रोज़ स्कूल के बाहर 3 अनाथ बच्चों को खाना देती थी यह महिला… 25 साल बाद उसके घर हेलीकॉप्टर उतरा

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माँ, ठेला और हेलीकॉप्टर: 25 साल बाद लौटे तीन बेटे

प्रस्तावना

शहर के बाहरी हिस्से में एक पुराना सरकारी स्कूल था। उसकी इमारत जर्जर थी, दीवारों की पपड़ी उतर रही थी, और बरसात में छत टपकती थी। लेकिन उस स्कूल के बाहर हर सुबह एक ठेला लगता था, जिस पर दाल-रोटी की खुशबू उठती थी। ठेले के पीछे खड़ी रहती थी कमला देवी—एक साधारण, मेहनती औरत, जिसके चेहरे पर झुर्रियाँ थीं, लेकिन आँखों में अपनापन था।

कमला देवी की जिंदगी कभी आसान नहीं थी। उसका पति एक फैक्ट्री हादसे में चल बसा, कोई संतान नहीं थी, रिश्तेदारों ने कुछ दिन संवेदना जताई और फिर उसे अकेला छोड़ दिया। कमला ने रोना छोड़ दिया और जीना सीख लिया। पहले घर-घर जाकर बर्तन मांजे, फिर सिलाई की, और आखिर में सड़क किनारे ठेला लगाकर खाना बनाना शुरू किया। यही ठेला उसकी पहचान बन गया।

तीन अनाथ बच्चे

हर सुबह कमला देवी सूरज निकलने से पहले उठती, चूल्हा जलाती, दाल चढ़ाती और रोटियों का आटा गूंथती। स्कूल खुलने से पहले उसका ठेला गेट के सामने लग जाता। बच्चे आते, शोर मचाते, कोई हँसता, कोई रोता। लेकिन उन्हीं बच्चों के बीच तीन चेहरे ऐसे थे, जो रोज कमला देवी की नजरों में अटक जाते थे।

वे तीनों बच्चे लगभग एक ही उम्र के थे। कपड़े मैले, जूते टूटे, और आँखों में एक ऐसी भूख झलकती थी जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। स्कूल की छुट्टी के बाद वे गेट के पास खड़े होकर बाकी बच्चों के टिफिन झांकते रहते। कभी कोई बचा-खुचा फल मिल जाता, वही उनका खाना बनता।

पहले दिन कमला ने उन्हें देखा, दूसरे दिन भी देखा, तीसरे दिन उसका दिल नहीं माना। उसने ठेले से आवाज लगाई, “अरे बेटा, इधर आओ।” तीनों सहमे-सहमे पास आए। कमला ने नरम आवाज में पूछा, “रोज यहीं क्यों खड़े रहते हो?” सबसे बड़े बच्चे ने सिर झुकाकर कहा, “अम्मा, घर नहीं है। खाने को भी कुछ नहीं।”

यह सुनते ही कमला देवी का हाथ अपने आप दाल के भगोने की ओर बढ़ गया। उसने तीन कटोरियाँ निकाली और गरम दाल-रोटी परोस दी। बच्चे ऐसे खाने लगे जैसे कई दिनों बाद पेट भरने का मौका मिला हो। खाते वक्त न शर्म थी, न डर, बस भूख थी।

खाना खत्म हुआ तो सबसे छोटे बच्चे ने धीरे से पूछा, “अम्मा, कल भी मिलेगा?” कमला देवी ने बिना एक पल सोचे कहा, “हाँ बेटा, कल भी मिलेगा और रोज मिलेगा।”

माँ का नया अर्थ

यही वह दिन था जब कमला देवी की जिंदगी में माँ बनने का एक नया अर्थ जुड़ा। उसने उन बच्चों से कभी उनका असली नाम नहीं पूछा, बाद में खुद ही उन्हें नाम दे दिए—रोहन, मोहन और सोहन। उसके लिए नाम से ज्यादा जरूरी यह था कि वे रोज पेट भरकर स्कूल जाएँ।

कई बार ऐसा होता कि कमला के पास बस उतना ही खाना होता जितना बिक सकता था। उन दिनों वह ग्राहकों को मना कर देती और बच्चों को खिला देती। लोग ताना मारते, “बुढ़िया धंधा करने आई है या धर्मशाला खोल रखी है?” कमला बस मुस्कुरा देती। वह जानती थी कि भूखे पेट के सामने कोई ताना बड़ा नहीं होता।

