शामली का बहावड़ी गांव जिसमें एक खानदान के 8 भाईयों ने बारी-बारी से एक दूसरे को गोलियों से भून डाला!

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पीढ़ियों तक चलती दुश्मनी: 11 हत्याओं से दहला एक गांव, बदले की आग में जलते रिश्ते

उत्तर प्रदेश के शामली जिले के एक छोटे से गांव की कहानी केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि पीढ़ियों तक चली आ रही दुश्मनी, अहंकार और बदले की भावना का भयावह उदाहरण है। यह कहानी बताती है कि कैसे एक मामूली विवाद धीरे-धीरे खून-खराबे की ऐसी श्रृंखला में बदल गया, जिसमें एक ही परिवार की कई पीढ़ियां खत्म हो गईं और अंततः तीसरी पीढ़ी के युवाओं ने हथियार उठा लिए।

शुरुआत: एक हत्या और दो भाइयों की दुश्मनी

इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत वर्ष 1984 में हुई, जब गांव में चकबंदी की प्रक्रिया चल रही थी। इसी दौरान गांव के एक व्यक्ति सुभाष की गोली मारकर हत्या कर दी गई। हत्या के बाद शक की सुई एक ही परिवार के दो सगे भाइयों—वेद सिंह और दरियाब सिंह—पर आकर टिक गई।

दोनों ने एक-दूसरे पर आरोप लगाए और यहीं से शुरू हुई वह दुश्मनी, जिसने आने वाले दशकों में पूरे परिवार को बर्बाद कर दिया। हालांकि शुरू में यह विवाद केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित था, लेकिन समय के साथ यह हिंसा में बदल गया।

पहला खून: रिश्तों में जहर घुलना

साल 1992 में गांव में प्रधान का चुनाव आया। दोनों भाइयों के परिवार राजनीति में आमने-सामने आ गए। इसी दौरान वेद सिंह के बेटे महेंद्र सिंह की हत्या कर दी गई। आरोप दरियाब सिंह के बेटे पर लगा।

यह इस दुश्मनी का पहला बड़ा खून था, जिसने दोनों परिवारों के बीच की खाई को और गहरा कर दिया। इसके बाद दोनों परिवार एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए।

बदले का दौर: एक के बाद एक हत्याएं

साल 1999 में दरियाब सिंह के बेटे जितेंद्र सिंह की हत्या कर दी गई। यह हत्या पहले हुए मर्डर का बदला मानी गई। इसके बाद 2000 में वेद सिंह के बेटे सुरेश मलिक की भी हत्या कर दी गई।

यहीं से यह सिलसिला थमने के बजाय और तेज हो गया। एक रात में तीन लोगों की हत्या हुई, जिसमें एक मासूम बच्चा भी शामिल था। इन हत्याओं का आरोप दोनों परिवार एक-दूसरे पर लगाते रहे, लेकिन सच्चाई कभी सामने नहीं आई।

पंचायत का हस्तक्षेप और अस्थायी शांति

लगातार बढ़ती हत्याओं के बाद गांव की पंचायत ने हस्तक्षेप किया। दोनों परिवारों को समझाया गया कि यदि यह सिलसिला नहीं रुका तो पूरा खानदान खत्म हो जाएगा।

करीब 10 साल तक, यानी 2000 से 2010 तक, गांव में शांति बनी रही। लेकिन यह शांति केवल तूफान से पहले की खामोशी थी।

चुनाव और फिर भड़कती आग

साल 2010 में फिर से प्रधान का चुनाव हुआ। इस बार दरियाब सिंह का बेटा विजेंद्र सिंह प्रधान बना। जीत के बाद उसने विरोधी परिवार के घर के सामने ढोल बजवाए, जो अपमान का कारण बन गया।

यह घटना फिर से हिंसा की चिंगारी बन गई।

2011: सातवां मर्डर

25 जनवरी 2011 को विजेंद्र सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई। इस हत्या में वेद सिंह के परिवार के लोगों पर आरोप लगे। बाद में अदालत ने कुछ आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा भी सुनाई।

