मैंने बस में एक बुज़ुर्ग व्यक्ति की मदद की; वह कानून के प्रोफेसर थे। मेरे घमंडी पति उन्हें देखते ही…

.
.

बस में एक बुज़ुर्ग की मदद, अदालत में एक नई ज़िंदगी

मेरा नाम ज्योति आचार्य है। उम्र 56 साल। पुणे के कोथरूड इलाके में मेरा अपना कोचिंग सेंटर है, जहां मैं पिछले 25 सालों से बच्चों को अंग्रेजी और गणित पढ़ाती हूं। लोग सोचते हैं कि मैं बस एक साधारण ट्यूशन टीचर हूं, लेकिन मेरा संस्थान काफी बड़ा है। 50 से ज्यादा बच्चे आते हैं, चार शिक्षक काम करते हैं और हर महीने अच्छी आमदनी होती है।

28 साल पहले जब मैंने अशोक राणे से शादी की थी, तब सब कुछ अलग था। वह एक अच्छी कंपनी में मार्केटिंग एग्जीक्यूटिव थे। मैं अपनी पढ़ाई पूरी करके घर से छोटे बच्चों को ट्यूशन देना शुरू कर रही थी। शादी के पहले दो साल ठीक रहे। फिर धीरे-धीरे उनका असली चेहरा सामने आने लगा।

पहले छोटी-छोटी बातें थी। मेरा काम उन्हें छोटा लगता था। घर के खर्चे में मेरी कमाई तो ले लेते, पर बाहर किसी से मिलते तो कहते, “मेरी पत्नी घर पर बच्चों को पढ़ाती है,” जैसे मैं बस टाइम पास के लिए काम कर रही हूं। जब मैंने अपना छोटा सा सेंटर खोला तो उन्होंने एक बार भी मुझे शाबाशी नहीं दी। बस इतना कहा, “देखो घर का काम ना भूलना।”

हमारा एक बेटा है, अनिरुद्ध। अब वो 28 साल का है। मुंबई में आईटी कंपनी में काम करता है। बचपन में वह पिता के करीब था, लेकिन धीरे-धीरे उसने भी देखा कि मेरे साथ कैसा व्यवहार हो रहा है।

पर मैं यह कहानी इसलिए नहीं सुना रही कि लोग मुझ पर तरस खाएं। मैं यह इसलिए सुना रही हूं क्योंकि जो कुछ हुआ, उसे सुनकर हर उस औरत को हिम्मत मिलेगी जो सोचती है कि वह कमजोर है। असल में मैं कभी कमजोर नहीं थी। मैंने बस चुप रहना सीखा था और जब जरूरी हो तब बोलना भी।

छह महीने पहले जब मैंने तलाक के लिए वकील से मिलने का फैसला किया, तो मुझे पता था कि आसान नहीं होगा। अशोक जी ऐसे इंसान हैं जिन्हें समाज में अपनी इज्जत बहुत प्यारी है। ऑफिस में अच्छी पोजीशन है। दोस्तों में नाम है। रिश्तेदारों में वह सफल आदमी माने जाते हैं। और मैं? मैं बस उनकी पत्नी हूं जो घर संभालती है।

पर उन्हें नहीं पता था कि मैंने क्या-क्या तैयारी की है। वो दिन मुझे अच्छे से याद है जब मैंने पहली बार वकील के ऑफिस में कदम रखा था। फर्गुसन कॉलेज रोड पर एक छोटा सा ऑफिस। मेरे हाथ कांप रहे थे। मैंने अपनी कॉटन की साड़ी का पल्लू ठीक किया और अंदर चली गई। वकील साहब ने मेरी पूरी कहानी सुनी। फिर उन्होंने पूछा, “आपके पास क्या सबूत है?”

