वर्दी, बाइक और नदी का रहस्य | क्या यह सिर्फ एक हादसा था? | UP Police Case

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वर्दी, बाइक और नदी का रहस्य

क्या दरोगा अजय गॉड की मौत सिर्फ एक हादसा थी या खाकी के भीतर छुपी साजिश?

बस्ती / अयोध्या (उत्तर प्रदेश)।
खाकी वर्दी भारतीय समाज में सुरक्षा, कानून और विश्वास का प्रतीक मानी जाती है। यही वर्दी अपराधियों के लिए डर और आम नागरिकों के लिए भरोसा होती है। लेकिन जब इसी वर्दी को पहनने वाला एक ईमानदार पुलिस अधिकारी अचानक लापता हो जाए और कई दिनों बाद उसका शव किसी दूसरी नदी में मिले, तो सवाल सिर्फ एक मौत का नहीं रह जाता, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर खड़े हो जाते हैं।

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में तैनात सब-इंस्पेक्टर अजय कुमार गॉड की रहस्यमयी मौत ने पुलिस महकमे, प्रशासन और आम जनता को झकझोर कर रख दिया है। यह मामला अब सिर्फ एक पुलिस अफसर की गुमशुदगी या मृत्यु नहीं, बल्कि लापरवाही, संभावित साजिश और विभागीय चुप्पी का प्रतीक बन चुका है।


अचानक गायब हुआ एक जांबाज़ दरोगा

5 फरवरी 2024 की शाम। बस्ती जिले के परशुरामपुर थाने में सब कुछ सामान्य था। थाने के प्रभारी सब-इंस्पेक्टर अजय कुमार गॉड अपनी नियमित ड्यूटी पर थे। शाम करीब 6–7 बजे के आसपास वे थाने से बाहर निकले। इसके बाद वे कभी वापस नहीं लौटे।

वर्दी, बाइक और नदी का रहस्य | क्या यह सिर्फ एक हादसा था? | UP Police Case

अजय गॉड ने उसी शाम अपनी पत्नी रंजीता से फोन पर सामान्य बातचीत की थी। यह एक आम पारिवारिक कॉल थी, जिसमें किसी अनहोनी का कोई संकेत नहीं था। लेकिन उस कॉल के कुछ ही देर बाद उनका मोबाइल फोन बंद हो गया। शुरू में पत्नी ने इसे नेटवर्क या बैटरी की समस्या समझा, लेकिन जैसे-जैसे रात बीतती गई, चिंता गहराती चली गई।

अगली सुबह जब अजय घर नहीं पहुंचे और फोन लगातार स्विच ऑफ रहा, तो रंजीता थाने पहुंचीं। वहां उन्हें जो जवाब मिला, उसने हालात को और भयावह बना दिया। किसी को ठीक से नहीं पता था कि थानाध्यक्ष कहां गए हैं। यहीं से सवाल उठता है कि क्या एक थाना प्रभारी का इस तरह बिना सूचना गायब हो जाना सिस्टम की गंभीर विफलता नहीं है?


शुरुआती 18 घंटे और बढ़ती लापरवाही

परिजनों के हंगामे और दबाव के बाद अजय गॉड की गुमशुदगी दर्ज की गई। लेकिन तब तक करीब 18 घंटे बीत चुके थे। ये वही घंटे थे जो शायद किसी की जान बचा सकते थे।

तलाश अभियान शुरू हुआ। वायरलेस संदेश प्रसारित हुए, कॉल डिटेल और लोकेशन ट्रेस करने की कोशिशें की गईं। अगले दिन पुलिस को एक अहम सुराग मिला, जिसने पूरे मामले को और उलझा दिया।


नदी किनारे मिली बाइक, लेकिन दरोगा कहां?

बस्ती शहर के सदर कोतवाली क्षेत्र में स्थित अमहट घाट, जहां से कुवानो नदी बहती है, वहां एक लावारिस पल्सर बाइक खड़ी मिली। जांच करने पर पता चला कि यह बाइक लापता दरोगा अजय गॉड की थी।

बाइक स्टैंड पर खड़ी थी, आसपास संघर्ष या दुर्घटना के स्पष्ट निशान नहीं थे। बाइक से अजय का कुछ निजी सामान भी बरामद हुआ। सवाल सीधा था—अगर बाइक यहां है, तो अजय कहां हैं?

क्या उन्होंने नदी में छलांग लगाई?
क्या यह आत्महत्या थी?
या फिर किसी साजिश के तहत उन्हें यहां लाकर बाइक छोड़ी गई?


