विधायक को आर्मी के कर्नल से भिड़ना पड़ा भारी।।

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वर्दी की ख़ामोश ताक़त

दोपहर का समय था। उत्तर भारत के एक छोटे से ज़िले की सड़कें धूप में चमक रही थीं। जनवरी का महीना था, इसलिए सूरज तेज़ होते हुए भी हवा में हल्की ठंडक मौजूद थी। सड़क के दोनों ओर फैले खेतों में गेहूं की बालियाँ हवा के साथ लहराती हुई किसी शांत गीत की तरह लग रही थीं। यह इलाका आम तौर पर शांत रहता था, लेकिन आज कुछ अलग होने वाला था—ऐसा किसी ने सोचा नहीं था।

भारतीय सेना की एक छोटी टुकड़ी नियमित मूवमेंट पर थी। एक पुराना लेकिन मज़बूत सेना का ट्रक, जैतूनी हरे रंग में रंगा हुआ, अपने निर्धारित रास्ते पर आगे बढ़ रहा था। ट्रक चला रहे थे हवलदार अर्जुन सिंह—तीस के दशक का अनुशासित, कम बोलने वाला सैनिक। आगे की सीट पर बैठे थे कर्नल आदित्य राठौर—एक अनुभवी अधिकारी, जिनके चेहरे पर वर्षों की सेवा की गंभीरता और आँखों में अजीब-सी शांति थी।

कर्नल राठौर उन अफ़सरों में से थे जो आदेश से ज़्यादा उदाहरण से नेतृत्व करते हैं। जवान उन्हें सिर्फ़ अफ़सर नहीं, बल्कि अपना संरक्षक मानते थे। ट्रक के पीछे बैठे चार जवान आपस में धीमी आवाज़ में बातें कर रहे थे—कोई घर की बात कर रहा था, कोई छुट्टी की।

रास्ता संकरा था, सिंगल लेन। ट्रैफिक बहुत कम था। तभी अचानक पीछे से तेज़ हॉर्न की आवाज़ गूंजी—लगातार, तीखी और बेवजह आक्रामक। हवलदार अर्जुन ने शीशे में देखा। पीछे धूल उड़ाती काली गाड़ियों का एक लंबा काफ़िला आ रहा था।

“साहब, पीछे कोई बड़ा काफ़िला लग रहा है,” अर्जुन ने कहा।

कर्नल राठौर ने बिना पीछे देखे शांति से जवाब दिया,
“ठीक है। गाड़ी साइड में रखो। हमें किसी से मुकाबला नहीं करना।”

ट्रक धीरे-धीरे बाईं ओर हो गया। पहिए कच्ची पटरी पर आ गए ताकि पीछे से आने वाले वाहन आराम से निकल सकें। लेकिन काफ़िला रुकने का नाम नहीं ले रहा था। हॉर्न, सायरन, चीख-पुकार—पूरा इलाका गूंजने लगा।

यह काफ़िला था विधायक वीरेंद्र चौहान का।

विधायक को आर्मी के कर्नल से लड़ना भारी पड़ा - 5 मिनट मैं आर्मी ने घेर लिया  - YouTube

वीरेंद्र चौहान—इलाके का बाहुबली नेता। पैसा, ताक़त, पुलिस-प्रशासन पर पकड़—सब कुछ था। लोग उसके नाम से डरते थे। कानून उसके लिए सिर्फ़ एक औपचारिक शब्द था।

काफ़िले की सबसे आगे वाली गाड़ी अचानक ट्रक के बराबर आई। खिड़की से एक गनमैन ने हाथ निकालकर अर्जुन को नीचे उतरने का इशारा किया।

अर्जुन बुदबुदाया,
“साहब, रास्ता तो पूरा खाली है। अब क्या खेत में उतार दूँ ट्रक?”

