लड़का गलती से गलत बस में चढ़ गया था, जब कंडक्टर ने उसे बस से उतारा तो उसने कुछ चौंका देने वाली चीज़ देखी।

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क्या आपने कभी सोचा है कि जिंदगी में हुई एक छोटी सी गलती भी आपके लिए एक बहुत बड़ा मौका बन सकती है? क्या किस्मत के दरवाजे एक गलत रास्ते पर चलकर भी खुल सकते हैं? यह कहानी है मोहन की, एक छोटे से गांव के लड़के की, जिसकी एक गलती ने उसकी पूरी दुनिया ही बदल दी।

गाँव की सुबह

मोहन का गाँव बहुत ही सुंदर और शांत था। हर तरफ हरे-भरे खेत, पेड़-पौधे और साफ हवा। मोहन का परिवार गरीब था, लेकिन ईमानदार और मेहनती। उसके पिता रामलाल किसान थे, जिनकी मेहनत ही उनकी पहचान थी। उसकी मां सीता देवी घर संभालती थीं, और छोटी बहन राधा उनके जीवन की खुशियों का केंद्र थी। मोहन बचपन से ही होशियार था। गांव के स्कूल में पढ़ता, हमेशा कक्षा में सबसे ऊपर आता। उसके शिक्षक कहते, “मोहन एक दिन बहुत बड़ा आदमी बनेगा।”

मोहन का सपना था कि वह शहर जाकर बड़ी कंपनी में नौकरी करे और अपने परिवार को गरीबी से बाहर निकाले। उसने खूब मेहनत की, अपनी पढ़ाई पूरी की और शहर की कंपनियों में आवेदन भेजा।

नौकरी का बुलावा

एक दिन मोहन को एक बड़ी कंपनी से पत्र मिला—उसे इंटरव्यू के लिए शहर बुलाया गया था। मोहन की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसने अपने माता-पिता को बताया। पिता ने अपनी सारी जमा पूंजी निकालकर मोहन को दी। मां ने रोटियां और अचार पैक किया, बहन ने शुभकामनाएं दीं। मोहन ने सबको गले लगाया, “मैं आपको निराश नहीं करूंगा।”

पहली गलती

मोहन गांव से बस स्टैंड तक पहुंचा। वहाँ बहुत भीड़ थी। उसने कभी इतनी भीड़ नहीं देखी थी, थोड़ा घबरा गया। उसे समझ नहीं आ रहा था किस बस में बैठना है। तभी एक बस आई, किसी ने कहा, “यह बस शहर जा रही है।” मोहन जल्दी से बस में बैठ गया, सोचा यही उसकी मंजिल है।

बस में बैठकर मोहन अपनी मां की दी रोटियां खाने लगा, सपनों में खो गया—”जब नौकरी मिलेगी, तो परिवार को शहर बुलाऊंगा, बड़ा घर लूंगा, गाड़ी लूंगा, कभी गरीबी नहीं आने दूंगा।” मां की याद में उसकी आंखें छलक गईं। उसने कितनी मेहनत की थी, अपने गहने बेच दिए, घर बेच दिया, लेकिन मोहन की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने दी।

रास्ता भटकना

मोहन की आंख लग गई। जब उठा, देखा बस सुनसान जगह पर खड़ी थी। उसने कंडक्टर से पूछा, “भैया, यह कौन सा स्टेशन है?” कंडक्टर ने टिकट देखा, चौंक गया—”यह टिकट तो उस शहर का नहीं है, तुम गलत बस में बैठ गए हो।” मोहन के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसे लगा सब खत्म हो गया। कंडक्टर ने उसे बस से उतार दिया।

अब मोहन अकेला बस स्टैंड पर था। जेब में पैसे कम थे, जगह अनजान थी। उसे लगा उसने माता-पिता को निराश कर दिया। वह रोने लगा, अपनी किस्मत को कोसने लगा। बस स्टैंड की बेंच पर बैठा, आंखों में आंसू लिए।

