वह नौकरानी से प्यार कर बैठा और अपनी पत्नी को तलाक दे दिया, लेकिन नौकरानी सारा सामान लेकर भाग गई, फिर…
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दिल्ली के वसंत विहार में आदित्य का आलीशान बंगला किसी सपने जैसा था। सफेद संगमरमर, हरे-भरे लॉन, विदेशी गाड़ियों की कतार और हर तरफ शान-ओ-शौकत। यह बंगला आदित्य के पिता की बरसों की मेहनत का नतीजा था, जिसे आदित्य ने अपनी काबिलियत से और भी बड़ा बना दिया था। आदित्य 40 साल का बेहद सफल बिजनेसमैन था, उसकी टेक्सटाइल कंपनी ‘रॉयल फैबिक्स’ देश के बड़े ब्रांड्स में से एक थी। उसके पास दौलत थी, शोहरत थी और एक ऐसी पत्नी थी जो किसी भी पति का गुरूर हो सकती थी।
उसकी पत्नी राधिका, 35 साल की, बेहद शांत, सुशील और खूबसूरत थी। वह एक रिटायर्ड प्रोफेसर की बेटी थी और खुद भी लिटरेचर में पोस्ट ग्रेजुएट थी। शादी के बाद उसने अपनी सारी डिग्रियों को, अपनी इच्छाओं को एक संदूक में बंद कर दिया था। उसकी दुनिया अब सिर्फ आदित्य, उनका घर और आठ साल की बेटी पिया थी। राधिका एक आदर्श पत्नी और मां थी। वह हर सुबह आदित्य के उठने से पहले उठती, रात में उसके सोने के बाद सोती। घर का कोना-कोना उसकी मेहनत और प्यार से महकता था। वह आदित्य की हर जरूरत का ख्याल रखती—कपड़े, खाना, बिजनेस की फाइलें, बेटी की पढ़ाई, सब कुछ।
बाहर से देखने पर यह परिवार एकदम परफेक्ट लगता था। लेकिन इस तस्वीर के पीछे एक सच्चाई छुपी थी—आदित्य अब अपनी सीधी-सादी पत्नी से ऊब चुका था। उसे राधिका की सादगी पिछड़ी हुई लगती थी। बिजनेस पार्टियों में अपने दोस्तों की मॉडर्न, फैशनेबल पत्नियों को देखकर उसे शर्म आती थी। राधिका को पार्टियों में जाना पसंद नहीं था, छोटे कपड़े पहनना या अजनबियों से घुलना-मिलना उसे असहज लगता था। आदित्य को अब उसकी यही बातें चुभने लगी थीं। वह चाहता था कि उसकी पत्नी भी बाकी औरतों की तरह बोल्ड और बिंदास हो।
इसी बीच एक दिन उनके घर में आई माया। 22-23 साल की एक नई नौकरानी, दूर के गांव से आई थी। सांवला रंग, बड़ी-बड़ी नशीली आंखें और भोला चेहरा। उसने बताया कि वह बहुत गरीब है, मां-बाप नहीं हैं और छोटी बहन की पढ़ाई के लिए काम करने आई है। राधिका को उस पर तरस आ गया, उसने माया को काम पर रख लिया और घर के एक कोने में रहने के लिए छोटा सा कमरा दे दिया।
शुरुआत में माया ने अपने काम से और भोलेपन से सबका दिल जीत लिया। वह मेहनती थी, राधिका की हर बात मानती थी। मगर उसकी नजरें हमेशा आदित्य पर टिकी रहती थीं। यहीं से उस घिनौने खेल की शुरुआत हुई, जिसने इस हंसते-खेलते घर को खंडहर में बदल दिया।
माया बहुत चतुर और शातिर थी। उसने आदित्य जैसे अमीर आदमी को फांसने का जाल बुनना शुरू किया। जब भी आदित्य घर पर होता, वह ऐसे कपड़े पहनती जो तंग और आकर्षक होते। वह उसके सामने झुककर काम करती और अपनी अदाओं से उसका ध्यान अपनी ओर खींचने की कोशिश करती। मीठी आवाज में बातें करती—”साहब, आप कितना काम करते हैं, थक जाते होंगे। लाइए, मैं आपके पैर दबा दूं। आप आज बहुत अच्छे लग रहे हैं।”
