वो रोजाना अंधे भिखारी को अपना टिफिन खिला देती , फिर जब वो ठीक होकर आया तो पता चला वो एक करोड़पति है
“नेकी का फल”
शहर की भीड़-भाड़ वाली गलियों में, जहाँ हर कोई अपने काम में व्यस्त रहता है, वहाँ एक छोटी सी गली के नुक्कड़ पर बैठा था एक बूढ़ा भिखारी। उसका नाम था शंकर। उसकी आँखें अंधी थीं, चेहरे पर समय की मार की गहरी लकीरें, और काले चश्मे के पीछे एक सूनी दुनिया। फटे-पुराने कपड़े पहनकर, वह अपने हाथ में एक एलुमिनियम का कटोरा लिए रहता था। कभी-कभार उसके कटोरे में कुछ सिक्के खनक जाते, लेकिन ज्यादा तर दिन वह खाली ही रहता।
हर दिन कॉलेज जाने वाली प्रिया उसी गली से गुजरती थी। एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार की लड़की, जो अपने माता-पिता के संस्कारों से प्रेरित होकर दूसरों की मदद करना जानती थी। प्रिया के पिता एक सरकारी नौकरी करते थे और माँ घर संभालती थीं। घर में हमेशा पैसे की तंगी रहती थी, लेकिन प्यार और इंसानियत की कमी कभी नहीं थी।
एक दिन प्रिया ने देखा कि शंकर बेहद कमजोर और भूखा बैठा है। उसके कटोरे में एक भी सिक्का नहीं था। प्रिया का दिल पसीज गया। उसने अपना टिफिन खोला और उसमें से आधी रोटी और थोड़ी सब्जी निकाल कर शंकर के कटोरे में रख दी। शंकर ने कांपते हाथों से खाना छुआ और पूछा, “कौन हो तुम, बेटी?” प्रिया ने धीरे से कहा, “मैं प्रिया हूँ, बाबा। आप ये खाना खाइए।”
शंकर की आवाज भर्रा गई, “भगवान तेरा भला करे, बेटी।” उस दिन प्रिया ने आधा पेट ही खाकर कॉलेज का रास्ता तय किया, लेकिन उसके मन को एक अजीब सी शांति मिली। यह सिलसिला रोज का हो गया। प्रिया रोजाना अपने टिफिन में से आधा खाना शंकर के लिए निकाल देती। कभी-कभी माँ कुछ अच्छा बनाती तो वह शंकर के लिए थोड़ा ज्यादा भी ले आती।

धीरे-धीरे शंकर भी प्रिया की आहट पहचानने लगा। जैसे ही वह पास आती, उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आती और वह प्रिया के सिर पर हाथ रखकर दुआएं देता। प्रिया को लगता जैसे उसे सारी खुशियाँ मिल गई हों। वह शंकर से बातें करने लगी, उसके परिवार के बारे में जानने की कोशिश करती।
शंकर बस इतना कहता, “किस्मत का मारा हूँ, बेटी। अब बस मौत का इंतजार है।” प्रिया उसे दिलासा देती, “बाबा, ऐसा मत कहिए। भगवान सब ठीक कर देगा।”
कॉलेज में प्रिया की सहेलियाँ कभी-कभी उसका मजाक उड़ातीं, “क्या तू भी उस भिखारी के चक्कर में पड़ गई है? अपना खाना उसे खिला देती है, खुद भूखी रहती है।” लेकिन प्रिया उनकी बातों पर ध्यान नहीं देती थी। उसे लगता था कि शंकर की मदद करके जो आत्मिक शांति उसे मिलती है, वह किसी भी चीज से बढ़कर है।
लगभग दो महीने गुजर गए। प्रिया और शंकर के बीच एक अनकहा रिश्ता बन गया था। एक सुबह जब प्रिया कॉलेज के लिए निकली, तो उसने देखा कि शंकर अपनी जगह पर नहीं था। उसने आसपास के दुकानदारों से पूछा, पर किसी को कुछ पता नहीं था। प्रिया का मन बेचैन हो उठा। कहीं शंकर बीमार तो नहीं हो गया? या किसी ने उसके साथ कुछ बुरा तो नहीं किया?
