लड़की ने 800 लोगों में फैलाया HIV लोगों ने लड़की को पकड़ा
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एक लड़की की कहानी: सच्चाई, अफवाह और एचआईवी का डर
जनवरी 2026 की एक ठंडी सुबह थी। पटना शहर अपने रोज़मर्रा के कामों में व्यस्त था। बस स्टैंड पर हमेशा की तरह भीड़ थी, लोग अपने-अपने गंतव्य की ओर भाग रहे थे। इसी भीड़ में एक लड़की खड़ी थी, चेहरे पर मास्क, आँखों में डर और बेचैनी। उसका नाम था रिया।
रिया की ज़िंदगी आसान नहीं थी। वह एक गरीब परिवार से थी, पिता की बीमारी के बाद घर चलाने की जिम्मेदारी उसके कंधों पर आ गई थी। पढ़ाई के साथ-साथ वह छोटे-मोटे काम करती थी, ताकि घर का खर्च चल सके। लेकिन किस्मत ने उसकी राह में कांटे बिछा दिए थे।
पिछले कुछ महीनों से रिया को अजीब सी थकान महसूस होती थी। उसे बार-बार बुखार आता, शरीर में दर्द रहता, और कभी-कभी उसकी त्वचा पर लाल चकत्ते पड़ जाते। उसने कई डॉक्टरों से इलाज कराया, लेकिन कोई खास फर्क नहीं पड़ा। एक दिन डॉक्टर ने उसे ब्लड टेस्ट कराने की सलाह दी। जब रिपोर्ट आई, तो रिया के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसे एचआईवी पॉजिटिव बताया गया।

रिया को समझ नहीं आया कि उसे यह बीमारी कैसे हुई। उसने कभी कोई ऐसा काम नहीं किया था जिससे उसे एचआईवी हो सकता था। डॉक्टर ने बताया कि शायद किसी पुराने इलाज के दौरान दूषित सुई इस्तेमाल हुई होगी या ब्लड ट्रांसफ्यूजन के समय लापरवाही हुई होगी। रिया टूट चुकी थी, लेकिन उसने हार नहीं मानी। उसने तय किया कि वह अपना इलाज करवाएगी और अपनी ज़िंदगी को बेहतर बनाएगी।
लेकिन समाज की सोच कुछ और थी। एक दिन जब रिया बस स्टैंड पर खड़ी थी, अचानक भीड़ में से किसी ने चिल्लाकर कहा, “यह वही लड़की है जिसने 800 लोगों में एचआईवी फैला दिया है!” देखते ही देखते भीड़ इकट्ठा हो गई, लोग गुस्से में थे। किसी ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो अपलोड कर दिया, जिसमें रिया को बस स्टैंड पर खड़ा दिखाया गया था। अफवाह फैल गई कि रिया जानबूझकर लोगों के साथ संबंध बनाकर उन्हें एचआईवी संक्रमित कर रही है।
रिया घबराकर भागने लगी, लेकिन भीड़ ने उसे पकड़ लिया। लोगों ने उसे मारना शुरू कर दिया, गालियाँ दीं, और पुलिस को फोन कर दिया। पुलिस आई, रिया को हिरासत में ले लिया। सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हो गया, हर तरफ रिया की बदनामी हो गई। लोग उसके खिलाफ नारे लगाने लगे, “इसको सज़ा दो! इसने 800 लोगों की ज़िंदगी बर्बाद कर दी है!”