मैंने अपना बैग खोला। अंदर पिछले 15 सालों की बैंक स्टेटमेंट्स थी। मेरे सेंटर के कागजात थे और एक छोटी सी डायरी जिसमें मैंने हर अपमान, हर झूठ, हर धोखा लिख रखा था। तारीख और समय के साथ। वकील साहब मुस्कुराए। उन्होंने कहा, “देवी जी, आप जितना सोचती हैं उससे ज्यादा मजबूत हैं।” तभी मुझे पहली बार लगा कि शायद मैं जीत सकती हूं।

पर मुझे नहीं पता था कि अशोक जी इतनी आसानी से नहीं मानेंगे। अगले ही हफ्ते जो हुआ, वो मेरे लिए सबसे बड़ा झटका था। रविवार की सुबह थी। मैं रसोई में खड़ी थी और आलू के परांठे बना रही थी। तवे पर घी की खुशबू फैल रही थी। अशोक जी अखबार पढ़ रहे थे। तभी उन्होंने अखबार नीचे रखा और बोले, “ज्योति, मुझे तुमसे कुछ बात करनी है।”

मैंने तवे से परांठा उठाया और प्लेट में रखा। “क्या बात है?” उन्होंने मुझे सीधे आंखों में देखा। “तुम यह कोचिंग सेंटर बंद कर दो।” मेरे हाथ से चिमटा नीचे गिर गया। “क्या?” “अब इसकी कोई जरूरत नहीं। अनिरुद्ध की अपनी नौकरी है। हमारे पास काफी पैसा है। तुम इतनी मेहनत क्यों कर रही हो? घर पर आराम से रहो।”

मैंने गहरी सांस ली। “यह मेरा काम है। मैं इसे बंद नहीं कर सकती।” वो हंसे। “ज्योति, तुम बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती हो। यह कोई काम है? असली काम तो मैं करता हूं। मार्केटिंग, क्लाइंट मीटिंग्स, टारगेट्स।” मुझे गुस्सा आया, पर मैंने अपने आप को संभाला। “मेरा सेंटर अच्छा चल रहा है। 50 बच्चे आते हैं। हर महीने अच्छी आमदनी होती है।”

वो उठ खड़े हुए। “हां। और वह पैसा कहां जाता है? घर में ही तो मेरी जेब में। तो फिर मेरा ही काम हुआ ना।” मैं चुप रह गई। उस दिन मुझे समझ आ गया कि अशोक जी को मेरे काम से कोई दिक्कत नहीं थी। उन्हें दिक्कत थी मेरी आजादी से, मेरे अपने पैसे से, मेरी पहचान से।

उस रात जब सब सो गए, मैं अपने छोटे से अध्ययन कक्ष में बैठी। खिड़की से बाहर सड़क की रोशनी आ रही थी। मैंने अपनी डायरी निकाली और लिखा, “15 नवंबर 2024, अशोक ने मुझसे सेंटर बंद करने को कहा। कारण: मेरा काम उन्हें छोटा लगता है।” मैंने निर्णय कर लिया था। मुझे इस रिश्ते से बाहर निकलना है।

अगले दिन से मैंने और तैयारियां शुरू कर दी। मैं वकील से मिलती रही लेकिन बहुत चुपचाप। मेरा सेंटर सुबह 9:00 बजे से शाम 6:00 बजे तक चलता था। वकील का ऑफिस में शाम 7:00 बजे जाती। अशोक जी को लगता था मैं बाजार गई हूं या किसी दोस्त से मिलने।

पर हर चीज इतनी आसानी से नहीं हुई। एक दिन अशोक जी ने हमारे जॉइंट अकाउंट से ₹1 लाख निकाल लिए। मुझे बताए बिना। जब मैंने पूछा तो बोले, “मेरे भाई को जरूरत थी। तुम्हें क्या दिक्कत है?” “दिक्कत,” मैंने धीरे से कहा। “वो मेरे भी पैसे थे।”

उन्होंने ऊंची आवाज में कहा, “तुम्हारा क्या है इस घर में? यह फ्लैट मेरे नाम पर है। बैंक अकाउंट मेरा है। तुम यहां मेरी वजह से हो।” उस दिन मैं कुछ नहीं बोली। बस मुस्कुराई और अपने कमरे में चली गई। क्योंकि मुझे पता था जो वो नहीं जानते थे।

मेरा कोचिंग सेंटर जिस बिल्डिंग में है, वो मेरे नाम पर है पूरी तरह से। मैंने उसे शादी से पहले अपनी मां के पैसों से खरीदा था। और मेरा अपना बैंक अकाउंट था जो उन्हें कभी पता नहीं चला। मैंने उन पैसों को बहुत समझदारी से बचाया था। हर महीने थोड़ा-थोड़ा, 25 साल में करीब ₹50 लाख जमा हो गए थे। अशोक जी को लगता था कि मैं उन पर निर्भर हूं। लेकिन सच तो यह था कि मैं पिछले 10 सालों से उनसे आर्थिक रूप से पूरी तरह आजाद थी।

