँ, हर महिला को हिम्मत मिले, यही उनका सपना है।

समाप्त