पुलिस ने रिया से पूछताछ की। उसने रोते हुए बताया कि वह कभी किसी के साथ संबंध नहीं बनाती थी, वह बस स्टैंड पर सिर्फ अपने काम के लिए आती थी। उसकी रिपोर्ट दिखाने पर पता चला कि वह एचआईवी पॉजिटिव है, लेकिन उसके खिलाफ कोई सबूत नहीं था कि उसने जानबूझकर किसी को संक्रमित किया हो। पुलिस ने उसे मेडिकल जांच के लिए भेजा।
इसी बीच, एक पत्रकार, आदित्य, को इस मामले में दिलचस्पी हो गई। उसने रिया की कहानी को गहराई से जानने की कोशिश की। आदित्य ने रिया के घरवालों से बात की, उसके डॉक्टर से मिला, और अस्पताल के रिकॉर्ड खंगाले। उसे पता चला कि रिया को एचआईवी किसी अस्पताल की लापरवाही की वजह से हुआ था, न कि उसकी किसी गलती से।
आदित्य ने अपने न्यूज़ चैनल पर रिया की सच्ची कहानी दिखाई। उसने बताया कि कैसे अफवाहों ने रिया की ज़िंदगी बर्बाद कर दी, कैसे समाज ने बिना सच जाने उसे दोषी ठहरा दिया। धीरे-धीरे लोग जागरूक होने लगे। कई सामाजिक संस्थाएँ रिया के समर्थन में आगे आईं। रिया को न्याय दिलाने के लिए लोगों ने रैली निकाली, “सच जानो, अफवाह मत फैलाओ।”
रिया की कहानी ने पूरे पटना शहर को झकझोर दिया। अस्पतालों में एचआईवी की जांच का अभियान शुरू हुआ। डॉक्टरों ने लोगों को बताया कि एचआईवी छूने, साथ बैठने, या सामान्य संपर्क से नहीं फैलता। यह केवल असुरक्षित संबंध, दूषित सुई या संक्रमित ब्लड से ही फैलता है। रिया ने भी हिम्मत दिखाई और लोगों को जागरूक करने के लिए कैंपेन चलाया।
समाज में धीरे-धीरे बदलाव आने लगा। लोग समझने लगे कि एचआईवी पॉजिटिव व्यक्ति भी सामान्य जीवन जी सकता है। रिया ने अपनी पढ़ाई जारी रखी, और एक सामाजिक कार्यकर्ता बन गई। उसने एचआईवी पीड़ितों के लिए हेल्पलाइन शुरू की, जहाँ लोग अपनी समस्याएँ साझा कर सकते थे। वह स्कूलों, कॉलेजों में जाकर बच्चों को जागरूक करती थी कि अफवाहों पर विश्वास न करें, सच जानें और प्रोटेक्शन का इस्तेमाल करें।
एक दिन, रिया को एक लड़का मिला, जिसका नाम था अजय। अजय भी एचआईवी पॉजिटिव था, लेकिन उसने कभी हार नहीं मानी थी। दोनों ने मिलकर एक संगठन बनाया, “साथ चलो”, जो एचआईवी पीड़ितों को मानसिक, भावनात्मक और आर्थिक सहायता देता था। धीरे-धीरे उनके संगठन ने पूरे बिहार में काम करना शुरू कर दिया।
रिया की कहानी अब मिसाल बन गई थी। वह लोगों को बताती थी कि एचआईवी कोई अभिशाप नहीं है, यह एक बीमारी है, जिसका इलाज संभव है। दवाओं से मरीज की ज़िंदगी लंबी हो सकती है, बशर्ते वह समय पर इलाज कराए और सावधानी बरते।
समाज में बदलाव आया, लेकिन चुनौतियाँ अभी बाकी थीं। कई लोग अभी भी एचआईवी पीड़ितों से दूरी बनाते थे, उन्हें हेय दृष्टि से देखते थे। रिया ने कभी हार नहीं मानी, उसने अपने संघर्ष को अपनी ताकत बना लिया।
एक दिन, पटना के बस स्टैंड पर फिर भीड़ थी। लेकिन इस बार रिया वहाँ एक कैंपेन के लिए आई थी। उसने माइक पर बोलना शुरू किया, “मैं रिया हूँ। मैं एचआईवी पॉजिटिव हूँ, लेकिन मैं दोषी नहीं हूँ। मेरी बीमारी किसी की गलती नहीं, बल्कि सिस्टम की लापरवाही है। मैं आप सबसे यही कहना चाहती हूँ कि अफवाहों पर विश्वास न करें। अगर आपको एचआईवी है, तो डरें नहीं, इलाज कराएँ। अगर नहीं है, तो सावधानी बरतें।”
लोगों ने ताली बजाई, कई लोग उसके पास आए, अपनी समस्याएँ बताईं। रिया ने सबको हिम्मत दी, उन्हें बताया कि एचआईवी से डरना नहीं, लड़ना है।