कुवानो नदी में चला सर्च ऑपरेशन

पुलिस ने गोताखोरों की मदद से कुवानो नदी में सर्च ऑपरेशन चलाया। घंटों तक नदी की तलाशी ली गई। अजय गॉड की पत्नी और बच्चे घाट पर खड़े होकर बेसब्री से इंतजार करते रहे। लेकिन नदी ने कोई जवाब नहीं दिया।

इसी बीच सीसीटीवी फुटेज सामने आया, जिसमें अजय गॉड बाइक पर जाते हुए दिखाई दिए। हैरानी की बात यह थी कि उनके पीछे एक व्यक्ति बैठा हुआ था, जिसे थाने का एक फॉलोअर बताया गया। यह फुटेज जांच की दिशा बदलने के लिए काफी था, लेकिन इस व्यक्ति की भूमिका पर कोई ठोस कार्रवाई या स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई।


पांच दिन बाद 50 किलोमीटर दूर मिला शव

10 फरवरी 2024 को एक और चौंकाने वाली सूचना सामने आई। बस्ती से करीब 50 किलोमीटर दूर अयोध्या जिले में सरयू नदी के तिहूरा मांझा इलाके में एक शव बरामद हुआ। शव कई दिनों तक पानी में रहने के कारण बुरी हालत में था।

जब अयोध्या पुलिस ने शव की पहचान की और बस्ती पुलिस से संपर्क किया, तो आशंका सच साबित हुई। यह शव किसी और का नहीं, बल्कि दरोगा अजय गॉड का ही था।

यह खबर परिवार पर कहर बनकर टूटी। पत्नी रंजीता बेसुध हो गईं। बच्चों के सिर से पिता का साया उठ चुका था।


एडीएम भाई का फूट-फूट कर रोना और सिस्टम पर सवाल

अजय गॉड के छोटे भाई अरुण कुमार गॉड, जो झांसी में एडीएम पद पर तैनात हैं, पोस्टमार्टम हाउस पहुंचे। वहां उन्होंने जो देखा, उसने उन्हें अंदर से तोड़ दिया।

एक प्रशासनिक अधिकारी, एक एडीएम, उस समय अपना पद, अपनी शक्ति सब भूल चुका था। वह सड़क पर बैठकर रो रहा था, सवाल कर रहा था—
“अगर मेरा भाई एक दरोगा नहीं होता, तो क्या आप ऐसे ही ढूंढते?”

अरुण गॉड ने पुलिस प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि एसपी और डीआईजी न तो समय पर सक्रिय हुए और न ही शव मिलने के बाद मौके पर पहुंचे। यह धरना और आक्रोश पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बन गया।


सबसे बड़ा सवाल: बाइक एक नदी, शव दूसरी नदी में कैसे?

इस केस का सबसे रहस्यमयी पहलू यही है।
अजय गॉड की बाइक कुवानो नदी के किनारे मिली।
उनका शव सरयू नदी में, 50 किलोमीटर दूर मिला।

हालांकि कुवानो नदी आगे जाकर सरयू में मिलती है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि 5 दिनों में शव का इस तरह बहकर इतनी दूरी तय करना, वह भी बिना स्पष्ट साक्ष्य के, संदेहास्पद है।

अगर यह आत्महत्या थी, तो शव कुवानो में ही क्यों नहीं मिला?
अगर हत्या हुई, तो क्या शव को दूसरी जगह ले जाकर नदी में डाला गया?


धमकियों का दावा और साजिश की आशंका

अजय गॉड की पत्नी रंजीता ने दावा किया कि उनके पति को पहले से जान का खतरा था। उन्होंने बताया कि दुबौलिया थाने में तैनाती के दौरान एक आरोपी पुलिस कस्टडी से भागा था, जिसकी बाद में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। उस मामले में अजय गॉड पर आरोप लगे थे और उन्हें धमकियां भी मिली थीं।

परिजनों का आरोप है कि पुलिस इस पूरे मामले को आत्महत्या बताकर दबाने की कोशिश कर रही है ताकि विभाग की छवि खराब न हो।


न्याय की मांग और अधूरी जांच

परिवार ने स्पष्ट मांग रखी है कि मामले में हत्या का मुकदमा दर्ज हो और सीबीआई जांच कराई जाए। पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है, जो यह तय करेगी कि मौत डूबने से हुई या किसी और कारण से।

फिलहाल यह मामला बस्ती से लेकर लखनऊ तक चर्चा में है। एक पुलिस अधिकारी की मौत ने पुलिस व्यवस्था, जवाबदेही और पारदर्शिता पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं।


निष्कर्ष

दरोगा अजय गॉड की मौत सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं है। यह उस खाकी वर्दी पर लगा सवाल है, जिसे कानून और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है। अगर एक पुलिस अधिकारी का परिवार ही न्याय के लिए सड़क पर बैठने को मजबूर हो जाए, तो आम नागरिक की स्थिति की कल्पना करना मुश्किल नहीं।

अब सवाल यह नहीं है कि अजय गॉड कैसे मरे, बल्कि यह है कि क्या उन्हें न्याय मिलेगा?
या यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?