समय बीतता गया। बच्चे बड़े होने लगे। स्कूल के बाद भी वे कमला के पास आते। कई बार रात हो जाती और वे वहीं ठेले के पास सो जाते। कमला उनके लिए चादर बिछा देती और खुद ठेले के नीचे बैठ जाती। बरसात के दिनों में वह उन्हें अपनी झोपड़ी में ले जाती। झोपड़ी छोटी थी, बारिश में टपकती थी, लेकिन वहाँ अपनापन था।

कमला देवी ने कभी खुद को उनकी माँ कहलाने की जिद नहीं की। लेकिन उन तीनों के लिए वह माँ ही थी। उसने उनकी फीस भरी, किताबें दिलाई और खुद कई बार भूखी रहकर उन्हें पढ़ाया। जब वे पढ़ाई में अच्छा करते, तो कमला का सीना गर्व से भर जाता। वही गर्व जो किसी माँ को अपने बच्चों को आगे बढ़ते देखकर होता है।

बच्चों का सफर

साल दर साल गुजरते गए। कमला की कमर झुकने लगी, हाथ काँपने लगे, ठेला अब रोज नहीं लग पाता था। एक दिन तीनों बच्चों ने उसके पैर छुए और कहा, “अम्मा, हमें बाहर पढ़ने का मौका मिला है।” कमला ने ज्यादा सवाल नहीं किए, बस उनके सिर पर हाथ रखा और कहा, “जहाँ भी रहो, ईमानदार रहना और किसी भूखे को कभी खाली हाथ मत लौटाना।”

उस दिन के बाद स्कूल के बाहर वह ठेला तो दिखता रहा, लेकिन वे तीन चेहरे नहीं दिखे। कमला कई बार गेट की ओर देखती, फिर खुद को समझा लेती, “बच्चे अपने रास्ते पर निकल गए हैं। यही तो हर माँ चाहती है।”

कमला को नहीं पता था कि समय हर एहसान का हिसाब रखता है और वह भी नहीं जानती थी कि 25 साल बाद उसी जिंदगी में एक ऐसा दिन आने वाला है जब उसके छोटे से घर के सामने आसमान से शोर करता हुआ एक हेलीकॉप्टर उतरेगा।

समय की नदी

समय कभी एक जैसा नहीं रहता। वह किसी के लिए धीरे चलता है, किसी के लिए बहुत तेज। कमला देवी के लिए समय एक ऐसी नदी बन चुका था जिसमें वह हर दिन चुपचाप उतरती और बिना शिकायत बहती चली जाती थी। स्कूल के बाहर लगने वाला ठेला अब पहले जैसा नहीं रहा था। कभी-कभी वह लगता, कभी-कभी नहीं। हाथों में अब पहले जैसी ताकत नहीं बची थी। आँखें धुंधली होने लगी थीं और पैरों में अक्सर दर्द रहता था।

लेकिन कमला देवी को इस सबसे ज्यादा तकलीफ इस बात की नहीं थी। उसे बस यही सुकून था कि जिन तीन बच्चों को उसने भूखा नहीं सोने दिया, वे अब अपनी जिंदगी के रास्ते पर निकल चुके थे।

तीनों की जिंदगी में बदलाव

रोहन पढ़ाई में तेज था, उसने इंजीनियरिंग की राह चुनी। रात-रात भर जागकर पढ़ता और दिन में पार्ट टाइम काम करता। मोहन का मन कानून की ओर झुका, उसे बचपन से अन्याय से नफरत थी। सोहन को व्यापार में दिलचस्पी थी, उसे हिसाब-किताब और लोगों से बात करने की समझ बचपन से थी।

तीनों भाइयों की मुलाकातें कम हो गई थीं, लेकिन दिलों में एक चीज समान थी—कमला देवी। कई बार रात को जब सब थक कर बैठते, तो बातें-बातों में वही सवाल उठता, “अम्मा अब कैसी होंगी?” लेकिन फिर कोई कह देता, “काम बहुत है, अगले महीने चलेंगे,” और अगला महीना यूँ ही बीत जाता।

समय के साथ पैसा आया, नाम आया, पहचान आई, लेकिन उनके दिल के किसी कोने में एक खालीपन भी पनपने लगा। उन्हें लगता था जैसे उन्होंने कुछ अधूरा छोड़ दिया हो। उस अधूरेपन का नाम था—कमला देवी।

कमला देवी का अकेलापन

इधर कमला देवी अब बहुत बूढ़ी हो चुकी थी। ठेला पूरी तरह बंद हो गया था। वह कभी-कभी स्कूल के बाहर बैठ जाती, सिर्फ बच्चों को देखने के लिए। अब कोई उससे खाना नहीं माँगता था। अब वह खुद दूसरों की दया पर निर्भर होती जा रही थी।

