रात में देवर-भाभी खेल रहे थे लूडो… एक छोटी सी बात और उजड़ गया पूरा घर!

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मैनपुरी ह-त्या-कांड: लूडो के खेल में छिपी थी मौ-त, देवर ने ही ले ली भाभी की जान – एक खौफनाक दास्तां

 

उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले से एक ऐसी दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है जिसने रिश्तों की पवित्रता और पारिवारिक विश्वास पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस घर में हंसी-मजाक और खेल चल रहा था, वहीं अचानक चीखें गूंजी और एक हँसता-खेलता परिवार पल भर में तबाह हो गया। यह कहानी है ‘दिल्हा’ गांव की, जहां एक मामूली लूडो के खेल ने एक खौ-फनाक र-क्त-रंजित अं-जाम ले लिया।

1. दिल्हा गांव: शांति के पीछे छिपा सन्नाटा

मैनपुरी के कुर्रा थाना क्षेत्र में स्थित दिल्हा गांव (अनूपपुर दिल्हा) किसी भी आम भारतीय गांव की तरह शांत और सरल है। यहां के लोग खेती-किसानी से जुड़े हैं और आपसी भाईचारे के लिए जाने जाते हैं। लेकिन 9 मार्च 2026 की रात इस गांव के इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज हो गई।

इसी गांव के एक घर में पूनम नाम की महिला रहती थी, जिसकी शादी 2016 में सौरभ चौहान के साथ हुई थी। सौरभ अपने परिवार के बेहतर भविष्य के लिए गुजरात के अहमदाबाद में नौकरी करता था, जबकि पूनम घर पर अपने बुजुर्ग ससुर की सेवा और गृहस्थी संभालती थी।

2. रिश्तों का ताना-बाना और देवर ऋषभ

सौरभ के चाचा सामंत का परिवार भी उसी घर के साझा आंगन में रहता था। सामंत का बेटा ऋषभ, जो रिश्ते में पूनम का चचेरा देवर लगता था, कुछ समय पहले ही गुजरात से काम छोड़कर गांव लौटा था। भारतीय समाज में देवर-भाभी का रिश्ता हंसी-मजाक और सम्मान का मिश्रण होता है। पूनम और ऋषभ के बीच भी सब कुछ सामान्य लग रहा था, लेकिन ऋषभ के भीतर एक आ-क्रामक और अहंकारी स्वभाव छिपा था।

3. 9 मार्च की वो मनहूस रात: लूडो का खेल और ‘चिकोटी’

रात के करीब 8:30 बज रहे थे। खाना खाने के बाद समय बिताने के लिए पूनम और ऋषभ लूडो खेलने बैठे। खेल के दौरान ऋषभ ने मर्यादा लांघते हुए मजाक में अपनी भाभी पूनम को ‘चिकोटी’ (Pinch) काट ली।

पूनम, जो एक स्वाभिमानी और मर्यादित महिला थी, उसे यह ओछी हरकत बिल्कुल पसंद नहीं आई। उसने तुरंत ऋषभ को फटकार लगाई और चेतावनी दी कि वह इसकी शिकायत अपने पति सौरभ से करेगी। पूनम का अपने आत्म-सम्मान के लिए खड़ा होना ऋषभ के ‘पुरुष प्रधान अहंकार’ को चोट पहुंचा गया।

4. आ-क्रोश का तांडव: रसोई बनी क-त्ल-गाह

पूनम की धमकी ने ऋषभ के भीतर के शैतान को जगा दिया। उसे लगा कि एक महिला उसे चुनौती दे रही है। गुस्से में अंधा होकर ऋषभ ने पूनम को जबरन रसोई की तरफ खींच लिया। वहां उसने पूनम की गला दबाकर नि-र्मम ह-त्या कर दी। जिस रसोई से पूरे परिवार का पेट भरता था, वही रसोई उस रात एक बेबस महिला की आखिरी सांसों की गवाह बनी।

5. सा-जिश और सुबूत मिटाने की कोशिश

ह-त्या करने के बाद ऋषभ ने बेहद शातिर दिमाग का परिचय दिया। उसने पूनम के मोबाइल से सिम कार्ड निकालकर गायब कर दिया ताकि किसी भी तरह की कॉल डिटेल्स या लोकेशन का पता न चल सके। उसने घर के बाकी सदस्यों को भनक तक नहीं लगने दी कि उसने अंदर क्या भयानक कांड कर दिया है। रात भर वह सामान्य दिखने का नाटक करता रहा।

6. सुबह का उजाला और राज का पर्दाफाश

10 मार्च की सुबह जब पूनम के मायके वालों का उससे संपर्क नहीं हो पाया, तो उन्हें अनहोनी का श-क हुआ। उन्होंने पुलिस हेल्पलाइन 112 पर सूचना दी। पुलिस जब मौके पर पहुंची, तो पूनम का शव फर्श पर पड़ा मिला। पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने साफ कर दिया कि पूनम की मौ-त ‘दम घुटने’ (Strangulation) से हुई है।

सौरभ भी बदहवास हालत में अहमदाबाद से गांव पहुंचा। पुलिस ने वैज्ञानिक साक्ष्यों और इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस की मदद से जांच शुरू की। ऋषभ की हरकतों पर पुलिस को श-क हुआ, क्योंकि वह अंतिम संस्कार के दौरान जरूरत से ज्यादा सामान्य दिखने की कोशिश कर रहा था।

7. गिरफ्तारी और जुर्म का कबूलनामा

11 मार्च की सुबह जब ऋषभ ने गांव से भागने की कोशिश की, तो पुलिस ने उसे दबोच लिया। कड़ी पूछताछ के बाद ऋषभ टूट गया और उसने अपना खौ-फनाक जुर्म कबूल कर लिया। उसने बताया कि कैसे एक पल के बेकाबू गुस्से ने उससे अपनी ही भाभी की जान ले ली।

पुलिस ने यह भी साफ किया कि इस मामले में कोई अ-वै-ध सं-बंध (Extra-marital affair) नहीं था; यह पूरी तरह से ईगो और गुस्से का मामला था।

8. समाज के लिए एक गंभीर सबक

यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि हमारे समाज में सहनशीलता (Tolerance) कितनी कम होती जा रही है। एक मामूली सा खेल और एक छोटी सी बहस कैसे मौ-त का कारण बन सकती है?

गुस्से पर नियंत्रण: पल भर का आ-क्रोश जीवन भर का पछतावा बन जाता है।

मर्यादा का सम्मान: रिश्तों में हंसी-मजाक की एक सीमा होती है जिसे कभी पार नहीं करना चाहिए।

अहंकार का विनाश: ऋषभ ने न केवल पूनम की जान ली, बल्कि दो परिवारों को हमेशा के लिए बर्बाद कर दिया।

निष्कर्ष

आज ऋषभ जेल की सलाखों के पीछे है, लेकिन सौरभ के घर का वो आंगन अब कभी पहले जैसा नहीं होगा। दिल्हा गांव के लोग आज भी उस रात को याद कर सिहर उठते हैं। यह कहानी हमें याद दिलाती है कि घर की चारदीवारी के भीतर भी सतर्कता और संस्कारों की कितनी जरूरत है।