सड़क पर तड़प रहा था बेसहारा लड़का…तभी आई एक अजनबी लड़की, फिर जो हुआ

उम्मीद और साहस की एक नई शुरुआत
दिल्ली की ठंडी शाम थी। दिसंबर का महीना जब हवा में ठंड चुभती है और धुंध सड़क की लाइटों को भी धुंधला कर देती है। कनॉट प्लेस की भीड़भाड़ वाली सड़कों पर लोग अपने-अपने काम में व्यस्त थे। कोई जल्दी-जल्दी ऑफिस से घर लौट रहा था, कोई अपने फोन में झुका चल रहा था, तो कोई फुटपाथ पर लगी दुकानों में भावताव कर रहा था। इसी भीड़ के बीच एक कोने में फुटपाथ पर एक दुबला-पतला बच्चा पड़ा था। उम्र मुश्किल से 12 साल, कपड़े फटे-पुराने, पैर नंगे और चेहरा पीला पड़ चुका था। वह कांप रहा था जैसे तेज बुखार या भूख ने उसकी हड्डियों तक को जकड़ लिया हो। उसका एक हाथ पेट पर था और होठों से हल्की सी कराह निकल रही थी। लोग गुजरते गए लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया। कुछ ने देखा भी पर फिर नजरें फेर लीं।
“अरे, यह तो जेब का तरह होगा। नाटक कर रहा है। ऐसे ही लेट जाते हैं सिंपैथी के लिए,” एक आदमी बड़बड़ाया। “हां भाई, आजकल के बच्चे पता नहीं कौन सच्चा है, कौन झूठा,” दूसरा बोला। लेकिन भीड़ में एक लड़की थी जो रुक गई। उसका नाम था नैना। उम्र करीब 25 साल। साधारण सलवार कमीज पहने, हाथ में सब्जियों का थैला और आंखों में साफ सुथरी मासूमियत। वह अपने घर जा रही थी लेकिन बच्चे की हालत देखकर उसके कदम अपने आप ठहर गए।
वह उसके पास बैठ गई। “अरे सुनो बेटा, ये तुम ठीक हो?” बच्चा मुश्किल से आंखें खोल सका। उसकी सांसे तेज थीं जैसे हर सांस लेना उसके लिए लड़ाई हो। नैना ने जल्दी से उसका हाथ पकड़ा। ठंडे हाथ जैसे बर्फ हो। उसने घबराकर उसकी नब्ज़ देखी। “बहुत धीमी। हे भगवान, यह तो सच में बीमार है,” उसने मन में सोचा। तभी बच्चा बेहद धीमी आवाज में कुछ बुदबुदाया। नैना ने कान पास किया। बस एक नाम, एक बहुत छोटा सा नाम – “मां,” और फिर उसकी आंखें बंद हो गईं।
नैना का दिल धड़क उठा। उसने तुरंत चारों ओर देखा। कोई मदद को नहीं आया। लोग या तो तमाशा देख रहे थे या जल्दी में निकल गए। “किसी को तो मदद करनी पड़ेगी,” उसने खुद से कहा। वह पास खड़े एक ऑटो वाले के पास भागी। “भैया, जल्दी आइए। इस बच्चे को अस्पताल ले चलना है।”
ऑटो वाला पहले हिचकिचाया। “मैडम, पुलिस का चक्कर होगा। क्यों फंसना?” नैना ने गुस्से में कहा, “फंसने से बड़ा है किसी की जान बचाना। चलिए।” आखिरकार ऑटो चल पड़ा। नैना बच्चे को अपनी गोद में लेकर बैठी। उसके सिर पर हाथ फेरते हुए उसे दिलासा देने लगी, “कुछ नहीं होगा। शुभ, बस थोड़ा और हिम्मत करो।”
पास के सरकारी अस्पताल में पहुंचकर नैना ने डॉक्टर को बुलाया और चेकअप करवाने के लिए जोर डाला। रिसेप्शन पर उसने अपनी जेब टटोली। बस ₹600 थे जो वह सब्जियों और घर के खर्च के लिए लाई थी। बिना सोचे उसने सारे पैसे काउंटर पर रख दिए। “बस जल्दी इलाज शुरू कीजिए।” डॉक्टर बच्चे को लेकर अंदर चले गए। नैना वहीं बेंच पर बैठ गई। ठंडी हवा में कांपते हाथों को एक दूसरे में दबाते हुए कुछ देर बाद एक नर्स बाहर आई। “आप ही लाई थीं इसे?”