एक शाम जब सूरज ढल रहा था, कमला देवी अपनी झोपड़ी के बाहर बैठी थी। पास के बच्चे खेल रहे थे, एक बच्चा गिर पड़ा और रोने लगा। कमला ने उसे पास बुलाया, सिर पर हाथ फेरा और कहा, “रो मत बेटा, सब ठीक हो जाएगा।” उस पल उसकी आँखें भर आईं। उसे अपने तीन बच्चे याद आ गए। उसने आसमान की ओर देखा और बुदबुदाई, “भगवान, बस एक बार उन्हें देख लूं।”

फैसला और वापसी

उसी रात शहर के एक आलीशान अपार्टमेंट में रोहन, मोहन और सोहन एक साथ बैठे थे। यह बहुत समय बाद हुआ था। बातों-बातों में अचानक सोहन ने कहा, “तुम लोगों को नहीं लगता हम अम्मा को भूल गए हैं?” कमरे में सन्नाटा छा गया। मोहन ने धीरे से कहा, “भूल तो नहीं गए, लेकिन हम उन्हें लेने कभी गए भी नहीं।”

रोहन ने सिर झुका लिया। उसे याद आया कैसे एक समय अम्मा ने अपना खाना छोड़कर उन्हें खिलाया था। उस रात तीनों देर तक सो नहीं पाए। पहली बार उन्होंने महसूस किया कि उनकी सफलता अधूरी है और वहीं से एक फैसला जन्म लेने लगा।

हेलीकॉप्टर और माँ की मुस्कान

कमला देवी को नहीं पता था कि उसके जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा अभी बाकी है। उसे यह भी नहीं पता था कि जिन बच्चों को उसने कभी स्कूल के बाहर भूख से रोते देखा था, वे अब अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा कदम उठाने वाले हैं और वह कदम सिर्फ जमीन पर नहीं, आसमान से उतरने वाला था।

एक सुबह आसमान कुछ अलग ही था। बादल हल्के थे, हवा में अजीब सी हलचल थी। कमला देवी अपनी झोपड़ी के बाहर बैठी धूप सेंक रही थी। तभी उसने ऊपर से एक तेज और अनजाना शोर सुना। पहले तो उसे लगा शायद कोई बड़ा ट्रक पास से गुजर रहा है, लेकिन शोर बढ़ता गया। आसपास के लोग घरों से बाहर निकलने लगे। बच्चों ने आसमान की ओर उँगलियाँ उठाई, “अरे हेलीकॉप्टर!”

कमला देवी ने धीरे-धीरे सिर उठाया। उसकी आँखों ने आसमान में घूमती एक बड़ी सी चीज को देखा। उसने कभी इतने पास से हेलीकॉप्टर नहीं देखा था। उसे समझ नहीं आया कि यह यहाँ क्यों आ रहा है। शोर इतना तेज था कि पूरी बस्ती गूंजने लगी। कुछ ही पलों में वह हेलीकॉप्टर उसी कच्चे मैदान में उतरने लगा जो कमला की झोपड़ी से कुछ ही दूरी पर था।

धूल का गुबार उठ गया। लोग सहमे हुए थे, कोई डर से पीछे हट रहा था, कोई उत्सुकता में आगे बढ़ रहा था। हेलीकॉप्टर के रुकते ही उसका दरवाजा खुला। सबसे पहले एक आदमी उतरा, महंगे कपड़े, चमकते जूते और चेहरे पर गंभीरता। उसके पीछे दूसरा, फिर तीसरा। तीनों ही रुतबे वाले, आत्मविश्वास से भरे हुए। लेकिन आँखों में कुछ और था, कुछ ऐसा जो अमीरी से अलग था।

तीनों आदमी बिना किसी दिखावे के सीधे उस झोपड़ी की ओर बढ़े जहाँ कमला देवी बैठी थी। कमला ने उन्हें आते देखा लेकिन समझ नहीं पाई कि वे कौन हैं। उसके लिए तो वे बस तीन अजनबी थे। जैसे ही वे उसके सामने पहुँचे, कमला उठने की कोशिश करने लगी लेकिन उसके पैर अब साथ नहीं देते थे।

तभी पहला आदमी आगे बढ़ा। उसने कुछ नहीं कहा, बस धीरे से कमला देवी के सामने घुटनों के बल बैठ गया। दूसरे और तीसरे ने भी वही किया। पूरा इलाका सन्न रह गया। तीन अमीर, प्रभावशाली आदमी और एक झुकी हुई बूढ़ी औरत के सामने झुके हुए।

