12 साल के लडके ने दबंग सरपंच के खिलाफ उठाया बड़ा कदम/अंजाम ठीक नहीं हुआ/
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मेरठ के खरखड़ी गांव में 12 साल के लड़के ने दबंग सरपंच के खिलाफ उठाया बड़ा कदम – एक साहसी कहानी
उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के खरखड़ी गांव की यह घटना पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गई है। एक साधारण परिवार, एक मेहनती महिला, उसकी बेटी और 12 साल का बेटा—इनकी जिंदगी अचानक एक तूफान से बदल गई। यह कहानी सिर्फ एक अपराध की नहीं, बल्कि हिम्मत, न्याय और समाज की सच्चाई की कहानी है।
ममता देवी का संघर्ष
ममता देवी, खरखड़ी गांव की एक मेहनती और ईमानदार महिला, तीन साल पहले अपने पति को खो चुकी थी। उसके पास सिर्फ एक एकड़ जमीन थी, जिसमें चार पशु पाल रखे थे। पशुओं से मिलने वाला दूध बेचकर वह अपने बच्चों का पालन-पोषण करती थी। उसका देवर करण सिंह फौजी, फौज में नौकरी करता था और अपनी कमाई का कुछ हिस्सा भाभी को भेजता था। ममता की बेटी रचना 12वीं की छात्रा थी, पढ़ाई में तेज और होशियार। उसका बेटा चेतन, 12 साल का, कक्षा छह में पढ़ता था। परिवार में सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था, लेकिन किसी को नहीं पता था कि आगे चलकर चेतन एक बड़ा कदम उठाने वाला है।

दबंग सरपंच की नजर
गांव का सरपंच हरकेश, एक दबंग और भ्रष्ट व्यक्ति था। वह लोगों को ब्याज पर पैसे देता था और पैसे न लौटाने पर महिलाओं से गलत काम करने की कोशिश करता था। ममता देवी के पति ने तीन लाख रुपये उधार लिए थे, जिसमें से एक लाख लौटाए जा चुके थे। हरकेश बार-बार ममता देवी से पैसे मांगता, लेकिन उसका असली इरादा पैसे नहीं, ममता देवी के साथ गलत काम करना था।
एक दिन खेत में चारा काटते समय हरकेश ने ममता देवी को धमकाया और जबरदस्ती करने की कोशिश की। ममता देवी ने विरोध किया, लेकिन सरपंच ने उसे घसीटकर ईख के खेत में ले जाकर उसके साथ जबरदस्ती की। जाते-जाते सरपंच ने धमकी दी कि अगर ममता ने किसी को बताया, तो वह पूरे परिवार को खत्म कर देगा और उसकी बेटी रचना के साथ भी यही करेगा।
डर और चुप्पी
ममता देवी डर गई। उसने न पुलिस में रिपोर्ट की, न किसी को बताया। वह जानती थी कि सरपंच बहुत ताकतवर है और उसकी बेटी खतरे में पड़ सकती है। दिन बीतते गए, लेकिन ममता के दिल में डर और चिंता बढ़ती गई।
रचना पर सरपंच की नजर
17 सितंबर को सरपंच ने फिर ममता के घर जाकर पैसे मांगे और रचना को देखकर उसकी बुरी नियत और बढ़ गई। सरपंच ने धमकी दी कि अगर पैसे नहीं मिले तो वह घर पर कब्जा कर लेगा। ममता ने अपने देवर करण सिंह को फोन किया, जिसने भरोसा दिलाया कि वह जल्दी ही पैसे लौटा देगा।
24 सितंबर की घटना
24 सितंबर को ममता देवी अपने बेटे चेतन को लेकर कपड़े खरीदने शहर गई। रचना स्कूल चली गई। सरपंच ने मौका देखकर घर पर ताला देखा और समझ गया कि रचना अकेली है। उसने शराब पी, स्कूल के बाहर रचना का इंतजार किया। छुट्टी के बाद उसने रचना को झूठ बोलकर अपनी मोटरसाइकिल पर बैठा लिया कि उसकी मां और भाई का एक्सीडेंट हो गया है।
रचना को खेत में ले जाकर सरपंच ने उसके साथ भी वही घिनौना काम किया, जैसा उसकी मां के साथ किया था। धमकी देकर उसे बस अड्डे पर छोड़ दिया। रचना घर आई, रोती रही, मां को सब बताया। ममता देवी के पैरों तले जमीन खिसक गई।
पुलिस की बेरुखी
ममता देवी अपनी बेटी और बेटे को लेकर पुलिस स्टेशन गई। लेकिन दरोगा अजमत सिंह ने रिपोर्ट लिखने से इनकार कर दिया। दरोगा सरपंच का साथी था, उसने ममता को ताने मारकर भगा दिया। परिवार बेबस होकर घर लौट आया।
चेतन की हिम्मत
12 साल के चेतन के दिल-दिमाग पर बहन के साथ हुए हादसे का गहरा असर पड़ा। उसने तय किया कि अब कुछ करना ही होगा। वह अपने चाचा करण सिंह फौजी के साथ दबंग सरपंच को खोजने निकल पड़ा। दोनों ने गांव में सरपंच को ढूंढा, आखिरकार खेत में सरपंच और उसका नौकर शराब पीते मिले।
करण सिंह ने सरपंच की कनपटी पर पिस्तौल तान दी, लेकिन नौकर ने डंडा मारकर पिस्तौल गिरा दी। चेतन ने पिस्तौल उठाकर सरपंच को चार गोलियां मार दीं। सरपंच मौके पर ढेर हो गया। नौकर भाग गया, गांव में खबर फैल गई कि 12 साल के लड़के ने सरपंच की हत्या कर दी।
पुलिस कार्रवाई
पुलिस मौके पर पहुंची, शव को कब्जे में लिया, पोस्टमार्टम कराया। करण सिंह और चेतन को गिरफ्तार कर लिया गया। चेतन ने पुलिस के सामने अपना जुर्म कबूल किया। नौकर ने भी गवाही दी कि चेतन ने ही सरपंच को गोली मारी थी। दोनों के खिलाफ चार्जशीट दायर कर दी गई।
समाज और सवाल
गांव में चर्चा थी—क्या चेतन और करण सिंह ने सही किया? क्या कानून का सहारा लेना चाहिए था या दबंगई के खिलाफ खुद खड़ा होना जरूरी था? पुलिस की मिलीभगत, सरपंच की दबंगई और एक मासूम लड़के की हिम्मत ने पूरे गांव को झकझोर दिया।
न्याय की उम्मीद
अब सवाल यह है कि जज साहब क्या फैसला देंगे? क्या चेतन के साहस को अपराध मानेंगे या उसके परिवार की मजबूरी को समझेंगे? क्या समाज ऐसे बच्चों को हीरो मानेगा या गुनहगार?
निष्कर्ष
यह घटना बताती है कि जब सिस्टम कमजोर हो जाए, कानून बिक जाए, तो कभी-कभी मासूमों को भी बड़ा कदम उठाना पड़ता है। चेतन ने अपनी बहन और मां की इज्जत बचाने के लिए जो किया, वह कानून की नजर में अपराध है, लेकिन समाज के कई लोगों के लिए वह हीरो बन गया।
आपकी राय क्या है? क्या चेतन का कदम सही था या गलत? क्या कानून से उम्मीद रखना चाहिए या खुद इंसाफ लेना चाहिए?
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