सरकारी स्कूल से पढ़कर IAS Officer बनी स्कूल के चपरासी की बेटी शिखा गौतम की कहानी
.
.
तंग गलियों से निकलकर बनीं आईएएस: बुलंदशहर की शिखा गौतम ने हासिल की 113वीं रैंक
बुलंदशहर, उत्तर प्रदेश:
कहा जाता है कि अगर इंसान ठान ले तो कोई भी मंज़िल दूर नहीं होती। उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले की रहने वाली शिखा गौतम ने इस कहावत को सच साबित कर दिया है। बेहद साधारण परिवार, सीमित संसाधन और छोटी-सी तंग गलियों में पली-बढ़ी शिखा ने संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की कठिन परीक्षा पास कर 113वीं रैंक हासिल की है। उनकी सफलता ने न केवल उनके परिवार बल्कि पूरे इलाके को गर्व से भर दिया है।
आज उनके घर के बाहर बधाई देने वालों की लंबी कतार लगी हुई है। लोग फूलों के गुलदस्ते लेकर पहुंच रहे हैं और शिखा के माता-पिता को बधाई दे रहे हैं। जिन गलियों से कभी मुश्किल से एक गाड़ी निकल पाती थी, आज वही गलियां खुशियों से भर गई हैं।
साधारण परिवार से आती हैं शिखा
शिखा गौतम बुलंदशहर जिले के भोड़ क्षेत्र की अंबेडकर नगर कॉलोनी की रहने वाली हैं। यह इलाका संकरी गलियों और साधारण घरों के लिए जाना जाता है। यहीं एक छोटे से घर में शिखा का बचपन बीता।
उनके पिता प्रेमचंद एक सरकारी इंटर कॉलेज में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के रूप में काम करते हैं। पिछले कई दशकों से वे स्कूल में घंटी बजाने, फाइलें पहुंचाने, पानी पिलाने और अन्य छोटे-बड़े काम करते रहे हैं। उनका जीवन संघर्षों से भरा रहा है, लेकिन उन्होंने कभी अपने बच्चों की पढ़ाई के साथ समझौता नहीं किया।
प्रेमचंद बताते हैं कि उन्होंने लगभग 1995 से सरकारी स्कूल में नौकरी शुरू की थी और तब से आज तक लगातार काम कर रहे हैं। उनका कहना है कि उन्होंने अपने बच्चों को हमेशा पढ़ने के लिए प्रेरित किया, क्योंकि वे जानते थे कि शिक्षा ही जीवन बदल सकती है।
पिता का संघर्ष और समाज की सच्चाई
प्रेमचंद का जीवन केवल आर्थिक संघर्ष तक सीमित नहीं था। समाज में कई बार उन्हें जातिगत भेदभाव का सामना भी करना पड़ा। उन्होंने बताया कि कई बार ऐसा हुआ जब लोग उनके हाथों का पानी पीने से भी मना कर देते थे।
लेकिन उन्होंने इन बातों को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। उन्होंने हमेशा अपने बच्चों को यही सिखाया कि शिक्षा ही वह ताकत है जो इंसान को हर प्रकार के भेदभाव से ऊपर उठा सकती है।
आज वही लोग उनके घर आकर मिठाइयां खा रहे हैं और उनकी बेटी की सफलता की तारीफ कर रहे हैं।

शिक्षा का सफर
शिखा की शुरुआती पढ़ाई स्थानीय सरकारी स्कूलों में हुई। उन्होंने बुलंदशहर के गांधी इंटर कॉलेज से अपनी इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी की।
उनका बचपन बेहद साधारण माहौल में बीता। परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी, लेकिन पढ़ाई के प्रति उनका लगाव शुरू से ही था।
स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने डीएलएड (Diploma in Elementary Education) किया। इसके बाद उन्होंने शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) और केंद्रीय शिक्षक पात्रता परीक्षा (CTET) भी पास की।
उस समय तक उनका लक्ष्य शिक्षक बनना ही था। उन्हें कभी नहीं लगा था कि वे एक दिन देश की सबसे कठिन परीक्षा यूपीएससी की तैयारी करेंगी।
