हाथ में कलावा, नाम ‘प्रिंस’… असली सच कुछ और | Shocking Reality Revealed

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विशेष रिपोर्ट: कलावा, ‘प्रिंस’ और ३०० लड़कियों का सौदा – बस्ती के उस ‘अंधेरे सौदागर’ का काला चिट्ठा

बस्ती, उत्तर प्रदेश। उत्तर प्रदेश का बस्ती जिला आज एक ऐसे जघन्य अपराध का गवाह बना है जिसने न केवल कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को भी झकझोर कर रख दिया है। यह कहानी एक ऐसे शातिर अपराधी की है जिसने आस्था के प्रतीक ‘कलवे’ को अपनी ढाल बनाया और ‘प्रिंस’ बनकर सैकड़ों मासूम जिंदगियों को नरक की दहलीज पर धकेल दिया। पुलिस फाइलों में दर्ज यह मामला केवल धोखे का नहीं, बल्कि एक अंतरराष्ट्रीय मानव तस्करी सिंडिकेट का पर्दाफाश है।

विश्वास का जाल: पहचान का वो घातक छलावा

मामले की शुरुआत साल २०२२-२३ के आसपास हुई, जब बस्ती के एक निजी अस्पताल में काम करने वाली एक युवती की मुलाकात एक प्रभावशाली युवक से हुई। युवक ने अपना नाम ‘प्रिंस’ बताया। उसके हाथ में बंधा कलावा और माथे पर तिलक उसकी धार्मिक पहचान को पुख्ता कर रहे थे। ‘प्रिंस’ ने बहुत ही सधे हुए अंदाज में युवती का विश्वास जीता। उसने उसे बेहतर नौकरी और उज्ज्वल भविष्य का झांसा दिया।

पीड़िता के अनुसार, प्रिंस की बातों में इतनी मिठास थी कि उसे संदेह का एक भी मौका नहीं मिला। धीरे-धीरे यह ‘दोस्ती’ विश्वास में बदल गई, लेकिन उसे यह नहीं पता था कि यह विश्वास उसे एक गहरी साजिश की ओर ले जा रहा है।

साजिश का कमरा और ब्लैकमेलिंग का हथियार

एक दिन नौकरी दिलाने के बहाने प्रिंस ने युवती को एक सुनसान स्थान पर बुलाया। वहां पहुंचते ही प्रिंस का असली और डरावना चेहरा सामने आया। युवती के साथ न केवल दुराचार किया गया, बल्कि शातिर अपराधी ने उस संवेदनशील पल का वीडियो भी बना लिया। यही वह ‘डिजिटल हथियार’ था, जिसके दम पर अगले कई महीनों तक युवती का मानसिक और शारीरिक शोषण किया गया।

डर के मारे खामोश युवती को प्रिंस ने ‘शादी’ का झांसा देकर शांत रखा। लेकिन जब वह उसे अपने घर ले गया, तो सच्चाई किसी बिजली की तरह उस पर गिरी। वहां उसे पता चला कि ‘प्रिंस’ दरअसल अजफरुल हक है। उसके हाथ का कलावा और उसका नाम, सब कुछ एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा था।

सामूहिक सिंडिकेट: जब पूरा परिवार बना अपराधी

जांच में जो सबसे चौंकाने वाला तथ्य सामने आया, वह था अजफरुल के परिवार की संलिप्तता। अजफरुल का पिता मजेर आजाद, उसकी मां और उसकी बहनें—मिसबा उस्मानी और राणा उस्मानी—सब मिलकर इस गिरोह को चला रहे थे। घर की महिलाएं लड़कियों का विश्वास जीतने और उनका ब्रेनवॉश करने का काम करती थीं।

पीड़िता का आरोप है कि उसे एक कमरे में कैद कर दिया गया और उस पर धर्म परिवर्तन का दबाव बनाया गया। विरोध करने पर उसे शारीरिक प्रताड़ना दी गई। इस दौरान उसे पता चला कि वह अकेली नहीं है; अजफरुल और उसका गिरोह अब तक ३०० से ज्यादा लड़कियों को अपना शिकार बना चुका था।

३०० लड़कियां और अंतरराष्ट्रीय तस्करी के तार

पुलिस की प्रारंभिक जांच और पीड़िता के बयानों से यह संकेत मिले हैं कि यह केवल शोषण का मामला नहीं था। यह गिरोह लड़कियों के आपत्तिजनक वीडियो बनाकर उन्हें ब्लैकमेल करता था और फिर उन्हें नेपाल के रास्ते खाड़ी देशों में तस्करी कर दिया जाता था। यह एक संगठित मानव तस्करी का जाल था, जिसका मुख्यालय बस्ती के एक साधारण से दिखने वाले घर में था।

कानून का शिकंजा: मुंबई से बस्ती तक का सफर

अजफरुल हक कोई नौसिखिया नहीं, बल्कि पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज एक ‘हिस्ट्रीशीटर’ था, जिस पर लूट और धोखाधड़ी के २० से अधिक मामले दर्ज थे। मामला तूल पकड़ते ही वह फरार हो गया। बस्ती पुलिस ने उस पर २५,००० रुपये का इनाम घोषित किया और सर्विलांस की मदद से उसे मुंबई के बांद्रा इलाके से गिरफ्तार किया गया।

डीएसपी सत्येंद्र भूषण तिवारी के अनुसार, “आरोपी को रिमांड पर लेकर पूछताछ की जा रही है। हमारा मुख्य उद्देश्य उन लड़कियों का पता लगाना है जिन्हें गायब किया गया है और इस सिंडिकेट के पीछे छिपे अन्य सफेदपोश चेहरों को बेनकाब करना है।”

निष्कर्ष: समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी

बस्ती की यह घटना एक कड़वा सबक है। यह हमें सचेत करती है कि डिजिटल युग में पहचान का संकट कितना गहरा है। ‘प्रिंस’ बनकर अजफरुल हक ने न केवल एक धर्म की पहचान का अपमान किया, बल्कि मानवता का भी कत्ल किया। आज वह सलाखों के पीछे है, लेकिन यह सवाल अभी भी गूँज रहा है—कितनी और बेटियाँ अब भी उन अंधेरी कोठरियों में न्याय का इंतजार कर रही हैं?


बस्ती पुलिस की अपील: यदि आपके आसपास कोई व्यक्ति अपनी पहचान छिपाकर संदिग्ध गतिविधियों में लिप्त है, तो तुरंत निकटतम थाने को सूचित करें। आपकी एक सूचना किसी की जिंदगी बचा सकती है।

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