कमला देवी के हाथ काँपने लगे। उसने घबराकर कहा, “अरे बेटा, यह क्या कर रहे हो? उठो।” तभी पहले आदमी की आँखों से आँसू गिर पड़े। उसने सिर उठाकर कहा, “अम्मा, हमें पहचान नहीं रही?” कमला ने उसकी शक्ल को गौर से देखा। कुछ पल तक वह बस देखती रही। फिर अचानक उसकी आँखें फैल गईं। उसके होंठ काँपने लगे।

“रोहन!” दूसरे ने कहा, “मैं मोहन हूँ अम्मा।” तीसरे ने भर्राई आवाज में कहा, “और मैं सोहन।”

कमला देवी की साँस जैसे अटक गई। वह कुछ बोल नहीं पाई, उसके हाथ अपने आप आगे बढ़े और तीनों के सिर पर जा टिके। उसके चेहरे पर अविश्वास, खुशी, दर्द और ममता सब एक साथ उमड़ आए। “मेरे बच्चे!” इतना कहकर वह फूट-फूटकर रो पड़ी।

रोहन ने उसका हाथ थाम लिया, “अम्मा, हमें माफ कर दो, बहुत देर कर दी हमने। हम आपको लेने आए हैं।” मोहन ने कहा, “जिस दिन हम बड़े बने, उसी दिन से हमारा हर कदम आपकी दुआ से उठा है।” सोहन ने कहा, “आज जो कुछ भी है, आपकी वजह से है।”

कमला देवी रोती रही। उसने तीनों के सिर अपने सीने से लगा लिए। “मैंने तो कभी कुछ माँगा ही नहीं था बेटा, बस यही चाहती थी कि तुम लोग अच्छे इंसान बनो।”

नई शुरुआत

रोहन ने इशारा किया, पीछे से कुछ लोग आए और झोपड़ी के पास खड़े हो गए। “अम्मा, अब आप यहाँ नहीं रहेंगी। आपके नाम से एक घर बनेगा, एक जगह जहाँ कोई बच्चा भूखा नहीं सोएगा।”

कमला देवी ने सिर हिलाया, “घर तो मुझे मिल गया था, जिस दिन तुम तीनों ने पहली बार पेट भरकर खाना खाया था।”

कुछ महीनों बाद शहर में एक नई इमारत बनी—नाम था “कमला अन्नपूर्णा आश्रय”। वहाँ रोज सैकड़ों बच्चों को खाना मिलता था, स्कूल भी था, रहने की जगह भी। और उस आश्रम की रसोई में एक कुर्सी पर बैठी रहती थी कमला देवी। अब उसके हाथ काँपते थे, लेकिन दिल भरा हुआ था। हर शाम रोहन, मोहन और सोहन उसके पास बैठते, वही सादा खाना खाते जो कभी उन्होंने फुटपाथ पर खाया था।

कमला देवी अक्सर मुस्कुरा कर कहती, “देखो, भूख से बड़ा कोई दुश्मन नहीं होता और पेट भरने से बड़ा कोई धर्म नहीं।”

समापन

जिस महिला ने रोज स्कूल के बाहर तीन भूखे अनाथों को खाना खिलाया था, समय ने उसी के दरवाजे पर 25 साल बाद तीन अमीर आदमियों को झुका कर भेज दिया था। दुनिया की हर दौलत फीकी है उस माँ के आशीर्वाद के सामने जिसने खुद भूखे रहकर तुम्हें इस काबिल बनाया।

याद रखना, कामयाबी की ऊँचाइयों पर पहुँचकर अपनी जड़ों और अपनी माँ को कभी मत भूलना। वक्त रहते लौट आना उन बुजुर्ग आँखों के पास जो हर आहट पर तुम्हारा इंतजार करती हैं। बड़ा आदमी वो नहीं जो बड़ी गाड़ी में घूमता है, बल्कि वो है जिसके आने से एक माँ के चेहरे पर सालों बाद सुकून की मुस्कान आ जाए।

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VIP काफिला आया… सांसद ने रुकवाया आर्मी का काफिला उसके बाद जो हुआ…

रास्ता देश का है – एक हाईवे, दो काफिले और एक फैसला

भूमिका

भारत का हर हाईवे सिर्फ गाड़ियों का रास्ता नहीं होता, बल्कि यह देश की धड़कन है। यहां रोज़ हजारों लोग, हजारों कहानियां और हजारों सपने एक-दूसरे से टकराते हैं। लेकिन कभी-कभी एक टकराव ऐसा होता है, जो सिर्फ दो गाड़ियों का नहीं, बल्कि दो सोचों का होता है – सत्ता बनाम फर्ज़। यह कहानी उसी टकराव की है, जहां एक ओर था वीआईपी काफिला, सत्ता का घमंड और दूसरी ओर था आर्मी का काफिला, देश की जिम्मेदारी।