दिसंबर आ गया। मैंने तलाक के कागजात फाइल कर दिए। जब अशोक जी को नोटिस मिला तो वह पागल हो गए। “तुमने यह क्या किया?” उन्होंने चिल्लाते हुए कहा, “तुम तलाक मांग रही हो? क्यों? मैंने तुम्हारे साथ क्या गलत किया?” मैं शांत बैठी रही। “आप जानते हैं आपने क्या किया है?” “नहीं, मुझे बताओ।” उन्होंने मेरी तरफ उंगली उठाई। “यह सब तुम्हारे दिमाग की उपज है। तुम अब बूढ़ी हो रही हो। दिमाग काम नहीं कर रहा।”

मैंने उन्हें सीधे आंखों में देखा। “अशोक जी, कोर्ट में मिलते हैं।” उस रात से हमारे बीच बातचीत बंद हो गई। घर में सन्नाटा रहने लगा। अशोक जी अपने कमरे में रहते, मैं अपने में। अनिरुद्ध को जब पता चला तो पहले वह समझ नहीं पाया। उसने फोन पर कहा, “मां, क्या हो रहा है? अचानक से यह क्या?” मैंने उससे कहा, “बेटा, कुछ चीजें अचानक नहीं होती। बहुत सोच समझ कर होती हैं।”

जनवरी में जो हुआ, वह मैंने नहीं सोचा था। एक दिन अचानक पुलिस मेरे घर आई। उन्होंने कहा कि अशोक जी ने शिकायत की है कि मैं मानसिक रूप से अस्थिर हूं, कि मैं अजीब व्यवहार कर रही हूं, कि मुझे इलाज की जरूरत है। मैं सदमे में आ गई। यह झूठ था। पूरा झूठ। पर अशोक जी ने यह सब इसलिए किया ताकि कोर्ट में मेरी बात का कोई असर ना हो।

मैंने उसी दिन अपने वकील को फोन किया। उन्होंने कहा, “चिंता मत कीजिए। हम इसका जवाब देंगे। आप डॉक्टर से मेडिकल सर्टिफिकेट ले आइए और अगर हो सके तो किसी मनोचिकित्सक से मिल लीजिए।” मैंने वैसा ही किया। डॉक्टर ने लिखा कि मैं पूरी तरह स्वस्थ हूं। मेरे सेंटर के सभी शिक्षकों ने लिखित में बताया कि मैं रोज काम पर आती हूं। अच्छे से काम करती हूं।

पर सबसे बड़ी बात यह थी कि अशोक जी की यह चाल उलटी पड़ गई। अदालत में झूठी शिकायत करना गैरकानूनी है। मेरे वकील ने इसे केस में शामिल कर लिया।

फरवरी के महीने में एक और घटना हुई। एक शाम अशोक जी के कुछ रिश्तेदार घर आए। उनकी बुआ, उनके चचेरे भाई सब ने मुझे समझाना शुरू किया। “ज्योति बेटी,” बुआ जी ने कहा। “तुम यह क्या कर रही हो? इतने साल की शादी, अनिरुद्ध बड़ा हो गया। अब तुम्हें तलाक की क्या जरूरत?”

मैंने कहा, “बुआ जी, आपको नहीं पता मेरे साथ क्या हुआ है।” “तो क्या हुआ?” चचेरे भाई बोले, “हर घर में थोड़े बहुत झगड़े होते हैं। अशोक भैया अच्छे इंसान हैं। तुम्हें सब दिया है।”

मैंने एक लंबी सांस ली। मैंने उन्हें नहीं बताया कि अशोक जी ने मुझे क्या दिया। अपमान दिया। मेरे काम को छोटा दिखाया। मेरे पैसे उठाकर अपने काम में लगाए। मुझे मानसिक रूप से प्रताड़ित किया। मैं चुप रही क्योंकि मुझे पता था कि यह लोग नहीं समझेंगे। समाज को बस बाहर का दिखावा चाहिए। अंदर क्या हो रहा है उससे किसी को मतलब नहीं।

