सबने समझा कूड़ा बिनने वाला… लेकिन उसने 10 करोड़ का गाना गा दिया! 😲
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सिर्फ एक मौका: आरव की सच्ची कहानी
शहर की सबसे बड़ी शादी थी। करोड़पति राघव सिंघानिया की बेटी की शादी, जिसकी चर्चा पूरे शहर में थी। पांच सितारा रिसॉर्ट रोशनी से नहाया हुआ था, हर टेबल पर विदेशी फूल, गोल्डन प्लेट्स, और बीच में विशाल स्टेज। हर कोई इस शादी को यादगार बनाना चाहता था। लेकिन ऐन वक्त पर, जिस मशहूर गायक को करोड़ों देकर बुलाया गया था, वह नहीं आया। राघव का गुस्सा सातवें आसमान पर था—”अगर गायक नहीं आया तो मेरी इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी!”
इसी हॉल के एक कोने में, खाने की कतार के पास, एक दुबला-पतला लड़का खड़ा था। नाम था आरव। उम्र करीब 15 साल, फटा हुआ कुर्ता, रंग उड़ा पायजामा, चप्पल की पट्टी धागे से बंधी। वह मेहमान नहीं था, न ही स्टाफ। बस, भूख लगी थी, दो दिन से ठीक से खाना नहीं खाया था। प्लेट में दाल-चावल उसके लिए किसी दावत से कम नहीं थे।
आरव के कानों में शोर नहीं, खालीपन था। स्टेज का खालीपन, माइक की चुप्पी। उसने मां की कही बात याद की—”तू जब गाता है, भूख भी चुप हो जाती है।” अचानक उसके मन में एक सुर उठा। उसने प्लेट नीचे रख दी, हाथ कपड़े से पोंछे, और खुद को चलते हुए पाया। वह सीधा राघव सिंघानिया के सामने आकर रुक गया।
राघव किसी पर चिल्ला रहा था। तभी आरव की धीमी आवाज आई—”साहब, अगर आप चाहें तो मैं गा दूं?” चारों तरफ सन्नाटा छा गया। राघव ने गुस्से में देखा—”यह शादी है, कोई सड़क का तमाशा नहीं।” आरव ने सिर उठाया, आंखों में आत्मविश्वास—”अगर मैं गा दिया और आपको पसंद आया तो आप क्या कहेंगे?” राघव ने शर्त रखी—”अगर तू गा दिया और मेरा मान बचा लिया, तो मैं तुझे 10 करोड़ दूंगा।”
हॉल में जैसे सांस रुक गई। आरव मुस्कुराया। वह पैसे के बारे में नहीं सोच रहा था, वह सोच रहा था मौके के बारे में। राघव ने पूछा, “नाम क्या है तेरा?”—”आरव।”—”कहां से आया है?”—”यहीं पास की झुग्गी से।” कुछ लोग हंसे, कुछ ने ताना मारा—”झुग्गी का लड़का और 10 करोड़!”

