लड़की 6 महीने की प्रेगनेंट हुई तो प्रेमी ने किया ऐसा

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(सामग्री चेतावनी: यह कहानी एक नाबालिग के साथ हुए गंभीर अपराध और हत्या पर आधारित है। विवरण तथ्यात्मक है, अनावश्यक या ग्राफ़िक वर्णन से बचा गया है।)

दोस्तों, यह कहानी राजस्थान के चूरू ज़िले के बिदासर थाना क्षेत्र के एक गांव की है। 9 दिसंबर की सुबह गांव में सब कुछ सामान्य लग रहा था। खेतों की ओर जाती पगडंडियां, ठंडी हवा और रोज़मर्रा की हलचल—किसी को अंदाज़ा नहीं था कि कुछ ही घंटों में पूरा इलाका शोक और आक्रोश से भर जाएगा।

गांव की 15 वर्षीय लड़की अपने माता‑पिता और भाई के साथ रहती थी। वह 10वीं कक्षा की छात्रा थी। परिवार मेहनतकश था—सुबह जल्दी उठना, खेतों की देखरेख, घर‑गृहस्थी; यही उनकी दिनचर्या थी। उस सुबह करीब 5:30 बजे पिता खेतों की ओर निकले। बेटी को सोता देखकर वह चले गए। लगभग 15–20 मिनट बाद लौटे तो देखा कि बेटी बिस्तर पर नहीं है। पहले तो उन्होंने सोचा कि वह शौचालय गई होगी या आसपास ही होगी। लेकिन आधा घंटा बीत गया—बेटी नहीं लौटी।

पिता ने पत्नी से बात की। मां ने कहा कि शायद वह अपने भाई के पास खेतों की ओर गई हो। पिता ने बेटे को फोन किया—लेकिन बेटी वहां नहीं थी। चिंता बढ़ने लगी। गांव के पड़ोसियों से पूछा गया। सुबह के सन्नाटे में आशंका भारी पड़ने लगी कि कहीं बेटी के साथ कुछ गलत तो नहीं हुआ।

करीब 6:30 बजे खोज तेज़ हुई। गांव वाले भी साथ हो गए। खेतों, पगडंडियों और पास की खदानों तक खोज की गई। लगभग डेढ़ घंटे बाद एक खदान के पास पिता को बेटी की चप्पल दिखी। वह तुरंत अंदर उतरे। वहां बेटी बेहोशी की हालत में पड़ी थी। सांसें नहीं चल रही थीं। गले पर दुपट्टे का निशान दिख रहा था। कपड़े व्यवस्थित थे—ऐसा नहीं लग रहा था कि मौके पर किसी तरह का संघर्ष हुआ हो। पुलिस को तुरंत सूचना दी गई।

पुलिस और फॉरेंसिक टीम मौके पर पहुंची। शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया। गांव में आक्रोश फैल गया। अस्पताल के बाहर धरना शुरू हो गया—न्याय की मांग तेज़ थी। शाम तक पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई और जिसने सबको हिला दिया: बच्ची छह महीने की गर्भवती थी।

यह खबर सुनते ही गांव में कोहराम मच गया। सवालों की बाढ़ आ गई—इतनी छोटी उम्र में यह कैसे हुआ? परिवार को कैसे पता नहीं चला? बच्ची ने किसी को क्यों नहीं बताया? पुलिस ने जांच तेज़ की। मां ने बताया कि बेटी अक्सर ढीले कपड़े पहनती थी। कभी‑कभी उल्टियां और पेट दर्द होता था, जिसे वे सामान्य पेट की समस्या समझते रहे—इनू, नींबू, हाजमोला जैसी चीज़ें देते रहे। बेटी सुबह जल्दी स्कूल चली जाती और लौटने पर मां खेतों में होती। इस तरह संकेत अनदेखे रह गए।

पुलिस ने डीएनए जांच का फैसला किया। गर्भ में पाए गए डीएनए का मिलान गांव और आसपास के संदिग्धों से किया गया। कई नमूने लिए गए—सब नेगेटिव आए। धरना जारी रहा। दबाव बढ़ता गया।

इसी बीच गांव वालों ने एक नाम बताया—सुनील मेघवाल। उम्र करीब 40 साल। उसे अक्सर बच्ची से बात करते देखा गया था। पुलिस ने उसे ढूंढा—वह एक ठेके पर मिला। डीएनए सैंपल लिया गया। कुछ समय बाद रिपोर्ट आई—डीएनए मैच हो गया। पुलिस ने सुनील को गिरफ्तार किया।

पूछताछ में सुनील टूट गया। उसने कबूल किया कि उसने बच्ची को बहला‑फुसलाकर अपने भरोसे में लिया। वह सुबह‑सुबह, जब गांव में हलचल कम होती, मिलने के बहाने बुलाता। छह महीने पहले पहली बार उसने अपराध किया और फिर कई बार यह दोहराया। बच्ची नादान थी, डरी हुई थी। जब उसे पता चला कि वह गर्भवती है—उल्टियां, पीरियड्स का रुकना—उसने सुनील को बताया। सुनील पहले टालता रहा, फिर घबरा गया। उसे डर था कि बात खुली तो गांव उसे मार डालेगा और जेल भी जाना पड़ेगा।

8 दिसंबर को उसने बच्ची को 9 दिसंबर की सुबह मिलने बुलाया—यह कहकर कि कोई ज़रूरी बात है। बच्ची ने शायद सोचा कि वह मदद करेगा या शादी की बात करेगा। लेकिन खदान में उसने बच्ची का गला दबाया और सिर पर पत्थर से वार किया—ताकि वह बच न सके।

पुलिस ने पूरी कहानी सामने रखी। आरोपी को जेल भेजा गया। गांव स्तब्ध था। हर कोई यही सोच रहा था कि यह सब कैसे छिपा रहा, कैसे परिवार को भनक नहीं लगी।

यह कहानी सुनाने का उद्देश्य किसी को ठेस पहुंचाना नहीं, बल्कि चेतावनी देना है। भरोसा ज़रूरी है, लेकिन निगरानी और संवाद भी उतने ही ज़रूरी हैं। समय कठिन है—अपराधी मौके की तलाश में रहते हैं। बेटियों की सुरक्षा सामूहिक जिम्मेदारी है।

इस बच्ची के साथ जो हुआ, वह दोबारा किसी के साथ न हो—यही इस कहानी का मकसद है।