समाज में जागरूकता बढ़ने लगी। स्कूल, कॉलेज, अस्पतालों में एचआईवी के बारे में खुलकर बातें होने लगीं। सरकार ने भी एचआईवी जागरूकता के लिए अभियान चलाया। रिया और अजय की मेहनत रंग लाई।
कई साल बाद, रिया को एक राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, उसके साहस, संघर्ष और समाज में बदलाव लाने के लिए। वह मंच पर खड़ी थी, आँखों में आँसू थे, लेकिन चेहरे पर मुस्कान थी। उसने कहा, “अगर मेरी कहानी से एक भी ज़िंदगी बच जाए, तो मेरी मेहनत सफल है।”
रिया की कहानी एक मिसाल बन गई। उसने साबित कर दिया कि अफवाहें चाहे कितनी भी तेज़ हों, सच्चाई आखिर सामने आ ही जाती है। उसने समाज को सिखाया कि बीमारी से नहीं, अज्ञानता और अफवाहों से लड़ना ज़रूरी है।
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VIP काफिला आया… सांसद ने रुकवाया आर्मी का काफिला उसके बाद जो हुआ…
रास्ता देश का है – एक हाईवे, दो काफिले और एक फैसला
भूमिका
भारत का हर हाईवे सिर्फ गाड़ियों का रास्ता नहीं होता, बल्कि यह देश की धड़कन है। यहां रोज़ हजारों लोग, हजारों कहानियां और हजारों सपने एक-दूसरे से टकराते हैं। लेकिन कभी-कभी एक टकराव ऐसा होता है, जो सिर्फ दो गाड़ियों का नहीं, बल्कि दो सोचों का होता है – सत्ता बनाम फर्ज़। यह कहानी उसी टकराव की है, जहां एक ओर था वीआईपी काफिला, सत्ता का घमंड और दूसरी ओर था आर्मी का काफिला, देश की जिम्मेदारी।
हाईवे पर टकराव
एक तेज़ धूप वाली दोपहर थी। हाईवे पर लाल और नीली बत्तियों से चमकता वीआईपी काफिला पूरे रौब के साथ भागा जा रहा था। आगे-पीछे पुलिस की गाड़ियां, हथियारबंद सिक्योरिटी, और बीच में राज्य के ताकतवर सांसद राघव प्रताप सिंह। उनके चेहरे पर आत्मविश्वास नहीं, बल्कि अधिकार का भाव था। सड़कें जैसे उनकी जागीर हों, कानून सिर्फ किताबों में लिखा हो, फैसले उनकी मर्जी से तय होते हों।
इसी हाईवे पर दूसरी दिशा से इंडियन आर्मी का काफिला दिखाई दिया। एक के पीछे एक लाइन में चलते ट्रक, हर ट्रक में जवान। किसान का बेटा, मजदूर का बेटा, कोई शादी के सपने लिए, कोई घर में नवजात बच्चे की खुशी लिए – सबकुछ पीछे छोड़कर सिर्फ देश की फिक्र लिए जा रहे थे। यह कोई रूटीन मूवमेंट नहीं था, बल्कि बॉर्डर अलर्ट का काफिला था। हर मिनट मायने रखता था, हर देरी किसी जान की कीमत बन सकती थी।
आदेश और अहंकार
अचानक वीआईपी काफिले के आगे पुलिस की गाड़ी रुक गई। हाथ ऊपर उठा, आवाज आई – “इंडियन आर्मी कॉन्वॉय साइड में रोको।”
पहला ट्रक धीमा हुआ, दूसरा रुका, फिर तीसरा। कुछ ही पलों में पूरा आर्मी काफिला हाईवे पर थम गया। धूल धीरे-धीरे बैठने लगी।
एक ट्रक का दरवाजा खुला। कैप्टन अर्जुन राठौर उतरे। 12 साल की फौजी सेवा उनकी चाल में दिखती थी। सीधी रीड, कंधों पर जिम्मेदारी।
एसपी आगे बढ़ा, “वीआईपी मूवमेंट है। काफिला यहीं रुकेगा।”
अर्जुन ने शांत स्वर में जवाब दिया, “सर, यह आर्मी कॉन्वॉय है। बॉर्डर पर रिपोर्टिंग का टाइम फिक्स है।”
एसपी के होठों पर हल्की मुस्कान थी, “बॉर्डर बाद में, यहां सांसद साहब हैं।”
कुछ पल खामोशी छा गई। काफिले के ट्रकों के अंदर जवान खिड़कियों से बाहर देख रहे थे। एक जवान ने धीरे से कहा, “साहब, अगर कॉन्वॉय लेट हुआ, तो ऑपरेशन पर असर पड़ेगा।”
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा। उसे वहां एक फौजी नहीं, एक जिम्मेदार बेटा दिखा।
सांसद का सामना
वीआईपी गाड़ी का शीशा नीचे हुआ। राघव प्रताप सिंह बाहर झुके। नजर सीधी अर्जुन पर।
“कौन इंचार्ज है यहां?”