उस रात मैं सो नहीं पाई। मुझे लगा कि शायद मैं गलत हूं। शायद मुझे सहना चाहिए। शायद सबकी बात मानकर वापस चली जानी चाहिए। पर फिर मैंने सोचा, अगर मैं यह नहीं कर पाई तो मैं बाकी जिंदगी कैसे जिऊंगी? अपने को आईने में देखकर कैसे सामना करूंगी? अपनी बेटी को अगर होती तो क्या सीख देती? नहीं, मैंने फैसला कर लिया था। मैं पीछे नहीं हटूंगी।

मार्च आ गया। कोर्ट की सुनवाइयां शुरू हो गई। हर हफ्ते एक तारीख, हर बार अशोक जी अपने वकील के साथ आते। मैं अपने वकील के साथ। कोर्ट रूम में हम एक दूसरे को देखते भी नहीं थे। उनका वकील कोशिश करता कि मुझे गलत साबित करें। कहता कि मैंने घर छोड़ दिया, कि मैंने पति के साथ गलत व्यवहार किया, कि मैं पैसों के लिए तलाक चाहती हूं।

पर मेरे पास सबूत थे। बैंक स्टेटमेंट्स दिखाए। मेरी डायरी दिखाई, डॉक्टर के सर्टिफिकेट दिखाए। मेरे सेंटर के शिक्षकों और कुछ माता-पिता ने मेरे लिए गवाही दी और धीरे-धीरे अदालत को समझ आने लगा कि सच क्या है।

अप्रैल के अंत में जज ने अंतिम सुनवाई की तारीख तय की। 7 मई। मैंने अपने वकील से पूछा, “क्या आपको लगता है हम जीतेंगे?” उन्होंने मुस्कुराकर कहा, “देवी जी, हम पहले ही जीत चुके हैं। बस औपचारिकता बाकी है।”

पर मुझे एक डर था। 7 मई को अगर कुछ गलत हो गया तो? मई का पहला हफ्ता बहुत तनाव भरा रहा। मैं ठीक से सो नहीं पा रही थी। खाना ठीक से नहीं खा पा रही थी। सिर्फ 7 मई का इंतजार था और फिर वह दिन आ गया।

7 मई की सुबह। आसमान में हल्के बादल थे। मौसम सुहाना था। पर मेरा दिल जोरजोर से धड़क रहा था। मैंने सफेद कॉटन की साड़ी पहनी। छोटी सी बिंदी लगाई। मेरे पास एक ब्रीफ केस था जिसमें सभी कागजात थे। मैं अपने घर से निकली। अशोक जी पहले ही निकल चुके थे। मैंने पीएमपीएमएल की बस पकड़ी। कोथरूड से शिवाजी नगर कोर्ट जाने के लिए।

बस भरी हुई थी। मैं खड़ी हो गई। मेरे हाथ में ब्रीफ केस था। एक हाथ से मैं रड पकड़े हुई थी। शिवाजी नगर बस स्टॉप पर जब बस रुकी तो अचानक बहुत भीड़ हो गई। लोग धक्कामुक्की करके चढ़ने लगे। तभी मैंने देखा कि एक बुजुर्ग सज्जन बस में चढ़ने की कोशिश कर रहे थे। उनके हाथ में एक बड़ा सा बैग था और वह संतुलन नहीं बना पा रहे थे।

मैंने फौरन अपना हाथ आगे बढ़ाया। “आइए, मैं मदद कर देती हूं।” उन्होंने मुस्कुराते हुए मेरी तरफ देखा। “बहुत-बहुत धन्यवाद बेटी।” मैंने उनका बैग पकड़ा और उन्हें चढ़ने में मदद की। फिर मैंने उन्हें अपनी सीट दे दी जो मुझे खाली मिल गई थी। “नहीं नहीं बेटी, आप बैठो।” उन्होंने कहा। मैंने हाथ जोड़ दिए। “जी नहीं, आप बैठिए। मैं ठीक हूं।” वो बैठ गए।

बस फिर से चल पड़ी। मैं उनके पास खड़ी थी और खिड़की से बाहर देख रही थी। मेरा दिल अब भी तेज धड़क रहा था। आधे घंटे में कोर्ट पहुंचना था। तभी उन बुजुर्ग सज्जन ने कहा, “बेटी, तुम कहां जा रही हो?” मैंने उनकी तरफ देखा। “शिवाजी नगर कोर्ट।” “अच्छा,” उन्होंने कहा, “मैं भी वहीं जा रहा हूं।” मैं थोड़ी हैरान हुई। “आप भी?” “हां,” उन्होंने कहा, “मैं वकील हूं। रिटायर्ड। अब कभी-कभी सलाह के लिए बुलाते हैं। आज एक केस में कंसलटेंट के तौर पर जाना है।” मैंने सिर हिलाया। “अच्छा। तुम्हारा केस है क्या?” उन्होंने पूछा।