कर्नल राठौर का स्वर अब भी संयत था।
“ध्यान मत दो। आगे बढ़ते रहो।”

लेकिन विधायक का अहंकार चोट खा चुका था। उसकी महंगी SUV ने ट्रक को ओवरटेक किया और अचानक सामने आकर ज़ोर से ब्रेक लगा दिए।

एक पल के लिए सब कुछ थम गया।

अर्जुन ने पूरी ताक़त से ब्रेक दबाए। भारी ट्रक चीखती आवाज़ के साथ रुका—महज़ कुछ इंच की दूरी पर।

अगर एक सेकंड की भी देरी होती, तो बड़ा हादसा तय था।

अब माहौल बदल चुका था।

काफ़िले की सभी गाड़ियाँ रुक गईं। दरवाज़े खुले। हथियारबंद गार्ड उतर आए। और अंत में, विधायक वीरेंद्र चौहान भी गाड़ी से उतरा—सफेद कुर्ता, महंगी घड़ी, आँखों में घमंड।

वह सीधे ट्रक की ओर बढ़ा और चिल्लाया,
“ओए! अंधा है क्या? दिखता नहीं कौन आ रहा था पीछे?”

कर्नल राठौर ने अर्जुन को इशारे से रोका और खुद नीचे उतरे। उन्होंने वर्दी ठीक की, कैप पहनी और शांत क़दमों से विधायक की ओर बढ़े।

“आपने खतरनाक तरीके से गाड़ी रोकी,” कर्नल ने कहा।
“इससे जान जा सकती थी।”

विधायक हंसा।
“तुम जानते हो मैं कौन हूँ? इस ज़िले में कानून मेरी जेब में रहता है।”

कर्नल राठौर की आँखों में हल्की सख़्ती आई, लेकिन आवाज़ अब भी नियंत्रित थी।
“और मैं जानता हूँ कि मैं कौन हूँ। भारतीय सेना का अधिकारी। और यह सड़क जनता की है।”

विधायक ने उंगली उठाकर कर्नल की छाती पर रख दी।
“ज़्यादा हीरो मत बन। एक फोन करूँगा और तेरी वर्दी उतर जाएगी।”

यह सुनते ही पीछे बैठे जवान भी ट्रक से उतर आए। वे शांत थे, लेकिन उनकी आँखों में चेतावनी साफ़ दिख रही थी।

माहौल बेहद तनावपूर्ण हो गया।

आस-पास के खेतों से लोग जमा होने लगे। कुछ युवाओं ने मोबाइल निकाल लिए। वीडियो रिकॉर्ड होने लगा।

विधायक को इसका अंदाज़ा नहीं था।

वह लगातार चिल्लाता रहा—गालियाँ, धमकियाँ, अहंकार।

कर्नल राठौर ने अपने जवानों से कहा,
“कोई उकसावे में नहीं आएगा। आदेश के बिना कुछ नहीं होगा।”

यह शांति विधायक को कमजोरी लगी।

लेकिन तभी खेल पलट गया।

एक जवान ने धीरे से कर्नल को बताया,
“साहब, वीडियो लाइव हो रहा है।”

उसी पल विधायक के फोन की घंटी बजी।

फोन पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष का था।

जैसे-जैसे बात आगे बढ़ी, विधायक का चेहरा सफ़ेद पड़ता गया। पसीना बहने लगा। उसका अहंकार मिनटों में चूर-चूर हो गया।

फोन कटते ही वह चुप हो गया।

कुछ देर बाद पुलिस की गाड़ियाँ सायरन बजाती हुई पहुँचीं। डीएम और एसपी सीधे कर्नल राठौर के पास आए और सैल्यूट किया।

“हमें खेद है, सर।”

विधायक यह दृश्य देखता रह गया।

उसके ख़िलाफ़ मामला दर्ज हुआ। गाड़ियाँ ज़ब्त हुईं। वीडियो देश भर में फैल चुका था।

कर्नल राठौर अपने ट्रक में बैठे और आगे बढ़ गए।

उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

कुछ महीने बाद, उसी सड़क पर एक बोर्ड लगा था—

“जय जवान सम्मान मार्ग”

कर्नल राठौर आज भी सेवा में हैं।
खामोशी से।
ईमानदारी से।

और विधायक?