डीजे ने पूछा—”क्या गाएगा?” आरव ने वही गाना चुना जो आज गायक को गाना था। सब चौंके—”वह बहुत मुश्किल गाना है!” राघव ने ठंडी आवाज में कहा—”अगर वही गाएगा तभी बात बनेगी।” आरव ने सिर झुकाया—”ठीक है, लेकिन पैसे नहीं चाहिए, बस एक मौका।”
राघव ने स्टेज की तरफ इशारा किया—”जा, आज देख लेते हैं, आवाज कपड़ों से बड़ी होती है या नहीं।” आरव के लिए स्टेज पर जाना आसान नहीं था। लाइट्स, भीड़, फटे कपड़े—सब उसकी कमजोरी दिखा रहे थे। लेकिन उसके अंदर एक आग थी। माइक उसके कद से ऊंचा था, टेक्निशियन ने नीचे किया। साउंड चेक हुआ। आरव ने पानी पिया, गहरी सांस ली और आंखें बंद कीं।
इंस्ट्रूमेंटल शुरू हुआ। आरव ने गाना शुरू किया—”दो दिल जब मिल जाते हैं, बन जाती है एक राह…” उसकी आवाज में कोई दिखावा नहीं था, बस दर्द और सच्चाई थी। पूरा हॉल चुप हो गया। कोई खांसा नहीं, कोई फुसफुसाया नहीं। राघव की भौहें ढीली पड़ने लगीं। आरव अब गा नहीं रहा था, जी रहा था। हर लाइन के साथ सन्नाटा गहरा होता गया। आखिरी लाइन पर उसकी नजर राघव से मिली—आवाज भारी थी लेकिन स्वर नहीं टूटा।
फिर कहीं से ताली बजने लगी, फिर पूरी हॉल तालियों से गूंज उठा। राघव स्टेज के पास आया, पूरा हॉल खड़ा हो गया। आरव को समझ नहीं आया कि क्या करे। राघव ने हाथ उठाया—”नाम क्या बताया था?”—”आरव,” लड़के ने धीमे से कहा। राघव ने कहा—”तू जानता है तूने क्या किया? इसने मुझे बचाया, लेकिन उससे पहले इसने मुझे शर्मिंदा किया। क्योंकि मैं समझता था कि पैसा आवाज खरीद सकता है। पर यह लड़का खाली पेट, फटे कपड़ों में आया और मेरी बेटी की शादी में जान डाल गया।”
राघव ने शर्त की बात की—”10 करोड़ गाने की कीमत नहीं हो सकती।” फिर कहा—”पैसा मैं दूंगा, लेकिन सौदे की तरह नहीं।” वह स्टेज पर चढ़ गया—”तू आज से किसी की दया पर नहीं जिएगा। ना मेरी, ना किसी और की। आज यह लड़का हमारा एंटरटेनर नहीं, हमारी कहानी है।”
तालियां फिर गूंजी। आरव को लगा सीने पर रखा पत्थर हट गया। लेकिन डर अभी भी था—जिंदगी इतनी आसानी से नहीं बदलती। राघव ने पूछा—”एक और गाना, अपनी पसंद का?” आरव ने सिर हिलाया—”मैं मां के लिए गाता हूं।” गाना शुरू हुआ, कई लोगों ने अपनी मां को याद किया। राघव सिंघानिया, जिसने जिंदगी में बहुत कुछ जीता था, आज पहली बार चुपचाप हार मान रहा था।
गाना खत्म होने से पहले ही माहौल बदल गया। हॉल अब शादी का हॉल नहीं, किसी की जिंदगी का मोड़ बन चुका था। आरव की आवाज में थकान, संघर्ष और एक अजीब सी शांति थी। तालियां आईं, स्टैंडिंग ओवेशन। आरव स्टेज से उतरने ही वाला था कि राघव ने उसका हाथ पकड़ लिया—”रुक, अभी नहीं।”
राघव ने शेखर मल्होत्रा को बुलाया—”20 साल से म्यूजिक इंडस्ट्री में हैं।” शेखर ने पूछा—”कहां सीखा?”—”कहीं नहीं, जहां मौका मिला गा लिया।” शेखर मुस्कुराए—”यही सबसे मुश्किल स्कूल होता है।” फिर राघव से बोले—”यह लड़का कच्चा है, लेकिन इसमें वह है जो अकादमी नहीं सिखा सकती।” राघव ने पूछा—”आप संभालेंगे?”—”अगर यह बच्चा चाहे।”