किस्मत का इशारा

तभी उसकी नजर बेंच के नीचे पड़े एक छोटे बैग पर पड़ी। उसने बैग खोला—कुछ पैसे, पुराने फोटो और एक फटी-सी डायरी थी। डायरी खोली तो पढ़ा—एक आदमी अक्षय ने दौलत के पीछे भागकर अपनी सबसे बड़ी गलती की थी, परिवार खो दिया था। अब अकेला था, पछता रहा था।

मोहन को डायरी पढ़कर बहुत दुख हुआ। उसने बैग में फोटो देखी—एक सुंदर महिला और छोटा लड़का। बिजनेस कार्ड मिला, अक्षय का नाम और पता लिखा था। मोहन ने तय किया—वो अक्षय को उनका बैग लौटाएगा।

अनजान सफर

मोहन बस स्टैंड से बाहर निकला, अक्षय के घर की ओर चला। घर बड़ा था, पर टूटा-फूटा, चारों तरफ जंगल। दरवाजा खटखटाया, एक बूढ़े आदमी ने खोला। “तुम कौन हो?”
“मैं मोहन हूं, अक्षय से मिलना चाहता हूं।”
बूढ़े ने मोहन को अंदर बुलाया। घर में अंधेरा था, कोई नहीं दिख रहा था।

बूढ़े ने बताया, “अक्षय बहुत दुखी इंसान है। दौलत के पीछे भागे, परिवार खो दिया। पत्नी और बेटा छोड़ गए।”

मोहन ने पूछा, “क्या मैं मिल सकता हूं?”
बूढ़े ने कहा, “हां, तुम मिल सकते हो।”

मुलाकात और बदलाव

मोहन अक्षय से मिला। अक्षय बूढ़े थे, आंखों में आंसू। “तुम कौन हो?”
“मुझे आपका बैग मिला था।”
अक्षय ने मोहन को गले लगा लिया। “बेटा, तुमने मेरा बैग लौटा दिया।”
“मैं आपका बेटा नहीं हूं,” मोहन बोला।
“नहीं, तुम मेरे बेटे हो,” अक्षय ने कहा।

मोहन ने बैग लौटाया। अक्षय ने फोटो देखी, आंखों में आंसू। “तुमने मुझे मेरा बेटा लौटा दिया।”

मोहन को अक्षय की बात सच लगी। उसने कहा, “मैं आपका बेटा नहीं हूं, लेकिन आपकी सेवा करूंगा।”
अक्षय ने मोहन को गले लगा लिया—”तुम मेरे बेटे हो।”

नई शुरुआत

मोहन ने अक्षय की सेवा शुरू की। खाना बनाता, कपड़े देता, बातें करता। अक्षय की जिंदगी में खुशी लौट आई। एक दिन अक्षय ने कहा, “बेटा, मैं तुम्हें सारी दौलत दे दूंगा।”
“मुझे दौलत नहीं चाहिए,” मोहन बोला।
“तो क्या चाहिए?”
“आप एक नया जीवन शुरू करें।”

अक्षय को मोहन की बात ने छू लिया। उन्होंने अपने बेटे को ढूंढना शुरू किया। आखिरकार बेटे से मिले, गले लगे, माफी मांगी। बेटा भी दुखी था, पिता को माफ कर दिया। अक्षय ने मोहन को भी बेटे की तरह अपना लिया, सारी दौलत दी।

मोहन का नया जीवन

मोहन ने अपने माता-पिता को शहर बुला लिया। परिवार मिलकर खुशहाल जिंदगी जीने लगे। मोहन अब किसान का बेटा ही नहीं, एक बड़ा आदमी बन गया था। उसने अपनी गलती से सीखा—कभी हार मत मानो, गलतियों से सीखो, आगे बढ़ो।

कहानी का संदेश

तो दोस्तों, यह कहानी हमें सिखाती है कि जिंदगी में कभी हार नहीं माननी चाहिए। कभी-कभी एक छोटी सी गलती भी किस्मत बदल सकती है। हमें अपनी गलतियों से सीखना चाहिए और हमेशा आगे बढ़ना चाहिए।