“हां,” नैना ने कहा। “इसके कपड़ों में हमें यह मिला।” नर्स ने देखा, नर्स के हाथ में एक पुरानी थोड़ी मुड़ी काले-सफेद फोटो थी। उसमें एक अमीर दिखने वाला जोड़ा अपने नवजात बच्चे को गोद में लिए मुस्कुरा रहा था। फोटो के पीछे सुनहरी स्याही में एक नाम लिखा था – “राठौड़ परिवार।” नैना की भौंहें सिकुड़ गईं। उसने कभी यह नाम नहीं सुना था। लेकिन फोटो से साफ था कि यह कोई साधारण परिवार नहीं था। उसके मन में सवाल उठे – “यह बच्चा कौन है? इसके पास यह फोटो क्यों है? और उसने मां क्यों कहा?”
नैना को पता था कि अगर उसने यह मामला पुलिस को दे दिया तो बच्चा बाल सुधार गृह में चला जाएगा। और शायद कभी सच सामने ना आ पाए। उसने ठान लिया। वह खुद सच्चाई पता लगाएगी। लेकिन उसे अंदाजा नहीं था कि यह रास्ता ना सिर्फ उसकी जिंदगी बदल देगा, बल्कि शहर के सबसे बड़े और ताकतवर परिवार का काला सच भी उजागर करेगा।
अस्पताल के वार्ड में हल्की सी दवाई की गंध थी। बच्चा अब भी बेहोश था। पर उसकी सांसे पहले से स्थिर थीं। नैना उसके पास बैठी रही। उसके माथे पर हल्के-हल्के हाथ फेरते हुए रात के करीब 11:00 बज चुके थे। नर्स ने आकर कहा, “मैडम, आप चाहे तो घर जाइए, हम देख लेंगे।” लेकिन नैना ने सिर हिलाया, “नहीं, मैं यहीं रहूंगी।” वह बार-बार उस पुरानी तस्वीर को देखती रही। पीछे लिखा नाम “राठौड़ परिवार” उसके दिमाग में गूंजता रहा। “कौन हैं ये लोग और इस छोटे से बच्चे का उनसे क्या रिश्ता है?”
सुबह होते ही उसने अपने फोन से इंटरनेट पर “राठौड़ परिवार” सर्च किया। तुरंत ही ढेरों खबरें सामने आ गईं। “बिजनेस टाइकून, शहर के सबसे बड़े रियलस्टेट ग्रुप के मालिक, आलीशान बंगले, मीडिया इंटरव्यू,” और एक पुरानी खबर जिसने नैना को हिला दिया। “5 साल पहले राठौड़ परिवार का 7 साल का बेटा रहस्यमई तरीके से लापता, अब तक कोई सुराग नहीं।” तस्वीर में वही चेहरा था जो फोटो में था। बस छोटा और मासूम। नैना का दिल तेजी से धड़कने लगा। “क्या यह वही बच्चा है?” लेकिन अगर हां, तो इतने साल कहां था और इस हालत में यहां कैसे पहुंचा?
उसने तय किया कि उसे सीधे राठौड़ परिवार तक पहुंचना होगा। लेकिन यह आसान नहीं था। इतने बड़े लोग आम जनता से नहीं मिलते। वह अगले दिन अस्पताल गई। “डॉक्टर से पूछा, ‘डॉक्टर साहब, कब तक ठीक हो जाएगा?’”