“कैप्टन अर्जुन राठौर, इंडियन आर्मी।”
“तुम जानते हो यह किसका रास्ता है?”
अर्जुन ने बिना झुके कहा, “किसका भी हो, यह देश का रास्ता है।”
कुछ सेकंड के लिए हाईवे पर सन्नाटा छा गया। सांसद का चेहरा सख्त हो गया।
“वीआईपी पहले जाएगा। पूरा आर्मी कॉन्वॉय यहीं रुकेगा।”
सायरन बंद कर दिए गए। अब आवाज नहीं, अहंकार बोल रहा था।
अर्जुन ने गहरी सांस ली, “सर, अगर यह काफिला रुका तो सिर्फ हम नहीं रुकेंगे, देश की सुरक्षा रुकेगी।”
एसपी चिल्लाया, “तुम आदेश मानोगे?”
अर्जुन की आवाज अब भारी थी, “हम आदेश नहीं, फर्ज़ मानते हैं।”
यह शब्द सड़क पर गूंजे। कुछ पल कोई नहीं बोला।
सिस्टम की परीक्षा
सांसद ने अपनी जेब से फोन निकाला। आंखों में भरोसा था। “अब देखते हैं सिस्टम किसके साथ खड़ा है।”
फोन कान से लगाया गया, “योगी जी को मिलाइए।”
हाईवे पर पूरा आर्मी काफिला खड़ा था। वीआईपी गाड़ियां रुकी थीं। धूप जल रही थी। समय निकल रहा था और एक फोन कॉल यह तय करने वाला था कि इस देश में पहले कौन चलेगा – सत्ता या सेना।
फोन की घंटी लगातार बज रही थी। कैप्टन अर्जुन ने पूरे काफिले की ओर देखा। हर ट्रक, हर जवान, फिर आसमान की तरफ देखा। धीरे से लगभग खुद से कहा, “जय हिंद।”
फोन की घंटी एक बार, दो बार, तीन बार। हर रिंग के साथ हाईवे पर खड़ा वक्त और भारी होता जा रहा था। धूप अब तेज़ लगने लगी थी। पसीना सिर्फ जवानों के चेहरे पर नहीं, सिस्टम के माथे पर भी था। वीआईपी काफिले की गाड़ियां चुपचाप खड़ी थीं। सायरन बंद थे, लेकिन घमंड अब भी जिंदा था।
फैसला
फोन की घंटी रुकी। दूसरी तरफ आवाज आई, “हां, बोलिए।”
यह आवाज तेज़ नहीं थी, पर उसमें ऐसा वजन था कि सामने वाला सीधा खड़ा हो जाए।
सांसद ने कुर्सी पर टिकते हुए कहा, “योगी जी, यहां हाईवे पर आर्मी कॉन्वॉय रास्ता रोक रहा है। वीआईपी मूवमेंट है।”
लाइन के उस पार कुछ सेकंड की खामोशी। फिर आवाज आई, “आर्मी कॉन्वॉय कहां जा रहा है?”