लॉकडाउन में बदली जिंदगी
शिखा के जीवन में सबसे बड़ा मोड़ कोरोना लॉकडाउन के दौरान आया। उसी समय उन्हें एक शिक्षक से प्रेरणा मिली जिन्होंने उन्हें यूपीएससी की तैयारी करने की सलाह दी।
शिखा बताती हैं कि शुरुआत में उन्हें इस परीक्षा के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। लेकिन जब उन्हें समझाया गया कि यह परीक्षा देश की सबसे प्रतिष्ठित सेवाओं में जाने का मौका देती है, तब उन्होंने इसे गंभीरता से लेना शुरू किया।
इसके बाद परिवार ने उन्हें दिल्ली भेजा ताकि वे वहां रहकर यूपीएससी की तैयारी कर सकें।
पहला प्रयास और असफलता
यूपीएससी जैसी परीक्षा में सफलता एक दिन में नहीं मिलती। शिखा को भी इसके लिए कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
उन्होंने अपना पहला प्रयास दिया और वे इंटरव्यू तक पहुंच गईं। लेकिन अंतिम चयन सूची में उनका नाम आने से केवल दो अंक से रह गया।
यह उनके लिए बेहद निराशाजनक क्षण था। उन्होंने बताया कि उस समय वे बहुत दुखी हो गई थीं। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
उन्होंने खुद से वादा किया कि अगले प्रयास में वे पूरी ताकत से तैयारी करेंगी।
दूसरा प्रयास और बड़ी सफलता
दूसरे प्रयास में शिखा ने पूरी मेहनत और लगन के साथ तैयारी की। उन्होंने अपने लक्ष्य पर पूरा ध्यान केंद्रित किया और किसी भी प्रकार के सामाजिक या व्यक्तिगत दबाव को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया।
आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई और यूपीएससी 2025 के परिणाम में उन्होंने 113वीं रैंक हासिल कर ली।
यह सफलता न केवल उनके परिवार बल्कि पूरे बुलंदशहर जिले के लिए गर्व की बात बन गई।
इंटरव्यू का अनुभव
शिखा ने बताया कि यूपीएससी इंटरव्यू का अनुभव उनके लिए बेहद खास था।
पहली बार जब वे इंटरव्यू रूम में गईं तो वे काफी घबराई हुई थीं। लेकिन बोर्ड के सदस्यों ने उन्हें सहज महसूस कराया।
उन्होंने बताया कि इंटरव्यू का पहला सवाल उनकी साड़ी के बारे में पूछा गया था। उन्होंने असमिया संस्कृति की साड़ी पहनी हुई थी।
इसके बाद उनसे असम के त्योहारों और वहां की संस्कृति से जुड़े सवाल पूछे गए। उन्होंने आत्मविश्वास के साथ सभी सवालों के जवाब दिए।
मोबाइल फोन से दूरी
शिखा की कहानी का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा मोबाइल फोन के बिना बिताया।
उन्होंने बताया कि डीएलएड करने तक उन्होंने कभी मोबाइल फोन का इस्तेमाल नहीं किया था। उस समय उनके सभी फोन कॉल परिवार के दूसरे सदस्यों के फोन पर आते थे।
आज जब अधिकांश युवा दिनभर मोबाइल में व्यस्त रहते हैं, शिखा का यह अनुशासन उनकी सफलता का एक महत्वपूर्ण कारण माना जा सकता है।
परिवार का समर्थन
शिखा की सफलता के पीछे उनके परिवार का बहुत बड़ा योगदान रहा है।
उनके परिवार में चार बहनें और एक भाई हैं। उनकी दो बड़ी बहनों की नौकरी शिक्षक के रूप में लग चुकी है।
शिखा बताती हैं कि उनके पिता हमेशा अपने बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित रहते थे। जब तक परिवार के किसी सदस्य की नौकरी नहीं लगी थी, तब तक वे अक्सर परेशान रहते थे।
लेकिन आज उनकी बेटी की इस सफलता ने उनके सभी संघर्षों को सार्थक बना दिया है।
परिणाम का वह पल
शिखा बताती हैं कि यूपीएससी का परिणाम आने से पहले वे बेहद बेचैन थीं। उन्होंने कई दिनों तक लगातार वेबसाइट चेक की।
