लड़की दलित, बलात-कारी राजपूत तो पुलिस के हाथ कांपते हैं । Navin Kumar
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दलित बेटी, राजपूत अपराधी और कांपती पुलिस: उत्तर प्रदेश के ‘रामराज’ की सच्ची कहानी
उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले का सरधना इलाका। सुबह की हल्की ठंड में खेतों की ओर जाती दो महिलाएं—रंजना और उसकी बेटी रचना। रंजना दलित है, मजदूरी करके परिवार चलाती है। उसका पति सतपाल, तीन बेटे और एक बेटी रचना। रचना की उम्र सत्रह साल है, पढ़ाई तंगी के कारण ढाई साल पहले छूट गई थी। मई में उसकी शादी तय थी, लेकिन किस्मत को कुछ और मंजूर था।
8 जनवरी 2024। रंजना और रचना खेतों में काम करने जा रही थीं। रास्ते में पारस सोम नाम का ठाकुर लड़का मिला, जो कंपाउंडर का काम करता था। पारस ने रचना को रोक लिया, मां के सामने छेड़छाड़ शुरू कर दी। रंजना ने विरोध किया। पारस ने गाली-गलौज की, विरोध जारी रहा तो उसने फरसे से रंजना पर हमला कर दिया। रंजना खेत में गिर पड़ी, खून बहता रहा। पारस ने रचना को जबरन बाइक पर बैठाया और अगवा कर ले गया।
गांव में हाहाकार मच गया। सतपाल और बेटे दौड़े, पड़ोसी इकट्ठा हुए। रंजना को अस्पताल ले जाया गया, लेकिन खून ज्यादा बह चुका था। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया। रंजना की मौत हो गई। दलित मां खेत में तड़पती रही, बेटी गायब थी। गांव में मातम छा गया।
पुलिस आई। पोस्टमार्टम हुआ, लेकिन पुलिस ने मामला जल्दी निपटाने की कोशिश की। परिवार ने विरोध किया—”जब तक आरोपी गिरफ्तार नहीं होगा, अंतिम संस्कार नहीं होगा।” दबाव में पुलिस ने इलाके को छावनी में बदल दिया, लेकिन पारस सोम का सुराग नहीं मिला। पुलिस ने दस टीमें बनाईं, खोज शुरू की। लेकिन आरोपी ठाकुर था, राजपूत था, क्षत्रिय था—पुलिस के हाथ कांप रहे थे।

जाति का खेल और सत्ता का अहंकार
सरधना इलाके में ठाकुरों के चौबीसी गांव हैं। यहां राजपूतों का दबदबा है। ठाकुर संगीत सोम, हिंदुत्व की राजनीति के बड़े चेहरे, इसी इलाके के हैं। लेकिन जब दलित लड़की का मामला आया, तो सब चुप हो गए। समाजवादी पार्टी के विधायक अतुल प्रधान तक पीड़ित परिवार से नहीं मिल सके—पुलिस ने रोक दिया। पुलिस कह रही थी—”आरोपी मिल नहीं रहा है।” लेकिन गांव वाले जानते थे, अगर आरोपी ठाकुर न होता तो योगी आदित्यनाथ का बुलडोजर कब का उसके घर पर चल चुका होता।
योगी राज में ठाकुर होना मतलब खुली छूट। कानून व्यवस्था को खूंटी पर टांग देने की छूट। दलितों, पिछड़ों को मसल कर फेंक देने की छूट। यही वजह थी कि पारस सोम खुलेआम घूम रहा था, पुलिस की हिम्मत नहीं थी उसे पकड़ने की।
कानपुर की दूसरी कहानी
यही उत्तर प्रदेश का दूसरा शहर—कानपुर। यहां पुलिस का दारोगा अमित कुमार और उसका दोस्त शुभरण स्कॉर्पियो कार में गश्त पर निकले। रात 10 बजे घर के बाहर खड़ी 14 साल की बच्ची को गाड़ी में खींच लिया। रेलवे ट्रैक के किनारे गाड़ी रोककर दोनों ने बारी-बारी से उसका बलात्कार किया। अधमरी हालत में बच्ची को घर के बाहर फेंक दिया और फरार हो गए।
लड़की का भाई एफआईआर दर्ज करवाने चौकी पहुंचा, पुलिस ने डांटकर भगा दिया। पुलिस कमिश्नर से गुहार लगाई, तब जाकर एफआईआर दर्ज हुई—वो भी अज्ञात लोगों के खिलाफ, जबकि नाम साफ था। नाबालिग लड़की के साथ गैंगरेप हुआ, लेकिन पॉक्सो एक्ट तक नहीं लगाया गया। शुभरण पकड़ा गया, लेकिन दारोगा अमित कुमार अभी तक पुलिस की गिरफ्त से बाहर है। क्या सचमुच गिरफ्त से बाहर है, या उसे जानबूझकर बचाया जा रहा है?