मैंने एक पल सोचा। फिर कहा, “जी हां, तलाक का केस।” उन्होंने धीरे से कहा, “समझ सकता हूं। आजकल बहुत केस आते हैं। तुम घबराओ मत, सच हमेशा जीतता है।” मुझे उनकी बात से थोड़ा सुकून मिला। मैंने कहा, “धन्यवाद।”

बस शिवाजी नगर पहुंची, हम दोनों उतरे। मैंने फिर से उनके बैग में मदद की। “बहुत अच्छा लगा मिलकर,” उन्होंने कहा। “भगवान तुम्हारे साथ है।” मैं कोर्ट की तरफ चल पड़ी, पर थोड़ी दूर चलने के बाद मुझे एहसास हुआ कि वो बुजुर्ग सज्जन भी मेरे पीछे आ रहे हैं।

मैं रुक गई। “आप भी इसी तरफ?” मैंने पूछा। “हां बेटी,” वो बोले, “अगर तुम्हें बुरा ना लगे तो मैं तुम्हारे साथ चलता हूं। इतना भारी बैग है, कोर्ट तक साथ हो जाएगा।” मैंने कोई ऐतराज नहीं किया। सच कहूं तो मुझे अच्छा लग रहा था। उनकी मौजूदगी से एक अजीब सा भरोसा मिल रहा था।

हम साथ-साथ कोर्ट की तरफ चलने लगे। रास्ते में उन्होंने पूछा, “तुम्हारा वकील कौन है?” मैंने अपने वकील का नाम बताया। “अच्छा,” उन्होंने कहा, “अच्छे वकील हैं। तुम अच्छे हाथों में हो।” मुझे थोड़ी राहत मिली। हम कोर्ट की सीढ़ियां चढ़ने लगे। अंदर जाकर मैंने अपना कोर्ट रूम ढूंढा। नंबर सात। मैं अंदर जाने वाली थी कि उन बुजुर्ग सज्जन ने कहा, “बेटी, 1 मिनट।”

मैं रुक गई। “मेरा नाम जगन्नाथ गोस्वामी है,” उन्होंने कहा। “अगर कभी जरूरत हो तो याद रखना।” मैंने उन्हें धन्यवाद कहा और अंदर चली गई। मैंने सोचा, कितने अच्छे इंसान हैं। आज जैसे भगवान ने ही भेज दिया।

पर मुझे नहीं पता था कि वह सिर्फ एक अच्छे इंसान नहीं थे। वो कुछ और थे। कोर्ट रूम में मैंने अपना वकील देखा। वो मुस्कुराए। “सब तैयार है देवी जी। आज आखिरी सुनवाई है।” मैं एक बेंच पर बैठ गई। मेरे हाथ ठंडे पड़ रहे थे। थोड़ी देर बाद अशोक जी अपने वकील के साथ आए। उन्होंने मुझे देखा पर कुछ नहीं बोले। वो सामने वाली बेंच पर बैठ गए।

जज साहब अब भी नहीं आए थे। कोर्ट रूम में कई लोग बैठे थे। अलग-अलग केस के। तभी दरवाजे से वही बुजुर्ग सज्जन अंदर आए। जगन्नाथ गोस्वामी जी। मैं मुस्कुराई। शायद उनका भी कोई केस यहीं है।

पर जो अगले पल हुआ, उसने मेरी सांसे रोक दी। अशोक जी ने उन्हें देखा और एकदम से उनका चेहरा सफेद पड़ गया। उनके माथे पर पसीना आ गया। वो खड़े हो गए। “गोस्वामी सर,” अशोक जी की आवाज कांप रही थी। “आप यहां?”