उन्होंने बताया कि जिस दिन परिणाम आया, उस दिन उन्होंने खुद अपना रिजल्ट देखा। जैसे ही उन्होंने सूची में अपना नाम देखा, उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
उस समय उनकी मां अस्पताल में थीं क्योंकि उनकी आंखों का ऑपरेशन होना था।
शिखा ने सबसे पहले अपनी बहन को फोन करके यह खुशखबरी दी।
समाज के लिए प्रेरणा
शिखा की सफलता केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह समाज के लिए भी एक बड़ा संदेश है।
वे मानती हैं कि अगर बच्चों को सही दिशा और अवसर दिया जाए तो वे किसी भी ऊंचाई तक पहुंच सकते हैं।
उनका कहना है कि माता-पिता को अपने बच्चों की पढ़ाई में कभी बाधा नहीं बनना चाहिए।
भविष्य की योजनाएं
113वीं रैंक हासिल करने के बाद शिखा को उम्मीद है कि उन्हें भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) मिल सकती है।
हालांकि यह अभी तय नहीं है कि उन्हें किस राज्य का कैडर मिलेगा।
लेकिन उनका कहना है कि जहां भी उन्हें काम करने का अवसर मिलेगा, वे पूरी ईमानदारी और समर्पण के साथ काम करेंगी।
माता-पिता का सपना
शिखा ने एक भावुक बात भी कही। उन्होंने कहा कि उनके माता-पिता ने कभी हवाई जहाज में सफर नहीं किया।
इसलिए जब उन्हें मौका मिलेगा, वे अपने माता-पिता को हवाई जहाज में बैठाकर देश के अलग-अलग हिस्सों में घुमाना चाहती हैं।
निष्कर्ष
शिखा गौतम की कहानी यह साबित करती है कि सफलता के लिए बड़े शहर या महंगे स्कूल जरूरी नहीं होते। जरूरी होता है मेहनत, दृढ़ संकल्प और परिवार का समर्थन।
बुलंदशहर की तंग गलियों से निकलकर यूपीएससी जैसी कठिन परीक्षा में सफलता हासिल करना किसी प्रेरणादायक कहानी से कम नहीं है।
आज शिखा गौतम न केवल अपने परिवार बल्कि हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं। उनकी सफलता यह संदेश देती है कि अगर इंसान ठान ले तो कोई भी सपना असंभव नहीं होता।
News
राजस्थान के जोधपुर में ट्यूशन, शक और साज़िश की खौफनाक कहानी — एक रिश्ते ने कैसे ली एक मासूम की जान
राजस्थान के जोधपुर में ट्यूशन, शक और साज़िश की खौफनाक कहानी — एक रिश्ते ने कैसे ली एक मासूम की…
इटावा में महिला कांस्टेबल के इश्क में CRPF जवान ने UPSC छात्र मनीष यादव को दी द#र्दनाक मौ#त!
इटावा में महिला कांस्टेबल के इश्क में CRPF जवान ने UPSC छात्र मनीष यादव को दी द#र्दनाक मौ#त! . . यूपीएससी…
जिस पत्नी के कत्ल में पति गया था जेल वो हरियाणा के गुरुग्राम में मौसेरे भाई से इश्क लड़ा रही थी
जिस पत्नी के कत्ल में पति गया था जेल वो हरियाणा के गुरुग्राम में मौसेरे भाई से इश्क लड़ा रही…
नेताओं और अफसरों की पत्नियों की आ*बरू लू*टने वाले महाराष्ट्र नासिक का कैप्टन बाबा की अजीब करतूत!
नेताओं और अफसरों की पत्नियों की आ*बरू लू*टने वाले महाराष्ट्र नासिक का कैप्टन बाबा की अजीब करतूत! . . विशेष…
विशेष रिपोर्ट: मगदूमपुर की ‘मधु’ और राशन का वह खूनी सौदा – जब भूख के आगे हार गई ममता और मर्यादा
विशेष रिपोर्ट: मगदूमपुर की ‘मधु’ और राशन का वह खूनी सौदा – जब भूख के आगे हार गई ममता और…
मेरठ: आस्था की आड़ में ‘हवस का खेल’, ढोंगी पुजारी और उसके साथी ने महिला के साथ किया कुकर्म; ऐसे फूटा भांडा
मेरठ: आस्था की आड़ में ‘हवस का खेल’, ढोंगी पुजारी और उसके साथी ने महिला के साथ किया कुकर्म; ऐसे…
End of content
No more pages to load