“दो-तीन दिन में होश आ जाएगा, लेकिन हमें पुलिस को इन्फॉर्म करना पड़ेगा।” यह सुनते ही नैना ने कहा, “अभी मत कीजिए। मैं कुछ जरूरी काम कर लूं, फिर बता दीजिएगा।” डॉक्टर ने शक भरी नजर से देखा, पर चुप रह गए।
उस शाम नैना ने पुरानी फोटो को एक पुराने फोटो कॉपी सेंटर पर स्कैन करवाया और बैकग्राउंड के एक छोटे हिस्से पर ज़ूम किया। वहां एक आलीशान घर का दरवाजा नजर आ रहा था। जिस पर एक अद्वितीय डिजाइन का पीतल का हैंडल लगा था। एक शेर के सिर के आकार का। उसने तय कर लिया। “वह इस हैंडल को खोजेगी।”
पहला सुराग बंगले के बाहर। दो दिन तक शहर के पौश इलाकों में घूमते-घूमते आखिर एक शाम उसे वहीं दरवाजा मिला। विशाल सफेद बंगला, ऊंची दीवारें और लोहे का गेट। जिसके दोनों तरफ सिक्योरिटी गार्ड खड़े थे। गेट पर बड़ा सा नेम प्लेट “राठौर विला”। नैना का गला सूख गया। यह जगह आम लोगों के लिए अजनबी और डराने वाली थी।
वो पास खड़ी एक फूल बेचने वाली औरत से बातें करने लगी। “दीदी, यह घर किसका है?”
“अरे, यह तो बड़े राठौर साहब का है। बहुत अमीर लोग हैं। लेकिन सुन, तू ज्यादा इधर मत खड़ी रह। सिक्योरिटी वाले डांट देंगे।” नैना ने देखा, अंदर से एक लंबी काली कार निकली जिसमें शायद परिवार का कोई सदस्य बैठा था। उसकी झलक पाते ही नैना के मन में और सवाल उठे।
खतरे की शुरुआत। वह अगले दिन फिर आई। इस बार गेट के सामने नहीं, बल्कि थोड़ी दूरी पर ताकि किसी को शक ना हो। लेकिन कुछ देर बाद उसने महसूस किया कि कोई उसकी हरकतों पर नजर रख रहा है। पीछे मुड़कर देखा, एक लंबा गहरे रंग का आदमी काले कपड़े पहने उसे लगातार देख रहा था। नैना का दिल बैठने लगा। “क्या मैंने कुछ गलत कर दिया? क्या यह लोग जानते हैं कि मैं बच्चे के बारे में पता लगा रही हूं?”
उसने जल्दी से रिक्शा रोका और वहां से निकल गई। लेकिन उसे एहसास हो गया था। “यह मामला सिर्फ एक लापता बच्चे का नहीं, बल्कि कुछ ऐसा है जो बहुत लोगों को डराता है और शायद इसी वजह से बच्चा इतने साल गायब रहा।” नैना ने ठान लिया। “चाहे जितना खतरा हो, सच सामने लाए बिना नहीं रुकेगी।”
उसे पता नहीं था कि अगले 24 घंटे में उसकी जान पर भी खतरा आने वाला है। युवती ने फोटो को अपने पर्स में रखा और अस्पताल से बाहर निकली। रात का अंधेरा गहराने लगा था। लेकिन उसके कदम थमने का नाम नहीं ले रहे थे। सड़क पर गाड़ियों के हॉर्न, दुकानों से आती रोशनी और बीच-बीच में गुजरते लोग सब कुछ धुंधला लग रहा था क्योंकि उसका ध्यान सिर्फ एक ही चीज पर था। उस लड़के की सच्चाई।
उसने फोटो के पीछे लिखा नाम फिर से पढ़ा। “राजपुरिया फैमिली।” यह नाम उसने पहले अखबारों में पढ़ा था। “शहर के सबसे अमीर और प्रभावशाली परिवारों में से एक।” लेकिन उनसे इस गरीब घायल बच्चे का क्या रिश्ता हो सकता है? पहला ठिकाना उसने शहर की पुरानी लाइब्रेरी को बनाया जहां अखबारों का पुराना रिकॉर्ड रखा था। पीली पड़ चुकी कतरनों में उसने पढ़ा। “राजपुरिया परिवार का इकलौता बेटा 5 साल की उम्र में किडनैप। अब तक कोई सुराग नहीं।”