हाईवे पर टकराव

एक तेज़ धूप वाली दोपहर थी। हाईवे पर लाल और नीली बत्तियों से चमकता वीआईपी काफिला पूरे रौब के साथ भागा जा रहा था। आगे-पीछे पुलिस की गाड़ियां, हथियारबंद सिक्योरिटी, और बीच में राज्य के ताकतवर सांसद राघव प्रताप सिंह। उनके चेहरे पर आत्मविश्वास नहीं, बल्कि अधिकार का भाव था। सड़कें जैसे उनकी जागीर हों, कानून सिर्फ किताबों में लिखा हो, फैसले उनकी मर्जी से तय होते हों।

इसी हाईवे पर दूसरी दिशा से इंडियन आर्मी का काफिला दिखाई दिया। एक के पीछे एक लाइन में चलते ट्रक, हर ट्रक में जवान। किसान का बेटा, मजदूर का बेटा, कोई शादी के सपने लिए, कोई घर में नवजात बच्चे की खुशी लिए – सबकुछ पीछे छोड़कर सिर्फ देश की फिक्र लिए जा रहे थे। यह कोई रूटीन मूवमेंट नहीं था, बल्कि बॉर्डर अलर्ट का काफिला था। हर मिनट मायने रखता था, हर देरी किसी जान की कीमत बन सकती थी।

आदेश और अहंकार

अचानक वीआईपी काफिले के आगे पुलिस की गाड़ी रुक गई। हाथ ऊपर उठा, आवाज आई – “इंडियन आर्मी कॉन्वॉय साइड में रोको।”
पहला ट्रक धीमा हुआ, दूसरा रुका, फिर तीसरा। कुछ ही पलों में पूरा आर्मी काफिला हाईवे पर थम गया। धूल धीरे-धीरे बैठने लगी।

एक ट्रक का दरवाजा खुला। कैप्टन अर्जुन राठौर उतरे। 12 साल की फौजी सेवा उनकी चाल में दिखती थी। सीधी रीड, कंधों पर जिम्मेदारी।
एसपी आगे बढ़ा, “वीआईपी मूवमेंट है। काफिला यहीं रुकेगा।”

अर्जुन ने शांत स्वर में जवाब दिया, “सर, यह आर्मी कॉन्वॉय है। बॉर्डर पर रिपोर्टिंग का टाइम फिक्स है।”

एसपी के होठों पर हल्की मुस्कान थी, “बॉर्डर बाद में, यहां सांसद साहब हैं।”

कुछ पल खामोशी छा गई। काफिले के ट्रकों के अंदर जवान खिड़कियों से बाहर देख रहे थे। एक जवान ने धीरे से कहा, “साहब, अगर कॉन्वॉय लेट हुआ, तो ऑपरेशन पर असर पड़ेगा।”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा। उसे वहां एक फौजी नहीं, एक जिम्मेदार बेटा दिखा।

सांसद का सामना

वीआईपी गाड़ी का शीशा नीचे हुआ। राघव प्रताप सिंह बाहर झुके। नजर सीधी अर्जुन पर।

“कौन इंचार्ज है यहां?”

“कैप्टन अर्जुन राठौर, इंडियन आर्मी।”

“तुम जानते हो यह किसका रास्ता है?”

अर्जुन ने बिना झुके कहा, “किसका भी हो, यह देश का रास्ता है।”

कुछ सेकंड के लिए हाईवे पर सन्नाटा छा गया। सांसद का चेहरा सख्त हो गया।

“वीआईपी पहले जाएगा। पूरा आर्मी कॉन्वॉय यहीं रुकेगा।”

सायरन बंद कर दिए गए। अब आवाज नहीं, अहंकार बोल रहा था।

अर्जुन ने गहरी सांस ली, “सर, अगर यह काफिला रुका तो सिर्फ हम नहीं रुकेंगे, देश की सुरक्षा रुकेगी।”

एसपी चिल्लाया, “तुम आदेश मानोगे?”