पीछे से एक महिला आई—”हम एनजीओ से हैं, इसकी पढ़ाई हमारी जिम्मेदारी।” एक आदमी बोला—”मेरे पास छोटा सा स्टूडियो है, रिकॉर्डिंग फ्री रहेगी।” आरव को समझ नहीं आ रहा था किसे देखे, किसे सुने। उसकी दुनिया तीन गलियों में सिमटी थी, अब फैल रही थी।
राघव ने माइक उठाया—”आज एक बात साफ हो गई, टैलेंट को मंच नहीं मिलता तो मंच बेमतलब हो जाता है।” फिर आरव के कंधे पर हाथ रखा—”10 करोड़ तेरे खाते में नहीं जाएंगे, तेरे नाम से एक ट्रस्ट में जाएंगे, तेरी पढ़ाई, तेरा म्यूजिक और तेरे जैसे और बच्चों के लिए।” आरव फूट-फूट कर रो पड़ा। पहली बार उसके आंसुओं में डर नहीं था, सिर्फ शुरुआत थी।
शादी खत्म हो चुकी थी, लाइट्स बंद हो रही थीं, लेकिन आरव के लिए रात अभी खत्म नहीं हुई थी। वह स्टेज के पीछे बैठा था, हाथ में वही पुराना रुमाल। राघव सिंघानिया सामने थे—अब चेहरे पर गुस्सा नहीं, सिर्फ सुकून था। राघव ने पूछा—”कभी सोचा था, एक दिन तू इस स्टेज पर बैठेगा?”—”नहीं साहब, मैं तो भीड़ में गुम हो जाना चाहता था।”—”आज भीड़ तुझे ढूंढ रही है।”
इवेंट मैनेजर आया—”वीडियो वायरल हो गया है।” आरव डर गया—”अब लोग मुझे पहचान लेंगे।”—”अब तू अकेला नहीं है।” अगले दिन आरव और उसकी मां को गेस्ट हाउस में शिफ्ट कराया गया। मां ने पूछा—”कुछ गड़बड़ तो नहीं की?”—”नहीं अम्मा, मैंने गाया।” मां ने बेटे को देखा और रो पड़ी—”तेरे बाप ने कहा था, एक दिन तेरा गाना हमारा सिर ऊंचा करेगा।”
तीन हफ्ते बीत गए। आरव अब गेस्ट हाउस में रहता, स्कूल जाता, म्यूजिक एकेडमी जाता। लेकिन अंदर वही डर था—”यह सब सपना है, जो टूट जाएगा।” असली झटका एक शाम मिला—शेखर सर ने कहा—”कल तुम्हारा ऑडिशन है, कोई ताली नहीं, कोई भीड़ नहीं, सिर्फ आवाज।” पहली दो टेक खराब गईं, किसी ने ताना मारा—”वायरल लड़के से यही उम्मीद थी।” शेखर ने कहा—”भीड़ के लिए मत गा, अपने लिए गा।” तीसरी टेक में आरव ने सब कुछ भूलकर गाया—और फाइनल टेक पास हो गया।
राघव ने फोन किया—”अब कहानी शुरू हुई है बेटा।” एक साल बाद, वही शहर, वही लोग, लेकिन वही आरव नहीं। रेडियो पर उसकी आवाज बज रही थी—”नाम नहीं बताया गया, बस इतना कहा गया—नया सिंगर।” लोग रुक गए, आवाज सुनी, कहा—”कुछ अलग है।”
इंटरव्यू, स्टेज शो, नाम—हर जगह वही सवाल—”पहला मौका कैसे मिला?” आरव हर बार वही जवाब देता—”एक शादी में, जहां मैं सिर्फ खाना खाने गया था।” लोग हंसते, लेकिन राघव सिंघानिया जानते थे, उनकी बेटी जानती थी, और वह खाली स्टेज भी जानता था।
एक दिन फिर उसी हॉल में, आरव साधारण कुर्ते में, आत्मविश्वास के साथ स्टेज पर चढ़ा। नीचे किचन के पास कुछ बच्चे चुपचाप खड़े थे—जैसे वह कभी था। आरव ने माइक पकड़ा—”अगर आज यहां कोई बच्चा है जिसे लगता है उसकी आवाज कोई नहीं सुनेगा, तो यह गाना उसके लिए है।” गाना खत्म हुआ, तालियां आईं, लेकिन आरव ने हाथ उठाकर रोक दिया। वह स्टेज से उतरकर सीधे उन बच्चों के पास गया—”कौन गाना चाहता है?” एक छोटा सा हाथ उठा, आरव मुस्कुराया, माइक आगे बढ़ाया।
क्योंकि कुछ कहानियां यहीं खत्म नहीं होतीं, वे दूसरों के लिए यहीं से शुरू होती हैं।
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