वह आज भी अदालत के चक्कर काट रहा है।

क्योंकि
पद किराए का होता है,
लेकिन चरित्र जीवन भर साथ चलता है।

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VIP काफिला आया… सांसद ने रुकवाया आर्मी का काफिला उसके बाद जो हुआ…

रास्ता देश का है – एक हाईवे, दो काफिले और एक फैसला

भूमिका

भारत का हर हाईवे सिर्फ गाड़ियों का रास्ता नहीं होता, बल्कि यह देश की धड़कन है। यहां रोज़ हजारों लोग, हजारों कहानियां और हजारों सपने एक-दूसरे से टकराते हैं। लेकिन कभी-कभी एक टकराव ऐसा होता है, जो सिर्फ दो गाड़ियों का नहीं, बल्कि दो सोचों का होता है – सत्ता बनाम फर्ज़। यह कहानी उसी टकराव की है, जहां एक ओर था वीआईपी काफिला, सत्ता का घमंड और दूसरी ओर था आर्मी का काफिला, देश की जिम्मेदारी।

हाईवे पर टकराव

एक तेज़ धूप वाली दोपहर थी। हाईवे पर लाल और नीली बत्तियों से चमकता वीआईपी काफिला पूरे रौब के साथ भागा जा रहा था। आगे-पीछे पुलिस की गाड़ियां, हथियारबंद सिक्योरिटी, और बीच में राज्य के ताकतवर सांसद राघव प्रताप सिंह। उनके चेहरे पर आत्मविश्वास नहीं, बल्कि अधिकार का भाव था। सड़कें जैसे उनकी जागीर हों, कानून सिर्फ किताबों में लिखा हो, फैसले उनकी मर्जी से तय होते हों।

इसी हाईवे पर दूसरी दिशा से इंडियन आर्मी का काफिला दिखाई दिया। एक के पीछे एक लाइन में चलते ट्रक, हर ट्रक में जवान। किसान का बेटा, मजदूर का बेटा, कोई शादी के सपने लिए, कोई घर में नवजात बच्चे की खुशी लिए – सबकुछ पीछे छोड़कर सिर्फ देश की फिक्र लिए जा रहे थे। यह कोई रूटीन मूवमेंट नहीं था, बल्कि बॉर्डर अलर्ट का काफिला था। हर मिनट मायने रखता था, हर देरी किसी जान की कीमत बन सकती थी।

आदेश और अहंकार

अचानक वीआईपी काफिले के आगे पुलिस की गाड़ी रुक गई। हाथ ऊपर उठा, आवाज आई – “इंडियन आर्मी कॉन्वॉय साइड में रोको।”
पहला ट्रक धीमा हुआ, दूसरा रुका, फिर तीसरा। कुछ ही पलों में पूरा आर्मी काफिला हाईवे पर थम गया। धूल धीरे-धीरे बैठने लगी।

एक ट्रक का दरवाजा खुला। कैप्टन अर्जुन राठौर उतरे। 12 साल की फौजी सेवा उनकी चाल में दिखती थी। सीधी रीड, कंधों पर जिम्मेदारी।
एसपी आगे बढ़ा, “वीआईपी मूवमेंट है। काफिला यहीं रुकेगा।”

अर्जुन ने शांत स्वर में जवाब दिया, “सर, यह आर्मी कॉन्वॉय है। बॉर्डर पर रिपोर्टिंग का टाइम फिक्स है।”

एसपी के होठों पर हल्की मुस्कान थी, “बॉर्डर बाद में, यहां सांसद साहब हैं।”

कुछ पल खामोशी छा गई। काफिले के ट्रकों के अंदर जवान खिड़कियों से बाहर देख रहे थे। एक जवान ने धीरे से कहा, “साहब, अगर कॉन्वॉय लेट हुआ, तो ऑपरेशन पर असर पड़ेगा।”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा। उसे वहां एक फौजी नहीं, एक जिम्मेदार बेटा दिखा।

सांसद का सामना

वीआईपी गाड़ी का शीशा नीचे हुआ। राघव प्रताप सिंह बाहर झुके। नजर सीधी अर्जुन पर।

“कौन इंचार्ज है यहां?”