अर्जुन की आवाज अब भारी थी, “हम आदेश नहीं, फर्ज़ मानते हैं।”

यह शब्द सड़क पर गूंजे। कुछ पल कोई नहीं बोला।

सिस्टम की परीक्षा

सांसद ने अपनी जेब से फोन निकाला। आंखों में भरोसा था। “अब देखते हैं सिस्टम किसके साथ खड़ा है।”

फोन कान से लगाया गया, “योगी जी को मिलाइए।”

हाईवे पर पूरा आर्मी काफिला खड़ा था। वीआईपी गाड़ियां रुकी थीं। धूप जल रही थी। समय निकल रहा था और एक फोन कॉल यह तय करने वाला था कि इस देश में पहले कौन चलेगा – सत्ता या सेना।

फोन की घंटी लगातार बज रही थी। कैप्टन अर्जुन ने पूरे काफिले की ओर देखा। हर ट्रक, हर जवान, फिर आसमान की तरफ देखा। धीरे से लगभग खुद से कहा, “जय हिंद।”

फोन की घंटी एक बार, दो बार, तीन बार। हर रिंग के साथ हाईवे पर खड़ा वक्त और भारी होता जा रहा था। धूप अब तेज़ लगने लगी थी। पसीना सिर्फ जवानों के चेहरे पर नहीं, सिस्टम के माथे पर भी था। वीआईपी काफिले की गाड़ियां चुपचाप खड़ी थीं। सायरन बंद थे, लेकिन घमंड अब भी जिंदा था।

फैसला

फोन की घंटी रुकी। दूसरी तरफ आवाज आई, “हां, बोलिए।”
यह आवाज तेज़ नहीं थी, पर उसमें ऐसा वजन था कि सामने वाला सीधा खड़ा हो जाए।

सांसद ने कुर्सी पर टिकते हुए कहा, “योगी जी, यहां हाईवे पर आर्मी कॉन्वॉय रास्ता रोक रहा है। वीआईपी मूवमेंट है।”

लाइन के उस पार कुछ सेकंड की खामोशी। फिर आवाज आई, “आर्मी कॉन्वॉय कहां जा रहा है?”

सांसद ने हल्के अंदाज में कहा, “बॉर्डर की तरफ ही होगा। पर अभी वीआईपी को जाना है।”

फोन के उस पार आवाज अब बदल गई, “कौन सा बॉर्डर?”

सांसद थोड़ा असहज हुआ, “सर, पूरी जानकारी तो नहीं लेकिन मेरे कार्यक्रम में देर हो रही है।”

अब आवाज सख्त थी, “जानकारी नहीं है और फैसला चाहिए?”

सांसद ने बात संभालने की कोशिश की, “सर, मेरी सिक्योरिटी का सवाल है। प्रोटोकॉल है।”

लाइन के उस पार कुछ पल की चुप्पी। फिर वह शब्द आए जो हवा का रुख बदल देते हैं, “देश की सिक्योरिटी तुम्हारी सिक्योरिटी से बड़ी है।”

एसपी फोन की आवाज नहीं सुन पा रहा था, लेकिन सांसद का चेहरा सब कुछ बता रहा था।

योगी जी की आवाज जारी रही, “अगर आर्मी कॉन्वॉय बॉर्डर जा रहा है तो वही पहले जाएगा।”

सांसद ने हड़बड़ा कर कहा, “पर सर, वीआईपी प्रोटोकॉल…”

बीच में ही आवाज आई, “प्रोटोकॉल देश के लिए होता है, देश प्रोटोकॉल के लिए नहीं।”

एक पल के लिए सांसद चुप हो गया। फोन पर आखिरी शब्द पड़े, “आर्मी कॉन्वॉय को तुरंत रास्ता दो।”

कॉल कट गई। फोन अब भी सांसद के हाथ में था, लेकिन भरोसा चेहरे से गायब हो चुका था।

रास्ता खुला

एसपी ने हिम्मत करके पूछा, “सर, क्या आदेश है?”

सांसद ने दांत भीचते हुए कहा, “काफिला साइड में लगा हो।”

यह शब्द उसके लिए आदेश नहीं थे, यह हार थी।

पुलिस ने इशारा किया। वीआईपी गाड़ियां धीरे-धीरे सड़क के किनारे खिसकने लगीं। हाईवे पर रास्ता खुलने लगा।

कैप्टन अर्जुन दूर से सब देख रहे थे। उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस हाथ उठाया। आर्मी काफिले के इंजन एक-एक करके स्टार्ट हुए। पहला ट्रक आगे बढ़ा, फिर दूसरा, फिर पूरा काफिला।

जवानों की आंखों में अजीब सी चमक थी। कोई जश्न नहीं, कोई नारा नहीं। बस सुकून।

एक जवान ने धीरे से कहा, “साहब, आज देरी नहीं हुई।”

अर्जुन ने उसकी ओर देखा, “आज देश समय पर पहुंचा है।”

काफिला आगे बढ़ता गया। वीआईपी काफिला पीछे रह गया। कुछ गाड़ियां कुछ देर तक चलती धूल को देखती रहीं। सांसद की गाड़ी में खामोशी थी। ना फोन, ना बात। सिर्फ एक सवाल जो भीतर ही भीतर उसे खाए जा रहा था – क्या हर बार सिस्टम उसके साथ खड़ा होगा?