आदित्य जो अपनी पत्नी से ऐसी तारीफें सुनने का आदि नहीं था, उसे माया की बातें शहद जैसी लगती थीं। वह धीरे-धीरे उसकी ओर आकर्षित होने लगा। माया ने दूसरा कदम उठाया—राधिका और आदित्य के बीच गलतफहमियां पैदा करनी शुरू कर दी। जब राधिका आदित्य के लिए कोई खास डिश बनाती, माया चुपके से उसमें नमक या मिर्च ज्यादा डाल देती। आदित्य गुस्से में खाना छोड़ देता, तो माया उसके लिए कुछ बनाकर ले जाती—”साहब, भाभी जी तो शायद भूल गईं, आप भूखे मत सोइए, मैंने आपके लिए बना दिया है।”
जब राधिका आदित्य के ऑफिस के कपड़े प्रेस करती, माया जानबूझकर किसी शर्ट पर हल्का सा दाग लगा देती। आदित्य ऑफिस के लिए तैयार होता, दाग देखकर गुस्सा करता, माया दौड़कर दूसरी शर्ट प्रेस करके ले आती। वह अक्सर राधिका की बुराई बहुत मासूमियत से आदित्य के सामने करती—”साहब, भाभी जी बहुत अच्छी हैं, पर उन्हें आपकी कोई कदर नहीं है। आप उनके लिए इतना कुछ करते हैं और वह सारा दिन बस पूजा-पाठ और बेटी में लगी रहती हैं।”
आदित्य जो पहले ही अपनी पत्नी से थोड़ा खिंचा-खिंचा रहता था, अब माया की बातों पर पूरी तरह यकीन करने लगा। उसे अब राधिका में सिर्फ खामियां ही नजर आने लगीं। उसे लगने लगा कि राधिका उसके लायक नहीं है, वह बोरिंग और पुरानी सोच वाली है। और माया—वह एक ऐसी लड़की है जो उसे समझती है, उसकी परवाह करती है।
राधिका अपने पति के बदलते व्यवहार को महसूस कर रही थी। उसे समझ आ रहा था कि माया जैसी दिखती है, वैसी है नहीं। उसने कई बार आदित्य को समझाने की कोशिश की—”मुझे वह लड़की ठीक नहीं लगती, उसकी नजरें…” मगर आदित्य उसकी बात सुनने को तैयार नहीं था। उल्टा उसी पर बरस पड़ता—”तुम जलती हो, क्योंकि वह मेरी परवाह करती है और तुम नहीं। तुम एक गरीब लड़की की खुशी नहीं देख सकती।”
अब घर में रोज झगड़े होने लगे। आदित्य अब राधिका से बात भी नहीं करता था, देर रात तक घर लौटता और आते ही माया को ढूंढता। उसके हाथ का बना खाना खाता, उसी से अपने दिल की बातें करता। राधिका अंदर ही अंदर घुटती रहती, अपनी बेटी पिया के लिए सब सह रही थी।
और फिर एक रात आदित्य ने सारी हदें पार कर दीं। शराब के नशे में धुत होकर घर लौटा, राधिका ने उसे संभालने की कोशिश की, तो उसने धक्का दे दिया—”दूर हटो मुझसे, मैं तुम्हारी शक्ल भी नहीं देखना चाहता।” वह लड़खड़ाता हुआ माया के कमरे की ओर बढ़ गया और उस रात उसने वो गुनाह किया जिसने पति-पत्नी के पवित्र रिश्ते को तार-तार कर दिया।
अगली सुबह राधिका ने आदित्य को माया के कमरे से निकलते देखा। उसका विश्वास, प्यार, सब कुछ एक पल में टूट गया। वह रोती हुई आदित्य के पास गई—”आपने यह क्या किया? आपने हमारा रिश्ता…”
“कौन सा रिश्ता? वह तो कब का मर चुका है राधिका। अब मैं माया से प्यार करता हूं और उसी के साथ रहना चाहता हूं।”
“नहीं, आप ऐसा नहीं कर सकते। मैं आपकी पत्नी हूं, यह पिया आपकी बेटी है।”
“मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं तुम्हें तलाक देना चाहता हूं।”
उस दिन राधिका ने पहली बार अपनी सादगी का चोला उतार फेंका। उसने माया को बालों से पकड़कर घर से निकालने की कोशिश की, लेकिन आदित्य दीवार की तरह माया के सामने आकर खड़ा हो गया—”खबरदार अगर माया को हाथ भी लगाया, इस घर से वो नहीं, तुम जाओगी।” और उसने अपनी पत्नी को अपनी बेटी के सामने धक्के मारकर घर से निकाल दिया।