“कैप्टन अर्जुन राठौर, इंडियन आर्मी।”

“तुम जानते हो यह किसका रास्ता है?”

अर्जुन ने बिना झुके कहा, “किसका भी हो, यह देश का रास्ता है।”

कुछ सेकंड के लिए हाईवे पर सन्नाटा छा गया। सांसद का चेहरा सख्त हो गया।

“वीआईपी पहले जाएगा। पूरा आर्मी कॉन्वॉय यहीं रुकेगा।”

सायरन बंद कर दिए गए। अब आवाज नहीं, अहंकार बोल रहा था।

अर्जुन ने गहरी सांस ली, “सर, अगर यह काफिला रुका तो सिर्फ हम नहीं रुकेंगे, देश की सुरक्षा रुकेगी।”

एसपी चिल्लाया, “तुम आदेश मानोगे?”

अर्जुन की आवाज अब भारी थी, “हम आदेश नहीं, फर्ज़ मानते हैं।”

यह शब्द सड़क पर गूंजे। कुछ पल कोई नहीं बोला।

सिस्टम की परीक्षा

सांसद ने अपनी जेब से फोन निकाला। आंखों में भरोसा था। “अब देखते हैं सिस्टम किसके साथ खड़ा है।”

फोन कान से लगाया गया, “योगी जी को मिलाइए।”

हाईवे पर पूरा आर्मी काफिला खड़ा था। वीआईपी गाड़ियां रुकी थीं। धूप जल रही थी। समय निकल रहा था और एक फोन कॉल यह तय करने वाला था कि इस देश में पहले कौन चलेगा – सत्ता या सेना।

फोन की घंटी लगातार बज रही थी। कैप्टन अर्जुन ने पूरे काफिले की ओर देखा। हर ट्रक, हर जवान, फिर आसमान की तरफ देखा। धीरे से लगभग खुद से कहा, “जय हिंद।”

फोन की घंटी एक बार, दो बार, तीन बार। हर रिंग के साथ हाईवे पर खड़ा वक्त और भारी होता जा रहा था। धूप अब तेज़ लगने लगी थी। पसीना सिर्फ जवानों के चेहरे पर नहीं, सिस्टम के माथे पर भी था। वीआईपी काफिले की गाड़ियां चुपचाप खड़ी थीं। सायरन बंद थे, लेकिन घमंड अब भी जिंदा था।

फैसला

फोन की घंटी रुकी। दूसरी तरफ आवाज आई, “हां, बोलिए।”
यह आवाज तेज़ नहीं थी, पर उसमें ऐसा वजन था कि सामने वाला सीधा खड़ा हो जाए।

सांसद ने कुर्सी पर टिकते हुए कहा, “योगी जी, यहां हाईवे पर आर्मी कॉन्वॉय रास्ता रोक रहा है। वीआईपी मूवमेंट है।”

लाइन के उस पार कुछ सेकंड की खामोशी। फिर आवाज आई, “आर्मी कॉन्वॉय कहां जा रहा है?”

सांसद ने हल्के अंदाज में कहा, “बॉर्डर की तरफ ही होगा। पर अभी वीआईपी को जाना है।”

फोन के उस पार आवाज अब बदल गई, “कौन सा बॉर्डर?”

सांसद थोड़ा असहज हुआ, “सर, पूरी जानकारी तो नहीं लेकिन मेरे कार्यक्रम में देर हो रही है।”

अब आवाज सख्त थी, “जानकारी नहीं है और फैसला चाहिए?”