पूरा दिन कॉलेज में उसका मन नहीं लगा। वह बार-बार उसी नुक्कड़ की ओर देखती रही, शायद शंकर आ जाए। लेकिन निराशा ही हाथ लगी। अगले दिन भी शंकर नहीं आया। फिर तीसरा दिन, चौथा दिन, पूरा हफ्ता गुजर गया। शंकर का कोई पता नहीं चला।
प्रिया बहुत उदास हो गई थी। उसकी यादें उसे तड़पाने लगीं। वह रोज उस नुक्कड़ पर रुकती, एक आस लिए कि शायद आज शंकर मिल जाए। लेकिन निराशा ही हाथ लगी।
धीरे-धीरे प्रिया ने मान लिया कि शायद शंकर कहीं और चला गया होगा या शायद वह आगे सोच भी नहीं पाती थी। जिंदगी अपनी रफ्तार से चलती रही। कुछ महीने और बीत गए। प्रिया अब अपने फाइनल ईयर के इम्तिहानों की तैयारी में जुट गई थी। शंकर की याद अब भी कभी-कभार उसके दिल में एक टीस बनकर उठती थी, पर वक्त हर जख्म भर देता है।
एक दोपहर जब प्रिया कॉलेज से घर लौट रही थी, उसी नुक्कड़ के पास उसने देखा कि एक महंगी कार खड़ी थी। कार के पास एक लंबा चौड़ा, सजीला आदमी खड़ा था, जिसने गहरे नीले रंग का सूट पहना था और आंखों पर धूप का चश्मा लगाया हुआ था। वह आदमी शायद किसी का इंतजार कर रहा था।
प्रिया ने उसे अनदेखा करते हुए आगे बढ़ना चाहा, लेकिन तभी उस आदमी ने उसे आवाज दी, “एक्सक्यूज मी, क्या आप प्रिया हैं?”
प्रिया ठिठक गई। यह आदमी उसे कैसे जानता था? उसने हैरानी से उसकी ओर देखा। “जी, मैं ही प्रिया हूँ। पर आप कौन?”
उस आदमी ने अपने चेहरे से चश्मा हटाया। प्रिया की आंखें आश्चर्य से फैल गईं। वह चेहरा कुछ जाना-पहचाना सा था, पर अब बिल्कुल अलग लग रहा था। चेहरे पर झुर्रियाँ नहीं थीं, बाल करीने से संवारे हुए थे, और सबसे बड़ी बात उसकी आंखें अब सूनी नहीं थीं। उनमें चमक और रोशनी थी।
“पहचाना नहीं, बेटी?” उस आदमी की आवाज में एक चिर परिचित नरमी थी। प्रिया का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। “क्या… क्या आप शंकर बाबा हैं?”
उस आदमी की आवाज कांप रही थी, “हाँ, बेटी, मैं तुम्हारा शंकर ही हूँ।”
उसकी आंखों में आंसू छलक आए। प्रिया को अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। यह कैसे हो सकता था? शंकर बाबा तो अंधे थे, गरीब थे, भिखारी थे, और यह आदमी… यह तो बिल्कुल वैसा नहीं लग रहा था।
शंकर ने प्रिया के सिर पर हाथ रखा, ठीक वैसे ही जैसे वह पहले करता था। प्रिया को यकीन हो गया। “यह वही स्पर्श है। पर बाबा, आपकी आंखें… यह सब, ये कपड़े, ये गाड़ी?”
शंकर मुस्कुराया, “बेटा, यह एक लंबी कहानी है। क्या तुम मेरे साथ एक कप कॉफी पीने चलोगी? मैं तुम्हें सब कुछ बताना चाहता हूँ।”
प्रिया अब भी सदमे की हालत में थी, पर उसने हामी भर दी। वह शंकर के साथ उसकी महंगी गाड़ी में बैठी। गाड़ी एक बड़े फाइव स्टार होटल के सामने जाकर रुकी। प्रिया अपनी जिंदगी में पहली बार इतने बड़े होटल में आई थी। होटल के मैनेजर और स्टाफ ने शंकर को झुककर सलाम किया। प्रिया यह सब देखकर और भी हैरान हो रही थी।
होटल के शानदार कैफे में बैठकर शंकर ने अपनी कहानी सुनानी शुरू की।
“बेटा, मेरा असली नाम शंकर नहीं, देवानंद है। हाँ, देवानंद। कभी इस शहर का जाना माना उद्योगपति हुआ करता था। मेरे पास सब कुछ था — पैसा, शोहरत, एक खुशहाल परिवार। लेकिन शायद मेरी खुशियों को किसी की नजर लग गई थी। कुछ साल पहले एक भयानक कार एक्सीडेंट में मेरी पत्नी और मेरा बेटा मुझसे हमेशा के लिए बिछड़ गए। उस हादसे में मेरी आंखों की रोशनी भी चली गई और मेरी याददाश्त भी।”
प्रिया स्तब्ध होकर सुन रही थी।
देवानंद ने आगे कहा, “मुझे कुछ भी याद नहीं था। मैं कौन? हम कहाँ से आया हूँ? मैं दर-दर की ठोकरें खाता रहा। जो कुछ मेरे पास था, वह भी शायद किसी ने लूट लिया। मैं सड़कों पर आ गया। एक अंधा लाचार भिखारी बनकर लोग मुझे ‘शंकर’ कहकर पुकारने लगे, तो मैंने भी यही नाम अपना लिया। जिंदगी एक बोझ बन गई थी। मैं हर रोज मौत की दुआ मांगता था।”