राधिका अपनी बेटी का हाथ पकड़े, रोती रही, गिड़गिड़ाती रही, लेकिन आदित्य ने एक बार भी मुड़कर नहीं देखा। दरवाजे के पीछे माया अपनी जीत पर मुस्कुरा रही थी।
राधिका के जाने के बाद आदित्य ने हफ्ते भर में ही माया से शादी कर ली। उसे लगा अब उसकी जिंदगी स्वर्ग बन जाएगी। कुछ महीनों तक ऐसा लगा भी—माया एक अच्छी पत्नी होने का नाटक करती, आदित्य का हर तरह से ख्याल रखती, घर को अपनी पसंद से सजाती, राधिका की निशानियों को मिटा देती। आदित्य माया के प्यार में अंधा हो चुका था। उसने कंपनी के बैंक अकाउंट्स में माया को नॉमिनी बना दिया, घर के कागजात, लॉकर की चाबियां सब माया के हवाले कर दी। बेटी पिया को बोर्डिंग स्कूल भेज दिया क्योंकि माया को वह पसंद नहीं थी। आदित्य को लगता था कि वह सबसे खुशकिस्मत इंसान है।
पर वह नहीं जानता था कि वह एक मकड़ी के जाल में फंसा हुआ कीड़ा है, जिसका खून धीरे-धीरे चूसा जा रहा है।
और फिर एक रात, शादी को छह महीने हुए थे। माया ने अपना आखिरी दांव खेला। उस रात उसने आदित्य के लिए खास डिनर बनाया, शराब में नींद की गोलियां मिला दीं। आदित्य गहरी नींद में सो गया। माया ने घर के लॉकर में रखे सारे गहने, नकदी, क्रेडिट कार्ड्स, घर के कागजात, कंपनी के दस्तावेज एक सूटकेस में भर लिए। जाने से पहले बेड के पास एक छोटा सा खत छोड़ा—
“शुक्रिया मेरे प्यारे बेवकूफ पति, तुम्हारी दौलत और बेवकूफी के लिए। मैं तुमसे कभी प्यार नहीं करती थी, सिर्फ तुम्हारी दौलत से प्यार करती थी। तुमने अपनी हीरे जैसी पत्नी को मेरे जैसे कांच के टुकड़े के लिए छोड़ दिया। अब तुम इसी कांच के टुकड़ों पर अपनी बाकी की जिंदगी रोते हुए गुजारना। अलविदा।”
अगली सुबह आदित्य की आंख खुली, सिर भारी था। माया को आवाज दी—कोई जवाब नहीं। देखा, घर का सारा सामान गायब, अलमारियां खुली, लॉकर खाली। खत पढ़ा तो लगा जैसे किसी ने उसके ऊपर उबलता लावा डाल दिया हो। वह चीखने-चिल्लाने लगा, पर उसकी आवाज सुनने वाला कोई नहीं था। जिस औरत के लिए उसने अपनी पत्नी, बेटी, इज्जत सब दांव पर लगा दिया था, वही उसे लूट कर भाग गई थी।
कुछ ही दिनों में आदित्य की दुनिया उजड़ गई। बैंक अकाउंट्स खाली, घर गिरवी, कंपनी कर्ज में डूबी। करोड़ों का मालिक सड़क पर आ गया। बंगला, गाड़ियां सब नीलाम हो गए। अब उसके पास रहने के लिए जगह नहीं थी, खाने के लिए पैसे नहीं थे। वह सड़कों पर भटकने लगा, हर किसी से माया का पता पूछता, पर माया जैसे हवा में गायब हो गई थी।
अब उसे राधिका की याद आ रही थी—उसका निस्वार्थ प्रेम, उसकी सेवा, उसकी वफादारी। उसे अपनी गलती का एहसास हो रहा था, पर अब बहुत देर हो चुकी थी। बेटी पिया से मिलने की कोशिश की, पर बोर्डिंग स्कूल वालों ने अंदर भी नहीं घुसने दिया। आदित्य पूरी तरह टूट चुका था। दिनभर मजदूरी करता, रात में मंदिर की सीढ़ियों या बस स्टैंड पर सोता। दो साल बीत गए। इन दो सालों ने आदित्य को जिंदगी का सबसे कठोर सबक सिखा दिया—असली दौलत पैसा या शोहरत नहीं, प्यार और विश्वास है।