लेकिन इससे बदले की आग शांत नहीं हुई।

अदालत में हत्या: नाबालिगों का खौफनाक कदम

2013 में इस मामले के गवाह देवेंद्र सिंह की हत्या मुजफ्फरनगर अदालत परिसर में दिनदहाड़े कर दी गई। सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि हत्या करने वाले दो नाबालिग लड़के थे—सौरभ और सागर—जो अपने पिता की हत्या का बदला लेने आए थे।

उन्होंने खुलेआम गोली मारकर हत्या की और बिना डर के खड़े रहे। बाद में उन्हें बाल सुधार गृह भेजा गया, लेकिन वहां से भी वे फरार हो गए।

अपराध की दुनिया में कदम

बाल सुधार गृह से भागने के बाद इन युवकों ने अपराध की दुनिया में कदम रखा। उन्होंने एक गैंगस्टर विक्रांत उर्फ विक्की त्यागी की हत्या की योजना बनाई, जिसे दरियाब सिंह का समर्थक माना जाता था।

2015 में अदालत परिसर में ही विक्की त्यागी की गोली मारकर हत्या कर दी गई। इस घटना ने पूरे प्रदेश को हिला दिया।

2016: एक और हत्या

2016 में दरियाब सिंह के एक और बेटे धर्मेंद्र उर्फ बबलू की हत्या कर दी गई। इस हत्या के बाद दरियाब सिंह के चारों बेटों की मौत हो चुकी थी।

वहीं दूसरी ओर, वेद सिंह के परिवार के भी चार बेटों की हत्या हो चुकी थी। यानी दोनों पक्षों में बराबर खून बह चुका था।

2026: शादी में हत्या और कहानी का नया मोड़

मार्च 2026 में एक शादी समारोह के दौरान इस दुश्मनी का एक और खौफनाक अध्याय सामने आया। वेद सिंह के बेटे विवेक उर्फ विक्की, जो एक शादी में बिचौलिये की भूमिका निभा रहा था, उसे रात में गोली मार दी गई।

हमलावरों ने उसे पार्किंग क्षेत्र में घेरकर कई गोलियां मारीं। मौके पर ही उसकी मौत हो गई।

एक आरोपी यशवीर उर्फ रजत को पकड़ लिया गया, जिसने बताया कि उसने अपने परिवार के लोगों की हत्या का बदला लिया है।

11 हत्याएं और खत्म होती पीढ़ियां

इस पूरे घटनाक्रम में अब तक कुल 11 हत्याएं हो चुकी हैं। दोनों परिवारों की पहली और दूसरी पीढ़ी लगभग खत्म हो चुकी है। अब तीसरी पीढ़ी—यानी युवा लड़के—इस दुश्मनी को आगे बढ़ा रहे हैं।

यह केवल एक आपराधिक कहानी नहीं, बल्कि सामाजिक विफलता का उदाहरण है।

प्रशासन की भूमिका पर सवाल

स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि प्रशासन ने समय रहते सख्ती दिखाई होती, तो यह सिलसिला रोका जा सकता था। शुरुआती हत्याओं के बाद अगर कड़ी कार्रवाई होती, तो शायद इतने लोगों की जान नहीं जाती।

सीख: बदले की आग सब कुछ जला देती है

यह कहानी हमें एक गहरी सीख देती है—बदले की भावना कभी समाधान नहीं होती। यह केवल विनाश लाती है।

एक छोटी सी दुश्मनी कैसे पीढ़ियों तक चलती है और पूरे परिवार को खत्म कर देती है, इसका यह जीता-जागता उदाहरण है।

निष्कर्ष

आज भी इस गांव में डर का माहौल है। लोग आशंकित हैं कि यह दुश्मनी अभी खत्म नहीं हुई है। कई लोग अब भी बदले की फिराक में हैं।

यह जरूरी है कि समाज, प्रशासन और परिवार मिलकर ऐसे विवादों को शुरुआती स्तर पर ही खत्म करें। वरना यह आग कभी भी भड़क सकती है और फिर किसी को नहीं बख्शती।