“फिर एक दिन तुम मेरी जिंदगी में फरिश्ता बनकर आई। प्रिया, तुमने मुझे अपना खाना खिलाया, मुझसे बातें की, मुझे जीने की एक नई उम्मीद दी। तुम्हारी नेकी ने मेरे अंदर कुछ जगा दिया था।”
“एक दिन जब मैं सड़क पार करने की कोशिश कर रहा था, तो एक गाड़ी ने मुझे हल्की सी टक्कर मार दी। मुझे अस्पताल ले जाया गया। वहां डॉक्टरों ने जब मेरी जांच की तो उन्हें मेरे सिर की पुरानी चोट के बारे में पता चला। उन्होंने कहा कि एक ऑपरेशन से मेरी याददाश्त और आंखों की रोशनी वापस आ सकती है।”
“लेकिन मेरे पास ऑपरेशन के लिए पैसे कहाँ थे? मैं तो फिर से उसी अंधेरी दुनिया में लौटने वाला था। तभी अस्पताल के एक ट्रस्टी, जो मेरे पुराने दोस्त भी थे, उन्होंने मुझे पहचान लिया। उन्होंने फौरन मेरे ऑपरेशन का इंतजाम करवाया। और देखो, बेटा, आज मैं तुम्हारे सामने हूँ। मेरी याददाश्त भी लौट आई है और मेरी आंखों की रोशनी भी।”
प्रिया की आंखों में आंसू थे। वह समझ नहीं पा रही थी कि क्या कहे। यह सब किसी फिल्मी कहानी जैसा लग रहा था।
देवानंद ने प्रिया का हाथ अपने हाथ में लिया। “बेटा, अगर उस दिन तुमने मुझे अपना टिफिन ना खिलाया होता, अगर तुमने मुझ जैसे भिखारी में इंसानियत ना देखी होती, तो शायद आज मैं ज़िंदा भी ना होता या होता भी तो उसी गुमनामी के अंधेरे में। तुमने मुझे सिर्फ खाना नहीं दिया, तुमने मुझे एक नई ज़िंदगी दी है।”
अब प्रिया के लिए एक और झटका इंतजार कर रहा था।
देवानंद ने कहा, “मेरे परिवार में अब कोई नहीं है। मेरी सारी जायदाद, मेरा सारा कारोबार सब वीरान पड़ा है। मैं चाहता हूँ कि तुम इसे संभालो। तुम मेरी बेटी बनकर मेरी इस विरासत को आगे बढ़ाओ।”
प्रिया को लगा जैसे उसके पैरों तले जमीन खिसक गई हो। “मैं… मैं यह सब कैसे कर सकती हूँ, बाबा? मैं तो एक साधारण सी लड़की हूँ।”
देवानंद मुस्कुराए, “बेटा, साधारण होकर भी तुमने जो असाधारण काम किया है, वह बड़े-बड़े अमीर और पढ़े-लिखे लोग भी नहीं कर पाते। तुम्हारे अंदर वह नेकी, वह इंसानियत है जो इस दुनिया को सबसे ज्यादा जरूरत है।”
“मैं तुम्हारी पढ़ाई का सारा खर्चा उठाऊंगा। तुम जो बनना चाहती हो बनो। और हाँ, यह लो मेरी तरफ से एक छोटा सा तोहफा।”
देवानंद ने अपने सेक्रेटरी को इशारा किया। सेक्रेटरी एक ब्रीफकेस लेकर आया और उसे खोलकर प्रिया के सामने रख दिया। ब्रीफकेस नोटों की गड्डियों से भरा हुआ था।
प्रिया की आंखें फटी की फटी रह गईं। “यह क्या है, बाबा?”
देवानंद ने कहा, “यह तुम्हारी नेकी की कीमत नहीं है, बेटा। यह तो बस एक पिता का अपनी बेटी के लिए प्यार है। इससे तुम अपने परिवार की सारी मुश्किलें दूर कर सकती हो।”
प्रिया रो पड़ी। उसने देवानंद के पैर छू लिए।
उस दिन प्रिया जब घर लौटी तो वह एक अलग ही प्रिया थी। उसके पास अब सिर्फ सपने नहीं थे, बल्कि उन सपनों को पूरा करने का जरिया भी था।
उसने देवानंद की मदद से अपने परिवार की सारी आर्थिक परेशानियाँ दूर कर दीं। उसके पिता का इलाज अच्छे अस्पताल में होने लगा। माँ भी अब खुश रहने लगी।
प्रिया ने अपनी पढ़ाई पूरी की और देवानंद के कारोबार को संभालने में उनकी मदद करने लगी। उसने अपनी इंसानियत और दयालुता को कभी नहीं छोड़ा। उसने देवानंद के नाम पर एक बड़ा सा चैरिटेबल ट्रस्ट खोला जो शंकर जैसे बेसहारा और जरूरतमंद लोगों की मदद करता था।
तो देखा आपने, प्रिया की एक छोटी सी निस्वार्थ मदद ने कैसे एक चमत्कार कर दिखाया। एक अंधे भिखारी की जिंदगी में रोशनी भर दी और खुद उसकी जिंदगी को भी रोशन कर दिया।
यह कहानी हमें यही सिखाती है कि नेकी कभी बेकार नहीं जाती। उसका फल हमें किसी न किसी रूप में जरूर मिलता है।
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