सांसद ने बात संभालने की कोशिश की, “सर, मेरी सिक्योरिटी का सवाल है। प्रोटोकॉल है।”

लाइन के उस पार कुछ पल की चुप्पी। फिर वह शब्द आए जो हवा का रुख बदल देते हैं, “देश की सिक्योरिटी तुम्हारी सिक्योरिटी से बड़ी है।”

एसपी फोन की आवाज नहीं सुन पा रहा था, लेकिन सांसद का चेहरा सब कुछ बता रहा था।

योगी जी की आवाज जारी रही, “अगर आर्मी कॉन्वॉय बॉर्डर जा रहा है तो वही पहले जाएगा।”

सांसद ने हड़बड़ा कर कहा, “पर सर, वीआईपी प्रोटोकॉल…”

बीच में ही आवाज आई, “प्रोटोकॉल देश के लिए होता है, देश प्रोटोकॉल के लिए नहीं।”

एक पल के लिए सांसद चुप हो गया। फोन पर आखिरी शब्द पड़े, “आर्मी कॉन्वॉय को तुरंत रास्ता दो।”

कॉल कट गई। फोन अब भी सांसद के हाथ में था, लेकिन भरोसा चेहरे से गायब हो चुका था।

रास्ता खुला

एसपी ने हिम्मत करके पूछा, “सर, क्या आदेश है?”

सांसद ने दांत भीचते हुए कहा, “काफिला साइड में लगा हो।”

यह शब्द उसके लिए आदेश नहीं थे, यह हार थी।

पुलिस ने इशारा किया। वीआईपी गाड़ियां धीरे-धीरे सड़क के किनारे खिसकने लगीं। हाईवे पर रास्ता खुलने लगा।

कैप्टन अर्जुन दूर से सब देख रहे थे। उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस हाथ उठाया। आर्मी काफिले के इंजन एक-एक करके स्टार्ट हुए। पहला ट्रक आगे बढ़ा, फिर दूसरा, फिर पूरा काफिला।

जवानों की आंखों में अजीब सी चमक थी। कोई जश्न नहीं, कोई नारा नहीं। बस सुकून।

एक जवान ने धीरे से कहा, “साहब, आज देरी नहीं हुई।”

अर्जुन ने उसकी ओर देखा, “आज देश समय पर पहुंचा है।”

काफिला आगे बढ़ता गया। वीआईपी काफिला पीछे रह गया। कुछ गाड़ियां कुछ देर तक चलती धूल को देखती रहीं। सांसद की गाड़ी में खामोशी थी। ना फोन, ना बात। सिर्फ एक सवाल जो भीतर ही भीतर उसे खाए जा रहा था – क्या हर बार सिस्टम उसके साथ खड़ा होगा?

सीमा पर मिशन

आर्मी काफिला तेजी से सीमा की ओर बढ़ रहा था। रास्ते में रेडियो पर आवाज आई, “कॉन्वॉय मेंटेन स्पीड। बॉर्डर अलर्ट कंफर्म्ड।”

जवानों के चेहरे और सख्त हो गए। यह अब सिर्फ यात्रा नहीं थी, यह मिशन था।

अर्जुन ने अपने हेलमेट को ठीक किया। उसे याद आया सुबह घर से निकलते वक्त मां ने क्या कहा था, “बेटा सही करना, डरना मत।”

आज वो सही कर पाए थे।

कुछ घंटे बाद सीमा के पास हलचल थी। खुफिया इनपुट सही निकला। दुश्मन की साजिश तैयार थी। लेकिन आर्मी काफिला समय पर पहुंच चुका था। घेरा डाला गया, इलाका सुरक्षित किया गया। एक बड़ा हमला होने से पहले ही नाकाम हो गया।