दिल की धड़कन तेज हो गई। “क्या यह वही बच्चा है?” जवाब ढूंढने के लिए उसने अगले दिन उस पुराने मोहल्ले का रुख किया जहां परिवार पहले रहा करता था। वहां एक बूढ़ा चाय वाला मिला जिसने फोटो देखते ही चौंकते हुए कहा, “अरे, यह तो छोटे साहब हैं। इन्हें तो सब मरा हुआ मान चुके हैं।”
युवती को अब यकीन हो गया कि वह सही रास्ते पर है। लेकिन खतरा भी बढ़ रहा था। उसी शाम उसने देखा कि दो अजनबी बाइक पर उसका पीछा कर रहे हैं। वह तेजी से भीड़ में घुस गई। गलियों से होती हुई एक पुराने मंदिर में जाकर रुकी। सांसें थामे उसने खुद से कहा, “अब पीछे हटना मुमकिन नहीं। इस बच्चे की किस्मत मेरे हाथ में है।”
वो जानती थी कि अगर सच्चाई सामने आ गई तो किसी की जिंदगी बदल जाएगी और किसी का राज हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा। सुबह की ठंडी धूप अस्पताल के कमरे में हल्की सी सुनहरी परत बिखेर रही थी। लड़का अब जाग चुका था लेकिन उसकी आंखों में अभी भी डर और अनिश्चितता थी। पास बैठी युवती ने उसके सिर पर हाथ फेरा और मुस्कुराकर कहा, “तुम अब सुरक्षित हो।”
इसी बीच कमरे का दरवाजा धीरे से खुला। अंदर एक महिला दाखिल हुई। उम्र करीब 40 साल, महंगे लेकिन सादे कपड़े, आंखें लाल और चेहरे पर थकान के गहरे निशान। जैसे ही उसकी नजर बिस्तर पर बैठे लड़के पर पड़ी, उसकी सांसे रुक सी गईं। वो तेजी से आगे बढ़ी और लड़के के चेहरे को दोनों हाथों में थाम लिया। “आर्यन,” उसकी आवाज कांप रही थी। लड़के ने पहले तो चुपचाप उसे देखा जैसे दिमाग में तस्वीरें साफ हो रही हों। फिर उसकी आंखें भर आईं और एक कमजोर सी आवाज में बोला, “मां।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। महिला ने उसे अपनी बाहों में कसकर पकड़ लिया जैसे सालों का दर्द एक ही पल में बह गया हो। युवती पीछे खड़ी सब देख रही थी। उसकी आंखों में संतोष था। लेकिन साथ ही एक अजीब सा भारीपन भी। तभी दरवाजे के बाहर कदमों की आहट गूंजी। सूट बूट में कुछ लोग अंदर आए। गार्ड, वकील और एक वृद्ध सज्जन जिनके चेहरे पर अधिकार और चिंता दोनों झलक रहे थे। यह लड़के के नाना थे।
उन्होंने युवती के पास आकर धीरे से कहा, “आपने जो किया वह सिर्फ हमारी नहीं बल्कि ईश्वर की मर्जी थी।” महिला ने युवती का हाथ थाम कर कहा, “अगर तुम ना होती तो मैं अपने बेटे को कभी नहीं पा सकती।” लड़का अब अपनी मां की गोद में था और उसकी नजरें उन लोगों पर टिकी थीं जो उसे कभी अनजान लगे थे। लेकिन आज घर कहे जा सकते थे।
युवती ने चुपचाप अपना बैग उठाया और मुड़ने लगी। लेकिन तभी लड़के ने उसका हाथ पकड़ लिया। “आप कहां जा रही हैं? आप भी आ, आप भी हमारे साथ चलिए।” उसकी मासूम आवाज में ऐसा अपनापन था कि युवती का दिल पिघल गया। वो मुस्कुराई, लेकिन जवाब नहीं दिया। बस उसकी उंगलियों को हल्के से दबाया।
अस्पताल के बाहर मीडिया और लोग जुटे हुए थे। कैमरे फ्लैश कर रहे थे। सवालों की बौछार हो रही थी। लेकिन उस शोर में भी कमरे के अंदर बस एक ही आवाज गूंज रही थी। एक मां और बेटे के दिलों की धड़कन जो बरसों बाद एक साथ धड़क रही थी।
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