एक दिन कंस्ट्रक्शन साइट पर मजदूरी करते हुए उसके अंदर का बिजनेसमैन जागा। उसने सोचा, “मैं कब तक अपनी किस्मत को रोता रहूंगा? मैंने गलती की है, उसकी सजा मिल रही है, पर माया मजे से जी रही है। नहीं, मैं उसे ऐसे नहीं छोड़ सकता। मुझे राधिका, अपनी बेटी और अपने सम्मान के लिए उसे ढूंढना है, कानून के हवाले करना है।”
यह फैसला उसकी जिंदगी का नया मोड़ था। अब वह मजदूर नहीं, जासूस बन गया। थोड़ी कमाई से पुराना फोन खरीदा, याद किया—माया ने कभी बिहार के मधुबनी गांव और अपनी कलाई पर तितली के टैटू का जिक्र किया था। आदित्य ने दिल्ली पुलिस में माया के खिलाफ धोखाधड़ी और चोरी की रिपोर्ट दर्ज करवाई। पुलिस ने मामला दर्ज किया, पर उनकी रफ्तार धीमी थी। आदित्य ने पैसे इकट्ठे किए और मधुबनी के लिए ट्रेन पकड़ ली।
वहां एक-एक गांव, एक-एक घर में माया के बारे में पूछता रहा। हफ्तों की तलाश के बाद एक बूढ़ी औरत ने बताया—पास के कस्बे में एक लड़की है जो दिल्ली से बहुत पैसा लेकर लौटी है और बड़ा ब्यूटी पार्लर खोला है। आदित्य वहां पहुंचा, बोर्ड पर लिखा था “मयाज़ मेकओवर”। अंदर गया, काउंटर पर वही माया थी—अब अमीर औरत की तरह। जब उसने आदित्य को मजदूर के भेष में देखा, डर के मारे सफेद पड़ गई।
“तुम यहां कैसे?”
“मैं तुम्हें तुम्हारी सही जगह पहुंचाने आया हूं।”
आदित्य ने पहले ही पुलिस को फोन कर दिया था। बिहार पुलिस की टीम पार्लर में आ गई। माया ने भागने की कोशिश की, पर पकड़ ली गई। पूछताछ में उसने सारा गुनाह कबूल कर लिया—वह पेशेवर धोखेबाज थी, अमीर शादीशुदा आदमियों को फंसाकर लूटती थी। उसने राधिका को फंसाने के लिए नमक-मिर्च मिलाने, दाग लगाने तक के नाटक किए थे। माया को गिरफ्तार करके दिल्ली लाया गया, मुकदमा चला और उसे 7 साल की सजा हुई।
जिस दिन माया को सजा हुई, आदित्य को लगा जैसे सिर से बड़ा बोझ उतर गया। उसने राधिका के नाम पर लगे दाग को धो दिया था। अब उसकी जिंदगी का एक ही मकसद था—राधिका से माफी मांगना। पता चला राधिका ने तलाक के बाद अपनी पढ़ाई शुरू की, बीएड किया, अब शहर के बड़े स्कूल में प्रिंसिपल थी। बेटी पिया को अपने पास रख लिया था। राधिका ने अपनी नई, सम्मानजनक दुनिया बना ली थी—जिसमें आदित्य के लिए कोई जगह नहीं थी।
आदित्य स्कूल के गेट पर पहुंचा। गार्ड ने उसके फटे कपड़े देखकर भगा दिया। आदित्य वहीं गेट के बाहर सड़क पर बैठ गया। सुबह से शाम तक बैठा रहा। शाम को राधिका की गाड़ी बाहर निकली, उसकी नजर आदित्य पर पड़ी। एक पल के लिए वह पहचान नहीं पाई, फिर गौर से देखा—आदित्य!
राधिका गाड़ी से उतरी, पास गई। आदित्य वहीं बैठा-बैठा रोने लगा।
“राधिका, मुझे माफ कर दो।”
राधिका चुपचाप देखती रही। उसकी आंखों में न गुस्सा था, न नफरत—बस एक गहरी शांति और थोड़ा सा तरस। उसने बेटी पिया को आवाज दी—”पिया, बाहर आओ।”
पिया बाहर आई। “मम्मा, ये अंकल कौन है?”
“बेटा, ये तुम्हारे पापा हैं।” और वह अपनी गाड़ी में बैठकर चली गई।
आदित्य अपनी बेटी को जाते हुए देखता रहा। उस दिन उसे एहसास हुआ कि उसने क्या खो दिया है—सिर्फ पत्नी नहीं, बल्कि वो प्यार जो उसे अब कभी नहीं मिलेगा।
यह कहानी सिखाती है कि वासना और लालच का रास्ता हमेशा तबाही की ओर ही जाता है। जब कर्म अपना हिसाब करता है, तो इंसान से उसकी हर चीज छीन लेता है—सिवाय पश्चाताप के।
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