रेडियो पर आवाज गूंजी, “ऑपरेशन सक्सेसफुल।”

किसी ने ताली नहीं बजाई, किसी ने जश्न नहीं मनाया, क्योंकि यह काम उनका रोज का काम था।

अर्जुन ने आसमान की ओर देखा, आज आसमान कुछ ज्यादा साफ लग रहा था।

सत्ता की खामोशी

उधर शहर में शाम का अंधेरा उतर चुका था। टीवी पर ब्रेकिंग न्यूज़ चल रही थी, “आर्मी कॉन्वॉय रीचेस बॉर्डर ऑन टाइम, मेजर थ्रेट।”

सांसद ने टीवी बंद कर दिया। कमरे में सिर्फ खामोशी बची। उसे एहसास हो चुका था, सड़कें वीआईपी की हो सकती हैं, पर रास्ता हमेशा देश का होता है।

कैप्टन अर्जुन अपने काफिले के साथ अंधेरे में ड्यूटी पर खड़े थे। कोई कैमरा नहीं, कोई तारीफ नहीं, बस एक आवाज दिल में गूंज रही थी – “जय हिंद।”

रात गहरी हो चुकी थी। सीमा पर हवा में अजीब सी खामोशी थी। ऐसी खामोशी जो या तो तूफान से पहले आती है या तूफान के बाद।

आर्मी का काफिला अब अपनी पोजीशन पर था। ट्रक खड़े थे, जवान सतर्क थे, हथियार तैयार थे। हर चेहरे पर नींद नहीं, जिम्मेदारी थी।

रेडियो से धीमी आवाज आई, “अलर्ट रिमेंस हाई। स्टे शार्प।”

कैप्टन अर्जुन मैप के सामने खड़े थे। उनकी उंगलियां एक-एक पॉइंट पर रुकती थीं। अगर वह काफिला आज हाईवे पर कुछ और देर रुक जाता तो यह सारी तैयारियां शायद बेकार हो जातीं।

हमला और जीत

कुछ किलोमीटर दूर दुश्मन अपनी चाल चल चुका था। उन्हें भरोसा था कि आर्मी समय पर नहीं पहुंचेगी। उन्हें भरोसा था कि सिस्टम हमेशा वीआईपी को चुनता है।

लेकिन आज सिस्टम ने देश को चुना था।

पहली हलचल थर्मल स्क्रीन पर दिखी। एक जवान ने फुसफुसाकर कहा, “मूवमेंट 3:00 बजे की दिशा में।”

अर्जुन ने तुरंत आदेश दिया, “पोजीशंस होल्ड, नो नॉइज़।”

हर जवान जमीन का हिस्सा बन गया। सांसे धीमी, दिल तेज़। कुछ ही मिनटों में साफ हो गया – यह हमला था। पूरा प्लान था, लेकिन उनकी टाइमिंग गलत थी।

आर्मी पहले पहुंच चुकी थी।

कमांड मिली, “गो!” और फिर अंधेरे में रोशनी फटी। कुछ ही मिनटों में सब खत्म। कोई लंबी लड़ाई नहीं, कोई फिल्मी सीन नहीं, बस प्रोफेशनल काम।

रेडियो पर आवाज गूंजी, “थ्रेट न्यूट्रलाइज्ड। एरिया सिक्योर।”

कुछ जवान थोड़ी देर चुपचाप बैठे रहे। किसी ने आसमान की ओर देखा, किसी ने जमीन की तरफ।

एक जवान ने धीमे से कहा, “साहब, अगर हम आज लेट हो जाते…”

अर्जुन ने उसकी बात पूरी नहीं होने दी, “तो आज किसी मां का बेटा घर नहीं लौटता।”

फर्ज़ का रास्ता

खामोशी। उस खामोशी में बहुत कुछ था।

सुबह होने लगी थी। सीमा पर सूरज धीरे-धीरे निकल रहा था। नई रोशनी, नई उम्मीद के साथ।

अर्जुन ने अपने मोबाइल पर नेटवर्क देखा। एक मिस्ड कॉल थी – घर से।

उन्होंने कॉल किया। उधर से मां की आवाज आई, “बेटा खबर देखी?”