जगन्नाथ जी ने उनकी तरफ देखा। शांति से मुस्कुराए। “हां, मैं यहां हूं। क्यों? कोई दिक्कत है?” “नहीं सर, बिल्कुल नहीं।” अशोक जी ने घबराहट में कहा, “मैं… मैं बस… मैं नहीं जानता था कि आप यहां होंगे।”

मैं कुछ समझ नहीं पा रही थी। यह क्या हो रहा है? मेरे वकील मेरे पास आए और धीरे से बोले, “देवी जी, आप जानती हैं यह कौन है?” मैंने सिर हिलाया। “हां, बस में मिले थे। बहुत अच्छे इंसान लगे।”

मेरे वकील ने मुस्कुराते हुए कहा, “यह सिर्फ अच्छे इंसान नहीं है। यह प्रोफेसर जगन्नाथ गोस्वामी हैं। पुणे के सबसे मशहूर कानून के प्रोफेसर। सुप्रीम कोर्ट में कई बड़े केस लड़ चुके हैं। रिटायरमेंट के बाद भी जब यह कोर्ट में आते हैं तो हर कोई उनका सम्मान करता है। यहां के हर वकील और जज उन्हें जानते हैं।”

मेरा मुंह खुला का खुला रह गया। मैंने बस में जिनकी मदद की थी वो। अशोक जी अब पूरी तरह घबरा गए थे। उनके वकील भी परेशान लग रहे थे। दोनों आपस में कुछ फुसफुसा रहे थे।

प्रोफेसर गोस्वामी मेरे पास आए। उन्होंने धीरे से कहा, “बेटी, तुम्हारा केस यही है ना?” मैंने हां में सिर हिलाया। उन्होंने कहा, “मुझे अंदाजा नहीं था कि तुम्हारा केस आज है।” पर अब जब मैं यहां हूं तो क्या तुम बुरा मानोगी अगर मैं तुम्हारे वकील की मदद करूं?”

मैं कुछ बोल नहीं पाई। बस आंखों में आंसू आ गए। मेरे वकील ने कहा, “सर, यह हमारे लिए सम्मान की बात होगी।” प्रोफेसर गोस्वामी ने मुझे देखा। उनकी आंखों में एक अजीब सा भरोसा था। उन्होंने कहा, “तुमने आज बस में मेरी मदद की। बिना कुछ सोचे, बिना कुछ जाने। ऐसे लोग आजकल कम मिलते हैं। अब मेरी बारी है तुम्हारी मदद करने की।”

जज साहब अंदर आए। सब खड़े हो गए। सुनवाई शुरू हुई। अशोक जी के वकील ने अपनी बात रखनी शुरू की। पर उनकी आवाज में वह ताकत नहीं थी जो पहले होती थी। वह बार-बार प्रोफेसर गोस्वामी की तरफ देख रहे थे।

फिर मेरे वकील ने बोलना शुरू किया। उन्होंने सारे सबूत पेश किए। बैंक स्टेटमेंट्स, मेरी डायरी, मेडिकल सर्टिफिकेट्स, गवाहों के बयान। फिर प्रोफेसर गोस्वामी खड़े हुए। उन्होंने जज साहब से कहा, “मैं इस केस में कंसलटेंट के तौर पर पेश हो रहा हूं। अगर अदालत इजाजत दे।”

जज साहब ने सम्मान से कहा, “गोस्वामी सर, आपको इजाजत की क्या जरूरत? आप तो इस कोर्ट के लिए हमेशा सम्मानीय हैं।”

प्रोफेसर गोस्वामी ने सारे केस को समझाना शुरू किया। उन्होंने हर कानूनी पहलू को इतनी सफाई से रखा कि अशोक जी के वकील के पास कहने को कुछ नहीं बचा। उन्होंने कहा, “यह केस सिर्फ तलाक का नहीं है। यह एक औरत के सम्मान का है। एक औरत जिसने 28 साल अपमान सहा, जिसका काम छोटा बताया गया, जिसके पैसे बिना पूछे इस्तेमाल किए गए, जिस पर झूठे आरोप लगाए गए। और सबसे बुरी बात, जिसे मानसिक रूप से अस्थिर बताकर उसकी आवाज को दबाने की कोशिश की गई।”

वह अशोक जी की तरफ मुड़े। “आपने यह सोचकर गलती की कि यह औरत कमजोर है। लेकिन असल में यह आपसे ज्यादा मजबूत है। क्योंकि इसने अपने बल पर सब कुछ बनाया। आपने सिर्फ इसकी मेहनत का फायदा उठाया।”