सांसद ने हल्के अंदाज में कहा, “बॉर्डर की तरफ ही होगा। पर अभी वीआईपी को जाना है।”
फोन के उस पार आवाज अब बदल गई, “कौन सा बॉर्डर?”
सांसद थोड़ा असहज हुआ, “सर, पूरी जानकारी तो नहीं लेकिन मेरे कार्यक्रम में देर हो रही है।”
अब आवाज सख्त थी, “जानकारी नहीं है और फैसला चाहिए?”
सांसद ने बात संभालने की कोशिश की, “सर, मेरी सिक्योरिटी का सवाल है। प्रोटोकॉल है।”
लाइन के उस पार कुछ पल की चुप्पी। फिर वह शब्द आए जो हवा का रुख बदल देते हैं, “देश की सिक्योरिटी तुम्हारी सिक्योरिटी से बड़ी है।”
एसपी फोन की आवाज नहीं सुन पा रहा था, लेकिन सांसद का चेहरा सब कुछ बता रहा था।
योगी जी की आवाज जारी रही, “अगर आर्मी कॉन्वॉय बॉर्डर जा रहा है तो वही पहले जाएगा।”
सांसद ने हड़बड़ा कर कहा, “पर सर, वीआईपी प्रोटोकॉल…”
बीच में ही आवाज आई, “प्रोटोकॉल देश के लिए होता है, देश प्रोटोकॉल के लिए नहीं।”
एक पल के लिए सांसद चुप हो गया। फोन पर आखिरी शब्द पड़े, “आर्मी कॉन्वॉय को तुरंत रास्ता दो।”
कॉल कट गई। फोन अब भी सांसद के हाथ में था, लेकिन भरोसा चेहरे से गायब हो चुका था।
रास्ता खुला
एसपी ने हिम्मत करके पूछा, “सर, क्या आदेश है?”
सांसद ने दांत भीचते हुए कहा, “काफिला साइड में लगा हो।”
यह शब्द उसके लिए आदेश नहीं थे, यह हार थी।
पुलिस ने इशारा किया। वीआईपी गाड़ियां धीरे-धीरे सड़क के किनारे खिसकने लगीं। हाईवे पर रास्ता खुलने लगा।
कैप्टन अर्जुन दूर से सब देख रहे थे। उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस हाथ उठाया। आर्मी काफिले के इंजन एक-एक करके स्टार्ट हुए। पहला ट्रक आगे बढ़ा, फिर दूसरा, फिर पूरा काफिला।
जवानों की आंखों में अजीब सी चमक थी। कोई जश्न नहीं, कोई नारा नहीं। बस सुकून।
एक जवान ने धीरे से कहा, “साहब, आज देरी नहीं हुई।”
अर्जुन ने उसकी ओर देखा, “आज देश समय पर पहुंचा है।”
काफिला आगे बढ़ता गया। वीआईपी काफिला पीछे रह गया। कुछ गाड़ियां कुछ देर तक चलती धूल को देखती रहीं। सांसद की गाड़ी में खामोशी थी। ना फोन, ना बात। सिर्फ एक सवाल जो भीतर ही भीतर उसे खाए जा रहा था – क्या हर बार सिस्टम उसके साथ खड़ा होगा?