सीमा पर मिशन

आर्मी काफिला तेजी से सीमा की ओर बढ़ रहा था। रास्ते में रेडियो पर आवाज आई, “कॉन्वॉय मेंटेन स्पीड। बॉर्डर अलर्ट कंफर्म्ड।”

जवानों के चेहरे और सख्त हो गए। यह अब सिर्फ यात्रा नहीं थी, यह मिशन था।

अर्जुन ने अपने हेलमेट को ठीक किया। उसे याद आया सुबह घर से निकलते वक्त मां ने क्या कहा था, “बेटा सही करना, डरना मत।”

आज वो सही कर पाए थे।

कुछ घंटे बाद सीमा के पास हलचल थी। खुफिया इनपुट सही निकला। दुश्मन की साजिश तैयार थी। लेकिन आर्मी काफिला समय पर पहुंच चुका था। घेरा डाला गया, इलाका सुरक्षित किया गया। एक बड़ा हमला होने से पहले ही नाकाम हो गया।

रेडियो पर आवाज गूंजी, “ऑपरेशन सक्सेसफुल।”

किसी ने ताली नहीं बजाई, किसी ने जश्न नहीं मनाया, क्योंकि यह काम उनका रोज का काम था।

अर्जुन ने आसमान की ओर देखा, आज आसमान कुछ ज्यादा साफ लग रहा था।

सत्ता की खामोशी

उधर शहर में शाम का अंधेरा उतर चुका था। टीवी पर ब्रेकिंग न्यूज़ चल रही थी, “आर्मी कॉन्वॉय रीचेस बॉर्डर ऑन टाइम, मेजर थ्रेट।”

सांसद ने टीवी बंद कर दिया। कमरे में सिर्फ खामोशी बची। उसे एहसास हो चुका था, सड़कें वीआईपी की हो सकती हैं, पर रास्ता हमेशा देश का होता है।

कैप्टन अर्जुन अपने काफिले के साथ अंधेरे में ड्यूटी पर खड़े थे। कोई कैमरा नहीं, कोई तारीफ नहीं, बस एक आवाज दिल में गूंज रही थी – “जय हिंद।”

रात गहरी हो चुकी थी। सीमा पर हवा में अजीब सी खामोशी थी। ऐसी खामोशी जो या तो तूफान से पहले आती है या तूफान के बाद।

आर्मी का काफिला अब अपनी पोजीशन पर था। ट्रक खड़े थे, जवान सतर्क थे, हथियार तैयार थे। हर चेहरे पर नींद नहीं, जिम्मेदारी थी।

रेडियो से धीमी आवाज आई, “अलर्ट रिमेंस हाई। स्टे शार्प।”

कैप्टन अर्जुन मैप के सामने खड़े थे। उनकी उंगलियां एक-एक पॉइंट पर रुकती थीं। अगर वह काफिला आज हाईवे पर कुछ और देर रुक जाता तो यह सारी तैयारियां शायद बेकार हो जातीं।

हमला और जीत

कुछ किलोमीटर दूर दुश्मन अपनी चाल चल चुका था। उन्हें भरोसा था कि आर्मी समय पर नहीं पहुंचेगी। उन्हें भरोसा था कि सिस्टम हमेशा वीआईपी को चुनता है।

लेकिन आज सिस्टम ने देश को चुना था।

पहली हलचल थर्मल स्क्रीन पर दिखी। एक जवान ने फुसफुसाकर कहा, “मूवमेंट 3:00 बजे की दिशा में।”

अर्जुन ने तुरंत आदेश दिया, “पोजीशंस होल्ड, नो नॉइज़।”

हर जवान जमीन का हिस्सा बन गया। सांसे धीमी, दिल तेज़। कुछ ही मिनटों में साफ हो गया – यह हमला था। पूरा प्लान था, लेकिन उनकी टाइमिंग गलत थी।

आर्मी पहले पहुंच चुकी थी।

कमांड मिली, “गो!” और फिर अंधेरे में रोशनी फटी। कुछ ही मिनटों में सब खत्म। कोई लंबी लड़ाई नहीं, कोई फिल्मी सीन नहीं, बस प्रोफेशनल काम।

रेडियो पर आवाज गूंजी, “थ्रेट न्यूट्रलाइज्ड। एरिया सिक्योर।”