कोर्ट रूम में सन्नाटा था। अशोक जी का सिर नीचे झुक गया था। प्रोफेसर गोस्वामी ने जज साहब से कहा, “मैं अदालत से गुजारिश करता हूं कि इस महिला को ना केवल तलाक दिया जाए बल्कि इनकी सारी संपत्ति इन्हें वापस दी जाए। और जो झूठा केस इनके पति ने इन पर लगाया था, उसके लिए इन्हें हर्जाना भी मिलना चाहिए।”

जज साहब ने सारे कागजात देखे। फिर उन्होंने फैसला सुनाया। “यह अदालत ज्योति आचार्य को तलाक देती है। इनकी सारी संपत्ति इन्हें मिलेगी। जॉइंट अकाउंट में जो पैसा है, उसका 60% इन्हें मिलेगा और अशोक राणे को झूठा केस करने के लिए ₹5 लाख हर्जाना देना होगा।”

मैं रो पड़ी। खुशी के आंसू थे। 28 साल बाद मुझे आजादी मिली थी। अशोक जी का चेहरा देखने लायक था। वो पूरी तरह टूट गए थे। उनका घमंड, उनका रुतबा सब खत्म हो गया था। कोर्ट रूम से बाहर निकलते समय प्रोफेसर गोस्वामी ने मुझसे कहा, “बेटी, यह तुम्हारी जीत है। तुमने हार नहीं मानी। यही सबसे बड़ी बात है।”

मैंने उनके पैर छुए। “आपका बहुत-बहुत शुक्रिया।” वो हंसे। “शुक्रिया मत करो। तुमने आज सुबह बस में मेरी मदद की थी। बिना कुछ जाने। यह तो बस वापसी थी।”

उस दिन मैं घर लौटी तो मेरा दिल हल्का था। सालों बाद मुझे सुकून मिला था। अगले हफ्ते अशोक जी घर से चले गए। उन्होंने एक किराए का फ्लैट लिया। उनके दोस्तों और रिश्तेदारों को जब पता चला कि कोर्ट में क्या हुआ तो सब ने उनसे दूरी बना ली। जिस इज्जत और रुतबे को वह इतना संभालते थे, वह सब खत्म हो गया। उनकी कंपनी में भी लोगों को पता चल गया। कुछ महीनों बाद उन्हें वहां से भी जाना पड़ा।

उन्होंने मुझे एक बार फोन किया और माफी मांगी। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। अनिरुद्ध ने जब पूरी सच्चाई जानी तो वह मेरे साथ आ गया। उसने कहा, “मां, मुझे माफ कर दो। मैं समझ नहीं पाया था।” उसने अपने पिता से बात करना बंद कर दिया।

मैं आज पुणे में अपने घर में रहती हूं। मेरा कोचिंग सेंटर पहले से भी अच्छा चल रहा है। अब 70 से ज्यादा बच्चे आते हैं। मैंने दो और शिक्षक रख लिए हैं। हर शाम जब मैं अपने अध्ययन कक्ष में बैठती हूं तो खिड़की से बाहर देखती हूं और सोचती हूं कि काश मैंने यह फैसला पहले लिया होता। पर फिर मुझे एहसास होता है कि हर चीज का अपना समय होता है। मैंने तब किया जब मैं तैयार थी और यही सही था।

अनिरुद्ध अब महीने में एक बार मुझसे मिलने आता है। वह अपनी गर्लफ्रेंड को भी लाया था। अच्छी लड़की है। मैंने उससे कहा, “बेटा, हमेशा अपनी पत्नी का सम्मान करना। कभी उसे छोटा मत समझना।” उसने कहा, “मां, मैं आपसे सीख चुका हूं।”

प्रोफेसर गोस्वामी जी से मेरा संपर्क बना रहा। वह कभी-कभी फोन करके हालचाल पूछते हैं। मैंने उन्हें एक बार खाने पर बुलाया था। मैंने उनके लिए पुरण पोली बनाई थी। उन्हें बहुत पसंद आई। उन्होंने कहा, “बेटी, तुमने मेरी बस में मदद की थी। पर असल में तुमने मुझे याद दिलाया कि अच्छाई अब भी बाकी है इस दुनिया में। और जब मैंने तुम्हारे पति का चेहरा देखा कोर्ट में तो मुझे पता चल गया कि यह केस जितनातना मेरे लिए जरूरी है।”