सीमा पर मिशन
आर्मी काफिला तेजी से सीमा की ओर बढ़ रहा था। रास्ते में रेडियो पर आवाज आई, “कॉन्वॉय मेंटेन स्पीड। बॉर्डर अलर्ट कंफर्म्ड।”
जवानों के चेहरे और सख्त हो गए। यह अब सिर्फ यात्रा नहीं थी, यह मिशन था।
अर्जुन ने अपने हेलमेट को ठीक किया। उसे याद आया सुबह घर से निकलते वक्त मां ने क्या कहा था, “बेटा सही करना, डरना मत।”
आज वो सही कर पाए थे।
कुछ घंटे बाद सीमा के पास हलचल थी। खुफिया इनपुट सही निकला। दुश्मन की साजिश तैयार थी। लेकिन आर्मी काफिला समय पर पहुंच चुका था। घेरा डाला गया, इलाका सुरक्षित किया गया। एक बड़ा हमला होने से पहले ही नाकाम हो गया।
रेडियो पर आवाज गूंजी, “ऑपरेशन सक्सेसफुल।”
किसी ने ताली नहीं बजाई, किसी ने जश्न नहीं मनाया, क्योंकि यह काम उनका रोज का काम था।
अर्जुन ने आसमान की ओर देखा, आज आसमान कुछ ज्यादा साफ लग रहा था।
सत्ता की खामोशी
उधर शहर में शाम का अंधेरा उतर चुका था। टीवी पर ब्रेकिंग न्यूज़ चल रही थी, “आर्मी कॉन्वॉय रीचेस बॉर्डर ऑन टाइम, मेजर थ्रेट।”
सांसद ने टीवी बंद कर दिया। कमरे में सिर्फ खामोशी बची। उसे एहसास हो चुका था, सड़कें वीआईपी की हो सकती हैं, पर रास्ता हमेशा देश का होता है।
कैप्टन अर्जुन अपने काफिले के साथ अंधेरे में ड्यूटी पर खड़े थे। कोई कैमरा नहीं, कोई तारीफ नहीं, बस एक आवाज दिल में गूंज रही थी – “जय हिंद।”
रात गहरी हो चुकी थी। सीमा पर हवा में अजीब सी खामोशी थी। ऐसी खामोशी जो या तो तूफान से पहले आती है या तूफान के बाद।
आर्मी का काफिला अब अपनी पोजीशन पर था। ट्रक खड़े थे, जवान सतर्क थे, हथियार तैयार थे। हर चेहरे पर नींद नहीं, जिम्मेदारी थी।
रेडियो से धीमी आवाज आई, “अलर्ट रिमेंस हाई। स्टे शार्प।”
कैप्टन अर्जुन मैप के सामने खड़े थे। उनकी उंगलियां एक-एक पॉइंट पर रुकती थीं। अगर वह काफिला आज हाईवे पर कुछ और देर रुक जाता तो यह सारी तैयारियां शायद बेकार हो जातीं।
हमला और जीत
कुछ किलोमीटर दूर दुश्मन अपनी चाल चल चुका था। उन्हें भरोसा था कि आर्मी समय पर नहीं पहुंचेगी। उन्हें भरोसा था कि सिस्टम हमेशा वीआईपी को चुनता है।
लेकिन आज सिस्टम ने देश को चुना था।
पहली हलचल थर्मल स्क्रीन पर दिखी। एक जवान ने फुसफुसाकर कहा, “मूवमेंट 3:00 बजे की दिशा में।”
अर्जुन ने तुरंत आदेश दिया, “पोजीशंस होल्ड, नो नॉइज़।”
हर जवान जमीन का हिस्सा बन गया। सांसे धीमी, दिल तेज़। कुछ ही मिनटों में साफ हो गया – यह हमला था। पूरा प्लान था, लेकिन उनकी टाइमिंग गलत थी।
आर्मी पहले पहुंच चुकी थी।
कमांड मिली, “गो!” और फिर अंधेरे में रोशनी फटी। कुछ ही मिनटों में सब खत्म। कोई लंबी लड़ाई नहीं, कोई फिल्मी सीन नहीं, बस प्रोफेशनल काम।
रेडियो पर आवाज गूंजी, “थ्रेट न्यूट्रलाइज्ड। एरिया सिक्योर।”
कुछ जवान थोड़ी देर चुपचाप बैठे रहे। किसी ने आसमान की ओर देखा, किसी ने जमीन की तरफ।
एक जवान ने धीमे से कहा, “साहब, अगर हम आज लेट हो जाते…”
अर्जुन ने उसकी बात पूरी नहीं होने दी, “तो आज किसी मां का बेटा घर नहीं लौटता।”
फर्ज़ का रास्ता
खामोशी। उस खामोशी में बहुत कुछ था।
सुबह होने लगी थी। सीमा पर सूरज धीरे-धीरे निकल रहा था। नई रोशनी, नई उम्मीद के साथ।
अर्जुन ने अपने मोबाइल पर नेटवर्क देखा। एक मिस्ड कॉल थी – घर से।
उन्होंने कॉल किया। उधर से मां की आवाज आई, “बेटा खबर देखी?”