कुछ जवान थोड़ी देर चुपचाप बैठे रहे। किसी ने आसमान की ओर देखा, किसी ने जमीन की तरफ।

एक जवान ने धीमे से कहा, “साहब, अगर हम आज लेट हो जाते…”

अर्जुन ने उसकी बात पूरी नहीं होने दी, “तो आज किसी मां का बेटा घर नहीं लौटता।”

फर्ज़ का रास्ता

खामोशी। उस खामोशी में बहुत कुछ था।

सुबह होने लगी थी। सीमा पर सूरज धीरे-धीरे निकल रहा था। नई रोशनी, नई उम्मीद के साथ।

अर्जुन ने अपने मोबाइल पर नेटवर्क देखा। एक मिस्ड कॉल थी – घर से।

उन्होंने कॉल किया। उधर से मां की आवाज आई, “बेटा खबर देखी?”

अर्जुन कुछ नहीं बोले।

मां ने कहा, “भगवान का शुक्र है तुम लोग समय पर पहुंच गए।”

अर्जुन की आवाज पहली बार हल्की पड़ी, “मां, आज रास्ता मिल गया।”

मां ने सिर्फ इतना कहा, “जब फर्ज़ आगे होता है तो रास्ते खुद बनते हैं।”

कॉल कट गई।

अर्जुन ने गहरी सांस ली।

शहर में सुबह

दूसरी तरफ शहर में सुबह का शोर शुरू हो चुका था। अखबार छप चुके थे। हेडलाइन थी, “आर्मी थwarts मेजर अटैक। कॉन्वॉय रीचेस बॉर्डर जस्ट इन टाइम।”

कोई नाम नहीं, कोई चेहरा नहीं। बस एक लाइन।

सांसद राघव प्रताप सिंह अखबार हाथ में लिए बैठे थे। उन्होंने हेडलाइन पढ़ी। फिर दूसरी बार पढ़ी। अखबार मोड़कर टेबल पर रख दिया। कमरे में कोई और नहीं था। ना सायरन, ना सिक्योरिटी, सिर्फ सोच।

उन्हें पहली बार एहसास हुआ – सत्ता का रास्ता भीड़ से गुजरता है, पर देश का रास्ता कुर्बानी से।

याद और जिम्मेदारी

उसी हाईवे पर जहां कल टकराव हुआ था, आज सब कुछ सामान्य था। गाड़ियां चल रही थीं, लोग जा रहे थे। लेकिन उस जगह जहां वीआईपी काफिला रुका था, वहां एक छोटा सा बोर्ड लगा दिया गया था – राष्ट्र सेवा सर्वोपरि

कोई बड़ा उद्घाटन नहीं, कोई पीता नहीं, बस एक याद।

आर्मी का काफिला अब आगे बढ़ चुका था। नया मिशन, नई जगह। जवान ट्रक में बैठे हंस भी रहे थे। किसी ने कहा, “साहब, आज तो वीआईपी पीछे रह गया।”

दूसरा बोला, “अच्छा है, कभी-कभी पीछे रहना भी जरूरी होता है।”

अर्जुन ने बाहर देखा, सड़क सीधी थी। उन्होंने कहा, “याद रखना, रास्ता हमेशा सीधा नहीं होता, पर फर्ज़ होना चाहिए।”

ट्रक आगे बढ़ते रहे। धूल उड़ती रही और देश शांत रहा, क्योंकि किसी ने सही समय पर सही फैसला लिया था।

उपसंहार

यह कहानी किसी सांसद की हार की नहीं है। यह कहानी उस जीत की है जिसका शोर नहीं होता। यह कहानी उन लोगों की है जो कैमरे से दूर देश को सुरक्षित रखते हैं।

अगर आज आप चैन से सो पा रहे हैं, तो याद रखना कहीं ना कहीं एक आर्मी काफिला अब भी चल रहा है – आपके लिए, देश के लिए।

जय हिंद।

नोट

कहानी में दिखाए गए सभी पात्र, घटनाएं और संवाद पूरी तरह काल्पनिक हैं। इनका किसी भी वास्तविक व्यक्ति, नेता, अधिकारी, सरकारी संस्था या वास्तविक घटना से कोई सीधा या अप्रत्यक्ष संबंध नहीं है। इस कहानी का उद्देश्य किसी की छवि को ठेस पहुंचाना नहीं, बल्कि फर्ज़, जिम्मेदारी और देशभक्ति की भावना को दिखाना है। हम भारतीय सेना का पूरा सम्मान करते हैं। देश सर्वोपरि है।