मैंने पूछा, “सर, आप उन्हें कैसे जानते थे?” वह हंसे। “15 साल पहले मैंने एक सेमिनार में उन्हें देखा था। तब वह बहुत घमंड से बातें कर रहे थे। अपनी पत्नी के बारे में भी कुछ अजीब टिप्पणी की थी। मुझे याद रह गया था। आज जब मैंने उन्हें कोर्ट में देखा तो मैं समझ गया कि यह वही इंसान है।”

अब मुझे पछतावा नहीं है। ना उन 28 सालों का, ना उस अपमान का। क्योंकि उसी ने मुझे मजबूत बनाया। उसी ने मुझे सिखाया कि मैं कितनी ताकतवर हूं। आज जब मैं अपने बालकनी में खड़ी होकर चाय पीती हूं तो मुझे सुकून मिलता है। मुझे अब किसी से डर नहीं लगता। मुझे अब किसी की इजाजत की जरूरत नहीं। मैं आजाद हूं। सही मायने में आजाद।

इस कहानी से मैंने सीखा कि उम्र सिर्फ एक नंबर है। 56 साल की उम्र में भी मैंने अपनी जिंदगी बदल दी। मैंने सीखा कि अगर आपके पास सच है, अगर आपके पास सबूत हैं, तो कोई आपको नहीं हरा सकता। मैंने यह भी सीखा कि अच्छाई कभी बेकार नहीं जाती। बस में एक बुजुर्ग की मदद करना एक छोटी सी बात थी। पर उसी का नतीजा था कि आज मैं इतनी शांति से अपनी जिंदगी जी रही हूं।

और सबसे बड़ी बात जो मैंने सीखी वो यह है कि कभी भी देर नहीं होती। अगर आपको लगता है कि आप गलत रिश्ते में हैं, गलत जगह पर हैं तो बाहर निकलिए। डरिए मत क्योंकि जिंदगी एक ही बार मिलती है और आपको हक है खुश रहने का।

आज जब मैं सोने से पहले अपने पति की पुरानी तस्वीर देखती हूं जो मैंने अलमारी में रख दी है तो मुझे गुस्सा नहीं आता। मुझे दया आती है। दया इस बात की कि उन्होंने एक अच्छी औरत को खो दिया। दया इस बात की कि उनका घमंड उनकी जिंदगी बर्बाद कर गया। पर मैं उन्हें माफ नहीं कर सकती। कुछ चीजें माफी से परे होती हैं। 28 साल का अपमान, 28 साल की प्रताड़ना, यह सब भुलाया नहीं जा सकता।

आज मेरी छात्राओं में से कई लड़कियां मुझसे सलाह लेने आती हैं। कभी पढ़ाई की, कभी जिंदगी की। मैं उन्हें हमेशा यही कहती हूं कि पढ़ाई करो। अपने पैरों पर खड़ी हो। किसी पर निर्भर मत रहो। क्योंकि जब आप आर्थिक रूप से आजाद होंगी तो कोई आपको दबा नहीं सकता।

मेरा कोचिंग सेंटर अब सिर्फ पढ़ाई की जगह नहीं है। यह एक जगह है जहां मैं लड़कियों को जिंदगी के सबक भी सिखाती हूं। जहां मैं उन्हें बताती हूं कि खुद पर भरोसा करना कितना जरूरी है। कल एक लड़की ने मुझसे कहा, “मैडम, आप मेरी हीरो हैं। मैं बड़ी होकर आपकी तरह बनना चाहती हूं।” मैंने उसे गले लगाया और कहा, “बेटा, तुम मुझसे भी बेहतर बनोगी। क्योंकि तुम अभी से सीख रही हो। मुझे तो 56 साल लग गए।”

आज रात जब मैं सोने जा रही हूं तो मेरा दिल भरा हुआ है। शुक्रगुजारी से, संतोष से, शांति से। मैंने अपनी लड़ाई जीत ली है। और यह जीत सिर्फ मेरी नहीं है। यह हर उस औरत की है जो सोचती है कि वह कमजोर है। यह हर उस औरत की है जो डरती है कि अगर उसने आवाज उठाई तो क्या होगा? मैं उन सब से कहना चाहती हूं – डरो मत। आवाज उठाओ। क्योंकि जब तक तुम चुप रहोगी, अन्याय होता रहेगा और जब तुम बोलोगी, तुम्हें ताकत मिलेगी।

शायद बस में कोई बुजुर्ग प्रोफेसर ना मिले, पर तुम्हें अपनी ताकत जरूर मिलेगी। अपने सच की ताकत और वही काफी है।

.

.