जाति, सत्ता और पुलिस का गठजोड़
योगी आदित्यनाथ के राज में पुलिस सिर्फ दलित, पिछड़े या मुसलमान को निस्तनाबूत करने के लिए बुलडोजर निकालती है। ठाकुरों की ऐंठ निकालने से पहले ही बुलडोजर की हवा निकल जाती है। यही वजह है कि मेरठ के सरधना में दलित मां की हत्या और बेटी की किडनैपिंग के बावजूद आरोपी ठाकुर पारस सोम पुलिस की पकड़ से बाहर है।
पुलिस की जांच में जाति का असर साफ दिखता है। पीड़िता के परिवार को दबाव में रखा जाता है, बयान दर्ज नहीं होते, केस को हल्का किया जाता है। इलाके में पुलिस छावनी तैनात है, लेकिन आरोपी का पता नहीं चलता। समाजवादी विधायक तक पीड़ित परिवार से नहीं मिल सकते। मीडिया चुप है, सिस्टम चुप है।
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े
अगर कोई योगी मॉडल की असलियत देखना चाहता है, तो नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो का डेटा देखे। 2023 में यूपी हत्या के मामलों में नंबर वन है—3206 हत्याएं एक साल में। दलित उत्पीड़न में भी यूपी नंबर वन—15130 मामले एक साल में। ऑपरेशन लंगड़ा, ऑपरेशन खल्लास की रीलें बनती हैं, लेकिन हकीकत में कानून व्यवस्था का रेल बना हुआ है।
सत्ता का खेल और दलितों की बेबसी
सरधना के सतपाल का परिवार आज भी इंसाफ के लिए लड़ रहा है। रंजना की मौत के बाद गांव में डर है, मातम है, गुस्सा है। रचना का पता नहीं, आरोपी ठाकुर फरार है। पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी है। इलाके में दहशत है—दलित, पिछड़े, मुसलमान डरे हुए हैं। ठाकुरों के राज में पुलिस भी कांपती है।
कानपुर की बच्ची का परिवार तीन दिन से दौड़ रहा है, बयान दर्ज नहीं हो रहा। पुलिस केस को हल्का कर रही है, दबाव बना रही है। आरोपी दारोगा खुलेआम घूम रहा है, सिस्टम उसे बचा रहा है।
सवाल और समाज की जिम्मेदारी
क्या पुलिस निष्पक्ष जांच कर सकती है? क्या दलितों को न्याय मिलेगा? क्या आरोपी ठाकुरों पर कार्रवाई होगी? क्या योगी आदित्यनाथ का बुलडोजर सिर्फ दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों के लिए है?
यह कहानी सिर्फ मेरठ या कानपुर की नहीं, पूरे उत्तर प्रदेश की है। यहां जाति, सत्ता और पुलिस का गठजोड़ दलितों को न्याय से दूर रखता है। जब तक सिस्टम बदल नहीं जाता, जब तक पुलिस निष्पक्ष नहीं होती, जब तक कानून सबके लिए बराबर नहीं होता—दलितों की बेटियां, मांएं, परिवार डरते रहेंगे।
समाप्ति
अगर आपको लगता है कि देश में कानून व्यवस्था सबके लिए बराबर होनी चाहिए, अगर आपको लगता है कि दलितों को भी न्याय मिलना चाहिए, तो अपनी आवाज उठाइए।
कमेंट करें, शेयर करें, जय भीम।
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