अर्जुन कुछ नहीं बोले।

मां ने कहा, “भगवान का शुक्र है तुम लोग समय पर पहुंच गए।”

अर्जुन की आवाज पहली बार हल्की पड़ी, “मां, आज रास्ता मिल गया।”

मां ने सिर्फ इतना कहा, “जब फर्ज़ आगे होता है तो रास्ते खुद बनते हैं।”

कॉल कट गई।

अर्जुन ने गहरी सांस ली।

शहर में सुबह

दूसरी तरफ शहर में सुबह का शोर शुरू हो चुका था। अखबार छप चुके थे। हेडलाइन थी, “आर्मी थwarts मेजर अटैक। कॉन्वॉय रीचेस बॉर्डर जस्ट इन टाइम।”

कोई नाम नहीं, कोई चेहरा नहीं। बस एक लाइन।

सांसद राघव प्रताप सिंह अखबार हाथ में लिए बैठे थे। उन्होंने हेडलाइन पढ़ी। फिर दूसरी बार पढ़ी। अखबार मोड़कर टेबल पर रख दिया। कमरे में कोई और नहीं था। ना सायरन, ना सिक्योरिटी, सिर्फ सोच।

उन्हें पहली बार एहसास हुआ – सत्ता का रास्ता भीड़ से गुजरता है, पर देश का रास्ता कुर्बानी से।

याद और जिम्मेदारी

उसी हाईवे पर जहां कल टकराव हुआ था, आज सब कुछ सामान्य था। गाड़ियां चल रही थीं, लोग जा रहे थे। लेकिन उस जगह जहां वीआईपी काफिला रुका था, वहां एक छोटा सा बोर्ड लगा दिया गया था – राष्ट्र सेवा सर्वोपरि

कोई बड़ा उद्घाटन नहीं, कोई पीता नहीं, बस एक याद।

आर्मी का काफिला अब आगे बढ़ चुका था। नया मिशन, नई जगह। जवान ट्रक में बैठे हंस भी रहे थे। किसी ने कहा, “साहब, आज तो वीआईपी पीछे रह गया।”

दूसरा बोला, “अच्छा है, कभी-कभी पीछे रहना भी जरूरी होता है।”

अर्जुन ने बाहर देखा, सड़क सीधी थी। उन्होंने कहा, “याद रखना, रास्ता हमेशा सीधा नहीं होता, पर फर्ज़ होना चाहिए।”

ट्रक आगे बढ़ते रहे। धूल उड़ती रही और देश शांत रहा, क्योंकि किसी ने सही समय पर सही फैसला लिया था।

उपसंहार

यह कहानी किसी सांसद की हार की नहीं है। यह कहानी उस जीत की है जिसका शोर नहीं होता। यह कहानी उन लोगों की है जो कैमरे से दूर देश को सुरक्षित रखते हैं।

अगर आज आप चैन से सो पा रहे हैं, तो याद रखना कहीं ना कहीं एक आर्मी काफिला अब भी चल रहा है – आपके लिए, देश के लिए।

जय हिंद।

नोट

कहानी में दिखाए गए सभी पात्र, घटनाएं और संवाद पूरी तरह काल्पनिक हैं। इनका किसी भी वास्तविक व्यक्ति, नेता, अधिकारी, सरकारी संस्था या वास्तविक घटना से कोई सीधा या अप्रत्यक्ष संबंध नहीं है। इस कहानी का उद्देश्य किसी की छवि को ठेस पहुंचाना नहीं, बल्कि फर्ज़, जिम्मेदारी और देशभक्ति की भावना को दिखाना है। हम भारतीय सेना का पूरा सम्मान करते हैं। देश सर्वोपरि है।