सऊदी अरब में फंसा भारतीय युवक, फिर हुआ ऐसा चमत्कार | Real Story

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इंसानियत का इम्तिहान: एक अनकही दास्तां

अध्याय 1: गरीबी का साया

उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव में सूरज का उगना खुशियाँ नहीं, बल्कि नई चुनौतियाँ लेकर आता था। आकाश, एक गबरू जवान लड़का, अपने टूटे हुए घर की देहलीज पर बैठा आसमान को निहार रहा था। घर के अंदर से उसकी माँ के खांसने की आवाज़ आ रही थी। कुछ महीने पहले पिता के देहांत ने परिवार की कमर तोड़ दी थी। दो छोटी बहनें, जिनकी पढ़ाई का खर्च और घर का राशन, सब अब आकाश के कंधों पर था।

उस दिन घर में अनाज का आखिरी दाना भी खत्म हो गया था। माँ की आँखों में आँसू देखकर आकाश का दिल छलनी हो गया। उसने माँ का हाथ थामकर कहा, “मां मत रो, सब ठीक हो जाएगा। भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं।”

अध्याय 2: सुनहरे सपनों का जाल

तभी गाँव के एक दोस्त ने उसे बताया कि शहर में एक ‘एजेंट’ है जो लोगों को सऊदी अरब भेजता है। आकाश की माँ ने उम्मीद भरी नज़रों से उसे देखा और कहा, “बेटा, सुना है वहाँ बहुत पैसा है। तू जाकर बात क्यों नहीं करता?”

आकाश एजेंट के पास पहुँचा। एजेंट ने बड़ी-बड़ी बातें कीं। “आकाश, तुझे वहाँ ऑफिस की नौकरी मिलेगी। बस कुर्सी पर बैठकर फाइलें देखनी होंगी। महीने के लाखों कमाएगा।” लेकिन एक शर्त थी— ₹1 लाख का खर्च।

आकाश के पास फूटी कौड़ी नहीं थी। उसने अपने पड़ोसियों के आगे हाथ फैलाए। किसी ने 500 दिए, किसी ने 1000। आखिर में, उसकी माँ ने अपनी आखिरी निशानी, अपनी शादी के गहने उतारकर आकाश के हाथ में रख दिए। आकाश की आँखों में आँसू थे, पर दिल में एक ज़िद—परिवार को इस दलदल से निकालना है।

अध्याय 3: रेगिस्तान की कड़वी सच्चाई

जब आकाश सऊदी अरब पहुँचा, तो उसके सपने कांच की तरह टूट गए। न कोई ऑफिस था, न कोई कुर्सी। उसे एक ऊँटों के फार्म और सफाई के काम में लगा दिया गया। चिलचिलाती धूप, दिन-रात की मेहनत और बदले में सिर्फ 7000 भारतीय रुपये। एजेंट ने उसे धोखा दिया था।

एक महीने बाद आकाश पूरी तरह टूट चुका था। वह सड़क किनारे बैठकर रो रहा था। “हे भगवान, मैंने क्या सोचा था और क्या हो गया? माँ के गहने भी चले गए और मैं यहाँ फंस गया।”

अध्याय 4: वह रहस्यमयी प्रस्ताव

तभी एक आलीशान काली गाड़ी उसके पास आकर रुकी। गाड़ी से तीन नकाबपोश महिलाएँ उतरीं। उन्होंने आकाश को देखा और आपस में कुछ बात की। उनमें से एक ने टूटी-फूटी हिंदी में पूछा, “क्या तुम काम करोगे? हम तुम्हें एक दिन का 1500 रियाल (लगभग 35,000 रुपये) देंगे।”

आकाश चौंक गया। एक दिन का इतना पैसा? उसे लगा शायद कोई गलत काम होगा। लेकिन उसकी मजबूरी ने उसे ‘हाँ’ कहने पर मजबूर कर दिया। महिलाएँ उसे शहर से बहुत दूर एक सुनसान जंगल के बीच बने एक भव्य महल जैसे घर में ले गईं।

अध्याय 5: महल का काला सच

घर पहुँचने पर आकाश को बहुत अच्छा खाना खिलाया गया। उसे लगा कि शायद ये महिलाएँ उससे कोई भारी मज़दूरी कराएंगी। लेकिन जब उसे एक गुप्त कमरे में ले जाया गया, तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वहाँ तीन छोटे बच्चे बेड पर लेटे थे। उनकी त्वचा पर अजीब से निशान थे।

महिलाओं ने रोते हुए बताया, “एक एक्सीडेंट में हमारे पतियों की मौत हो गई। उसके बाद हमारे बच्चों को यह संक्रामक बीमारी हो गई। डॉक्टरों ने कहा है कि अगर हम इन्हें छुएंगे, तो हमें भी यह बीमारी हो जाएगी। हम अपने ही बच्चों को ममता नहीं दे पा रहे। हमें एक ऐसे साहसी इंसान की ज़रूरत है जो इनकी देखभाल कर सके, इन्हें नहला सके और दवा लगा सके।”

अध्याय 6: सेवा और चमत्कार

आकाश समझ गया कि यह काम उसकी जान भी ले सकता है। लेकिन उसने सोचा, “अगर मैं इनकी सेवा करते हुए मर भी गया, तो कम से कम मेरे परिवार को मिलने वाले पैसों से उनका भला हो जाएगा।”

उसने पूरे एक महीने तक उन बच्चों की सेवा की। वह उन्हें अपने हाथों से खाना खिलाता, उनकी पट्टियाँ बदलता और उन्हें कहानियाँ सुनाता। धीरे-धीरे, आकाश के प्यार और देखभाल का असर दिखने लगा। बच्चे ठीक होने लगे। जो बीमारी लाइलाज लग रही थी, वह इंसानियत की गर्मी से हार रही थी।

अध्याय 7: एक नया जीवन

एक महीने बाद, बच्चे पूरी तरह स्वस्थ होकर दौड़ने-खेलने लगे। महिलाओं की खुशी का ठिकाना न था। उन्होंने आकाश को ₹7 लाख दिए। आकाश खुश था कि अब वह घर लौट सकेगा, माँ के गहने छुड़ा सकेगा।

लेकिन जब वह जाने लगा, तो उन महिलाओं ने उसे रोक लिया। उन्होंने कहा, “आकाश, तुमने हमारे बच्चों को जीवनदान दिया है। उन्होंने तुममें अपना पिता देखा है। हमारे शौहर हमें बहुत दौलत दे गए हैं, पर हमें एक रक्षक की ज़रूरत है। क्या तुम हमसे निकाह करके यहीं हमारे साथ रहोगे?”

आकाश ने अपनी माँ को फोन किया। माँ ने कहा, “बेटा, अगर तूने वहाँ किसी का उजड़ा घर बसाया है, तो यह खुदा की मर्जी है। अपना फर्ज निभा।”

उपसंहार

आकाश, जो एक मजदूर बनकर गया था, अपनी ईमानदारी और इंसानियत की बदौलत उस साम्राज्य का वारिस बन गया। उसने अपनी माँ और बहनों को भी वहीं बुला लिया।