अर्जुन कुछ नहीं बोले।
मां ने कहा, “भगवान का शुक्र है तुम लोग समय पर पहुंच गए।”
अर्जुन की आवाज पहली बार हल्की पड़ी, “मां, आज रास्ता मिल गया।”
मां ने सिर्फ इतना कहा, “जब फर्ज़ आगे होता है तो रास्ते खुद बनते हैं।”
कॉल कट गई।
अर्जुन ने गहरी सांस ली।
शहर में सुबह
दूसरी तरफ शहर में सुबह का शोर शुरू हो चुका था। अखबार छप चुके थे। हेडलाइन थी, “आर्मी थwarts मेजर अटैक। कॉन्वॉय रीचेस बॉर्डर जस्ट इन टाइम।”
कोई नाम नहीं, कोई चेहरा नहीं। बस एक लाइन।
सांसद राघव प्रताप सिंह अखबार हाथ में लिए बैठे थे। उन्होंने हेडलाइन पढ़ी। फिर दूसरी बार पढ़ी। अखबार मोड़कर टेबल पर रख दिया। कमरे में कोई और नहीं था। ना सायरन, ना सिक्योरिटी, सिर्फ सोच।
उन्हें पहली बार एहसास हुआ – सत्ता का रास्ता भीड़ से गुजरता है, पर देश का रास्ता कुर्बानी से।
याद और जिम्मेदारी
उसी हाईवे पर जहां कल टकराव हुआ था, आज सब कुछ सामान्य था। गाड़ियां चल रही थीं, लोग जा रहे थे। लेकिन उस जगह जहां वीआईपी काफिला रुका था, वहां एक छोटा सा बोर्ड लगा दिया गया था – राष्ट्र सेवा सर्वोपरि।
कोई बड़ा उद्घाटन नहीं, कोई पीता नहीं, बस एक याद।
आर्मी का काफिला अब आगे बढ़ चुका था। नया मिशन, नई जगह। जवान ट्रक में बैठे हंस भी रहे थे। किसी ने कहा, “साहब, आज तो वीआईपी पीछे रह गया।”
दूसरा बोला, “अच्छा है, कभी-कभी पीछे रहना भी जरूरी होता है।”
अर्जुन ने बाहर देखा, सड़क सीधी थी। उन्होंने कहा, “याद रखना, रास्ता हमेशा सीधा नहीं होता, पर फर्ज़ होना चाहिए।”
ट्रक आगे बढ़ते रहे। धूल उड़ती रही और देश शांत रहा, क्योंकि किसी ने सही समय पर सही फैसला लिया था।
उपसंहार
यह कहानी किसी सांसद की हार की नहीं है। यह कहानी उस जीत की है जिसका शोर नहीं होता। यह कहानी उन लोगों की है जो कैमरे से दूर देश को सुरक्षित रखते हैं।
अगर आज आप चैन से सो पा रहे हैं, तो याद रखना कहीं ना कहीं एक आर्मी काफिला अब भी चल रहा है – आपके लिए, देश के लिए।
जय हिंद।
नोट
कहानी में दिखाए गए सभी पात्र, घटनाएं और संवाद पूरी तरह काल्पनिक हैं। इनका किसी भी वास्तविक व्यक्ति, नेता, अधिकारी, सरकारी संस्था या वास्तविक घटना से कोई सीधा या अप्रत्यक्ष संबंध नहीं है। इस कहानी का उद्देश्य किसी की छवि को ठेस पहुंचाना नहीं, बल्कि फर्ज़, जिम्मेदारी और देशभक्ति की भावना को दिखाना है। हम भारतीय सेना का पूरा सम्मान करते हैं। देश सर्वोपरि है।
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